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Thursday, 23 February 2012

वीरान

मैं पृथ्वी की एक घनी बस्ती का वीरान हूँ
जिसे ठीक ठीक देखने के लिए
आपको पर्यटक बनना पड़ेगा.

मेरी स्थिति
बस्ती के बीचों-बीच तो नही ही है
पर इसे पूरी तरह
एक किनारे भी नहीं कहा जा सकता.

दरअसल लोगों के पलायन ने
इस वीरान का भूगोल ही बदल दिया है.

बस्ती के लोग कभी कभार
इधर से गुजरते ज़रूर हैं
पर इस वीरान को देख कर
उनकी स्मृति में कुछ उभरता हो-
ऐसा कभी लगा नहीं.

अक्सर लोगों को यह भी याद नहीं रहता
कि इस बस्ती में कोई वीरान भी है.

फिर भी यहाँ
एक घर का उजाड़ है
कुछ अजीब सी वनस्पतियाँ है
जिन्हें रोज़मर्रा के जीवन में
पहचाना नहीं जा सकता.

एक पुराने पेड़ पर
कुछ पक्षियों का ठिकाना है
जो दिन भर कहां आते जाते हैं
यह कौन पता करता है भला !

बस्ती में जब जब
कोई खुशनुमा मौसम आता है
इस वीराने को
थोड़ा और वीरान कर जाता है.

कभी कभी यह वीरान
इतना बड़ा हो जाता है
कि इसमें
एक बस्ती दिखने लगती है.
          **

Monday, 20 February 2012

सौ बरस का सिनेमा और साहित्य !


   मुझे अक्सर यह लगता रहा है कि फिल्म निर्माण की कला, प्रकृति के सृष्टि निर्माण की कला से प्रेरित है. यह प्रकृति को मनुष्य की चुनौती नहीं, बल्कि प्रकृति का साभार अनुकरण है. मज़हब, मुहब्बत,जात-पांत,भाषा और मुल्कों की सीमाओं को लाँघता हुआ भारतीय सिनेमा अपने सोवें बरस में पहुँच गया है. करोड़ों लोगों के सपनों को जीने वाले भारतीय सिनेमा की शुरुआत एक ऐसे व्यक्ति के स्वप्न से हुई थी जिसकी ज़िद ने पत्नी के गहने तक बिकवा दिये थे. सपनों के इस सौदागर का नाम था—धुंडिराज गोविन्द फाल्के, जिन्हें हम अब दादा साहब फाल्के के नाम से याद करते हैं.
         जीवन बीमा की पॉलिसियां तक बेचकर यह ज़िद्दी और बेचैन आदमी समंदर की लहरों पर सवार होकर 5 फरवरी 1912 को लन्दन पहुँचा था. मक़सद था फिल्म निर्माण की तकनीक सीखना और ज़रूरी उपकरण खरीदना. दो महीने लन्दन में रहकर जब फाल्के भारत लौटे तो उनके पास फिल्म निर्माण के उपकरणों के साथ ब्रिटिश फिल्मकार सेसिल हैफवर्थ की दीक्षा भी थी.
          भारत आकर दादा फाल्के ने तमाम बाधाओं को पार करते हुए पहली भारतीय फिल्म ‘राजा हरिश्चन्द’ बनाई. यह उस नीव का पहला पत्थर था, जिस पर दुनिया के सबसे बड़े फिल्म उद्योग की इमारत बन चुकी है. आज भारत में औसतन 1000 फिल्में हर वर्ष बन रही हैं, जबकि तकनीक और पैसे में अव्वल हालीवुड में औसतन 600 फिल्में प्रति वर्ष बनती हैं.
          बैलगाड़ी पर सवार होकर सफर शुरू करने वाला भारतीय सिनेमा आज जेट विमान पर सवार है. इसके समावेशी चरित्र का स्वरूप इसी से पता चलता है कि इसने देश के सभी कलारूपों को अपने में समेट लिया है. गीत-संगीत, नृत्य, नौटंकी, लीला, नटबाजी, जादू, मदारियों के खेल, शिल्पकला, चित्रकला, साहित्य—सभी कलाओं को भारतीय सिनेमा ने इस विराट देश की स्वप्नजीवी जनता के सुख-दुख-राग-विराग-संघर्ष से जोड़ दिया.
         अभी हाल ही में वरिष्ठ और मेरे अत्यंत प्रिय कथाकार काशीनाथ सिंह P.hd.  की एक मौखिकी के सिलसिले में रीवा आये तो विवि के हिन्दी विभाग में उनका एक व्याख्यान आयोजित कर लिया गया. उन्होने बताया कि उनकी मशहूर कृति ‘ काशी का अस्सी ‘ पर चन्द्रप्रकाश द्विवेदी एक फिल्म बना रहे हैं, जिसमें सनी देओल, रवि किशन आदि कलाकार भूमिका निभा रहे हैं. 
         इस सूचना से मन मे यह सवाल पैदा हुआ कि क्या सिनेमा का माध्यम इतना सक्षम है कि वह एक साहित्यिक कृति के साथ न्याय कर सके ? मैं इसको लेकर आश्वस्त नहीं हूँ. मैने ‘काशी का अस्सी’ दो-तीन बार पढ़ा है. इस कृति में—जिसे लेखक ने उपन्यास कहा है—बनारस के अस्सी चौराहे के इर्द-गिर्द के जीवन के संस्मरण हैं, जिन्हें लेखक ने अलग-अलग समय पर लिखा है. इन लेखों के पात्रों और घटनाओं में इतना स्वाभाविक तारतम्य है कि सभी लेखों को एक ज़गह इकट्ठा कर देने में इसका स्वरूप औपन्यासिक दिखने लगता है, लेकिन उपन्यास का सहज प्रवाह फिर भी नहीं सध पाया है.
          इस कृति में संकलित हर संस्मरण एक अद्भुत आस्वाद पैदा करता है. चर-अचर सभी पात्रों को लेखक काशीनाथ सिंह ने  जिस नज़र से देखा और प्रस्तुत किया है, मुझे नहीं लगता कि सिनेमा के पास वही आस्वाद पैदा कर पाने की क्षमता है. पात्रों की समय और स्थान के साथ अन्तर्सम्बंधों  की जो डिटेलिंग और निहितार्थ लेखक ने शब्दों और इशारों से दिए हैं, उन्हें सिनेमा में व्यक्त कर पाना बहुत कठिन है. इन संस्मरणो में अधिकांश समय, लेखक पात्रों के बगल में बैठा हुआ है, जो उन पात्रों की हरकतों और उनके आपसी संवादों की व्याख्या करता चलता है. जाहिर है कि जो मर्म पाठक के सामने खुलता है, वह दृष्टा-लेखक की रुचि-संस्कार और निष्ठा से गुज़र कर आता है.
          यहीं पर साहित्य और सिनेमा की सीमाएँ सामने आती हैं. साहित्य किसी दृश्य या घटना की जो व्याख्या या विश्लेषण करता है, हर पाठक के पास वही पहुँचता है. पाठकों के आस्वाद के स्तर में अंतर के आधार पर उसका प्रभाव अलग-अलग हो सकता है. यह अंतर प्रभाव की तीव्रता में होता है, उसके रूप में नहीं. सिनेमा के पास दृश्य होते हैं. उनकी व्याख्या और विश्लेषण की सुविधा बहुत ही कम होती है उसके पास. मज़े की बात यह है कि साहित्य में जो व्याख्या उसके प्रभाव को बढ़ा देती है, उसी व्याख्या की कोशिश सिनेमा के असर को चौपट कर देती है. जो विवरण साहित्य की ताकत होता है, वही सिनेमा की कमज़ोरी बन जाता है.
          वहीं सिनेमा के पास अपनी कुछ विशिष्ट शक्तियाँ होती हैं जो साहित्य के पास नही हैं. संगीत के प्रयोग की शक्ति, सिनेमा को सम्प्रेषणीयता की ऐसी क्षमता प्रदान करती है जो उसे दूसरे और माध्यमों से अलहदा बनाता है. सिनेमा अपने ध्वनि और प्रकाश माध्यमों से ऐसे बहुत कुछ अव्यक्त को को व्यक्त कर देता है, जिसे कह पाने मे महान लेखक भी लड़खड़ा जाते हैं. काल के अतिक्रमण की जो सुविधा सिनेमा के पास होती है, वह साहित्य के पास ठीक उसी तरह से नहीं होती. मौन की जिस भाषा का इस्तेमाल सिनेमा सहजता से कर लेता है, उसी मौन को रचने के लिए साहित्य को पहले और बाद में बहुत सी वाणी खरचनी पड़ती है.
         इस अंतर को और आसानी से समझने के लिए कुछ देर के लिए हम ऐसा करें कि कुछ महान कृतियों की अपनी कल्पना में फिल्म बनायें और कुछ महान फिल्मों की कल्पना मे ही कहानी लिखें. फिर देखिए कैसी हास्यास्पद स्थिति बनती है.
          साहित्य और सिनेमा का सम्बंध भी दो पड़ोसियों की तरह रहा. दोनो एक दूसरे के काम तो आते रहे लेकिन यह कभी सुनिश्चित नही हो पाया कि इनमे प्रेम है या नही. सिनेमा ने अपने आरंभिक चरण में साहित्य से ही प्राण-तत्व लिया. यह उसके भविष्य के लिए ज़रूरी भी था. दरअसल सिनेमा और साहित्य की उम्र में जितना अधिक अंतर है, उतना ही अंतर उनकी समझ और सामर्थ्य में भी है. विश्व सिनेमा अभी सिर्फ 117 साल का हुआ है. साहित्य की उम्र से इसकी तुलना की जाय तो यह अभी शिशु ही है साहित्य के सामने.
          साहित्य के पास सिनेमा की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए अथाह भंडार है. भाव-दशा, पात्रों, दृश्यों, वास्तुकला, परिवेश और भावनात्मक स्थितियों  के दृश्यात्मक ब्यौरे हैं. साथ ही भाव-भंगिमा, ध्वनियों, शब्दों और संगीत के सूक्ष्म प्रभावों तक के विवरण साहित्य के पास मौज़ूद हैं. सुखद बात यह है कि  साहित्य ने सिनेमा की मदद में कभी कोताही नहीं की. सिनेमा को जब-जब ज़रूरत हुई साहित्य ने खुले मन से उसका सहयोग किया. यह बात और है कि आगे चलकर सिनेमा ने अपना खुद का एक लेखक-वर्ग तैयार कर लिया.
          सिनेमा ने साहित्य के अनेक मनीषियों को अपनी ओर खींचा. पं.बेताब, मुंशी प्रेमचंद, जोश मलीहाबादी, पं.सुदर्शन, सआदत हसन मंटो, कृष्न चंदर, कैफ़ी आज़मी, जावेद अख़्तर, राजेन्द्र सिंह बेदी और गुलज़ार जैसे खालिस साहित्यिक व्यक्तित्व सिनेमा में अभिव्यक्ति के नये आयाम खोजने गये. पर दुर्भाग्य से अधिकतर के हाथ निराशा ही लगी. दरअसल सिनेमा एक व्यावसायिक माध्यम है और उसके सिद्धांत, लेने में अधिक और देने पर कम ही आधारित होते हैं. एक और बात ध्यान देने की है कि सिनेमा त्वरित और सहज लोकप्रियता के लिए रचा जाता है. यह भी एक वज़ह धी कि गंभीर साहित्यिक लेखक इस माध्यम से अपना सामंजस्य नहीं बनाये रख सके.
          साहित्यकार फिल्मों में जाकर भले ही उतने सफल न रहे हों, लेकिन जब-जब सिनेमा ने साहित्यिक कृतियों पर फिल्में बनायी हैं तो एक नये रचनात्मक लोक की सृष्टि की है. प्रेमचन्द के ‘ गोदान ‘ पर बनी फिल्म को छोड़ दें तो रेणु की कहानी पर बनी ‘तीसरी कसम’ ने दुनिया को कुछ अमर पात्र दिये. महाश्वेतादेवी की कहानी पर बनी ‘रुदाली’ के दृश्य अविस्मरणीय हैं. विमल मित्र के उपन्यास पर बनी ‘साहब,बीवी और गुलाम’, टैगोर की कहानी-‘नष्टनीड़’ पर सत्यजीत राय की फिल्म ‘चारुलता’,  सृजन के नये आयामों की तलाश करती हैं.
          एक बहुत बड़ा फर्क अब साहित्य और सिनेमा की भाषा मे आया है. इसका सीधा संबन्ध दर्शकों-पाठकों की भागीदारी से है. सिनेमा का दर्शक सीधे शामिल होता है. हर दर्शक के पास हर स्थिति के लिए सुझाव होते हैं. सिनेमा की सारी सफलताओं-असफलताओं का दारोमदार इसी दर्शक-वर्ग पर होता है. सिनेमा को समीक्षकों की उतनी जरूरत नही होती जितनी साहित्य को होती है. यही वज़ह है कि सिनेमा रचने वालों ने दर्शक से तादात्म्य बैठाना शुरू किया तो सिनेमा की रचनात्मकता धीरे-धीरे कम होने लगी. सिनेमा ने बहुत आरंभिक समय मे ही अपने आप को एक स्वतंत्र विधा के रूप में महसूस करना शुरू कर दिया था. दर्शकों के मेल से उसने अपनी जो सिनेमाई भाषा विकसित की उस पर उसका भरोसा दिनो-दिन बढ़ता गया. साहित्य और सिनेमा की भाषा का अंतराल अब इतना बढ़ चुका है कि ये दोनो माध्यम अब महानगरीय पड़ोसियों की तरह दिखने लगे हैं.

