Friday, 29 July 2011
साहित्य और सिनेमा का आस-पड़ोस
अभी हाल ही में वरिष्ठ और मेरे अत्यंत प्रिय कथाकार काशीनाथ सिंह P.hd. की एक मौखिकी के सिलसिले में रीवा आये तो विवि के हिन्दी विभाग में उनका एक व्याख्यान आयोजित कर लिया गया. मेरा दुर्भाग्य ही था कि सूचना न मिल पाने के कारण मैं उन्हें सुन नहीं पाया. अख़बारों और मित्रों से ही जानकारी हुई कि काशीनाथ जी की मशहूर कृति ‘ काशी का अस्सी ‘ पर चन्द्रप्रकाश द्विवेदी एक फिल्म बना रहे हैं, जिसमें सनी देओल, रवि किशन आदि कलाकार भूमिका निभा रहे हैं.
इस सूचना से मन मे यह सवाल पैदा हुआ कि क्या सिनेमा का माध्यम इतना सक्षम है कि वह एक साहित्यिक कृति के साथ न्याय कर सके ? मैं इसको लेकर आश्वस्त नहीं हूँ. मैने ‘काशी का अस्सी’ दो-तीन बार पढ़ा है. इस कृति में—जिसे लेखक ने उपन्यास कहा है—बनारस के अस्सी चौराहे के इर्द-गिर्द के जीवन के संस्मरण हैं, जिन्हें लेखक ने अलग-अलग समय पर लिखा है. इन लेखों के पात्रों और घटनाओं में इतना स्वाभाविक तारतम्य है कि सभी लेखों को एक ज़गह इकट्ठा कर देने में इसका स्वरूप औपन्यासिक दिखने लगता है, लेकिन उपन्यास का सहज प्रवाह फिर भी नहीं सध पाया है.
इस कृति में संकलित हर संस्मरण एक अद्भुत आस्वाद पैदा करता है. चर-अचर सभी पात्रों को लेखक काशीनाथ सिंह ने जिस नज़र से देखा और प्रस्तुत किया है, मुझे नहीं लगता कि सिनेमा के पास वही आस्वाद पैदा कर पाने की क्षमता है. पात्रों की समय और स्थान के साथ अन्तर्सम्बंधों की जो डिटेलिंग और निहितार्थ लेखक ने शब्दों और इशारों से दिए हैं, उन्हें सिनेमा में व्यक्त कर पाना बहुत कठिन है. इन संस्मरणो में अधिकांश समय, लेखक पात्रों के बगल में बैठा हुआ है, जो उन पात्रों की हरकतों और उनके आपसी संवादों की व्याख्या करता चलता है. जाहिर है कि जो मर्म पाठक के सामने खुलता है, वह दृष्टा-लेखक की रुचि-संस्कार और निष्ठा से गुज़र कर आता है.
यहीं पर साहित्य और सिनेमा की सीमाएँ सामने आती हैं. साहित्य किसी दृश्य या घटना की जो व्याख्या या विश्लेषण करता है, हर पाठक के पास वही पहुँचता है. पाठकों के आस्वाद के स्तर में अंतर के आधार पर उसका प्रभाव अलग-अलग हो सकता है. यह अंतर प्रभाव की तीव्रता में होता है, उसके रूप में नहीं. सिनेमा के पास दृश्य होते हैं. उनकी व्याख्या और विश्लेषण की सुविधा बहुत ही कम होती है उसके पास. मज़े की बात यह है कि साहित्य में जो व्याख्या उसके प्रभाव को बढ़ा देती है, उसी व्याख्या की कोशिश सिनेमा के असर को चौपट कर देती है. जो विवरण साहित्य की ताकत होता है, वही सिनेमा की कमज़ोरी बन जाता है.
वहीं सिनेमा के पास अपनी कुछ विशिष्ट शक्तियाँ होती हैं जो साहित्य के पास नही हैं. संगीत के प्रयोग की शक्ति, सिनेमा को सम्प्रेषणीयता की ऐसी क्षमता प्रदान करती है जो उसे दूसरे और माध्यमों से अलहदा बनाता है. सिनेमा अपने ध्वनि और प्रकाश माध्यमों से ऐसे बहुत कुछ अव्यक्त को को व्यक्त कर देता है, जिसे कह पाने मे महान लेखक भी लड़खड़ा जाते हैं. काल के अतिक्रमण की जो सुविधा सिनेमा के पास होती है, वह साहित्य के पास ठीक उसी तरह से नहीं होती. मौन की जिस भाषा का इस्तेमाल सिनेमा सहजता से कर लेता है, उसी मौन को रचने के लिए साहित्य को पहले और बाद में बहुत सी वाणी खरचनी पड़ती है.
इस अंतर को और आसानी से समझने के लिए कुछ देर के लिए हम ऐसा करें कि कुछ महान कृतियों की अपनी कल्पना में फिल्म बनायें और कुछ महान फिल्मों की कल्पना मे ही कहानी लिखें. फिर देखिए कैसी हास्यास्पद स्थिति बनती है.
साहीत्य और सिनेमा का सम्बंध भी दो पड़ोसियों की तरह रहा. दोनो एक दूसरे के काम तो आते रहे लेकिन यह कभी सुनिश्चित नही हो पाया कि इनमे प्रेम है या नही. सिनेमा ने अपने आरंभिक चरण में साहित्य से ही प्राण-तत्व लिया. यह उसके भविष्य के लिए ज़रूरी भी था. दरअसल सिनेमा और साहित्य की उम्र में जितना अधिक अंतर है, उतना ही अंतर उनकी समझ और सामर्थ्य में भी है. सिनेमा अभी सिर्फ 117 साल का हुआ है. साहित्य की उम्र से इसकी तुलना की जाय तो यह अभी शिशु ही है साहित्य के सामने.
साहित्य के पास सिनेमा की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए अथाह भंडार है. भाव-दशा, पात्रों, दृश्यों, वास्तुकला, परिवेश और भावनात्मक स्थितियों के दृश्यात्मक ब्यौरे हैं. साथ ही भाव-भंगिमा, ध्वनियों, शब्दों और संगीत के सूक्ष्म प्रभावों तक के विवरण साहित्य के पास मौज़ूद हैं. सुखद बात यह है कि साहित्य ने सिनेमा की मदद में कभी कोताही नहीं की. सिनेमा को जब-जब ज़रूरत हुई साहित्य ने खुले मन से उसका सहयोग किया. यह बात और है कि आगे चलकर सिनेमा ने अपना खुद का एक लेखक-वर्ग तैयार कर लिया.
सिनेमा ने साहित्य के अनेक मनीषियों को अपनी ओर खींचा. पं.बेताब, मुंशी प्रेमचंद, जोश मलीहाबादी, पं.सुदर्शन, सआदत हसन मंटो, कृष्न चंदर, कैफ़ी आज़मी, जावेद अख़्तर, राजेन्द्र सिंह बेदी और गुलज़ार जैसे खालिस साहित्यिक व्यक्तित्व सिनेमा में अभिव्यक्ति के नये आयाम खोजने गये. पर दुर्भाग्य से अधिकतर के हाथ निराशा ही लगी. दरअसल सिनेमा एक व्यावसायिक माध्यम है और उसके सिद्धांत, लेने में अधिक और देने पर कम ही आधारित होते हैं. एक और बात ध्यान देने की है कि सिनेमा त्वरित और सहज लोकप्रियता के लिए रचा जाता है. यह भी एक वज़ह धी कि गंभीर साहित्यिक लेखक इस माध्यम से अपना सामंजस्य नहीं बनाये रख सके.
साहित्यकार फिल्मों में जाकर भले ही उतने सफल न रहे हों, लेकिन जब-जब सिनेमा ने साहित्यिक कृतियों पर फिल्में बनायी हैं तो एक नये रचनात्मक लोक की सृष्टि की है. प्रेमचन्द के ‘ गोदान ‘ पर बनी फिल्म को छोड़ दें तो रेणु की कहानी पर बनी ‘तीसरी कसम’ ने दुनिया को कुछ अमर पात्र दिये. महाश्वेतादेवी की कहानी पर बनी ‘रुदाली’ के दृश्य अविस्मरणीय हैं. विमल मित्र के उपन्यास पर बनी ‘साहब,बीवी और गुलाम’, टैगोर की कहानी-‘नष्टनीड़’ पर सत्यजीत राय की फिल्म ‘चारुलता’, सृजन के नये आयामों की तलाश करती हैं.
एक बहुत बड़ा फर्क अब साहित्य और सिनेमा की भाषा मे आया है. इसका सीधा संबन्ध दर्शकों-पाठकों की भागीदारी से है. सिनेमा का दर्शक सीधे शामिल होता है. हर दर्शक के पास हर स्थिति के लिए सुझाव होते हैं. सिनेमा की सारी सफलताओं-असफलताओं का दारोमदार इसी दर्शक-वर्ग पर होता है. सिनेमा को समीक्षकों की उतनी जरूरत नही होती जितनी साहित्य को होती है. यही वज़ह है कि सिनेमा रचने वालों ने दर्शक से तादात्म्य बैठाना शुरू किया तो सिनेमा की रचनात्मकता धीरे-धीरे कम होने लगी. सिनेमा ने बहुत आरंभिक समय मे ही अपने आप को एक स्वतंत्र विधा के रूप में महसूस करना शुरू कर दिया था. दर्शकों के मेल से उसने अपनी जो सिनेमाई भाषा विकसित की उस पर उसका भरोसा दिनो-दिन बढ़ता गया. साहित्य और सिनेमा की भाषा का अंतराल अब इतना बढ़ चुका है कि ये दोनो माध्यम अब महानगरीय पड़ोसियों की तरह दिखने लगे हैं.
Thursday, 21 July 2011
अहा और आह के बीच ग्राम्य जीवन !
जिन दिनों एक कवि के कण्ठ से फूट पड़ा था—“ अहा ग्राम्य जीवन भी क्या है “—उन दिनों भारत के गांव इतने हीनताबोध से ग्रस्त नहीं रहे होंगे जितने आज हैं. वह समय ऐसा था जब देश में शहरों की संख्या भी कम थी और उनके मायालोक की सूचनाएँ भी गांवों तक बहुत कम ही पहुँचती थीं. यह बात भले ही बहुत पुरानी न हो लेकिन इस समय भी गांवों के आर्थिक स्वाबलंबन के भग्नावशेष मौजूद थे. तब से लेकर आज तक में भारतीय गांवों के चित्र और चरित्र दोनो ही बहुत बदल गये हैं. हमारी बुजुर्ग और अधेड़ पीढ़ी जिस पीपल की छाँव और धानी चूनर के नास्टेल्जिया में जी लेती है, उसकी हकीकत बेहद दिल-शिकन है.
अभी हाल ही में सरकार ने जनगणना-2011 के अस्थाई आंकड़े जारी किये जो यह बताते हैं कि 121 करोड़ की आबादी के इस महादेश में 83 करोड़ लोग यानी लगभग 70 फीसदी लोग गांवों में ही रहते हैं. जब यह कहा जाता है कि भारत की आत्मा गांवों में बसती है, तो यह कथन अलंकारिक होने के बावजूद सच के बेहद करीब ठहरता है. भारत की आत्मा जिन गांवों में बसती है उनकी खुशहाली का अंदाज़ा लगाने के लिए यह जान लेना ठीक रहेगा कि पिछले एक दशक (2001-2011) में 3.5 फीसदी लोगों ने गांव छोड़ दिया और शहरों में जा बसे. 121 करोड़ की आबादी में साढ़े तीन प्रतिशत, सुनने मे चाहे भले ही छोटा लगे लेकिन हल करने में जो आँकड़ा सामने आता है वह इतना समझने के लिए पर्याप्त है कि इतनी जनसंख्या जब शहरों में पहुँची होगी तो उन शहरों पर दवाब कितना बढ़ गया होगा ?
लेकिन मैं यहाँ मैं सिक्के के दूसरे पहलू को देखना चाहता हूँ. मेरी दिलचस्पी इसमें है कि वो कौन से हालात हैं जिनकी वज़ह से इतनी बड़ी तादात में गांवों से शहर की ओर लोगों का पलायन हो रहा है, इस पर विचार करने से पहले यह भी जानते चलें कि पिछले दस सालों में भारत की आबादी में 18.14 करोड़ की बढ़ोतरी हुई है, जिसमें गांवों में 9.04 करोड़ और शहरों में 9.10 करोड़ लोग बढ़ गये हैं. और यह भी ध्यान मे रखना ठीक रहेगा कि इसी बीच केवल म.प्र. में ही लगभग 82 शहर बढ़ गये हैं और लगभग 500 गांव खत्म हो गये हैं.
नये शहरों की पैदाइश और पुराने गांवों की की मृत्यु चिन्ता की बात नहीं है. इसको लेकर भावुक होने की कोई ज़रूरत नहीं है क्योंकि यह विकास की एक सहज प्रक्रिया है. असल चिन्ता की वज़ह वह खाई है जो भरत के शहरों और ग्रामीण इलाकों के बीच बनी हुई है.