Tuesday, 14 February 2012

तात कहउँ कछु करउँ ढिठाई । अनुचित छमब जानि लरिकाई ।। ( कमला प्रसाद के जन्मदिन 14 फरवरी पर )


                 14 सितंबर 1989 को जब मैं उन्हें बोलते हुए सुन रहा था, तो पहली बार मुझे लगा कि मेरे पिता से भी ज़्यादा ज्ञानी और पराक्रमी कोई व्यक्ति इस धरती पर है.....ये वक्ता थे प्रो. कमला प्रसाद, जो कुछ ही दिनों बाद मेरे ताऊ जी बन गये थे. सुर्ख चेहरा, करीने से कढ़े हुए बाल, तेजस्वी ललाट, बोलती आँखें और होठों पर सम्मोहित कर देने वाली मुस्कान.......स्कूल में हिन्दी दिवस समारोह में मुख्य अतिथि के इसी सम्मोहन के बीच मुझे मेरे ताऊजी यानी प्रो. कमला प्रसाद मिले थे....हिन्दी साहित्य इन्हें वापंथी आलोचक की तरह जानता है, तो प्रगतिशील लेखक संघ के साथी इन्हें कमाण्डर कहते थे.

                 एक ऐसा योद्धा जिसने पराजित होना सीखा ही नहीं था. एक अथक पथिक जो तलवार की धार पर चलते हुए रोमांचित होता था. यात्रा ही जिनकी ज़िन्दगी थी. मेरे एक मित्र ने कहा था कि अगर कोई पूछे कि इस देश के सबसे बड़े पुल का नाम क्या है, तो इसका ज़वाब होगा--कमला प्रसाद. पूरब से पश्चिम, उत्तर से दक्षिण, कमला प्रसाद यात्राएँ करते रहे और संस्कृति-कर्मियों को जोड़ते रहे. हज़ारों नौजवान-प्रौढ़ लेखक-कलाकार उनसे होकर गुज़रते हुए अपने मुकाम तक पहुँचते रहे. देश भर में साहित्य-कला शिविरों, संगोष्ठियों की झड़ी लगा दी थी कमाण्डर कमला प्रसाद ने. थकान और हताशा कभी उनके पास तक आयी नहीं. स्कूल के उस दिन से उनकी मृत्यु तक, मैने उनको जब देखा- उनकी धज में ज़रा भी बदलाव नहीं आया. उन्हें उत्साह में देखा पर कभी क्रोध में नहीं देखा...उन्हें प्रेम में देखा पर कभी भावुक नहीं देखा....उन्हें दुख में देखा पर कभी टूटन में नहीं देखा..

                  ताऊजी का जन्मदिन 14 फरवरी को होता है. इसी दिन पूरी दुनिया वैलेन्टाइन्स डे को प्रेम के उत्सव के रूप मे मना रही होती थी. हम लोग इसी बात पर उनसे ठिठोली किया करते. उनसे जानने की कोशिश करते कि क्या उन्होने भी प्यार किया था. वो बैठे मुस्कुराते रहते. बहुत छेड़ने पर कह देते कि तुम लोग हो तो, क्या तुम तक मेरा प्रेम नहीं पहुँच रहा ! ताऊजी के भीतरका यह प्रेम ही उनकी ताकत और सबसे बड़ा हथियार भी था. वो अपने दुश्मनों पर भी प्रेम लुटाने के लिए मशहूर थे.

                  कोई यह सोच सकता है कि ऐसे आदमी के दुश्न कैसे हो सकते हैं ! पर उनके दुश्मन कई थे. मेरे ताऊजी देश के बड़े आलोचकों में शुमार किए जाते थे. रीवा विवि में केशव शोध संस्थान के निदेशक और हिन्दी के विभागाध्यक्ष थे. प्रगतिशील लेखक संघ के राष्ट्रीय महासचिव, वसुधा के संपादक, कला परिषद के निदेशक, राष्ट्रीय स्तर की अनेक समितियों के संयोजक-सदस्य, और असंख्य आयोजनों के कर्ता-धर्ता थे. अब कहिए, ऐसे आदमी के दुश्मन न हों, क्या यह संभव है. यश और प्रतिभा के स्वाभाविक दुश्मन होते हैं. कमला प्रसाद के भी थे. और कमला प्रसाद इन दुश्मनों पर प्यार, पुरस्कार और सम्मान लुटाते रहते थे. सुबह जिसने उन्हें पानी पी-पी कर गालियाँ दी, शाम को उसे ही अपने कार्यक्रम का मुख्य अतिथि बना देते थे. जिन लोगों ने उन्हें दोयम दरजे का आलोचक साबित करने की मुहिम चलाई, उन्हीं की किताबें छपवा देते, किसी अकादमी में रखवा देते या किसी विवि में व्याख्याता बनवा देते.