देश की अर्थव्यवस्था में ग्रामीण क्षेत्रों की हिस्सेदारी कम होते होते ऐसी दयनीय अवस्था में पहुँच गई है कि जो गांव पहले खुदमुख्तार हुआ करते थे वो आज आज शहरी उत्पादन-इकाइयों के टुकड़ो पर पलने के लिए मज़बूर हो गये हैं. इस देश की अर्थव्यवस्था इतनी तेजी से एकांगी हुई है कि अब भी अगर कोई इसे मिश्रित अर्थव्यवस्था कहता है तो उसका भ्रम बहुत जल्दी ही टूट जाएगा. उत्पादन और वितरण के लगभग सभी साधनों पर पूँजीवादी संस्थाओं का नियंत्रण हो चुका है. सार्वजनिक क्षेत्र की सभी इकाइयाँ बीमार होकर दम तोड़ रही हैं. ऐसी दशा में यह तो तय था कि नियंत्रण की डोर उन्हीं के हाथों में रहनी है जिनके पास पूँजी है.
जाहिर है कि पूँजी के सभी केन्द्र भारत के नगरों में स्थानान्तरित हो चुके हैं. गांव से कुम्हार,जुलाहे, तेली, मोची,दर्जी,दरवेश,बनिए,लोहार आदि विलुप्त हो चुके हैं. ये गांव की उत्पादन इकाइयां थीं. औद्योगीकरण की विक्षिप्त नीतियों के चलते ग्रामीण अर्थव्यवस्था के ये सभी स्तम्भ ध्वस्त हो चुके हैं. जनगणना के जब और आँकड़े सामने आयेंगे तो निश्चित ही यह पता चल जायेगा कि ग्रामीण क्षेत्रों में बेरोजगारी बढ़ने की दर, शहरी क्षेत्रों से बहुत अधिक होगी.
गांवों के पास उत्पादन की केवल एक इकाई रह गई है, वह है-कृषि. और यही उनकी दुर्दशा का भी कारण है. हमारे देश में तमाम प्रयासों के मायाजाल के बाद भी कृषि प्रकृति की कृपा पर ही निर्भर है. पिछले दो दशकों में प्रकृति का मिजाज़ कुछ इस तरह से बिगड़ा है कि गांव के बड़े-बड़े ज़मींदारों तक की मूँछों का पानी उतर गया है.आज से बीस साल पहले गांव के लोग जितनी ज़मीन और जितनी खेती में जिस रौब के साथ अपने परिवार को रखते थे , उतनी ही ज़मीन वाले कृषक आज दरिद्रता में जी रहे हैं.
इस दरिद्रता के आने की वज़ह भी साफ हैं. गांवों में दूरदर्शन पहुँचा, मोबाइल फोन पहुँचा. इनके साथ कुरकुरे,पेप्सी और अंकल चिप्स पहुँच गये. कारखानों में बनी पैकेट-बन्द चीज़ों ने गांव-घर की हस्तकला को समूल नष्ट कर दिया. लोगों की आकांक्षाओं को नागर पंख तो मिल गये, लेकिन आय के हाथ-पैर काट लिए गये. नगरों के दृश्य और महत्वाकांक्षाएं तो गांवों में पहुच गईं, लकिन उत्पादन और आय की विधियाँ वहाँ तक नहीं पहुँची. ऐसे में दरिद्रता के अलावा गांवों में और हो भी क्या सकता था.
दरिद्रता गांवों का भाग्य नही थी. इस इबारत को हमारे नीति-निर्माताओं ने लिखा है. मैने जिन गांवों को देखा है उनमे से अधिकांश में दूरदर्शन और मोबाइल के नेटवर्क तो मिल जाते हैं, लेकिन बिजली, पानी और सड़कें नहीं मिलतीं. जहां बिजली पहुँच भी चुकी है वहां कुछ इस तरह से पहुँची है कि पचास प्रतिशत लोग ही उसका उपयोग कर पाते हैं, वह भी चौबीस में से छः या आठ घंटे ही. पानी के लिए लोगों को दो-तीन मील दूर जाना पड़ता है. जिन गांवों तक सड़कें पहुँची भी हैं तो उनकी दशा पगडंडियों से बेहतर नहीं है.
सबसे खराब दशा शिक्षा और स्वास्थ्य की है. ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा का जो बुनियादी ढाँचा और स्तर है, उसकी तुलना शहरी शिक्षण संस्थाओं से करने पर भारत के गांवों की दरिद्रता के सारे राज़ खुल जाते हैं. दो झोपड़ीनुमा कमरों या किसी पेड़ के नीचे दो किसाननुमा मास्टरों के आगे उछल-कूद करते ढाई-तीन सौ बच्चे. पेट में दर्द होने पर किसी तलैया या घर की तरफ भगते बच्चे...स्कूल के साथ-साथ खेत की निदाई-गहाई भी निपटाते मास्टर जी—अमूमन यही है हमारे गांवों की शिक्षा व्यवस्था का विहंगम दृश्य. इन विद्यालयों से पढ़कर निकले बच्चे सिर्फ इतनी ही योग्यता हासिल कर पाते हैं कि वो शहरी बच्चों की दासता कर सकें. इन्टरमीडियट तक की शिक्षा के लिए इन्हें 10 से 15 किमी दूर जाना पड़ता है तथा उच्चशिक्षा के लिए कम से कम 50 किलोमीटर. ऐसे में आधे छात्रों की पढ़ाई इन्टर के बाद बन्द हो जाती है.
स्वास्थ्य सुविधाओं का हाल यह है कि गांव के हर घर के पिछवाड़े में नसबन्दी और पोलियो उन्मूलन के नारे तो पोत दिए गये हैं, लेकिन गांव के किसी व्यक्ति का मलेरिया भी ज़रा बिगड़ जाये तो कोई इलाज़ करने वाला नहीं मिलता. आस-पास के स्वास्थ्य केन्द्रों में जो चिकित्सक तैनात हैं वो कभी वहां जाते ही नही. हालांकि सरकार ने इन्हें खूब धमकाया भी और प्रलोभन भी दिया.
ऐसा भी नहीं है कि सरकार गांवों की दशा के प्रति बिल्कुल ही असंवेदनशील है. हर वर्ष केन्द्रीय और प्रादेशिक बजट में भारी भरकम राशि ग्रामीण विकास के लिए समर्पित की जाती है. रोज़गार से लेकर शिक्षा और स्वास्थ्य के लिए एक से बढ़कर एक योजनाओं का उद्घाटन और शिलान्यास चलता रहता है, लेकिन गांवों की छाती पर पड़ी दरिद्रता की शिला टस से मस नहीं होती. ऐसे में जो लोग भाग सकते हैं वो शहर भाग जाते हैं. शहर पहुँचकर उनका क्या हाल होता है, इसकी चर्चा फिर कभी करेंगें.
Monday, 18 July 2011
विभागाध्यक्ष की कार्पेट पर अमीबा...
हमेशा की तरह राजा विक्रमादित्य बेताल को लेकर चले तो शर्त के मुताबिक बेताल ने कहानी शुरू की--------
राजन, विश्वविद्यालय के अँग्रेजी के विभागाध्यक्ष प्रो.मिश्रा कई दिनो से परेशान थे...उनके साथ एक विचित्र किन्तु सत्य टाइप की घटना हो रही थी कई दिनों से ,जिसे वो किसी से कह नहीं पा रहे थे......
कोई उनके चेम्बर में, फर्श पर बिछी कीमती कालीन पर पेशाब कर जाता था.....
प्रो.मिश्रा शौकीन तबीयत के आदमी थे. सो अँग्रेजी विभाग में अपने चेम्बर को खूब आकर्षक रंग-रूप दे रखा था...एक रोज़ जब विभाग में पहुचे तो देखा कि उनकी टेबल के ठीक सामने हरे रंग की कालीन पर फाइन आर्ट टाइप का एक धब्बा बना हुआ है. चपरासी को बुलाकर पूछा----" ये धब्बा कैसा है यहाँ पर ? ".....
चपरासी कुछ सकपकाते हुए बोला----" साहब पानी का होगा.".....प्रो.मिश्रा ने उँगलियों से धब्बे को दबाया और सूँघकर बोले----" बेवकूफ , पानी का नही पेशाब का धब्बा है !"
उस दिन से रोज़ कोई उनके पहुँचने से पहले कलीन पर पेशाब कर जाता था. विभाग का दरवाज़ा खोलकर , चपरासी साफ-सफाई के बाद जब पानी लेने चला जाता, इसी बीच कोई आकर ये कारनामा कर जाता....
प्रो.मिश्रा ने तंग आकर पेशाब करने वाले को पकड़ने की योजना बनाई...
एक दिन वो अपने समय से काफी पहले विभाग पहुँच गये.दरवाज़ा उन्होने खुद खोला, और जाकर आल्मारी के पीछे छुप गये....लगभग पौन घंटा बाद एक आकृति ने उनके कमरे में प्रवेश किया....इधर-उधर देखकर आकृति विभागाध्यक्ष के टेबल के सामने बैठ गई.....और जब उठी तो वहाँ पर अमीबा की तरह का एक गीला धब्बा बन गया था.....
आकृति जाने को ही थी कि प्रो. मिश्रा आल्मारी के पीछे से कूद पड़े----" मिसेज़ तिवारी आप !! ये क्या करती हैं आप !!!"....
असिस्टेन्ट प्रो., मिसेज़ तिवारी अवाक् रह गईं थीं...सर..सर.. करते हुए सर्रर्रर्रर्र.....से बाहर भागीं......
माज़रा ये था कि प्रो. मिश्रा चाहते थे कि मिसेज़ तिवारी मातहत होने के नाते उन्हें अपना प्रेम-पात्र बनायें, जबकि मिसेज़ तिवारी अपना बसन्त रसायन विभाग के विभागाध्यक्ष पर लुटा रही थीं....बहुत समझाने-बुझाने के बाद भी जब मिसेज़ तिवरी नहीं समझीं तो प्रो. मिश्रा ने उनकी वेतनवृद्धि में अड़ंगा लगा दिया था....खिसियाकर मिसेज़ तिवारी ने उनके चेम्बर में पेशाब करना शुरू कर दिया.
कहानी खत्म कर बेताल ने प्रश्न पूछा-----" अब तू ही बता विक्रम ! असली अपराधी कौन है, मिसेज़ तिवारी--कि प्रो. मिश्रा ?? "
राजन, विश्वविद्यालय के अँग्रेजी के विभागाध्यक्ष प्रो.मिश्रा कई दिनो से परेशान थे...उनके साथ एक विचित्र किन्तु सत्य टाइप की घटना हो रही थी कई दिनों से ,जिसे वो किसी से कह नहीं पा रहे थे......
कोई उनके चेम्बर में, फर्श पर बिछी कीमती कालीन पर पेशाब कर जाता था.....
प्रो.मिश्रा शौकीन तबीयत के आदमी थे. सो अँग्रेजी विभाग में अपने चेम्बर को खूब आकर्षक रंग-रूप दे रखा था...एक रोज़ जब विभाग में पहुचे तो देखा कि उनकी टेबल के ठीक सामने हरे रंग की कालीन पर फाइन आर्ट टाइप का एक धब्बा बना हुआ है. चपरासी को बुलाकर पूछा----" ये धब्बा कैसा है यहाँ पर ? ".....
चपरासी कुछ सकपकाते हुए बोला----" साहब पानी का होगा.".....प्रो.मिश्रा ने उँगलियों से धब्बे को दबाया और सूँघकर बोले----" बेवकूफ , पानी का नही पेशाब का धब्बा है !"
उस दिन से रोज़ कोई उनके पहुँचने से पहले कलीन पर पेशाब कर जाता था. विभाग का दरवाज़ा खोलकर , चपरासी साफ-सफाई के बाद जब पानी लेने चला जाता, इसी बीच कोई आकर ये कारनामा कर जाता....
प्रो.मिश्रा ने तंग आकर पेशाब करने वाले को पकड़ने की योजना बनाई...
एक दिन वो अपने समय से काफी पहले विभाग पहुँच गये.दरवाज़ा उन्होने खुद खोला, और जाकर आल्मारी के पीछे छुप गये....लगभग पौन घंटा बाद एक आकृति ने उनके कमरे में प्रवेश किया....इधर-उधर देखकर आकृति विभागाध्यक्ष के टेबल के सामने बैठ गई.....और जब उठी तो वहाँ पर अमीबा की तरह का एक गीला धब्बा बन गया था.....
आकृति जाने को ही थी कि प्रो. मिश्रा आल्मारी के पीछे से कूद पड़े----" मिसेज़ तिवारी आप !! ये क्या करती हैं आप !!!"....
असिस्टेन्ट प्रो., मिसेज़ तिवारी अवाक् रह गईं थीं...सर..सर.. करते हुए सर्रर्रर्रर्र.....से बाहर भागीं......
माज़रा ये था कि प्रो. मिश्रा चाहते थे कि मिसेज़ तिवारी मातहत होने के नाते उन्हें अपना प्रेम-पात्र बनायें, जबकि मिसेज़ तिवारी अपना बसन्त रसायन विभाग के विभागाध्यक्ष पर लुटा रही थीं....बहुत समझाने-बुझाने के बाद भी जब मिसेज़ तिवरी नहीं समझीं तो प्रो. मिश्रा ने उनकी वेतनवृद्धि में अड़ंगा लगा दिया था....खिसियाकर मिसेज़ तिवारी ने उनके चेम्बर में पेशाब करना शुरू कर दिया.
कहानी खत्म कर बेताल ने प्रश्न पूछा-----" अब तू ही बता विक्रम ! असली अपराधी कौन है, मिसेज़ तिवारी--कि प्रो. मिश्रा ?? "
Sunday, 17 July 2011
स्व. चिड़ीमार वनवासी तीरंदाजी सम्मान
जब कई दिनों तक राजा विक्रमादित्य बेताल को पकड़ने नहीं आया तो बेताल उदास रहने लगा. चुड़ैलों के नृत्य-गान भी उसका मन न बहला पाते. शाम होते ही वह श्मशान के मुख्य दरवाज़े पर जाकर बैठ जाता और विक्रम की प्रतीक्षा करता.