                     मैने उनसे एक बार पूछा कि ताऊजी, आप ऐसे लोगों को क्यों उपकृत करते हैं, जो आपकी जड़ खोदते रहते हैं. उन्होने कहा--" विमलेन्दु , मार्क्स कहते थे कि अगर आप सबको साथ लेकर चलना चाहते है, संगठन को मजबूत करना चाहते हैं, तो विरुद्धों का सामंजस्य करना सीखिए." यही मेरे लिए मार्क्सवाद का पहला पाठ था. कमला प्रसाद के साथ रहते हुए मार्क्सवाद को अलग से पढ़ने की ज़रूरत नहीं पड़ती थी. भारतीय मिट्टी,हवा, पानी,रिश्ते-नातों,जनम-मरण,लोकरीतियों के बीच मार्क्सवाद अधिकतम जितना संभव हो सकता है, वह कमला प्रसाद की दिनचर्या का हिस्सा था. कोई छद्म नहीं था. वह सिद्धान्तों की बात उतनी ही दूर तक करते थे, जितना जीवन में उतारना संभव हो सकता था. कामरेड थे तो कामरेड की तरह जीते थे इसलिए. कभी छोटे-बड़े का या पद-प्रतिष्ठा का अहंकार या भेदभाव करते उन्हें किसी नें नहीं देखा.

                    जिस वर्ष कमला प्रसाद रीवा विवि में आये उसी वर्ष कवि-मित्र आशीष त्रिपाठी ( इस वक्त BHU में रीडर हैं) भी रीवा आये. आशीष ने उसी मॉडल स्कूल में दाखिला लिया जिसमें मैं पहले से पढ़ रहा था. हम दोनो एक ही कक्षा में थे. आशीष ने साहित्य में अपनी प्रतिभा दिखाई , तो मेरा प्रभाव संगीत में था. हम दोनो को अच्छा मित्र बनने में ज्यादा देर नहीं लगी. स्कूल में कमला प्रसाद को पहली बार सुनने के बाद आशीष ने ही मुझे उनसे घर ले जाकर मिलवाया. आशीष के पिता श्री सेवाराम त्रिपाठी, कमला प्रसाद के शिष्य भी थे और पारिवारिक मित्र भी. आशीष पर कमला प्रसाद जी का विशेष स्नेह था, जो जीवन पर्यन्त बना रहा. कमला प्रसाद द्वारा आयोजित प्रलेस के शिविरों में आशीष ने तब से भाग लेना शुरू कर दिया था, जिस उम्र में बच्चे गुल्ली-डंडा खेल रहे थे. आशीष की साहित्य की दीक्षा यहीं से शुरू हुई थी.

                      इस पहली मुलाकात के बाद उनसे मेरा पिता-पुत्र का एक ऐसा अटूट नाता बना, जो मेरे सपनों में था. कमला प्रसाद लगभग बारह-तेरह वर्ष रीवा में रहे. इन वर्षों में लगभग रोज़ ( जब वे रीवा में होते थे ) शाम के एक-दो घंटे उनके साथ ही बीतते थे. वो किसी बड़े आयोजन की रूपरेखा बना रहे होते तो हमारी भी राय लेते. फिर कोई काम हमारे जिम्मे छोड़कर निश्चिन्त हो जाते. अदभुत विश्वास था उन्हें लोगों पर. नये लोगों को तैयार करने का यह उनका अपना तरीका था. वह नये से नये नौजवान पर भी पूरा भरोसा जताते थे. उनके समय में रीवा विवि में महीने में एक-दो राष्ट्रीय स्तर के आयोजन होते ही रहते थे. एक से एक लोग रीवा आने लगे थे, जिनके बारे में कभी हमने सोचा भी नहीं था. नामवर सिंह,केदारनाथ सिह,चन्द्रकांत देवताले,राजेन्द्र यादव,काशीनाथ सिंह,रमेश कुंतल मेघ,विश्वनाथ त्रिपाठी  ज्ञानेन्द्रपति,कुमार अंबुज,भगवत रावत,राजेश जोशी,अशोक वाजपेयी,हवीब तनवीर,अलखनन्दन,त्रिलोचन,ज्ञानरंजन,जैसे नामचीन लोगों के साथ हमने हमजोलियों जैसा समय बिताया और कविताएँ सुनाईँ.

                     तब तक हिन्दी विभाग में कवि दिनेश कुशवाह भी आ गये थे. ताऊजी के काम करने का निराला अंदाज़ था. विवि में कविता पर तीन दिन की एक राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित की. केदारनाथ सिंह, देवताले जी, राजेश जोशी, ज्ञानेन्द्रपति आदि लोग उसमें आये. 12 बजे उद्घाटन सत्र था. 9 बजे ताऊजी ने हम लोगों ( दिनेश कुशवाह, मैं, आशीष, विवेक श्रीवास्तव ) को घर पर बुला लिया. वहां से सबको लेकर विवि के सभागार पहुँच गये. बोले, चलो हम लोग मंच वगैरह ठीक कर लेते हैं. हम लोगों ने कुर्सियाँ झाड़ीं, मंच पर दरी बिछायी, माइक दुरुस्त किया, फूल-माला वगैरह तैयार किए. कमला प्रसाद भी बराबर साथ में लगे रहे. दो-ढाई घंटे की मेहनत के बाद सभागार तैयार और 12 बजे से कविता पर राष्ट्रीय संगोष्ठी शुरू......गज़ब तो तब हुआ जब 4 बजे दूसरा सत्र शुरू होना था. हम लोग अतिथियों को भोजन करा रहे थे कि ताऊजी खोजते हुए मेरे पास पहुँचे. पास आकर बोले--" विमलेन्दु, इस सत्र का संचालन तुम कर लो !" थोड़ी देर के लिए मैं सन्न रह गया. कोई तैयारी नहीं. विमर्श का सत्र था. इतने धुरंधर वक्ताओं के बीच मैं ! तब तक उन्होने मुझे अपनी छाती से लगा लिया था. और मैं इस परीक्षा के लिए तैयार हो गया था. यह बात तब की है जब मैं एम.ए. दर्शनशास्त्र का विद्यार्थी था.

                       मुझसे मिलने का उनका यही अंदाज़ था. जब भी मैं उनके सामने पहुँचता वो हाथ बढ़ाकर मुझे अपनी छाती से लगा लेते. खाना खा रहे होते तो दो रोटी अपनी थाली से निकाल कर मुझे दे देते. मुझे अपना मानस पुत्र कहते थे. जब भी किसी से मिलवाते तो कहते--'' ये विमलेन्दु है, मेरा मानस पुत्र. कविताएँ लिखता है. थोड़ा बदमाश है, बीच-बीच में गायब हो जाता है तो इसे खोजना पड़ता है. "  दरअसल मेरा कविता लिखना भी उन्हीं के कारण शुरू हुआ था. जिन दिनों मैं बी.ए. प्रथम वर्ष में था, उन्हीं दिनों कवि भगवत रावत ने भोपाल में एक युवा कवियों की कार्यशाला संयोजित की. इसमें अलग-अलग शहरों से एकदम नये कवियों को शामिल करना था. दो-दो कविताएँ मगाई गई थीं, जिनके आधार पर चयन होना था. ताऊजी ने कहा कि तुम भी दो कविताएँ भेज दो. तब तक मुझे यह भी नहीं मालूम था कि मैं कविताएँ लिखता हूँ. कुछ कवितानुमा प्रेमपत्र लिखे थे , और कुछ ग्रीटिंग कार्ड्स बनाये थे. खैर उन्हीं को आशीष की मदद से कविता की शक्ल देकर भेज दिया. चयन भी हो गया.रीवा से मैं, आशीष त्रिपाठी, क्षितिज विवेक और अंकुर पाण्डेय उस कार्यशाला में शामिल हुए. तभी से हम कवि हो गये.

                       ताऊजी  मेरे गुणों को पता नहीं कितना जानते थे, पर मेरे अवगुण सारे उन्हें पता थे. थियेटर करने के दौरान जब हम बीड़ी का सुट्टा लगाकर कभी उनके सामने फँस जाते, तो छाती से लगाते ही मुस्काते हुए कह देते कि आज तो विमलेन्दु बहुत महक रहा है भाई ! मेरी खुशी और उदासी को झट पहचान लेते. मुझे भी जब रोना होता तो मैं उनके पास पहुँच जाता और जी भर के रोता......पर क्या किसी ने कमला प्रसाद को रोते देखा था कभी ? मैने देखा था...एक दिन रात के आठ बजे मैने उन्हें फोन करके बताया कि ताऊजी मैने एक कहानी लिखी है. उन्होने कहा, लेकर फौरन चले आओ. मैं पहुँच गया. उस समय दिनेश कुशवाह भी उनके घर पर ही बैठे थे. ताऊजी ने कहा सुनाओ कहानी. वह कहानी मेरे साथ घटी कुछ घटनाओँ की कहानी थी, जिनकी कुछ जानकारी उन्हें थी. मैं कहानी सुनाता रहा....ताऊजी बीच-बीच में तौलिए से अपनी आँखें पोछते रहे. पहली और आखिरी बार मैने उन्हें इतना भावुक देखा था. यह शायद मेरे लिए उनका स्नेह था जो आँखों से उमड़ पड़ा था.