बहुत दिन बाद जब विक्रम श्मशान आया तो कुछ दुर्बल दिखाई पड़ रहा था. उसे देखकर बेताल ने कुछ चिन्तित होकर उसकी दुर्बलता का कारण पूछा. विक्रम ने बताया कि उसे बवासीर की बीमारी हो गई थी. गुदामार्ग से निरंतर रक्त-स्राव के कारण दुर्बलता आ गई है.
विक्रम की यह दशा देखकर बेताल उसके साथ पैदल ही चल पड़ा...रास्ता काटने के लिए उसने कहानी शुरू की----
राजन् ! तुमने महाभारत के गुरु द्रोण का नाम तो सुना ही होगा , जिनके प्रिय शिष्य अर्जुन ने तीरंदाजी में बड़ी ख्याति अर्जित की थी. गुरु द्रोण युद्ध-कला से सम्बंधित एक त्रैमासिक पत्रिका ' आखेट ' का प्रकाशन भी किया करते थे, जिसका अधिकतर काम-काज अर्जुन ही देखता था. यह पत्रिका राजवंश से आर्थिक सहायता प्राप्त थी.
एक दिन गुरु द्रोण अपने शयनकक्ष में विश्राम कर रहे थे. गर्मी का समय था. अर्जुन आम की गुठली को पीसकर, सरसो के तेल में मिलाकर ले आया. यह लेप गुरु द्रोण के तलवों में मलने लगा. इस लेप से गर्मी का प्रकोप कदाचित कुछ कम हो जाता था.
तलवों में लेप मलते हुए अर्जुन किंचित सकुचाते हुए गुरु द्रोण से कहा--" गुरुवर, आपकी कृपा से आज मुझे संसार का सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर माना जाता है. एकलव्य का अंगूठा मागकर ,मेरे पथ के सभी कांटे आपने दूर कर दिए. कर्ण का प्रमाणपत्र तो आपने पहले ही निरस्त कर दिया था. अब मेरा कोई प्रतिद्वन्द्वी नहीं है...गुरुवर अब तीरंदाजी का कोई सम्मान भी मिल जाता तो मेरी भी प्रतिष्ठा बढ़ जाती और आपकी भी."
गुरु द्रोण ने करवट बदली. उदर में अठखेलियां करती हुई वायु को मुक्त किया और बोले---" हाँ अर्जुन, मैं भी कई दिनों से यही सोच रहा था. तुम्हें सम्मान मिल जाने से हमारी कोचिंग संस्था का नाम ऊँचा होगा और विद्यार्थियों की संख्या भी बढ़ जायेगी....ऐसा करो, हमारी पत्रिका के इसी अंक में एक सम्मान की घोषणा कर दो---' स्व. चिड़ीमार वनवासी तीरंदाजी सम्मान ' .....अर्जुन ने बीच में टोंका---" गुरुदेव,ये चिड़ीमार कौन था ?"
" यह एक बहेलिया था "---गुरु द्रोण ने बताया. " मेरे ही गांव का था. बाल्यावस्था में हम लोग इससे तीतर और बटेर मरवाकर चुपके से खाया करते थे. बड़ा अचूक निशानेबाज़ था." " और सुनो, ऐसा करना "---गुरु द्रोण ने रणनीति समझाते हुए कहा---" इस सम्मान के लिए एक तीन सदस्यीय निर्णायक मंडल बना लो...एक तो कृपाचार्य ही हो जायेंगे. दो और लोगों के नाम सोचकर उन्हें पत्र लिख दो.मगध और काशी के आचार्यों को ही रख लो, उनकी नियुक्ति के समय मैं ही एक्सपर्ट था.कोई गड़बड़ न होगी. अपना बायोडाटा बनाकर तीनो निर्णायकों के पास भेज दो...अगर दूसरे लोगों की प्रविष्टियां आती हैं तो उन्हें भेजने की आवश्यकता नहीं है...यह तो सभी जानते ही हैं कि तुम संसार के सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर हो."
अर्जुन ने पुलकित होकर द्रोण के चरणो में सिर रखा और सीधे पत्रिका-कार्यालय चला गया.
त्रैमासिक पत्रिका-' आखेट ' के ताज़ा अंक में ' स्व. चिड़ीमार वनवासी तीरंदाजी सम्मान ' की सूचना प्रकाशित हुई. पात्र व्यक्तियों से प्रविष्टियां मगाई गई थीं. अन्य लोगों के साथ कर्ण और एकलव्य ने भी प्रविष्टि भेजीं जिन्हें पत्रिका कार्यालय में ही जमा कर दिया गया. गुरु द्रोण की तरफ से एक पत्र लिखकर कर्ण और एकलव्य को सूचित किया गया कि चूँकि आपने अपने बायोडाटा में जाति-प्रमाणपत्र नहीं लगाया था, अतएव आपकी प्रविष्टि विचार योग्य नहीं पाई गई.
'आखेट ' के दीपावली विशेषांक में, 'स्व. चिड़ीमार वनवासी तीरंदाजी सम्मान ' अर्जुन को देने की घोषणा प्रकाशित हुई और यह भी सूचना दी गई कि नववर्ष के प्रथम दिन हस्तिनापुर नरेश धृतराष्ट्र यह सम्मान प्रदान करेंगे.
इस सूचना के बाद दुर्योधन वगैरह ने कुछ हो-हल्ला मचाया लेकिन पितामह ने उन्हें " घर की ही बात है "-का हवाला देकर शांत करा दिया.
कहानी खत्म कर बेताल ने विक्रम से पूछा---" राजन् तनिक विचार कर बताओ ! यह सम्मान देकर द्रोण ने किसकी प्रतिभा का अपमान किया है ??? "
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Friday, 15 July 2011
हमारी निरुपायता का कोई जवाब नहीं
आप भी महसूस तो कर ही रहे होंगे की दिल्ली सरकार का रथ एक अर्से से लड़खड़ाया हुआ है. न तो उसकी दिशा समझ में आ रही है,न ही उसकी गति का कोई अंदाज़ा मिल पा रहा है. इस रथ के कुछ घोड़े कभी सरपट दौड़ लगाते हैं तो कुछ चलने को तैयार ही नहीं हैं. जो सारथी है वह कभी बेचारा तो कभी अनाड़ी नज़र आता है.
भारत की राजनीति में ऐसे अवसर कम ही नज़र आये होंगे जब न तो पक्ष के पास कोई दिशा हो,न विपक्ष के पास. सत्तापक्ष में जहाँ कोई नेतृत्व ही नही दिख रहा है, तो विपक्ष के पास मुद्दों का टोटा पड़ा है. विपक्षी दलों की सारी मेधा मिलकर भी एक अदद ऐसे मुद्दे की तलाश नहीं कर पा रही है, जिसे वो पूरे आत्मविश्वास के साथ देश की जनता के सामने रख सकें और कह सकें कि हमको इस बिनाह पर सत्ताधारियों से अलग समझा जाये. आत्मविश्वास की कमी का ही परिणाम है कि विपक्ष को दूसरों के मुद्दों में सेंध लगानी पड़ती है. अन्ना हजारे और बाबा रामदेव के आन्दोलनों में बिना बुलाए मेहमान की तरह जाना पड़ता है और धक्के खाने पड़ते हैं.
राजनीतिक स्वप्न-शून्यता की यह स्थिति तब है जब देश अनेक स्तरों पर गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहा है. बेतहाशा बढ़ती मंहगाई के बीच सरकार के कण्ठ से एक लाचार आश्वासन के अलावा कुछ नहीं फूटता है. आम जनता न तो अर्थशास्त्र की सैद्धान्तिकी समझती है और न ही उसे सेन्सेक्स की उत्तेजना से कोई फर्क पड़ता. दशमलव के इर्द-गिर्द, मुद्रा-स्फीति किस तरह से ठुमके लगाती है, आम जनता का मन इससे भी नहीं बहलता. दावा तो नहीं पर विश्वास है कि देश की अस्सी फीसदी जनता तो जानती भी नहीं है कि यह मुद्रा-स्फीति किस बला का नाम है, और सेन्सेक्स की उत्तेजना किस वियाग्रा को खाने से बढ़ती है !!
यही अस्सी फीसदी जनता है जो सरकार के भरोसे नहीं, भगवान के भरोसे जी रही है. जिन माई-बापों को चुनकर उसने दिल्ली-भोपाल भेजा, उन्हें न तो इस जनता से कोई लेना देना है और न ही देश चलाने का शऊर है. आप अगर ध्यान से इन रहनुमाओं के बयान और हरकतें देखते होंगे तो अपना माथा ज़रूर ठोंकते होंगे कि इन जाहिलों को उस गद्दी तक पहुँचाने में एक वोट आपका भी है. आपका एक वोट आपको कितनी चोट पहुँचाता है, यह सिर्फ आप ही बेहतर जानते हैं.
लेकिन सत्ता के गलियारों में बे-खौफ़ घूमते ये सफेदपोश सचमुच इतने जाहिल भी नही हैं. हमारे भारत नाम के इस राष्ट्रीय-उद्यान के ये राष्ट्रीय प्रतीक हैं. यह देश इनके लिए आरक्षित है. इन्हें यह विशेषाधिकार है कि अब ये अपनी जनता खुद चुन लें.
जिन नेताओं को पहले हमने चुना, उन्होने अब अपनी जनता चुन ली है. सौ में अस्सी घटाने के बाद जो बीस फीसदी लोग बचते हैं-यह देश उनका है. तरक्की के सारे रास्ते उनके हैं. सारे राग-रंग, रोशनी के सभी झरोखे इसी बीस फीसद जनता के हैं. यहीं अंबानी-टाटा, कलमाणी,राजा और सत्यसाँईं जैसे लोग पैदा होते है, जिनकी सम्पत्तियों का कोई हिसाब नहीं. सरकार का सारा खाद-पानी इन्हीं पौधों को पोषने में खत्म हो जाता है. इसी हरियाली को दुनिया को दिखाकर सरकार वाहवाही लूटती है. अमेरिका और चीन के सामने खड़े होकर ताल ठोकने वाली सरकार को क्या पता नहीं होगा कि देश की सत्तर प्रतिशत आबादी बीस रुपये प्रतिदिन की औसत कमाई में क्या खाती और क्या पहनती होगी ?
पता तो है.पता तो यह भी है कि ए.राजा, राजा कैसे बने. पता तो यह भी है कि कलमांड़ी, कनुमोझी के दरवाज़े किधर खुलते हैं और किधर बंद होते हैं. सरकार को पता तो यह भी है कि स्विटजरलैण्ड कौन जाता है और वहाँ के बैंकों में किसका पैसा है. हम और आप, जिन्होंने स्विटजरलैण्ड का नक्शा तक ठीक से नहीं देखा है, वहाँ पैसा जमा करने तो जा नहीं सकते. हमारी ज़ेबों में जो पैसा होता है वह शाम को घर लौटते समय किराने की दूकान और सब्ज़ी के ठेलों पर जमा हो जाता है.
तो बोलें जितने अन्ना-बाबा बोलते हों....सरकार ने कान में रुई ठूंस लिया है. सुप्रीम कोर्ट का यह कहते-कहते दम फूलने लगा है कि भाई काला धन जमा कराने वालों का नाम जाहिर करिए. कौन बताएगा ? पक्ष या विपक्ष ?? किसका दामन साफ है. जो सरकार में हैं, सारे संसाधनों पर उनका कब्ज़ा है. कमाई के अनन्त मनोरम स्रोत हैं. जो विपक्ष में हैं वो कभी सत्ता में थे या आगे कभी होंगे. तो कौन अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारेगा भला !
लोकपाल और काले धन को लेकर सरकार और विपक्ष दोनो ने जिस तरह का चूहे-बिल्ली का खेल शुरू किया है वह बेहद शर्मनाक है. यह पहली बार हुआ था कि देश की जनता ने अपने प्रतिनिधियों पर गंभीर अविश्वास जताते हुए सीधा सवाल पूछा था कि क्यों न आपके ऊपर भी निगरानी रखी जाये ? इस सवाल पर सिब्बल-दिग्विजय की तिलमिलाहट को सारे देश ने देखा. उनके बेशर्मी भरे बयानों को हर कान ने सुना. भ्रष्टाचार के खिलाफ इस सशक्त जनचेतना को निश्चेत करने के लिए सरकार ने जो रवैया अपना रखा है, उसे देखकर ऐसा लगता ही नहीं कि हम एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में रह रहे हैं.
दरअसल हमारा लोकतंत्र एक बहुत बड़ा भ्रम है. एक इन्द्रजाल है. अपनी सारी मनमोहक अवधारणाओं के बावजूद इस देश में लोकतंत्र शोषण, भ्रष्टाचार,अनैतिकता और शक्ति-प्रदर्शन की एक वैधानिक व्यवस्था बन गया है. बड़ा हास्यास्पद और शर्मनाक लगता है यह उल्लेख करना कि इस देश में चपरासी जैसे सबसे छोटे पद के लिए भी बारहवीं कक्षा उत्तीर्ण होना न्यूनतम योग्यता है, लेकिन देश का राष्ट्रपति-प्रधानमंत्री-नेता प्रतिपक्ष बनने के लिए कोई योग्यता निर्धारित नहीं है !!