                         विवि से रिटायर होने के बाद कमला प्रसाद भोपाल चले गये. कुछ साल म.प्र. शासन की कला परिषद के निदेशक रहे. बीच-बीच में रीवा आते . आने से पहले फोन कर देते. मुझसे ये भी कहते कि नयी कविताएं सुनूंगा. कुछ निजी परेशानियों के चलते मेरा लिखना पढ़ना ठप्प होता जा रहा था. मैं फोन करता तो पूछते कि क्या नया लिखा. मैं उनसे कतराने लगा. वो ऱीवा आते तो मुझे ढुढ़वाते. मैं छुपता रहता. वो भी थोड़ा नाराज़ रहने लगे थे मुझसे. या शायद यह मेरा भ्रम था. मैं इस मुगालते में था कि जब नयी कविता लिखूँगा , तो उन्हें सुनाकर मना लूँगा. कहां जायेंगे विमलेन्दु से रूठकर....पर उन्हें मनाने का मौका नहीं मिला. पिछली फरवरी में कैंसर ने उनकी जान ले ली.......उनकी दर्जनों किताबें हैं. देश के कोने-कोने में उनकी ध्वनियों  हैं. पन्ने-पन्ने पर उनकी छवियाँ हैं......पर जिन कमला प्रसाद को मैं अब खोजता हूँ, वो यहाँ नहीं मिलते मुझे.

Tuesday, 31 January 2012

हारे को हरि नाम !


  क्रिकेट की असल परीक्षा में भारत एक बार फिर अनुत्तीर्ण हो गया. भारत की हार से जहां ऑस्ट्रेलियाई मीडिया उत्साह के अतिरेक में है, वहीं भारतीय मीडिया और दर्शक अपेक्षाकृत धैर्य रखे हुए हैं. इस समय यह कह पाना कठिन है कि यह ऊब है या उदासी.......देश में  कुछ ऐसा माहौल है जैसे कि हमें पूर्वाभास था कि यही होने वाला है. दो-एक लोगों को छोड़ दें तो, उस तरह की उग्र प्रतिक्रिया देखने को नहीं मिल रही है,जैसी आमतौर पर भारत के हारने पर होती है. हालांकि एक नज़रिए से यह भारतीय क्रिकेट के लिए चिन्ताजनक भी है.

          ऑस्ट्रेलिया में उमंग है. हो भी क्यों न ! पिछले दो-तीन सालों से वे पिट रहे थे. दो दशकों की उनकी बादशाहत को इंग्लैण्ड-भारत और दक्षिण अफ्रीका ने खत्म कर दिया था. अब इस जीत के साथ वे खुद को फिर से नम्बर एक के सिंहासन की तरफ जाता हुआ देख रहे हैं. उनके लिए यह जीत कई मायनों में बहुत महत्वपूर्ण है. सबसे पहली बात यह कि भारत को हराने का उनका प्लान-A  ही कामयाब हो गया. ऑस्ट्रेलियाई टीम इस बार अपने कुछ प्रमुख खिलाड़ियों के बगैर खेल रही थी. विशेष रूप से उनकी गेंदबाजी बहुत अनुभवहीन थी. मिशेल जॉनसन,बोलिंगर की अनुपस्थिति में उन्होने पैटिन्सन का हौव्वा खड़ा करने की कोशिश की थी, लेकिन पैटिन्सन भी पहले टेस्ट मैच के बाद घायल होकर सीरीज से बाहर हो गये. लेकिन कमाल की गेंदबाजी की उन गेंदबाजों ने जिनसे कोई उम्मीद नहीं थी. हेल्फिनहॉस, सिडल और हैरिस ने भारतीय बल्लेबाजों को एक तरह से दफ़्न ही कर दिया.

         इस जीत से सबसे बड़ा फायदा हुआ रिकी पोन्टिंग और कप्तान माइकल क्लार्क को. ये दोनो ही बल्लेबाज़ पिछले दो-ढाई सालों से रनों के लिए तरस रहे थे. पोंटिंग पर सन्यास का दबाव बढता ही जा रहा था. इस सीरीज में उनकी असफलता या तो उन्हें सन्यास के निर्णय तक पहुँचा देती या उन्हें टीम से बाहर ही कर दिया जाता. इस मामले में ऑस्ट्रेलिया क्रिकेट प्रशासन बहुत निर्मम है.क्लार्क के ऊपर हालांकि इस तरह का खतरा नहीं था क्योंकि पिछले चार पांच वर्षों से उन्हें कप्तान के रूप में तैयार और परिपक्व किया जा रहा था. इन दोनो ही खिलाड़ियों ने इस मौके का खूब फायदा उठाया. इतने रन बटोरे कि हाल की असफलता एक झटके मे ही अदृश्य हो गयी. सीरीज के बीच में ही सुनील गावस्कर ने थोड़ा खिसियाहट में ही कहा था कि जिन टीमों और खिलाड़ियों को अपना रिकार्ड सुधारना हो उन्हें भारत के साथ सीरीज खेलनी चाहिए. कुछ ऐसा संयोग ही रहा है कि जयसूर्या,पोन्टिंग,पीटरसन,लारा आदि दिग्गज जब-जब बुरे दौर से गुजरे, उन्हें भारत ने ही उबारा.

            पहला टेस्ट मैच जीतने के बाद ही ऑस्ट्रेलिया के पूर्व कप्तान ने भविष्यवाणी कर दी थी कि भारत यह सीरीज 0-4 से हारेगा. उनकी भविष्यवाणी सच साबित हुई. स्टीव वॉ कोई ज्योतिषी नहीं हैं. लेकिन वो अपने देश की क्रिकेट के मिजाज़ और उसकी रणनीति को समझते हैं. आप भी जानते हैं कि ऑस्ट्रेलिया में क्रिकेट भवना से नहीं, बुद्धि से खेली जाती है. इसीलिए उनके क्रिकेट में सौन्दर्य नहीं होता. आमतौर पर ऑस्ट्रेलियाई, क्रिकेट की अनिश्चितता को खत्म कर देते हैं. उनके यहां अकादमियों में क्रिकेट के हर पहलू पर शोध चलता रहता है. अभ्यास के लिए मशीनों और कम्प्यूटर्स का प्रयोग बहुतायत में होता है. खिलाड़ियों के उपयुक्त शारीरिक गठन के लिए शरीर विज्ञान का सहारा लिया जाता है. हर सीरीज के पहले विपक्षी टीम की क्षमताओं और कमजोंरियों का पूरा विश्लेषण कर लेते हैं.

            ऐसी ही तैयारी के साथ ऑस्ट्रेलियाई इस बार भी उतरे थे. स्टीव वॉ नें जब 0-4 से भारत के हारने की घोषणा पहले ही टेस्ट के बाद कर दी तो वो समझ गये थे कि भारतीय टीम ऑस्ट्रेलिया की पहली ही रणनीति में फंस चुकी है. इससे अगर इन्होंने किसी तरह से पार पा भी लिया तो प्लान-B और C  से  निकलना आसान नहीं होगा. सब जानतें हैं कि ऑस्ट्रेलिया की पिचें दुनिया की सबसे तेज़ पिचें हैं. हालांकि इंग्लैण्ड, अफ्रीका,न्यूजीलैंड,वेस्टइंडीज में भी एक जमाने में बहुत उछाल वाली पिच हुआ करती थीं, लेकिन अब इन पिचों का मिजाज़ बदल गया है. धीरे-धीरे ये पिचे धीमी होती गयीं. लेकिन ऑस्ट्रेलियाई प्रशासन ने अपनी पिचों का ख़याल रखा और उन्हें धीमा नहीं होने दिया. चार मैचों की सीरीज के शुरुआती तीन मैच मेलबर्न, सिडनी और पर्थ की तेज पिचों पर रखे गये. इन तीनों मे से पर्थ की पिच सर्वाधिक तेज़ है, जहां ऑस्ट्रेलिया से मुकाबला करना लगभग असंभव होता है. चौथा मैच एडिलेड की अपेक्षाकृत धीमी पिच पर हुआ. यह पिच उतनी ही धीमी है जितनी हमारे देश की सर्वाधिक तेज़ मोहाली की पिच. एडिलेड को ही माना जा रहा था कि यहां स्पिनरों को मदद मिलेगी. अगर ऐसा हो भी जाता तब भी पिछले तीन मैचों में ऑस्ट्रेलिया ने भारत की वापसी की सभी संभावनाएं खत्म कर दी थीं.