और यही वज़ह है कि हमारे ये नियति-नियन्ता आज देश की चुनौतियों के सामने असहाय नज़र आ रहे हैं. दिल्ली में जो सरकार है, वह सरकार कम, जानवरों का एक बाड़ा ज़्यादा लगती है. कहले को एक प्रधानमंत्री हैं, पर वो देश के अहम् सवालों पर चुप रहते हैं. अपने सहयोगी मंत्रियों पर उनका कोई नियंत्रण नहीं दिखता और न ही उनसे कोई संवाद है. मंत्रीगण अपने-अपने अहंकार में इस तरह मस्त हैं कि सामूहिकता की कोई भावना कहीं दिखती ही नहीं. यह देश जब उनके सामने कोई सवाल रखता है तो उसका जवाब देने की जगह या तो चुप रह जाते हैं या सवाल पूछने वाले की ज़बान काट लेते हैं. इस समय यह देश एक बड़े नक्कारखाने में तब्दील हो गया है और जनता की आवाज़ तूती की तरह गुम हो जाती है.
यह ऐसा समय है जब न तो ठीक से विलाप किया जा सकता और न ही पूरी तरह से आशावादी हुआ जा सकता. उम्मीद बूमरेंग की तरह लौटकर अपने ही पास आ जाती है. बदलाव की ज़रूरत तो लगती है, लेकिन उसके लिए न हौसला है, न समय. हमारी निरुपायता का कोई जवाब नहीं.
भारत की राजनीति में ऐसे अवसर कम ही नज़र आये होंगे जब न तो पक्ष के पास कोई दिशा हो,न विपक्ष के पास. सत्तापक्ष में जहाँ कोई नेतृत्व ही नही दिख रहा है, तो विपक्ष के पास मुद्दों का टोटा पड़ा है. विपक्षी दलों की सारी मेधा मिलकर भी एक अदद ऐसे मुद्दे की तलाश नहीं कर पा रही है, जिसे वो पूरे आत्मविश्वास के साथ देश की जनता के सामने रख सकें और कह सकें कि हमको इस बिनाह पर सत्ताधारियों से अलग समझा जाये. आत्मविश्वास की कमी का ही परिणाम है कि विपक्ष को दूसरों के मुद्दों में सेंध लगानी पड़ती है. अन्ना हजारे और बाबा रामदेव के आन्दोलनों में बिना बुलाए मेहमान की तरह जाना पड़ता है और धक्के खाने पड़ते हैं.
राजनीतिक स्वप्न-शून्यता की यह स्थिति तब है जब देश अनेक स्तरों पर गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहा है. बेतहाशा बढ़ती मंहगाई के बीच सरकार के कण्ठ से एक लाचार आश्वासन के अलावा कुछ नहीं फूटता है. आम जनता न तो अर्थशास्त्र की सैद्धान्तिकी समझती है और न ही उसे सेन्सेक्स की उत्तेजना से कोई फर्क पड़ता. दशमलव के इर्द-गिर्द, मुद्रा-स्फीति किस तरह से ठुमके लगाती है, आम जनता का मन इससे भी नहीं बहलता. दावा तो नहीं पर विश्वास है कि देश की अस्सी फीसदी जनता तो जानती भी नहीं है कि यह मुद्रा-स्फीति किस बला का नाम है, और सेन्सेक्स की उत्तेजना किस वियाग्रा को खाने से बढ़ती है !!
यही अस्सी फीसदी जनता है जो सरकार के भरोसे नहीं, भगवान के भरोसे जी रही है. जिन माई-बापों को चुनकर उसने दिल्ली-भोपाल भेजा, उन्हें न तो इस जनता से कोई लेना देना है और न ही देश चलाने का शऊर है. आप अगर ध्यान से इन रहनुमाओं के बयान और हरकतें देखते होंगे तो अपना माथा ज़रूर ठोंकते होंगे कि इन जाहिलों को उस गद्दी तक पहुँचाने में एक वोट आपका भी है. आपका एक वोट आपको कितनी चोट पहुँचाता है, यह सिर्फ आप ही बेहतर जानते हैं.
लेकिन सत्ता के गलियारों में बे-खौफ़ घूमते ये सफेदपोश सचमुच इतने जाहिल भी नही हैं. हमारे भारत नाम के इस राष्ट्रीय-उद्यान के ये राष्ट्रीय प्रतीक हैं. यह देश इनके लिए आरक्षित है. इन्हें यह विशेषाधिकार है कि अब ये अपनी जनता खुद चुन लें.
जिन नेताओं को पहले हमने चुना, उन्होने अब अपनी जनता चुन ली है. सौ में अस्सी घटाने के बाद जो बीस फीसदी लोग बचते हैं-यह देश उनका है. तरक्की के सारे रास्ते उनके हैं. सारे राग-रंग, रोशनी के सभी झरोखे इसी बीस फीसद जनता के हैं. यहीं अंबानी-टाटा, कलमाणी,राजा और सत्यसाँईं जैसे लोग पैदा होते है, जिनकी सम्पत्तियों का कोई हिसाब नहीं. सरकार का सारा खाद-पानी इन्हीं पौधों को पोषने में खत्म हो जाता है. इसी हरियाली को दुनिया को दिखाकर सरकार वाहवाही लूटती है. अमेरिका और चीन के सामने खड़े होकर ताल ठोकने वाली सरकार को क्या पता नहीं होगा कि देश की सत्तर प्रतिशत आबादी बीस रुपये प्रतिदिन की औसत कमाई में क्या खाती और क्या पहनती होगी ?
पता तो है.पता तो यह भी है कि ए.राजा, राजा कैसे बने. पता तो यह भी है कि कलमांड़ी, कनुमोझी के दरवाज़े किधर खुलते हैं और किधर बंद होते हैं. सरकार को पता तो यह भी है कि स्विटजरलैण्ड कौन जाता है और वहाँ के बैंकों में किसका पैसा है. हम और आप, जिन्होंने स्विटजरलैण्ड का नक्शा तक ठीक से नहीं देखा है, वहाँ पैसा जमा करने तो जा नहीं सकते. हमारी ज़ेबों में जो पैसा होता है वह शाम को घर लौटते समय किराने की दूकान और सब्ज़ी के ठेलों पर जमा हो जाता है.
तो बोलें जितने अन्ना-बाबा बोलते हों....सरकार ने कान में रुई ठूंस लिया है. सुप्रीम कोर्ट का यह कहते-कहते दम फूलने लगा है कि भाई काला धन जमा कराने वालों का नाम जाहिर करिए. कौन बताएगा ? पक्ष या विपक्ष ?? किसका दामन साफ है. जो सरकार में हैं, सारे संसाधनों पर उनका कब्ज़ा है. कमाई के अनन्त मनोरम स्रोत हैं. जो विपक्ष में हैं वो कभी सत्ता में थे या आगे कभी होंगे. तो कौन अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारेगा भला !
लोकपाल और काले धन को लेकर सरकार और विपक्ष दोनो ने जिस तरह का चूहे-बिल्ली का खेल शुरू किया है वह बेहद शर्मनाक है. यह पहली बार हुआ था कि देश की जनता ने अपने प्रतिनिधियों पर गंभीर अविश्वास जताते हुए सीधा सवाल पूछा था कि क्यों न आपके ऊपर भी निगरानी रखी जाये ? इस सवाल पर सिब्बल-दिग्विजय की तिलमिलाहट को सारे देश ने देखा. उनके बेशर्मी भरे बयानों को हर कान ने सुना. भ्रष्टाचार के खिलाफ इस सशक्त जनचेतना को निश्चेत करने के लिए सरकार ने जो रवैया अपना रखा है, उसे देखकर ऐसा लगता ही नहीं कि हम एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में रह रहे हैं.
दरअसल हमारा लोकतंत्र एक बहुत बड़ा भ्रम है. एक इन्द्रजाल है. अपनी सारी मनमोहक अवधारणाओं के बावजूद इस देश में लोकतंत्र शोषण, भ्रष्टाचार,अनैतिकता और शक्ति-प्रदर्शन की एक वैधानिक व्यवस्था बन गया है. बड़ा हास्यास्पद और शर्मनाक लगता है यह उल्लेख करना कि इस देश में चपरासी जैसे सबसे छोटे पद के लिए भी बारहवीं कक्षा उत्तीर्ण होना न्यूनतम योग्यता है, लेकिन देश का राष्ट्रपति-प्रधानमंत्री-नेता प्रतिपक्ष बनने के लिए कोई योग्यता निर्धारित नहीं है !!
और यही वज़ह है कि हमारे ये नियति-नियन्ता आज देश की चुनौतियों के सामने असहाय नज़र आ रहे हैं. दिल्ली में जो सरकार है, वह सरकार कम, जानवरों का एक बाड़ा ज़्यादा लगती है. कहले को एक प्रधानमंत्री हैं, पर वो देश के अहम् सवालों पर चुप रहते हैं. अपने सहयोगी मंत्रियों पर उनका कोई नियंत्रण नहीं दिखता और न ही उनसे कोई संवाद है. मंत्रीगण अपने-अपने अहंकार में इस तरह मस्त हैं कि सामूहिकता की कोई भावना कहीं दिखती ही नहीं. यह देश जब उनके सामने कोई सवाल रखता है तो उसका जवाब देने की जगह या तो चुप रह जाते हैं या सवाल पूछने वाले की ज़बान काट लेते हैं. इस समय यह देश एक बड़े नक्कारखाने में तब्दील हो गया है और जनता की आवाज़ तूती की तरह गुम हो जाती है.
यह ऐसा समय है जब न तो ठीक से विलाप किया जा सकता और न ही पूरी तरह से आशावादी हुआ जा सकता. उम्मीद बूमरेंग की तरह लौटकर अपने ही पास आ जाती है. बदलाव की ज़रूरत तो लगती है, लेकिन उसके लिए न हौसला है, न समय. हमारी निरुपायता का कोई जवाब नहीं.
Monday, 11 July 2011
पहला प्यार
पहले प्यार के जीवाश्म
दबे रह जाते हैं
जीवन की परतों में ।
उम्र की सदियाँ गुज़र जाने के बाद
अचानक एक रोज़
पड़ती है एक कुदाल
परतों के बीच से
कोई निकाल लाता है
पहले प्यार के गुणसूत्र ।
कहते हैं
एक ही राग था
जो बजता रहा
पीढ़ी दर पीढ़ी
बस बंदिशें बदल गयीं थीं ।
Sunday, 10 July 2011
Saturday, 2 July 2011
लगी लॅाटरी ?
कछुआ छाप मच्छर अगरबत्ती खरीदने पर लाल बुझक्कड़ को लंदन घूमने का ईनाम निकला..यह खुशखबरी देने के लिए उन्होंने अपनी पत्नी मेधावटी को फोन लगाया---
लाल बुझक्कड़-- हलो, लंदन घूमने चलोगी..?
मेधावटी--हाय, लंदन..वो तो मेरे सपनो का शहर है..मैं ज़रूर चलूँगी जी....कितना रोमैंटिक होगा न..!! आप कौन साहब बोल रहे हैं..??
सावधान ! फूल देने वाले प्रेमी होते हैं बदमाश !!
साधो !
प्रेम के प्रदर्शन और फूलों का रिश्ता बड़ा पुराना और गहरा रहा है. प्रेमिकाएँ, प्रेमी से फूल पाकर फूली नहीं समातीं. प्रणय-निवेदन का सबसे निरापद तरीका माना जाता रहा है फूल देना...फूल किसी भी अवसर पर दिये जा सकते हैं,या बिना किसी बहाने के भी...लेकिन एक सर्वे ने सारा मामला उलट-पुलट दिया है.यह सर्वे ब्रिटेन में 3000 महिलाओं के साथ किया गया.नतीज़ा यह निकला कि जो प्रेमी अपनी प्रेमिका को बार-बार फूल या बुके गिफ्ट करते हैं वो धोखेबाज़ होते हैं....तो सुन्दरियों...सतर्क हो जाइये..!!
अगर गिफ्ट में प्रेमी आपको चॉकलेट बॉक्स गिफ्ट करता है अर्थात वह कोई बात आपसे छूपा रहा है। वहीं अगर वह आपको कैंडल लाइट डिनर के लिए ले जाता है अर्थात कुछ बुरा होने वाला है।
शोधकर्ता ग्रेग्स वेकर्स ने इस सर्वे के आधार पर दावा किया है कि महिलाएं अपने पति से सरप्राइज गिफ्ट पाना पसंद करती हैं लेकिन सरप्राइज गिफ्ट रिश्तों में जहर भी घोल देता है। इसलिए प्रेमिका को गिफ्ट देने से पहले इस खबर पर गौर जरूर करें।
प्रेम के प्रदर्शन और फूलों का रिश्ता बड़ा पुराना और गहरा रहा है. प्रेमिकाएँ, प्रेमी से फूल पाकर फूली नहीं समातीं. प्रणय-निवेदन का सबसे निरापद तरीका माना जाता रहा है फूल देना...फूल किसी भी अवसर पर दिये जा सकते हैं,या बिना किसी बहाने के भी...लेकिन एक सर्वे ने सारा मामला उलट-पुलट दिया है.यह सर्वे ब्रिटेन में 3000 महिलाओं के साथ किया गया.नतीज़ा यह निकला कि जो प्रेमी अपनी प्रेमिका को बार-बार फूल या बुके गिफ्ट करते हैं वो धोखेबाज़ होते हैं....तो सुन्दरियों...सतर्क हो जाइये..!!