           भारतीय उपमहाद्वीप के बल्लेबाज फ्रंटफुट पर ज़ोरदार खेलते हैं, क्योंकि यहां कि पिचों पर उछाल ज्यादा नहीं होती और हवा में गेंद स्विंग भी कम करती है. स्विंग पाने के लिए हमारे गेंदबाज ज्यादातर गुड लेन्थ पर बॉल डालते हैं. ऐसी गेंदों पर फारवर्ड शॉट खेलना या डिफेन्स करना सुरक्षित होता है. इसीलिए हमारे सभी बल्लेबाज फारवर्ड शॉट या डिफेन्स में माहिर होते हैं. बैकफुट पर जाकर कट करने या डिफेन्स करने का उनका अभ्यास हो ही नहीं पाता. यह कमजोरी सचिन समेत हमारे सभी महान बल्लेबाजों में रही है. कुछ हद तक गुन्डप्पा विश्वनाथ,सुनील गावस्कर और राहुल द्रविड़ ही इस मिथ को तोड़ पाये हैं. इस सीरीज में द्रविड़ तो थे लेकिन बढ़ती उम्र ने उके पैरों की मूवमेन्ट को शायद इतना प्रभावित किया है कि वो भी असफल रहे. द्रविड़ आठ में से छः बार क्लीन बोल्ड आउट हुए. हर बार उनके बैट और पैड के बीच में एक ऐसी अवांछित दरार रह जाती थी, जिसने उन्हें अपमानजनक तरीके से सन्यास के बारे में सोचने के लिए विवश कर दिया.

            ऑस्ट्रेलिया के मौसम और पिचों में गेंद कम लम्बाई में भी पर्याप्त स्विंग हासिल कर लेती है, और उछाल तो रहती ही है. ऐसी गेंदों को खेलने के लिए ऐसे बल्लेबाज चाहिए जो बैकफुट पर जाकर कट,हुक और पुल शॉट खेल सकें. दुर्भाग्य से हमारे पास एक भी ऐसा बल्लेबाज नहीं था. जबकि ऑस्ट्रेलिया के दसवें और ग्यारहवें क्रम के बल्लेबाज भी ये शॉट आसानी से खेल लेते हैं...एक बात और ...इस पूरी सीरीज में कूकाबुरा गेंदों का इस्तेमाल हुआ. भारतीय उपमहाद्वीप में पूरी क्रिकेट एसजी गेंदों से खेली जाती है.कूकाबुरा गेंदें, एसजी के मुकाबले ज्यादा स्विंग होती हैं. इसका भी फर्क ज़रूर पड़ा होगा. यहां यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि इन परिस्थितियों का फायदा हमारे तेज गेंदबाज क्यों नहीं उठा पाए ? पूरी सीरीज में हमारे तेज गेंदबाजों-उमेश यादव,जहीर खान,इशान्त शर्मा-ने शानदार गति प्राप्त की लेकिन सही लंबाई और दिशा उन्हें अंत तक नहीं मिल पाई. गुडलेन्थ पर गेंद डालने के अभ्यासी हमारे तेज गेंदबाज बड़े संकोच के साथ शॉर्टपिच गेंदें डालते थे. उनकी इस दुविधा का फायदा ऑस्ट्रेलिया के बल्लेबाजों ने उठाया और रन बरसाते रहे.

           इस दौरे के शुरू होने के पहले मैने एक आलेख में लिखा था कि अब सचिन,द्रविड़,लक्ष्मण के विकल्प खोज लिए जाने चाहिए. उस वक्त जबकि वेस्टइंडीज के साथ इन खिलाड़ियों ने जोरदार प्रदर्शन किया था, इनके विकल्पों की बात करना एक दुस्साहस ही था. मेरा मानना था कि हर मैच में इस त्रिमूर्ति के किसी एक बल्लेबाज को आराम देकर किसी नये खिलाड़ी को प्रत्यारोपित किया जाये. मेरे ज़हन में चार नाम थे—रोहित शर्मा,चेतेश्वर पुजारा,विराट कोहली और बद्रीनाथ. इन खिलाड़ियों के पास टेस्ट क्रिकेट लायक तकनीक और टेम्प्रामेन्ट है.लेकिन भारतीय टीम के थिंक टैंक ने लगातार इस त्रिमूर्ति को बनाए रखा और वे असफल होते रहे.

           यह असफलता विशेष रूप से कोच और कप्तान की असफलता है. विपक्षी टीम की रणनीति का तोड़ ढूँढ़ना कोच और कप्तान का काम होता है. हारना तो खेल का एक हिस्सा है, लेकिन हमारी टीम ने ऑस्ट्रेलिया का मुकाबला ही नहीं किया.जब हम लगातार हार रहे थे तो टीम ने अपने तौर-तरीके में कोई बदलाव नहीं किया. न हमने खिलाड़ियों का संयोजन बदला न ही खिलाड़ी बदले. पूरी सीरीज में हमारे खिलाड़ी एक ही जगह पर एक ही तरीके से पस्त होते रहे. धोनी की कप्तानी की जो शैली अभी तक कामयाब होती आई थी वही उनकी नाकामयाबी का कारण बनी. धोनी शान्त चित्त रहकर चीजों के अपने पक्ष में घटित होने की प्रतीक्षा करते हैं. पर कंगारुओं नें ऐसा नहीं होने दिया. टीम लगातार चार मैच हार गयी और एक भी खिलाड़ी बदला नहीं गया. कोच डंकन फ्लेचर का कहीं अता-पता नहीं था. टीम में गुटबाजी की खबरें भी आती रहीं. संभव है कि ऑस्टेलिया से लौटने पर टीम में कुछ बदलाव हों. उम्मीद की जानी चाहिए कि ये बदलाव भारतीय क्रिकेट के भविष्य को बेहतर बनायेंगे. 

Saturday, 28 January 2012

जादुई यथार्थ...!


  आज पीलार तर्नेरा की याद आई तो Marquez का उपन्यास One Hundred Years of Solitude निकाला.....हिन्दी मे इसका तर्जुमा सोन्या सुरभि गुप्ता ने किया है---एकान्त के सौ बरस---नाम से.......स्पेनिश में यह उपन्यास 1967 में छपा था.अब तक इसकी 2 करोड़ से अधिक प्रतियां बिक चुकी हैं.......दरअसल हमारे देश में इसी उपन्यास के बाद जादुई यथार्थवाद के नारे लगने शुरू हुए थे........यह बुएन्दीया परिवार की सात पीढ़ियों की दास्तान है.....दक्षिण अमेरिका के कोलंबिया देश में, माकोन्दो नदी के किनारे, बुएन्दीया परिवार के पितामह -खोसे अर्कादियो बुएन्दीया ने माकोन्दो शहर बसाया था......उपन्यास में ऐसी कथाएँ हैं कि जैसे कोई जादू का खेल हो......पीलार की बात मैं अभी नहीं करूँगा.......पर आप सबने हमारे पुराणों की कथा सुनी-पढ़ी है......तीन-चार हज़ार वर्ष पहले ये कथाएँ लिखी कही गयी थीं......इन कथाओं के जादुई यथार्थ पर हमने कभी बात नहीं की...क्यों..????

Thursday, 19 January 2012

अब बारी लेखक-कलाकारों की है !


  न्यूज़ पोर्टल मोहल्ला लाइव पर अरविन्द गौड़ के हवाले से एक खबर थी कि मुंबई पुलिस की क्राइम ब्रांच ने एक स्थानीय वकील की शिकायत पर कानपुर के युवा कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी की वेबसाइट ‘कार्टून अगेंस्ट करप्शन डॉट कॉम’ पर प्रतिबंध लगा दिया है। असीम पर आरोप है कि उन्होंने अपने कार्टूनों के जरिये देश की भावनाओं को ठेस पहुंचायी है। असीम एक कलाकार हैं. भ्रष्टाचार के खिलाफ़ लडने का अपना तरीका है.किसी भीड़ का हिस्सा बने विना वो एक रचनात्मक प्रतिरोध कर रहे है. वे भ्रष्टाचार पर तीखी और सीधी चोट करते हैं। जिन्होने असीम के कार्टून देखे हैं, वे जानते हैं कि इन चित्रों में किसी का मजाक नहीं बल्कि आम आदमी की भावनाओं की, गुस्से की वास्तविक अभिव्यक्ति है। अरविन्द लिखते हैं कि " यह सिर्फ कार्टूनिस्ट पर प्रतिबंध लगाना नहीं बल्कि मीडिया और सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर सुनियोजित तरीके से नियंत्रण की शुरुआत है।" हाल के समय में सरकार के कुछ ज़िम्मेदार मंत्री अपनी मंशा सार्वजनिक कर चुके हैं कि सोशल मीडिया पर लगाम की ज़रूरत है.
         दरअसल भ्रष्टाचार की अभी तक की मुहिम में देश का बुद्धिजीवी वर्ग खुलकर सामने नहीं आया था.बल्कि यह कहना ज़्यादा ठीक होगा कि बौद्धिक वर्ग का रवैया कुछ-कुछ नकारात्मक रहा है. इसकी वज़ह शायद अन्ना और उनकी टीम का बेतुकापन हो.अन्ना, रामदेव और उनके साथियों की हर हरकत और बयान को बौद्धिक समाज अपनी कसौटी पर कसता रहा. लेकिन यकीन मानिए कि बुद्धिजीवी यह कतई नहीं चाहते थे कि यह आन्दोलन अकाल मृत्यु को प्राप्त हो.इस बात की संभावना प्रबल है और अवसर भी है, कि आगे आन्दोलन की कमान देश के लेखक-कलाकार अपने हाथ में ले लें. राजनीतिक दल और सरकार सतर्क दिखती है.
         आप देख ही रहे होंगे कि पूरे देश में जितनी भी अकादमियां और कला-संस्थान हैं, उनमें सरकार ने अपने पक्षधर और बहुत औसत किस् के लोगों को बैठा रखा है. फिर ये संस्थाएँ चाहे केन्द्र सरकार की हों या राज्य सरकारों की.यह सब बहुत सुनियोजित तरीके से हुआ है. सरकार इन्हीं लोगों को पुरस्कृत भी करती रहती है. ये मठाधीश आपस में भी एक दूसरे को सम्मानित और उपकृत करते रहते हैं. इस रणनीति से सरकार ने बौद्धिक वर्ग के एक बहुत बड़े हिस्से की मेधा को पहले ही नियंत्रित कर रखा है. जो कुछ लोग सरकार की कृपा से महरूम हैं या कुछ जो अपनी क्षमताओं को सरकार का गुलाम नहीं बनाना चाहते, उन पर सरकार इस तरह के हमले करने लगी है.
         अपने देश के लिए यह अपेक्षाकृत नयी बात है. और ज़ाहिर है ख़तरनाक भी.मुस्लिम देशों और यूरोप-अमेरिका महाद्वीप के कुछ देशों में लेखक-कलाकारों पर प्रतिबन्ध के समाचार जब हम सुनते थे तो आश्चर्य तो होता था, पर इसकी गम्भीरता और छटपटाहट को महसूस नहीं कर पाते थे.लेकिन कुछ वर्षों में अपने देश में पनप रही इस प्रवृत्ति की चोट अब दर्द बन कर उभरने लगी है.
          एक वाकया मैं आपको म.प्र. का बताता हूं. म.प्र. की साहित्य अकादमी पिछले कई वर्षों से प्रदेश के लगभग सभी शहरों में पाठक मंच चलाती है. उस शहर के किसी उर्जावान साहित्यकर्मी को संयोजक बना दिया जाता है.अकादमी अपनी ओर से 10-12 किताबें चुनकर सभी केन्द्रों में भिजवाती है.शहर के साहित्य प्रेमियों को ये किताबें पढ़ने को दी जाती हैं. हर महीने एक किताब पर सब लोग चर्चा करते हैं. इस चर्चा की समेकित रपट अकादमी के पास भेजी जाती है. दिखने में यह योजना बहुत शानदार लगती है. पुस्तक-संस्कृति को बढ़ावा देने की ऐसी योजना शायद किसी और प्रदेश में नहीं है.
          लेकिन यहाँ भी सरकार के अपने छल-छद्म हैं. तीन साल पहले तक रीवा-पाठक मंच का संयोजक मैं था.तीन साल पहले अमरकंटक में पाठक मंच संयोजकों का वार्षिक सम्मेलन हुआ. वार्षिक सम्मेलन में प्रदेश-देश के ख्यात साहित्यकारों-विचारकों को बुलाकर विचार-विमर्श की परंपरा है. विडम्बना ये है कि सरकार बदलती है तो विचारक भी बदल जाते हैं और अकादमी का संचालक भी. म.प्र.में भाजपा की सरकार पिछले आठ वर्षों से है. अब आप अंदाजा लगा सकते हैं कि सम्मेलन में विशेषज्ञ के रूप में किन लोगों को बुलाया गया होगा. इस सम्मेलन के दौरान कुछ वरिष्ठ साहित्यकारों ने खुलेआम अकादमी संचालक को सलाह दी कि पाठक मंच के ऐसे संयोजकों को तत्काल हटाया जाय जो प्रगतिशील हैं. और नतीजा यह हुआ कि कुछ ही दिनों के अन्दर मेरे साथ ही कई संयोजक बदल दिए गये. कुछ पाला बदल कर बच गये. कहीं कोई शोर गुल नहीं हुआ.
            सरकारों का चरित्र अब कुछ ऐसा हो गया है कि किसी भी आवाज. का उन पर अब कोई असर भी नहीं होता. आपको याद ही होगा केन्द्रीय साहित्य अकादमी के उपाध्यक्ष पद पर अशोक चक्रधर की नियुक्ति का कितना विरोध किया था देश भर के साहित्यकारों ने. क्या फर्क पड़ा  ? लेखक-कलाकारों की आवाज़ सुनने की अब आदत ही नहीं रही सरकार को.
       अरविन्द के साथ ही हम सब रचनाकर्मियो का सवाल है कि आखिर कोई किस आधार पर किसी वेबसाइट, लेख, नाटक, पेंटिंग या किताब पर प्रतिबंध लगा सकता है? सच कहना क्या कोई अपराध है? हमारे नेता या सरकार इतने कमजोर या डरपोक क्‍यों है? वे असलियत से क्‍यों डरते है? हमारे बोलने की, लिखने की, कहने की आजादी पर रोक क्‍यों लगाना चाहते है? ये केवल अभिव्यक्ति की आजादी का सवाल नहीं है, ये केवल लोकतांत्रिक हकों का हनन भर भी नहीं है, बल्कि ये एक चुनोती है, असल में ये हमारे संवैधानिक अधिकारो पर सीधा हमला है।
       असीम का आरोप है कि वेबसाइट को बैन करने की भी मुंबई पुलिस ने कोई जानकारी उन्हे नहीं दी। वेबसाइट की प्रोवाइडर कंपनी बिगरॉक्स डॉट कॉम ने एक मेल द्वारा असीम को साइट बंद करने की सूचना दी। जब बिगरॉक्स कंपनी से बात हुई, तो उन्‍होंने असीम को मुंबई पुलिस की क्राइम ब्रांच से संपर्क करने को कहा। क्राइम ब्रांच में कोई बताने वाला नहीं कि वेबसाइट को बैन क्‍यों किया गया? या साइबर एक्ट की किन धाराओं में केस दर्ज किया गया है? अब पता चला है कि महाराष्ट्र के बीड़ जिला अदालत ने स्थानीय पुलिस को असीम पर राष्ट्रद्रोह का केस दर्ज करने का आदेश भी दे दिया है। ये और भी शर्मनाक हरकत है।
       आरोप है कि उनके कार्टूनो में संविधान और संसद का मजाक उड़ाया गया है। पर सवाल ये भी है कि जब सांसद संसद में हंगामा करते हैं, खुलेआम नोट लहराते हैं, लोकपाल बिल फाड़ते हैं, चुटकुलेबाजी करते हैं, तब क्या वे संसद का मजाक नहीं उड़ाते? देश की जनता का अपमान नहीं करते?
         दरअसल हमारे लेखक-कलाकार भी इतने   खेमों में बटे हैं कि हम असीम को बहुत भरोसे के साथ आश्वस्त भी नहीं कर सकते.हमने इस देश के बौद्धिकों को कोई बड़ी लड़ाई लड़ते कभी देखा ही नहीं है. पर इस बिनाह पर हम उम्मीद नहीं छोड़ सकते. यह सवाल हमारी पहचान और सुरक्षा का भी है.

Monday, 16 January 2012

कविता : तुमसे मिलने के बाद


कई बार माँ की गोद में सिर रखा  
बहुत दिनों के बाद
एकदम शिशु हो गया.
मित्र से लिपटकर खूब चूमा उसे
वह एकदम हक्का बक्का.

कई बार पकड़े गये हजरत
बिना बात मुस्कुराते हुए.

लौकी की सब्जी भी 
इतने स्वाद से खायी
कि जैसे छप्पन भोगों का रस
इसी कमबख्त में उतर आया हो.
आज खूब सम्भल कर चलाई स्कूटर.

जीवन से यह एक नये सिरे से मोह था.

कुछ चटक रंग
मेरी ही आँखों के सामने
मेरे पसंदीदा रंगों को बेदखल कर गये.

एकाएक जीवन की लय
विलम्बित से द्रुत में आ गई
एक शाश्वत राग को 
मैं नयी बन्दिश में गाने लगा.

भीषण गर्मी में भी 
कई बार काँप गया शरीर
अप्रैल के अंत की पूरी धूप
एकाएक जमकर बर्फ बन गई.

शर्म से पानी-पानी होकर
सूरज ने ओढ़ लिया शाम का बुर्का.

रात एक स्लेट की तरह थी मेरे सामने
जिस पर सीखनी थी मुझे
एक नई भाषा की वर्णमाला.

मैं एक अक्षर लिखता
और आसमान में एक तारा निकल आता
फिर धीरे धीरे
पूरा आसमान तारों से भर जाता.

तीन अक्षरों का तुम्हारा नाम पढ़ने में
पूरी रात तुतलाता रहा मैं ।

                            - विमलेन्दु

Tuesday, 10 January 2012

अन्ना के आगे क्या है..?