अगर गिफ्ट में प्रेमी आपको चॉकलेट बॉक्स गिफ्ट करता है अर्थात वह कोई बात आपसे छूपा रहा है। वहीं अगर वह आपको कैंडल लाइट डिनर के लिए ले जाता है अर्थात कुछ बुरा होने वाला है।
शोधकर्ता ग्रेग्स वेकर्स ने इस सर्वे के आधार पर दावा किया है कि महिलाएं अपने पति से सरप्राइज गिफ्ट पाना पसंद करती हैं लेकिन सरप्राइज गिफ्ट रिश्तों में जहर भी घोल देता है। इसलिए प्रेमिका को गिफ्ट देने से पहले इस खबर पर गौर जरूर करें।
Sunday, 26 June 2011
विक्रम-बेताल : आचार्य वनस्पती सिंह और काशी की गुरु-शिष्य परंपरा
अपनी आदत से मज़बूर राजा विक्रम, बेताल को लेने श्मशान पहुँच गया लेकिन बेताल उसे दिखा नहीं...उस समय बेताल कुछ चुड़ैलों के साथ आइस-पाइस खेल रहा था.
विक्रम ने इधर-उधर देखकर आवाज़ लगाई.बेताल हाँफता हुआ आया और विक्रम की गर्दन से झूल गया.
विक्रम, बेताल को लेकर चल पड़ा.बेताल ने कहानी शुरू की-----------
सुन राजन ! आज तुझे आचार्य वनस्पती सिंह और उनके शिष्य हरित क्रांति की कथा सुनाता हूँ......पादप विज्ञान के आचार्य, वनस्पती सिंह काशी के रहने वाले थे. संभवतः उनके माता-पिता ने उनका नाम वंशपति सिंह रखा होगा, लेकिन काशी की परंपरा में वो वनस्पती सिंह हो गया होगा और वही रह गया. काशी में ही शिक्षा-दीक्षा लेने के उपरांत वे अपनी प्रथम नियुक्ति में, रेवाखण्ड के विश्वविद्यालय में पादप विज्ञान के आचार्य बनकर आये. साथ में उनकी भार्या पुष्पलता और दो बच्चे-अश्वगंध और घृतकुमारी भी आये.
विवि मे पादप विज्ञान का विभाग नया था, वनस्पती सिंह इकलौते आचार्य थे. अतः आते ही स्वाभाविक रूप से विभागाध्यक्ष का पद सुशोभित करने लगे.
विभाग का दायित्व सम्भालते ही उन्हे एक विलक्षण प्रतिभा वाला शिष्य मिल गया. उसका नाम था- हरित क्रांति. उसके कवि-शिक्षक पिता ने अपनी कल्पना के सर्वोच्च शिखर पर जाकर यह नाम रखा था. पाँच भाई-बहनों में यह सबसे छोटा, किन्तु पिता के सपनों में सबसे बड़ा सपना था.
आचार्य जी ने दो-चार दिन में ही उसकी प्रतिभा को पहचान लिया था. विभाग के अलावा उसे अपने घर में भी दीक्षा देने लगे. न केवल आचार्य जी ही उसे दीक्षित कर रहे थे,बल्कि गुरु माता भी उसे आटा गूंथने,सब्जी काटने,वस्त्रादि पछारने जैसे गृहकार्यों मे प्रवीण कर रही थीं.----आचार्य जी इसे काशी की गुरु-शिष्य परंपरा कहते थे जिसका इस रेवाखण्ड में नितान्त अभाव था.
राजन ! सायंकालीन बेला में जब आचार्य जी मदिरापान के लिए अवस्थित होते तो शिष्य हरितक्रांति शीतल जल और लवण इत्यादि की व्यवस्था किया करता. यही वह समय होता था जब आचार्य वनस्पती सिंह, शिष्य हरितक्रांति को अपनी मौलिक उद्भावनाओं से शिक्षित करते थे....उनकी मौलिक खोज के मुताबिक , पेड़-पौधे भी संसर्ग किया करते हैं. पेड़-पौधे उभयलिंगी होते हैं. वर्ष में दो बार,एक निशचित समय पर उनकी दो शाखाएँ ( जिनमें विपरीत लिंग होते हैं ) आपस में कुछ दिनों के लिए जुड़ जाती हैं.यही उनका रति-काल होता है.
शिष्य हरितक्रांति इसी तरह के अनेक दिव्य उद्घाटनों से अचम्भित,स्तम्भित और गदगद हो उठता. साथ में उसकी अपनी प्रखर मेधा तो ही. सो वह पादप-विज्ञान विभाग में इतना लोकप्रिय हुआ कि कक्षा की एकमात्र कोमल-कांत-पदावली उस पर मोहित हो उठी.
आचार्य वनस्पती सिंह को यह ताड़ने में तनिक भी देर न लगी, क्योंकि वह तरुणी खुद उनके भी संचारी भावों का आलंबन थी.
एक दिन मदिरा की चतुर्थ आवृत्ति के बाद आचार्य जी ने शिष्य से कहा--" बालक, हमारी काशी में एक परंपरा यह भी है कि यदि शिष्य को कोई दुर्लभ फल प्राप्त हो जाये, तो वह उसे सर्वप्रथम अपने गुरु को अर्पित कर उनसे जूठा करवाता है. तभी उस फल का सम्पूर्ण लाभ उसे मिलता है."
हरितक्रांति मर्मान्तक पीड़ा के साथ कराहा---" गुरुवर आप कैसी बात कर रहे हैं, वह मेरी प्रीति है. हम दोनो ने विवाह करने का प्रण किया है."
इस गटना के बाद हरितक्रांति आचार्य जी से कटा-सा रहने लगा.उनके घर जाना तो बिल्कुल ही बंद हो गया. कुछ महीनों बाद उसकी स्नातकोत्तर की पढ़ाई भी पूरी हो गई.M.Sc. और ढाई आखर-दोनो ही पाठ्यक्रमो में वह विशेष योग्यता के साथ उत्तीर्ण हो गया. पिताजी का सपना उसे कॅालेज में प्राध्यापक बनाने का था,जिसके लिए Ph.d. की उपाधि आवश्यक थी. इसके लिए उसे फिर आचार्य जी की शरण में जाना था....वह गया...आचार्य जी ने क्षमा की मुद्रा में उसका स्वागत करते हुए शोध-निदेशक बनना स्वीकार कर लिया.
जिस दिन उसके शोध कार्य को अनुमति देने की बैठक विवि में होनी थी, गुरुमाता ने हरितक्रांति से अपनी एक इच्छा व्यक्त की. उन्हें लेब्राडोर नस्ल के पिल्लों का एक जोड़ा पालना था. हरितक्रांति उस दिन उत्साह में था. उसने पिल्लों का जोड़ा देने का वचन गुरुमाता को दे दिया. इस वचन के साथ ही उसके शोध कार्य का शुभारंभ निर्विघ्न हो गया.पिल्लों का जोड़ा 45 हज़ार रु. में मिला. शिक्षक-पिता ने, प्राध्यापक-सपने के लिए ये पैसे दिये.
राजन ! पिल्लों के साथ-साथ हरितक्रांति का शोधकार्य भी बढ़ता गया. तीन साल की अथक मेहनत के बाद आखिर वह घड़ी आ गई जब शोध-ग्रंथ पर आचार्य जी को हस्ताक्षर करना था....हरितक्रांति इस अवसर के लिए चांदी की कलम लेकर आया था आचार्य जी के लिए.....आचार्य जी मुसकाए...शोध-ग्रंथ को एक किनारे रखते हुए कहा----" तुम्हारी प्रेमिका कैसी है ? तुम्हें काशी की परंपरा याद है न ?? "
उसके बाद की कथा यह है कि हरितक्रांति का शोध-ग्रंथ तीन बार रिजेक्ट हुआ....और दो वर्ष बाद हरितक्रांति का शव नवनिर्मित वाणसागर बांध की एक नहर में पाया गया.
कहानी खत्म कर बेताल ने प्रश्न किया----" अब तू बता राजन, हरितक्रांति की मृत्यु का कारण क्या था--काशी की परंपरा या शिक्षक-पिता का प्राध्यापक-सपना ??? "
विक्रम ने इधर-उधर देखकर आवाज़ लगाई.बेताल हाँफता हुआ आया और विक्रम की गर्दन से झूल गया.
विक्रम, बेताल को लेकर चल पड़ा.बेताल ने कहानी शुरू की-----------
सुन राजन ! आज तुझे आचार्य वनस्पती सिंह और उनके शिष्य हरित क्रांति की कथा सुनाता हूँ......पादप विज्ञान के आचार्य, वनस्पती सिंह काशी के रहने वाले थे. संभवतः उनके माता-पिता ने उनका नाम वंशपति सिंह रखा होगा, लेकिन काशी की परंपरा में वो वनस्पती सिंह हो गया होगा और वही रह गया. काशी में ही शिक्षा-दीक्षा लेने के उपरांत वे अपनी प्रथम नियुक्ति में, रेवाखण्ड के विश्वविद्यालय में पादप विज्ञान के आचार्य बनकर आये. साथ में उनकी भार्या पुष्पलता और दो बच्चे-अश्वगंध और घृतकुमारी भी आये.
विवि मे पादप विज्ञान का विभाग नया था, वनस्पती सिंह इकलौते आचार्य थे. अतः आते ही स्वाभाविक रूप से विभागाध्यक्ष का पद सुशोभित करने लगे.
विभाग का दायित्व सम्भालते ही उन्हे एक विलक्षण प्रतिभा वाला शिष्य मिल गया. उसका नाम था- हरित क्रांति. उसके कवि-शिक्षक पिता ने अपनी कल्पना के सर्वोच्च शिखर पर जाकर यह नाम रखा था. पाँच भाई-बहनों में यह सबसे छोटा, किन्तु पिता के सपनों में सबसे बड़ा सपना था.
आचार्य जी ने दो-चार दिन में ही उसकी प्रतिभा को पहचान लिया था. विभाग के अलावा उसे अपने घर में भी दीक्षा देने लगे. न केवल आचार्य जी ही उसे दीक्षित कर रहे थे,बल्कि गुरु माता भी उसे आटा गूंथने,सब्जी काटने,वस्त्रादि पछारने जैसे गृहकार्यों मे प्रवीण कर रही थीं.----आचार्य जी इसे काशी की गुरु-शिष्य परंपरा कहते थे जिसका इस रेवाखण्ड में नितान्त अभाव था.
राजन ! सायंकालीन बेला में जब आचार्य जी मदिरापान के लिए अवस्थित होते तो शिष्य हरितक्रांति शीतल जल और लवण इत्यादि की व्यवस्था किया करता. यही वह समय होता था जब आचार्य वनस्पती सिंह, शिष्य हरितक्रांति को अपनी मौलिक उद्भावनाओं से शिक्षित करते थे....उनकी मौलिक खोज के मुताबिक , पेड़-पौधे भी संसर्ग किया करते हैं. पेड़-पौधे उभयलिंगी होते हैं. वर्ष में दो बार,एक निशचित समय पर उनकी दो शाखाएँ ( जिनमें विपरीत लिंग होते हैं ) आपस में कुछ दिनों के लिए जुड़ जाती हैं.यही उनका रति-काल होता है.
शिष्य हरितक्रांति इसी तरह के अनेक दिव्य उद्घाटनों से अचम्भित,स्तम्भित और गदगद हो उठता. साथ में उसकी अपनी प्रखर मेधा तो ही. सो वह पादप-विज्ञान विभाग में इतना लोकप्रिय हुआ कि कक्षा की एकमात्र कोमल-कांत-पदावली उस पर मोहित हो उठी.
आचार्य वनस्पती सिंह को यह ताड़ने में तनिक भी देर न लगी, क्योंकि वह तरुणी खुद उनके भी संचारी भावों का आलंबन थी.
एक दिन मदिरा की चतुर्थ आवृत्ति के बाद आचार्य जी ने शिष्य से कहा--" बालक, हमारी काशी में एक परंपरा यह भी है कि यदि शिष्य को कोई दुर्लभ फल प्राप्त हो जाये, तो वह उसे सर्वप्रथम अपने गुरु को अर्पित कर उनसे जूठा करवाता है. तभी उस फल का सम्पूर्ण लाभ उसे मिलता है."
हरितक्रांति मर्मान्तक पीड़ा के साथ कराहा---" गुरुवर आप कैसी बात कर रहे हैं, वह मेरी प्रीति है. हम दोनो ने विवाह करने का प्रण किया है."
इस गटना के बाद हरितक्रांति आचार्य जी से कटा-सा रहने लगा.उनके घर जाना तो बिल्कुल ही बंद हो गया. कुछ महीनों बाद उसकी स्नातकोत्तर की पढ़ाई भी पूरी हो गई.M.Sc. और ढाई आखर-दोनो ही पाठ्यक्रमो में वह विशेष योग्यता के साथ उत्तीर्ण हो गया. पिताजी का सपना उसे कॅालेज में प्राध्यापक बनाने का था,जिसके लिए Ph.d. की उपाधि आवश्यक थी. इसके लिए उसे फिर आचार्य जी की शरण में जाना था....वह गया...आचार्य जी ने क्षमा की मुद्रा में उसका स्वागत करते हुए शोध-निदेशक बनना स्वीकार कर लिया.
जिस दिन उसके शोध कार्य को अनुमति देने की बैठक विवि में होनी थी, गुरुमाता ने हरितक्रांति से अपनी एक इच्छा व्यक्त की. उन्हें लेब्राडोर नस्ल के पिल्लों का एक जोड़ा पालना था. हरितक्रांति उस दिन उत्साह में था. उसने पिल्लों का जोड़ा देने का वचन गुरुमाता को दे दिया. इस वचन के साथ ही उसके शोध कार्य का शुभारंभ निर्विघ्न हो गया.पिल्लों का जोड़ा 45 हज़ार रु. में मिला. शिक्षक-पिता ने, प्राध्यापक-सपने के लिए ये पैसे दिये.