  अनेक आशंकाओं के बीच वर्ष 2012 में भारत के लिए सबसे बड़ी दुर्घटना यह हो सकती है कि भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ जो मानस तैयार हुआ है देश में, उसका कोई खेवनहार न मिले और वह मझधार मे ही डूब जाये. पिछले कुछ महीनों में अन्ना हजारे और उनकी टीम की विश्वसनीयता जिस तरह से क्षतिग्रस्त हुई है, उसके ठीक होने के कोई आसार नहीं दिखते. अन्ना भी थके हुए से दिख रहे हैं, और पराजय की हताशा उनके चेहरे और बयानों में साफ देखी जा सकती है.

                भ्रष्टाचार के विरुद्ध अन्ना ने जब पहल की तब उन्हें भी यह आभास न रहा होगा कि उनके समर्थन में देश भर से इतनी आवाज़ें साथ हो लेंगी. उनके सहयोगियों और देश की जनता ने उन्हें दूसरा गांधी कहना शुरू कर दिया. मुझे लगता है कि गांधी की उपाधि, अन्ना और आन्दोलन के लिए ख़तरनाक साबित हुई. अन्ना गांधी नहीं थे और न हो सकते हैं. ठीक वैसे ही,भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ यह आन्दोलन, आज़ादी के आन्दोलन से बहुत अलग है. आज़ादी की लड़ाई में हमारा दुश्मन स्पष्ट था और हमसे अलग था. अँग्रेज सरकार के अत्याचार और हमारी गरीबी इतनी बढ़ गई थी कि उन्हें भगाने के अलावा हमारे पास कोई दूसरा रास्ता नहीं था.

                 लेकिन भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ जो आन्दोलन शुरू हुआ उसके अपने अंतर्विरोध हैं. सबसे बड़ी विडम्बना यह है कि इस लड़ाई में हमें अपने आप से ही लड़ना है. दुश्मन हमारे भीतर और हमारी बिरादरी का ही है. खुद के ख़िलाफ़ लड़ना शायद दुनिया की सबसे कठिन लड़ाई होती है. खुद को जीतना सभी लड़ाइयों का अंत भी होता है. एक लहर और उन्माद में जो लोग अन्ना की मुहिम  में शामिल हो गये , भ्रष्टाचार उन्हीं सबके बीच फलता-फूलता है. तम्बू गाड़कर और अन्ना टोपी लगाकर नारे लगाते जिन लोगों को आपने देखा है, उनमें अपराधी, चोर, घूँसखोर, दलाल आदि अवश्य दिखे होंगे. अब आप सोचिए इनकी आवाज़ और नारों का क्या अर्थ रह जाता है.

                  एक बहुत बड़ा फर्क यह है कि आज़ादी के आन्दोलन का कोई राजनीतिक विरोध नहीं था. राजनीतिक दल आन्दोलन के साथ थे, भले ही नेतृत्व काँग्रेस के हाथ में था. लेकिन अन्ना के आन्दोलन में भारत का पूरा राजनीतिक तंत्र ही विपक्ष में है. भ्रष्टाचार के विरोध से शुरू हुआ आन्दोलन, आज पूरी तरह से राजनीतिक व्यवस्था के विरोध का आन्दोलन बन गया है. यद्यपि यह प्रबल जन भावना है कि भ्रष्टाचार का केन्द्र राजनीति ही है, जिसे अभी तक किसी रिक्टर पैमाने पर नापा नहीं जा सका है. सीधे राजनीति से मुकाबिल आ जाना ही अन्ना और उनकी टीम के लिए विनाशकारी साबित हुआ.

                 और फिर भारतीय राजनीति ने अपना कमाल दिखाया. उसने अन्ना को सत्तारूढ़ काँग्रेस का विरोधी दिखा दिया और भाजपा-संघ को अन्ना का समर्थक. अन्ना ये दोनों ही स्थितियां न चाहते रहे होंगे. लेकिन वो राजनीति के जाल में फँस गये. अन्ना के साथ जुटी भीड़ को देख कर विपक्षी दलों का लालच समझना आसान है. भाजपा ने हर संभव कोशिश की कि अन्ना का आन्दोलन अपहरित हो जाये. लेकिन लोकपाल के मुद्दे पर वो देश की जनता के साथ विश्वसनीयता और मजबूती से नहीं खड़ी हो सकी. दरअसल कोई भी राजनीतिक दल अपने गिरेबान में न खुद झाँकना चाहता था न जनता को झाँकने देना चाहता था.

                  अन्ना के साथ भाजपा-संघ के होने को , सत्तापक्ष ने इस तरह से प्रचारित किया जैसे यह कोई बहुत बड़ा अपराध हो. सत्तापक्ष की कोशिश थी कि अन्ना के आन्दोलन को साम्प्रदायिक रंग दिया जा सके. उनकी यह कामयाब रणनीति है. वो विपक्ष की किसी भी कोशिश को साम्प्रदायिक बताकर पहले भी निष्फल करते आए है. यद्यपि अन्ना राजनीति के माहिर नहीं हैं, पर सत्तापक्ष की इस चाल को वो शुरू से ही समझ रहे थे. इसीलिए उन्होने भाजपा-संघ से एक उचित दूरी हमेशा बनाए रखी.

                  विपक्षी दलों की बड़ी हास्यास्पद स्थिति थी. वो बाहरी तौर पर तो भ्रष्टाचार को उखाड़ फेंकना चाहते थे लेकिन सत्तापक्ष की ही तरह अपने गले में घंटी बंधवाने से बचते भी रहे.संसद में जब लोकपाल विधेयक पर उठापटक शुरू हुई तो सबकी लुंगियां उठ गईँ, और पूरे देश ने देखा कि कितने नर हैं और कितने मादा. भारत के संसदीय इतिहास में नौवीं बार लोकपाल विधेयक लाया गया था, और उसका हश्र लगभग एक जैसा ही रहा. सारे दिखावों के बावजूद चूँकि लोकपाल विधेयक का ड्राफ्ट काँग्रेस के मुताबिक ही हुआ, इसलिए बाकी लोगों में असंतोष पैदा हुआ. संसद में जब पक्ष-विपक्ष लड़ रहे थे तो अन्ना और देश की जनता लाचार नज़रों से यह तमाशा देख रही थी.

                  और फिर अन्ना गांधी भी तो नहीं हैं. हालांकि मुझे संदेह है कि गांधी भी आज इस आन्दोलन का नेतृत्व करते तो स्थितियां कुछ अलग न होतीं. गांधी जी जब भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन से जुड़े तो वो अपने सारे अस्त्र-शस्त्र ईज़ाद कर चुके थे. दक्षिण अफ्रीका उनकी प्रयोगशाला थी. सफलता और असफलता को कैसे पचाना है, इसका अभ्यास वे दक्षिण अफ्रीका  में ही कर चुके थे. अपमान को सहेजना और उचित समय पर उसका आयुध के रूप में प्रयोग करना गांधी जी बखूबी जानते थे. गांधी जी के आत्मबल का कायल पूरा विश्व था. गांधी जब आये तो अपना एक समृद्ध दर्शन लेकर आये. उनका वैचारिक आधार अत्यन्त सुदृढ़ था.

                  लेकिन अन्ना के पास न तो उतना धैर्य है, न आत्मबल और न कोई वैचारिक दर्शन. विधि और संसदीय प्रकृयाओं की उनकी जानकारी भी कम ही लगती है. इसीलिए वो अपनी टीम पर बहुत ज़्यादा निर्भर रहते हैं. इन दिनों तो ऐसा दिखने लगा है कि जैसे वो अपने साथियों के हाथों खेल रहे हैं. उनके सहयोगियों के सरकार के साथ संबन्ध पहले से ही कटु रहे हैं. इस कटुता को आन्दोलन के परदे में भुनाने की कोशिशें भी दिखती हैं. अन्ना अगर गांधी होते तो यह कभी न कहते कि संसद में बैठे हुए सब चोर हैं, या कि लोकपाल को राहुल गांधी के इशारे पर कमज़ोर किया जा रहा है. गांधी काँग्रेस को हराने के लिए प्रचार करने का भी निर्णय न लेते.

Tuesday, 3 January 2012

न गुल खिले, न तुमसे मिले, न मय पी है...!



   कुछ इसी अंदाज़ में पुराना साल गया और नया आ गया. न पुराने के जाने का कोई ग़म, न नये के आने की कोई उत्सुकता. जश्न के अनेक रंग-ढंग बिखरे थे पर लुभा नहीं पायें. ये कैफ़ियत कोई आज की  नहीं है, कई सालों से साल ऐसे ही आते जातेहैं. अब न तो वो लोग आस पास हैं जिनमें मन रमता था, न तौर-तरीके. लोगों की ज़बान पर एक मशीनी हैप्पी न्यू इयर था और उत्सव के नाम पर डीजे के शोर में नाच और शराबखोरी. हमें भी इन्हीं के बीच अपने उत्सव और उमंग को खोजना था.
      तो हमने अपनी उमंग अपनी रजाई और  कविता में खोजी. रजाई की तरफ ठंड ने प्रेरित किया तो दिन भर सहकर्मियों-साथियों से चली चर्चा ने कविता के लिए. नया साल शुरू होने के हफ्ता भर पहले से लोग उत्साहित थे. चेहरे पर एक बेदम सी चमक उठती थी नये साल के ज़िक्र के साथ और फिर कहीं गुम हो जाती थी. मुझे लगता कि  किसीके पासकोई योजना नहीं है. हर कोई दूसरे से पूछ रहा था कि पार्टी की तैयारी कैसी है ! जब उनसे पूछा जाता तो यही जवाब ता कि अरे भाई, हम तो कहीं आते-जाते नहीं, बस एक जनवरी को हनुमान जी का दर्शन कर आते हैं.
      उत्सव मनाना भी एक कला है, जो सबके पास नहीं होती. कुछ लोग उत्सवों के आयोजन में पारंगत होते हैं, तो उत्सव में शामिल होकर अपनी भूमिका की तलाश करना भी एक कला है. कुछ ही वर्ष पहले कि बात है, जब हमारा मित्र-समूह उत्सवों के एक से एक नायाब युक्तियों से लैस होता था. हमारे समूह में रंगकर्मी, कवि, गायक, चित्रकार थे. कुछ ऐसे लोग भी थे जिनके पास इनमें से कोई हुनर नहीं था. ये लोग वित्तीय व्यवस्था और विघ्नसंतोषियों से निपटने का काम देखते थे. इस मित्र-मंडली के साथ किसी भी आम मौके पर खास महफिल सजा लेना बड़ा सहज था. छोटा मोटा ड्रामा तैयार कर लिया जात, कविता पोस्टर, ग्रीटिन्ग कार्ड्स वगैरह हाथ से तैयार कर लिए जाते. ग़ज़लों और लोकगीतों की महफिल सज जाती. घर की महिलाएँ और प्रशंसिकाएँ खाने-पीने का इंतजाम कर ही देतीं. धीरे-धीरे समय बदलता गया. रोजी-रोटी के चक्कर में मित्र दूसरे शहरों में बस गये तो समूह टूट गया. फिर जब से उत्सवों को मनाने का जिम्मा टीवी चैनलों,होटलों और ट्रैवल एजेंसियों ने ले लिया तो हम जैसे लोग अप्रासंगिक होते गये. सच पूछिए तो उत्सवों के इन उत्तर आधुनिक तौर तरीकों को हम वितृष्णा से देखते हैं.
      अप्रत्याशित ढंग से शहर में इस बार होटलों, रेस्तराओं, विवाहघरों में होने वाले कार्यक्रम नदारत थे. इस बार नव वर्ष के ज़्यादातर कार्यक्रम मंदिरों में आयोजित हुए. कहीं अखण्ड मानस, कहीं भण्डारा. यह शायद माया कलेण्डर की भविष्यवाणी का असर रहा होगा. माया कलेण्डर के मुताबिक दुनिया के प्रलय की तारीख निकली है 21 दिसंबर 2012 . हमारे देश की जनता का जैसा मानस है, उसे देखते हुए यह कहना अविश्वसनीय नहीं होगा कि प्रलय का का भय लोगों के मन में कहीं न कहीं होगा ज़रूर. इसीलिए लोग शराबखानों से ज़्यादा मंदिरों की ओर गये. टुटपुजिए ज्योतिषियों की बहार थी. हर कोई दूसरों का भविष्य बांच रहा था. प्रणय, दाम्पत्य, नौकरी-पेशा से लेकर खेती-बाड़ी तक का भविष्यफल छप रहा था.जितने अखबार-चैनल-ज्योतिषी, उतनी तरह की भविष्यवाणियां. एक ज्योतिषी जिसे राजा बना रहा था, दूसरा उसे रंक बनाने पर आमादा था.
      इन्हीं कौतुकों के बीच पुराना साल जा रहा था, तभी गाँव से राजबली आ गया. राजबली कोई नामचीन आदमी नहीं है. वह हमारी बड़ी मौसी के गाँव का है. उनके यहाँ किसानी का काम-काज देखता है. पर है अद्भुत आदमी. हम लोगों के यहां का कोई आयोजन राजबली के बिना पूरा नहीं हो सकता. नौजवान है और गज़ब का मेहनती. भूत की तरह काम करता है. एक तरफ दस आदमी लगा दीजिए और दूसरी तरफ राजबली को. राजबली भारी पड़ेगा. पढ़ा-लिखा नहीं है, पर लढ़ा बहुत है. कोई भी काम सौंपिए, ऐसी तरतीब से करता है कि देखने वाले दंग रह जायें.
        राजबली आया तो घर में सर्वसम्मति से तय किया गया कि पुराने साल की विदाई और नये साल के स्वागत में आलू-बैगन-टमाटर का भरता और हाथ की पोई रोटी खाई जाये. राजबली इस देसी हुनर के उस्ताद थे.बाकी सामग्री तो थी ही, धनिया की पत्ती और अदरक खत्म थी तो मगा ली गई. घर में लगे पेड़ों से निकली सूखी लकड़ी इकट्ठी की गई और सहेजकर रखे गए उपले निकाले गये. घर के बाहर पेड़ों के नीचे ईटों को जोड़कर राजबली ने चूल्हा बनाया. लकड़ी उपले लगाकर आग बनाई. गोल वाले बैगनों में लहसुन और हींग खोंसकर भूना गया. साथ में आलू और टमाटर भी.आटे में आजवाइन और थोड़ा बेसन मिलाकर रोटी को ज़रा अलग रंग और स्वाद देने की कवायद की गई. इस पूरी प्रक्रिया में राजबली का केवल एक सहयोगी था—शहज़ादा खुर्रम उर्फ ढाई वर्षीय नन्दन. इन हजरत की फितरत है कि ये किसी काम में जब तक हाथ न बटायें, इन्हें चैन नहीं मिलता. लगभग दो घंटे की मेहनत के बाद भरता-रोटी तैयार हुआ. राजबली गरम-गरम रोटियां सेंक कर दे रहा था और हम लोग पुराने साल की विदाई कर रहे थे.
       पहली जनवरी को मेरी वर्षों पुरानी एक साध पूरी होते-होते रह गई. मेरे मन में एक दुर्निवार इच्छा जमी बैठी है कि मैं काले रंग का एक देसी कुत्ता पालूँ. साल के पहले दिन भोर से ही झमाझम बारिश हो रही थी जो रात तक चलती रही. शाम को बारिश थोड़ा कम हुई तो हवा-पानी के लिए चौराहे की तरफ निकले. लेकिन बारिश फिर तेज़ हो गई, तो PWD ऑफिस के शेड के नीचे छुपना पड़ा. उसी शेड के एक कोने में पानी में भीगा हुआ काले रंग का एक पिल्ला दुबका हुआ था. ठंड से ठिठुरते हुए पिल्ले को देखकर दया भी उपजी और आँखों में चमक भी. एक-डेढ़ घंटे तक, जब तक पानी बरसता रहा मैं उसके साथ खेलता-बतियाता रहा. पानी रुकने पर मैने पिल्ले को एक पॉलीथिन पैकेट में डाला और घर लेकर आ गया.
       आशंका के विपरीत घर में पिल्ले का ज़ोरदार स्वागत हुआ. ठंड से बचाने के लिए उसके शरीर पर कपड़े लपेटे गए. तुरन्त दूध और  बिस्किट दिया गया. नन्दन ने उसे पढ़ाने का जिम्मा उठाते हुए झटपट क्लास भी शुरू कर दी. A से D तक जितना उसे आता था, पिल्ले को पढ़ा दिया. पिल्ले के आराम का इंतज़ाम पोर्च से लगी गैलरी में किया गया. लेकिन दस मिनट में ही उसने चिल्लाना शुरू कर दिया. तब मैने उसका बिस्तर अपने कमरे में लगवा दिया. उसके बाद पूरी रात मेरी वो दुर्गति हुई कि कुछ पूछिए मत. हर पन्द्रह मिनट में पिल्ला ज़ोर-ज़ोर से रोने लगता. बार-बार भाग कर माताजी के कमरे के पास जाकर रोने लगता. अम्मा का व्लडप्रेशर तीन-चार दिनों से बिगड़ा हुआ था.उनकी नींद में खलल बहुत महगा पड़ता. इसी तरह पूरी रात मैं उसे पकड़-पकड़ कर चुप कराता रहा, और वह मुझे पराजित करता रहा. सुबह मैने नन्दन की नज़रें बचाकर उसी पॉलीथिन पैकेट में उसे फिर से डाला र उसी ज़गह पर ले जाकर छोड़ दिया जहां से उठाया था.
         इस तरह एक नन्हीं सी इच्छा के लिए प्रतीक्षा की फिर उसी राह पर आ गये. इस तरह की न जाने कितनी छोटी-छोटी हसरतें होती हैं हमारी, जिनके लिए समय के साथ हमारी होड़ चलती रहती है. और हाँ, ज्योतिषियों ने जिन तीन राशियों के लिए यह साल अशुभ बताया है, उन्हीं में से एक मेरी भी है.