राजन ! पिल्लों के साथ-साथ हरितक्रांति का शोधकार्य भी बढ़ता गया. तीन साल की अथक मेहनत के बाद आखिर वह घड़ी आ गई जब शोध-ग्रंथ पर आचार्य जी को हस्ताक्षर करना था....हरितक्रांति इस अवसर के लिए चांदी की कलम लेकर आया था आचार्य जी के लिए.....आचार्य जी मुसकाए...शोध-ग्रंथ को एक किनारे रखते हुए कहा----" तुम्हारी प्रेमिका कैसी है ? तुम्हें काशी की परंपरा याद है न ?? "
उसके बाद की कथा यह है कि हरितक्रांति का शोध-ग्रंथ तीन बार रिजेक्ट हुआ....और दो वर्ष बाद हरितक्रांति का शव नवनिर्मित वाणसागर बांध की एक नहर में पाया गया.
कहानी खत्म कर बेताल ने प्रश्न किया----" अब तू बता राजन, हरितक्रांति की मृत्यु का कारण क्या था--काशी की परंपरा या शिक्षक-पिता का प्राध्यापक-सपना ??? "
Saturday, 18 June 2011
सृष्टि का पहला दिन
यह दिनसृष्टि का पहला दिन था.
रची जानी थी इतनी बड़ी दुनिया
और हमारे पास कोई औजार न थे.
हमने सागर मे उतार दी थी अपनी नाव
हमारे हाथों मे पतवार भी न थी.
हमे रचना था समय
पर उसकी गति पर हम नियंत्रण नहीं कर सकते थे.
मेरे जीवन के रेगिस्तान मे
एक नदी की तरह आयीं थीं तुम
और मेरी पूरी रेत को
प्रेम मे बदल दिया था.
यदा कदा ही धर्मस्य : निशाने पर तीर
अर्जुन उवाच : योगेश्वर ! आप 16 हजार पटरानियों और इतनी सारी गोपियों को कैसे मैनेज कर लेते हैं? मैं तो 5 किलो बताशे मे बरगद का दूध डाल के खा गया, पर कुछ नहीं भया ! सुभद्रा तो फिर भी समझदार है, लेकिन पांचाली बड़ा 'इनफीरियारिटी' देती है माधव ! मेरा तीर निशाने पर लगता ही नहीं !!
श्री कृष्ण: हे पार्थ ! तुमने पहली बार मेरे 'फील्ड' का प्रश्न किया है. मुझे इसी विषय मे 'वाचस्पति' की उपाधि मिली थी.......
..बड़ा ही समीचीन प्रश्न हैतुम्हारा....इस युद्ध के बाद तुम्हारे बंधु-बान्धवों की सारी पटरानियों की ज़िम्मेदारी तुम्हारे ही 'अंग-विशेष' पर होगी...इसलिए बाकी सभी धर्मों का परित्याग करके मेरी बात सुनो------
ब्रह्म-मुहूर्त में उठकर एनीमा लगाओ और उसके बाद सात सिंघाड़े गुड़ के साथ खाओ. तत्पश्चात, वज्रासन में बैठकर त्रिबंध लगाओ.पांच मिनट तक....ध्यान रहे,इस स्थिति में सांस को बाहर की तरफ फेंकना है....इसके बाद ' पेल्विक-लिफ्ट ' करके शवासन कर लेना....फिर रात में शेर की तरह भोंकना..सॅारी..दहाड़ना...!
शिखर की चिन्ता..
अगर आप अपने अंतरंग संबंधों मं शिखर को प्राप्त कर पाने में असफल भी हो जा रहे हैं तो चिन्ता मत करिये...यात्रा भी उतनी ही सुखदायी हो सकती है जितनी मंज़िल...कभी-कभी तो इससे भी अधिक....बस आपमें चलने का सलीका और शऊर होना चाहिए !
Tuesday, 14 June 2011
विक्रम-बेताल : विभागाध्यक्ष की कार्पेट पर अमीबा..!
हमेशा की तरह राजा विक्रमादित्य बेताल को लेकर चले तो शर्त के मुताबिक बेताल ने कहानी शुरू की--------
राजन, विश्वविद्यालय के अँग्रेजी के विभागाध्यक्ष प्रो.मिश्रा कई दिनो से परेशान थे...उनके साथ एक विचित्र किन्तु सत्य टाइप की घटना हो रही थी कई दिनों से ,जिसे वो किसी से कह नहीं पा रहे थे......
कोई उनके चेम्बर में, फर्श पर बिछी कीमती कालीन पर पेशाब कर जाता था.....
प्रो.मिश्रा शौकीन तबीयत के आदमी थे. सो अँग्रेजी विभाग में अपने चेम्बर को खूब आकर्षक रंग-रूप दे रखा था...एक रोज़ जब विभाग में पहुचे तो देखा कि उनकी टेबल के ठीक सामने हरे रंग की कालीन पर फाइन आर्ट टाइप का एक धब्बा बना हुआ है. चपरासी को बुलाकर पूछा----" ये धब्बा कैसा है यहाँ पर ? ".....
चपरासी कुछ सकपकाते हुए बोला----" साहब पानी का होगा.".....प्रो.मिश्रा ने उँगलियों से धब्बे को दबाया और सूँघकर बोले----" बेवकूफ , पानी का नही पेशाब का धब्बा है !"
उस दिन से रोज़ कोई उनके पहुँचने से पहले कलीन पर पेशाब कर जाता था. विभाग का दरवाज़ा खोलकर , चपरासी साफ-सफाई के बाद जब पानी लेने चला जाता, इसी बीच कोई आकर ये कारनामा कर जाता....
प्रो.मिश्रा ने तंग आकर पेशाब करने वाले को पकड़ने की योजना बनाई...
एक दिन वो अपने समय से काफी पहले विभाग पहुँच गये.दरवाज़ा उन्होने खुद खोला, और जाकर आल्मारी के पीछे छुप गये....लगभग पौन घंटा बाद एक आकृति ने उनके कमरे में प्रवेश किया....इधर-उधर देखकर आकृति विभागाध्यक्ष के टेबल के सामने बैठ गई.....और जब उठी तो वहाँ पर अमीबा की तरह का एक गीला धब्बा बन गया था.....
आकृति जाने को ही थी कि प्रो. मिश्रा आल्मारी के पीछे से कूद पड़े----" मिसेज़ तिवारी आप !! ये क्या करती हैं आप !!!"....
असिस्टेन्ट प्रो., मिसेज़ तिवारी अवाक् रह गईं थीं...सर..सर.. करते हुए सर्रर्रर्रर्र.....से बाहर भागीं......
माज़रा ये था कि प्रो. मिश्रा चाहते थे कि मिसेज़ तिवारी मातहत होने के नाते उन्हें अपना प्रेम-पात्र बनायें, जबकि मिसेज़ तिवारी अपना बसन्त रसायन विभाग के विभागाध्यक्ष पर लुटा रही थीं....बहुत समझाने-बुझाने के बाद भी जब मिसेज़ तिवरी नहीं समझीं तो प्रो. मिश्रा ने उनकी वेतनवृद्धि में अड़ंगा लगा दिया था....खिसियाकर मिसेज़ तिवारी ने उनके चेम्बर में पेशाब करना शुरू कर दिया.
कहानी खत्म कर बेताल ने प्रश्न पूछा-----" अब तू ही बता विक्रम ! असली अपराधी कौन है, मिसेज़ तिवारी--कि प्रो. मिश्रा ?? "
Thursday, 9 June 2011
राजनीति का अनुलोम-विलोम
कुछ दिनों से देश की राजनीति बेहद सक्रिय अवस्था में है. जैसे कोई सुप्त ज्वालामुखी फिर से सक्रिय हो गया हो.पहलवानों ने अपने मुगदर,डंडे निकाल लिए हैं.जो इधर-उधर कहीं थे,उन्होंने अपने दीगर काम फिलहाल मउल्तवी कर दिए हैं.पूरी एकाग्रता के साथ सब अखाड़े में आकर जम गये हैं.
यूँ तो हमारे देश में नेताओं के पास ज़्यादा काम होता नहीं, क्योंकि जो असल चुनौतियाँ हैं उनसे कोई मुठभेड़ नहीं करना चाहता.इसलिए ज़्यादातर समय नेतागण खाली बैठे रहते हैं.अपने इसी खालीपन को भरने के लिए ये लोग अपने जन्मदिन इत्यादि के बहाने कभी-कभी सुर्खियों में आने की कोशिश करते रहते हैं.चूँकि हमारे देश में, किसी और देश की तुलना में महापुरुष ज़्यादा पैदा होते हैं,अतः किसी न किसी का जन्मदिन या पुण्यतिथि पड़ती ही रहती है.यही वह सुअवसर होते हैं जब हमारे राजनीतिज्ञों को अपनी प्रतिभा दिखाने का मौका मिलता है.
लेकिन पिछले कुछ समय से एक के बाद एक ऐसी घटनाएँ होती गयीं कि सारे राजयोगी जीवित हो उठे.पक्ष हो या विपक्ष, सबके पास काम आ गया.पहले 2जी घोटाले पर सुप्रीम कोर्ट ने सरकार की मुश्कें कसीं, फिर पांच राज्यों में विधानसभा के चुनाव हुए,34 साल पुरानी वाम दलों की सरकार ढहाकर ममता दी नें अपनी सरकार बनाई,अन्ना हजारे अचानक भ्रष्टाचार के खिलाफ धरने पर बैठ गये तो पक्ष-विपक्ष दोनो हड़बड़ा गए.और फिर कुछ दिनों से काले धन के मसले पर सरकार को खुजली करने वाले योग गुरु बाबा रामदेव का धरनाहुआ,लाठीचार्ज,जूतमपैजार,चीरहरण इत्यादि,भारतीय राजनीति की सभी लीलाएँ देखने को मिलीं.इन सब अवसरों में ये स्पष्ट हुआ कि हमारी राजनीति दोमुही नहीं कई मुह वाली है.ऐसे एसे पैंतरे देखने को मिल रहे हैं कि जनता अपना दुख-दर्द भूलकर इन करतबबाज़ों की तमाशबीन बन गई है.उसे कुछ वैसा ही रस मिल रहा है जैसे सांप और नेवले का खेल देखते हुए मिलता है. यही हमारे नेताओं की खूबी भी है कि जब भी जनता कराहती है ये उसे कोई न कोई तमाशा दिखाने लगते है.
बात शुरू करते हैं बाबा रामदेव के आन्दोलन(?) से. पिछले चार-पांच सालों में देश में योग-क्रान्ति कर चुके बाबा रामदेव को न जाने किस महत्वाकांक्षा ने इतना प्रेरित किया कि उन्होंने भ्रष्टाचार मिटाने का बीड़ा उठा लिया.फिर जो कुछ हुआ और हो रहा है,वह सब तो आप भी देख रहे हैं.इस पूरे घटनाक्रम में जो राजनीतिक पैंतरेबाज़ी है वह बड़ी दिलचस्प है.
सोनिया गांधी को चारों ओर से गालियाँ दी गईं.लोगों ने मज़े ले-लेकर कहा कि सोनिया की सरकार ने बड़ी मूर्खता कर दी बाबा को पिटवाकर,अब सरकार का बचना मुश्किल है.पर आप गौर से देखेंगे तो आपको लगेगा कि सोनिया गांधी वर्तमान भारतीय राजनीति की चाणक्य हैं. कुछ समय से काले धन और भ्रष्टाचार के मसले पर सुप्रीम कोर्ट से लेकर अन्ना, बाबा और देश की जनता ने यूपीए सरकार का जीना हराम कर रखा था.सरकार के पास इनके सवालों के कोई ज़वाब नहीं थे.सरकार इसलिए भी ज़्यादा परेशान थी कि ये सवाल विपक्षी दलों की ओर से नहीं बल्कि आम युवा और न्यायपालिका की ओर से आ रहे थे.विपक्ष से निपटना तो उनको आता है क्योंकि उसकी सीमाएँ वो जानते हैं.
सत्ताधारी यूपीए सरकार बहुत समय से इस प्रयास में थी कि किसी तरह से भ्रष्टाचार की जनता की लड़ाई, सत्तापक्ष और विपक्ष की लड़ाई में तब्दील हो जाये. ऐसा होने पर उसे कई फायदे थे. मुख्य मुद्दे से जनता का ध्यान हट जाता, कार्यकर्ता ऐसे ही समय में एकजुट होते हैं.अगले चुनाव की तैयारी के लिहाज से यह काफी सुखद माहौल होता. दूसरे वो ये भी जानते हैं कि काले धन और भ्रष्टाचार पर विपक्ष खुलकर कभी भी सामने नहीं आ सकता क्योंकि उसके दामन पर कम दाग नहीं हैं.
राजनीति में कच्चे बाबा रामदेव की अदूरदर्शिता ने कांग्रेस को वह अवसर दे दिया जिसकी तलाश में वे थे.लाठीचार्ज से पैदा हुई भावुकता में भाजपा, आरएसएस और दूसरे विपक्षी दलों के शामिल हो जाने से मुख्य मुद्दा नेपथ्य में जाता हुआ दिख रहा है और लड़ाई पक्ष-विपक्ष की बनती जा रही है.सबसे मज़े कि बात ये है कि इस लड़ाई में कोई सूत है न कपास, बस जुलाहों में लट्ठमलट्ठ मची हुई है.
कुछ समय पहले लिखी गई मेरी यह कविता पढ़िये और देखिए कि यह अब भी प्रासंगिक है या नहीं---- राजयोगी क्षमा करें किन्तु..
यह समय
एकता का नहीं, गठबंधन का है
जैसे लाल मिर्च का
काली मिर्च से गठबंधन
चील का बाज़ से,
जैसे करांयत का गठबंधन अजगर से.
सरकारें
एक जादूमेडली की तरह
आती हैं मंच पर
एक पुरुष जादूगर
अपनी छातियों से
एक बच्चे को
दूध पिलाने का भ्रम उत्पन्न करता है
दर्शकगण ताली बजाते हैं
भूखा बच्चा लौटकर
माँ की छाती से लिपट जाता है.
पलक झपकते ही हमारा श्वेत आराध्य
श्यामवर्णी हो जाता है
अपनी स्वाभाविक बेशर्मी
और नायाब तरीकों के साथ.
विज्ञान और कला
दोनो से इनका सीधा जुड़ाव है
जातिगत जनमत का
विज्ञान विकसित करने वाले,
पीठ पर पर वार कर सकने को
अनिवार्य कला मानते है.
सारे दल मिलकर
न्यूनतम साझा कार्यक्रम भर बना सकने की
अधिकतम योग्यता में सिमटते जा रहे है.
इस समय जो पक्ष में नहीं है
वह निरापद है
जिन्हें होना चाहिए था विपक्ष में
वे एक आत्मघाती ठंडेपन
और मुर्दा हँसी के साथ
लोकतंत्र की आखिरी हिचकी की प्रतीक्षा में हैं.
ठीक इसी समय
एक कविता
गठबंधन में शामिल होने से इनकार करती है.
Wednesday, 8 June 2011
" राजयोगी क्षमा करें किन्तु..."
यह समय
एकता का नहीं, गठबंधन का है
जैसे लाल मिर्च का
काली मिर्च से गठबंधन
चील का बाज़ से,
जैसे करांयत का गठबंधन अजगर से.
सरकारें
एक जादूमेडली की तरह
आती हैं मंच पर
एक पुरुष जादूगर
अपनी छातियों से
एक बच्चे को
दूध पिलाने का भ्रम उत्पन्न करता है
दर्शकगण ताली बजाते हैं
भूखा बच्चा लौटकर
माँ की छाती से लिपट जाता है.
पलक झपकते ही हमारा श्वेत आराध्य
श्यामवर्णी हो जाता है
अपनी स्वाभाविक बेशर्मी
और नायाब तरीकों के साथ.
विज्ञान और कला
दोनो से इनका सीधा जुड़ाव है
जातिगत जनमत का
विज्ञान विकसित करने वाले,
पीठ पर पर वार कर सकने को
अनिवार्य कला मानते है.
सारे दल मिलकर
न्यूनतम साझा कार्यक्रम भर बना सकने की
अधिकतम योग्यता में सिमटते जा रहे है.
इस समय जो पक्ष में नहीं है
वह निरापद है
जिन्हें होना चाहिए था विपक्ष में
वे एक आत्मघाती ठंडेपन
और मुर्दा हँसी के साथ
लोकतंत्र की आखिरी हिचकी की प्रतीक्षा में हैं.
ठीक इसी समय
एक कविता
गठबंधन में शामिल होने से इनकार करती है.
Friday, 3 June 2011
विक्रम और बेताल : " प्रो. साहब का मुहावरा "
रात्रि के घनघोर अंधकार में राजा विक्रम एक बार फिर श्मशान जा पहुचा. बेताल बड़ी व्यग्रता से उसकी प्रतीक्षा करता हुआ पेड़ के नीचे तम्बाकू मलते हुए बैठा था. उसे भी विक्रम के साथ इस खेल में मज़ा आने लगा था.विक्रम की आहट पाते ही वह फुर्ती से उठा और पेड़ पर उल्टा लटक गया.
राजा विक्रम आया. वह गमछे से अपना पसीना पोंछ ही रहा था कि बेताल कूद कर उसकी गर्दन से लटक गया. विक्रम उसे लादकर चल पड़ा.....
>बेताल ने कहानी शुरू की-----
राजन ! एक शहर के एक नामचीन महाविद्यालय में हिन्दी साहित्य के एक व्याख्याता थे...मीठी वाणी बोलते थे. अपने मेनिफेस्टो में कम्युनिस्ट थे, पर निरापद थे....अध्यापन,संगोष्ठियों,उत्तर-पुस्तिकाओं की जाँच और प्रश्न-पत्रों की सेटिग में ही रमे रहते थे. इस कार्य मे उनके नाबालिग कम्युनिस्ट शिष्य उनकी भरपूर मदद किया करते थे......
सब कुछ ठीक-ठाक ही चल रहा था, कि पिछले बरस, बी.ए. तृतीय वर्ष का हिन्दी का पेपर सेट करने का ज़िम्मा विश्वविद्यालय ने उन्हे दे दिया. प्रो. साहब के लिए यह कोई नयी बात नहीं थी...लेकिन इस बार वे कोई नवाचार करने के मूड में थे.....सो एक नाबालिग शिष्य की सलाह पर प्रश्न-पत्र के खण्ड-स में उन्होने एक प्रश्न दिया-----
---- " हँसी तो फँसी "----इस मुहावरे का अर्थ बताते हुए, वाक्य में प्रयोग कीजिये ।
परीक्षा में जब पेपर छात्रों को दिया गया तो कुछ धार्मिक किस्म के छात्र इस मुहावरे को लेकर भड़क गये...बात तुरंत प्रो.साहब के विरोधियों के मार्फत कुलपति तक और फिर राज्यपाल तक पहँच गयी....थोड़ी-बहुत औपचारिकताओं के बाद प्रो.साहब पेपर सेट करने के अयोग्य घोषित कर दिये गये. साथ ही चरित्र-परिष्कार करने की चेतावनी भी दी गई....
कहानी खत्म कर बेताल ने अपना प्रश्न किया---"-अब तू बता विक्रम ! इसमें प्रोफेसर साहब की क्या गलती थी ?? "
राजा विक्रम आया. वह गमछे से अपना पसीना पोंछ ही रहा था कि बेताल कूद कर उसकी गर्दन से लटक गया. विक्रम उसे लादकर चल पड़ा.....
>बेताल ने कहानी शुरू की-----
राजन ! एक शहर के एक नामचीन महाविद्यालय में हिन्दी साहित्य के एक व्याख्याता थे...मीठी वाणी बोलते थे. अपने मेनिफेस्टो में कम्युनिस्ट थे, पर निरापद थे....अध्यापन,संगोष्ठियों,उत्तर-पुस्तिकाओं की जाँच और प्रश्न-पत्रों की सेटिग में ही रमे रहते थे. इस कार्य मे उनके नाबालिग कम्युनिस्ट शिष्य उनकी भरपूर मदद किया करते थे......
सब कुछ ठीक-ठाक ही चल रहा था, कि पिछले बरस, बी.ए. तृतीय वर्ष का हिन्दी का पेपर सेट करने का ज़िम्मा विश्वविद्यालय ने उन्हे दे दिया. प्रो. साहब के लिए यह कोई नयी बात नहीं थी...लेकिन इस बार वे कोई नवाचार करने के मूड में थे.....सो एक नाबालिग शिष्य की सलाह पर प्रश्न-पत्र के खण्ड-स में उन्होने एक प्रश्न दिया-----
---- " हँसी तो फँसी "----इस मुहावरे का अर्थ बताते हुए, वाक्य में प्रयोग कीजिये ।
परीक्षा में जब पेपर छात्रों को दिया गया तो कुछ धार्मिक किस्म के छात्र इस मुहावरे को लेकर भड़क गये...बात तुरंत प्रो.साहब के विरोधियों के मार्फत कुलपति तक और फिर राज्यपाल तक पहँच गयी....थोड़ी-बहुत औपचारिकताओं के बाद प्रो.साहब पेपर सेट करने के अयोग्य घोषित कर दिये गये. साथ ही चरित्र-परिष्कार करने की चेतावनी भी दी गई....
कहानी खत्म कर बेताल ने अपना प्रश्न किया---"-अब तू बता विक्रम ! इसमें प्रोफेसर साहब की क्या गलती थी ?? "
Wednesday, 1 June 2011
देखते जाइये...
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करते-धरते हो गया..
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शेर को रोते देखा है आपने..!!
(सफेद शेर मोहन की स्मृति में)
उसका नाम मोहन था.उसने दुनिया को ‘रीवा’दिया.वह शेर था..सफेद शेर ! राजा था जंगल का.ये एक शेर के ही बूते की बात हो सकती है कि वह एक नामालूम सी छोटी जगह को दुनिया के नक्शे में जगमग कर दे.जंगल के इस राजा को दुनिया के सामने लाने वाला भी एक राजा ही था.
ये कारनामा किया था रीवा राज्य के तत्कालीन नरेश महाराज मार्तण्ड सिंह ने. उन्होने रीवा राज्य के बरगड़ी जंगल(वर्तमान मे सीधी जिले के गोपद बनास तहसील में) से सफेद शेरों के वंशज को, 27 मई,1951 को पकड़ा था.उस समय वह 9 माह का था. नाम रखा मोहन.उसे गोविन्दगढ़ किले में रखा गया.महाराजा ने सफेद शेर की वंशवृद्धि के प्रयास शुरू किया...राधा नाम की शेरनी को मोहन के साथ रखा गया...अन्तत: 30 अक्टूबर 1956 को मोहन और रामबाई नामक शेरनी के सम्पर्क से सफेद रंग के एक नर और तीन मादा शावकों का जन्म हुआ...9 अगस्त 1962 को दो सफेद शेर कलकत्ता भेजे गए, 1962 मे ही एक-एक अमेरिका और इंग्लैण्ड के चिड़ियाघर भेजे गये.
मोहन ने 18 दिसंबर 1967 को अंतिम सांस ली.उसका राजकीय सम्मान से अंतिम संस्कार किया गया. मोहन का सिर आज भी बाघेला म्यूजियम,रीवा में संरक्षित है.
रीवा के लोग इस बात पर गर्व करते रहे हैं कि उन्होने दुनिया को सफेद शेर दिया.....तो रीवा के शेर और शेरनियों आज आप जहां भी हों, लोगों को बताइये कि हम हैं...!! यूँ तो रीवा को राष्ट्रीय पहचान देने वाले कुछ और शेरों को आप जानते हैं.तानसेन रीवा राजघराने के गायक थे.बीरबल भी कथित तौर पर रीवा के ही बताये जाते हैं.इन दोनों शेरों को दिल्ली के सम्राट अकबर ने पहले अनुनय-विनय और फिर धमकी देकर अपने दरबार मे बुला लिया था.
लेकिन सफेद शेर मोहन ने रीवा की पहचान विश्वस्तर पर बनायी.वह रीवा वासियों के लिए सिर्फ एक शेर नहीं है.वह रीवा की अस्मिता है.वह यहाँ की पहचान है.मोहन इस छोटे से पिछड़े हुए जनपद का अभिमान है.वह इस अविकसित भू-भाग का अप्रत्याशित विस्तार था.
दरअसल मोहन और उसके वंशज,जिन्हें हम शेर कहते हैं,प्राणिविज्ञान में उन्हे बाघ कहा जाता है.शेर सामान्यत: उन्हें कहा जाता है जिनके सिर और चेहरे पर लम्बे बाल होते हैं.बाघ की बनावट इनसे अलग होती हे.बाघ दुनिया का सबसे ताकतवर प्राणी माना जाता है.रीवा से सफेद शेर चले गये,यह रीवा का दुख है, लेकिन पूरे देश में बाघ खत्म होने की कगार पर हैं-यह एक आपदा के संकेत हैं.
जिस देश के चप्पे-चप्पे से बाघों की दहाड़ सुनाई देती थी,उसी देश में वर्ष 2010 तक केवल 1412 बाघ बचे थे.यह संख्या भी कोई विश्वसनी. नहीं थी.अनुमान की एक छोटी सी रस्सी को इसमें भी पकड़ कर रखा गया है. 19वीं शताब्दी में भारत में लगभग 45,000 बाघ थे.तब उनकी संख्या को लेकर किसी का ध्यान नहीं था.यह स्वाभाविक भी था.आपका पेट भरा हो तो आप रोटियाँ नहीं गिनते.20 वीं शताब्दी में1972 तक आते-आते अचानक पता चला कि पूरे देश में अब केवल 1,827 बाघ ही बचे हैं.
देश की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की चिन्ता के मद्देनज़र,स्वतंत्र भारत की पहली व्यवस्थित वन नीति बनाने की कवायद चल रही थी.उसी दरम्यान यह तथ्य सामने आया की बाघों की संख्या में डरावनी कमी हो गयी है.1972 में वन्य जीव संरक्षण कानून बना दिया गया,और उसके अगले ही साल 1973 में,बाघों को बचाने के लिए एक अलग दीर्घकालिक योजना ‘प्रोजक्ट टाइगर’ के बनायी गई.बाघों के संरक्षण के लिए भारी भरकम बजट और अधिकार के साथ इसकी शुरुआत के लिए पलामू अभयारण्य को चुना गया.उसके बाद देश के कई अन्य राष्ट्रीय उद्यानो और अभयारण्यों को टाइगर रिज़र्व के नाम से बाघों के लिए आरक्षित कर दिया गया.इन आरक्षित क्षेत्रों में बाघों के शिकार पर पूर्ण प्रतिबंध लगाकर कठोर सज़ा का प्रावधान रखा गया.प्राणिविज्ञानियों,चिकित्सकों और प्रशासकों का एक अमला बाघों के संरक्षण और संवर्धन के लिए तैनात कर दिया गया.
लेकिन मर्ज़ बढ़ता गया ज्यों-ज्यों दवा दी.इस पूरी कवायद का नतीज़ा ये निकला कि वर्ष 2010 तक आते-आते बाघों की संख्या इतनी कम हो गयी कि उन्हें उँगलियों पर गिना जा सकता है.और यह पक्के तौर पर कहा जाने लगा कि दो-चार सालों में इस देश से बाघ पूरी तरह से खत्म हो जायेंगे.म.प्र.,पूरे देश में सर्वोधिक बाघ हुआ करते थे,वहाँ की सरकार को ठीक-ठीक यह भी नहीं मालूम कि इस प्रदेश मे अब कितने बाघ बचे हैं.शिकारियों और अक्षम प्रशासकों के नापाक गठजोड़ ने इस देश में बाघों के अस्तित्व को लगभग खत्म होने हद तक पहुँचा दिया है.हालांकि वर्ष 2011 में एक सुखद सूचना आयी है कि बाघों की संख्या में लगभग 20 प्रतिशत बढ़ोतरी हुई है,पर यह ख़बर कितनी विश्वसनीय है इसकी पुष्टि नहीं हुई है.
हम गौरव,अस्मिता और पहचान की बात छोड़ दें, तो पर्यावरणीय दृष्टि से भी बाघों का खत्म होना देश के लिए एक भयंकर दुर्घटना होगी.इन्हें बचाने के लिए हमारी रणनीति किसी आपदा से निपटने जैसी ही होनी चाहिए.
आज सफेद शेर मोहन के वंशज दुनिया भर में हैं...नहीं हैं तो सिर्फ रीवा में.जिस धरती से सफेद शेर ने अपनी यात्रा शुरू की वह धरती ही उससे छूट गयी.उसने विश्व को जीत लिया, पर अपनी ही जन्मभूमि को हार गया.वो शेर था तो क्या हुआ..अपनी धरती से निर्वासित होने पर शेर भी रोते होंगे...क्या आपने किसी शेर को रोते देखा है !! कभी सुनी हैं उसकी हिचकियाँ ?? विख्यात कवि केदारनाथ सिहँ की ‘बाघ’ श्रृखला की एक कविता ज़रूर पढ़नी चाहिए----
ये आदमी लोग
इतने चुप क्यों रहते हैं आजकल---
एक दिन बाघ ने लोमड़ी से पूछा
लोमड़ी की समझ में कुछ नही आया
पर उसने समर्थन में सिर हिलाया
और एक टक देखती रही बाघ के जबड़ों को
जिनसे अब भी खून की गंध आ रही थी.
फिर कुछ देर बाद कुछ सोचती हुई बोली
“कोई दुख होगा उन्हें”
“कैसा दुख ?”---
बाघ ने तड़पकर पूछा
“यह मैं नहीं जानती पर दुख का क्या !
वह हो ही जाता है कैसे भी “
लोमड़ी ने उत्तर दिया.
“हो सकता है
उन्हें कोई कांटा गड़ा हो !”
बाघ ने पूछा.
“हो सकता है
पर हो सकता है आदमी ही
गड़ गया हो कांटे को “
लोमड़ी ने धीरे से कहा.
अबकी बाघ की समझ में कुछ नहीं आया
पर समर्थन में
उसी तरह सिर हिलाया
फिर धीरे से पूछा
“क्या आदमी लोग पानी पीते हैं ?”
“पीते हैं---लोमड़ी ने कहा---
पर वे हमारी तरह
सिर्फ सुबह-शाम नहीं पीते,
दिन भर में जितनी बार चाहा
उतनी बार पीते हैं “
“पर इतना पानी क्यों पीते हैं
आदमी लोग ?”
बाघ ने पूछा.
“वही दुख---मैने कहा न !”
लोमड़ी ने उत्तर दिया.
इस बार फिर
बाघ की समझ में कुछ नहीं आया
वह देर तक सिर झुकाए
उसी तरह सोचता रहा.
यह ‘दुख ‘ एक ऐसा शब्द था
जिसके सामने बाघ
बिल्कुल निरुपाय था.
उसका नाम मोहन था.उसने दुनिया को ‘रीवा’दिया.वह शेर था..सफेद शेर ! राजा था जंगल का.ये एक शेर के ही बूते की बात हो सकती है कि वह एक नामालूम सी छोटी जगह को दुनिया के नक्शे में जगमग कर दे.जंगल के इस राजा को दुनिया के सामने लाने वाला भी एक राजा ही था.
ये कारनामा किया था रीवा राज्य के तत्कालीन नरेश महाराज मार्तण्ड सिंह ने. उन्होने रीवा राज्य के बरगड़ी जंगल(वर्तमान मे सीधी जिले के गोपद बनास तहसील में) से सफेद शेरों के वंशज को, 27 मई,1951 को पकड़ा था.उस समय वह 9 माह का था. नाम रखा मोहन.उसे गोविन्दगढ़ किले में रखा गया.महाराजा ने सफेद शेर की वंशवृद्धि के प्रयास शुरू किया...राधा नाम की शेरनी को मोहन के साथ रखा गया...अन्तत: 30 अक्टूबर 1956 को मोहन और रामबाई नामक शेरनी के सम्पर्क से सफेद रंग के एक नर और तीन मादा शावकों का जन्म हुआ...9 अगस्त 1962 को दो सफेद शेर कलकत्ता भेजे गए, 1962 मे ही एक-एक अमेरिका और इंग्लैण्ड के चिड़ियाघर भेजे गये.
मोहन ने 18 दिसंबर 1967 को अंतिम सांस ली.उसका राजकीय सम्मान से अंतिम संस्कार किया गया. मोहन का सिर आज भी बाघेला म्यूजियम,रीवा में संरक्षित है.
रीवा के लोग इस बात पर गर्व करते रहे हैं कि उन्होने दुनिया को सफेद शेर दिया.....तो रीवा के शेर और शेरनियों आज आप जहां भी हों, लोगों को बताइये कि हम हैं...!! यूँ तो रीवा को राष्ट्रीय पहचान देने वाले कुछ और शेरों को आप जानते हैं.तानसेन रीवा राजघराने के गायक थे.बीरबल भी कथित तौर पर रीवा के ही बताये जाते हैं.इन दोनों शेरों को दिल्ली के सम्राट अकबर ने पहले अनुनय-विनय और फिर धमकी देकर अपने दरबार मे बुला लिया था.
लेकिन सफेद शेर मोहन ने रीवा की पहचान विश्वस्तर पर बनायी.वह रीवा वासियों के लिए सिर्फ एक शेर नहीं है.वह रीवा की अस्मिता है.वह यहाँ की पहचान है.मोहन इस छोटे से पिछड़े हुए जनपद का अभिमान है.वह इस अविकसित भू-भाग का अप्रत्याशित विस्तार था.
दरअसल मोहन और उसके वंशज,जिन्हें हम शेर कहते हैं,प्राणिविज्ञान में उन्हे बाघ कहा जाता है.शेर सामान्यत: उन्हें कहा जाता है जिनके सिर और चेहरे पर लम्बे बाल होते हैं.बाघ की बनावट इनसे अलग होती हे.बाघ दुनिया का सबसे ताकतवर प्राणी माना जाता है.रीवा से सफेद शेर चले गये,यह रीवा का दुख है, लेकिन पूरे देश में बाघ खत्म होने की कगार पर हैं-यह एक आपदा के संकेत हैं.
जिस देश के चप्पे-चप्पे से बाघों की दहाड़ सुनाई देती थी,उसी देश में वर्ष 2010 तक केवल 1412 बाघ बचे थे.यह संख्या भी कोई विश्वसनी. नहीं थी.अनुमान की एक छोटी सी रस्सी को इसमें भी पकड़ कर रखा गया है. 19वीं शताब्दी में भारत में लगभग 45,000 बाघ थे.तब उनकी संख्या को लेकर किसी का ध्यान नहीं था.यह स्वाभाविक भी था.आपका पेट भरा हो तो आप रोटियाँ नहीं गिनते.20 वीं शताब्दी में1972 तक आते-आते अचानक पता चला कि पूरे देश में अब केवल 1,827 बाघ ही बचे हैं.
देश की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की चिन्ता के मद्देनज़र,स्वतंत्र भारत की पहली व्यवस्थित वन नीति बनाने की कवायद चल रही थी.उसी दरम्यान यह तथ्य सामने आया की बाघों की संख्या में डरावनी कमी हो गयी है.1972 में वन्य जीव संरक्षण कानून बना दिया गया,और उसके अगले ही साल 1973 में,बाघों को बचाने के लिए एक अलग दीर्घकालिक योजना ‘प्रोजक्ट टाइगर’ के बनायी गई.बाघों के संरक्षण के लिए भारी भरकम बजट और अधिकार के साथ इसकी शुरुआत के लिए पलामू अभयारण्य को चुना गया.उसके बाद देश के कई अन्य राष्ट्रीय उद्यानो और अभयारण्यों को टाइगर रिज़र्व के नाम से बाघों के लिए आरक्षित कर दिया गया.इन आरक्षित क्षेत्रों में बाघों के शिकार पर पूर्ण प्रतिबंध लगाकर कठोर सज़ा का प्रावधान रखा गया.प्राणिविज्ञानियों,चिकित्सकों और प्रशासकों का एक अमला बाघों के संरक्षण और संवर्धन के लिए तैनात कर दिया गया.
लेकिन मर्ज़ बढ़ता गया ज्यों-ज्यों दवा दी.इस पूरी कवायद का नतीज़ा ये निकला कि वर्ष 2010 तक आते-आते बाघों की संख्या इतनी कम हो गयी कि उन्हें उँगलियों पर गिना जा सकता है.और यह पक्के तौर पर कहा जाने लगा कि दो-चार सालों में इस देश से बाघ पूरी तरह से खत्म हो जायेंगे.म.प्र.,पूरे देश में सर्वोधिक बाघ हुआ करते थे,वहाँ की सरकार को ठीक-ठीक यह भी नहीं मालूम कि इस प्रदेश मे अब कितने बाघ बचे हैं.शिकारियों और अक्षम प्रशासकों के नापाक गठजोड़ ने इस देश में बाघों के अस्तित्व को लगभग खत्म होने हद तक पहुँचा दिया है.हालांकि वर्ष 2011 में एक सुखद सूचना आयी है कि बाघों की संख्या में लगभग 20 प्रतिशत बढ़ोतरी हुई है,पर यह ख़बर कितनी विश्वसनीय है इसकी पुष्टि नहीं हुई है.
हम गौरव,अस्मिता और पहचान की बात छोड़ दें, तो पर्यावरणीय दृष्टि से भी बाघों का खत्म होना देश के लिए एक भयंकर दुर्घटना होगी.इन्हें बचाने के लिए हमारी रणनीति किसी आपदा से निपटने जैसी ही होनी चाहिए.
आज सफेद शेर मोहन के वंशज दुनिया भर में हैं...नहीं हैं तो सिर्फ रीवा में.जिस धरती से सफेद शेर ने अपनी यात्रा शुरू की वह धरती ही उससे छूट गयी.उसने विश्व को जीत लिया, पर अपनी ही जन्मभूमि को हार गया.वो शेर था तो क्या हुआ..अपनी धरती से निर्वासित होने पर शेर भी रोते होंगे...क्या आपने किसी शेर को रोते देखा है !! कभी सुनी हैं उसकी हिचकियाँ ?? विख्यात कवि केदारनाथ सिहँ की ‘बाघ’ श्रृखला की एक कविता ज़रूर पढ़नी चाहिए----
ये आदमी लोग
इतने चुप क्यों रहते हैं आजकल---
एक दिन बाघ ने लोमड़ी से पूछा
लोमड़ी की समझ में कुछ नही आया
पर उसने समर्थन में सिर हिलाया
और एक टक देखती रही बाघ के जबड़ों को
जिनसे अब भी खून की गंध आ रही थी.
फिर कुछ देर बाद कुछ सोचती हुई बोली
“कोई दुख होगा उन्हें”
“कैसा दुख ?”---
बाघ ने तड़पकर पूछा
“यह मैं नहीं जानती पर दुख का क्या !
वह हो ही जाता है कैसे भी “
लोमड़ी ने उत्तर दिया.
“हो सकता है
उन्हें कोई कांटा गड़ा हो !”
बाघ ने पूछा.
“हो सकता है
पर हो सकता है आदमी ही
गड़ गया हो कांटे को “
लोमड़ी ने धीरे से कहा.
अबकी बाघ की समझ में कुछ नहीं आया
पर समर्थन में
उसी तरह सिर हिलाया
फिर धीरे से पूछा
“क्या आदमी लोग पानी पीते हैं ?”
“पीते हैं---लोमड़ी ने कहा---
पर वे हमारी तरह
सिर्फ सुबह-शाम नहीं पीते,
दिन भर में जितनी बार चाहा
उतनी बार पीते हैं “
“पर इतना पानी क्यों पीते हैं
आदमी लोग ?”
बाघ ने पूछा.
“वही दुख---मैने कहा न !”
लोमड़ी ने उत्तर दिया.
इस बार फिर
बाघ की समझ में कुछ नहीं आया
वह देर तक सिर झुकाए
उसी तरह सोचता रहा.
यह ‘दुख ‘ एक ऐसा शब्द था
जिसके सामने बाघ
बिल्कुल निरुपाय था.
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