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Wednesday, 12 September 2012

बात तो फिर भी बोलेगी...!


असीम त्रिवेदी को गिरफ्तार किये जाने की खबर तो अब सभी लोगों तक पहुँच ही गई होगी. शायद यह भी सब जान ही गये होंगे कि तीन दिन बाद बिना मागे ही असीम को ज़मानत भी दे दी गई. असीम एक कार्टूनिस्ट हैं. अन्ना टीम के सक्रिय सदस्य हैं. भ्रष्टाचार को लक्ष्य करके उन्होने कमाल के कार्टून बनाए हैं. मुंबई पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार किया और पन्द्रह दिन की न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया. कुछ महीने पहले उनकी वेबसाइट ‘कार्टून अगेंस्ट करप्शन डॉट कॉम’ को प्रतिबंधित कर दिया गया था. खबर थी कि उन पर राष्ट्रद्रोह का मुकदमा सरकार चलायेगी, फिर खबर यह भी मिल रही है कि सरकार का मन बदल गया है.

अब हम सरकार को इतना संवेदनशील और सदय मान लें तो भूल होगी. मीडिया और खासतौर पर सोशल मीडिया के जागरूक प्रयासों के चलते पूरे देश में सरकार के इस कदम के विरोध और असीम के समर्थन में लोग सक्रिय हो चुके हैं. चौतरफा मुसीबतों में घिरी केन्द्र सरकार शायद इस समय जनता को आन्दोलित होने का कोई मौका नही देना चाहती. अन्ना टीम की दुविधाओं और मतभेदों से सरकार को कुछ राहत की साँस आने लगी थी. वो इन्हें फिर से एकजुट नहीं होने देगी.

खैर, अब बात असीम पर लगाये गये आरोपों की करते हैं. उन्हें राष्ट्रद्रोही कहा जा रहा है, क्योंकि उन्होने कुछ राष्ट्रीय प्रतीकों से मिलती-जुलती आकृतियों से भ्रष्टाचार और हमारी राजनीतिक व्यवस्था पर व्यंग्य किया है. वो कार्टून बनाते हैं. कार्टून, चित्र से ज़्यादा एक भाषा होते हैं. एक ऐसी चित्रात्मक भाषा, जिसमें लक्षणा और व्यंजना में अर्थ खुलते हैं. इस भाषा में जो अप्रकट है वह महत्वपूर्ण होता है. कार्टून बनाने वाला जो बात कहना चाहता है, उसके लिए वह उपयुक्त माध्यम और प्रतीक खोजता है. ज़ाहिर है कि इस विधा में बात करते समय चित्र महत्वपूर्ण नहीं होता. असीम ने राष्ट्रीय चिन्ह (अशोक स्तम्भ के शीर्ष पर बनी चार शेरों की आकृति) और राष्ट्रीय ध्वज  में परिवर्तन करके राजनीति पर व्यंग्य  किया. यहाँ ध्यान रखना होगा कि  उनका व्यंग्य इन राष्ट्रीय प्रतीतो पर नहीं था.

इसे सरकार, पुलिस और नेतागण राष्ट्रद्रोह मान रहे हैं. यानी संसद में बैठे हुए कुछ भ्रष्ट और सज़ायाफ़्ता सदस्यों पर टिप्पणी करना राष्ट्रद्रोह हो गया. दूसरी तरफ से इसका अर्थ यह है कि ये जो रोज़-रोज़ करोड़ों-करोड़ का घोटाला कर रहे हैं, जो जेल में बन्द हैं, जो संसद ठप्प  करके जनता का पैसा और देश का भविष्य बरबाद कर रहे हैं  वो सच्चे राष्ट्रभक्त हैं. मेरा ख़याल है कि राजनीतिक दलों का चरित्र दिनो-दिन साफ होता जा रहा है. यह कहना भले ही गहन निराशा की उपज लगे, पर हमारे देश में लोगतंत्र के परदे में एक मृदु तानाशाही चल रही है. जनता की आवाज़ और राष्ट्रहित की लगातार हो रही अनदेखी के बाद प्रतिरोध को कुचलने के जो तरीके अपनाये जा रहे है, वो तानाशाही के प्रारंभिक लक्षण हैं. गनीमत यह है कि देश की गरीब जनता और हमारी सेना की, लोकतंत्र पर अनन्य आस्था है. हम मिस्र या सीरिया जैसी क्रान्ति की कल्पना नहीं कर सकते. लेकिन सरकार पर नज़र रखने के अपने संवैधानिक कर्तव्य से भी पीछे नहीं हटना चाहिए.

असीम पर आरोप है कि उन्होंने अपने कार्टूनों के जरिये देश की भावनाओं को ठेस पहुंचायी है। असीम एक कलाकार हैं. भ्रष्टाचार के खिलाफ़ लड़ने का अपना तरीका है. किसी भीड़ का हिस्सा बने बिना वो एक रचनात्मक प्रतिरोध कर रहे है. मैंने असीम त्रिवेदी के भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम वाले कार्टून देखे हैं, वे भ्रष्टाचार पर तीखी और सीधी चोट करते हैं। उनमें किसी का मजाक नहीं बल्कि आम आदमी की भावनाओं की, गुस्से की वास्तविक अभिव्यक्ति है। मेरी निगाह में यह सिर्फ कार्टूनिस्ट पर प्रतिबंध लगाना नहीं बल्कि मीडिया और सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर सुनियोजित तरीके से नियंत्रण की शुरुआत है। हाल के समय में सरकार के कुछ ज़िम्मेदार मंत्री अपनी मंशा सार्वजनिक कर चुके हैं कि सोशल मीडिया पर लगाम की ज़रूरत है.

कार्टून-कला, उन चुनिन्दा कला-माध्यमों में से एक है, जिसका असर  जनता पर रेखांकित किए जाने लायक है. आज़ादी के पहले और आज़ादी के बाद एक बड़ा अंतर हमारे प्रतिरोध के माध्यमों की प्रभावशीलता में भी दिखता है. आज़ादी के संघर्ष में लिखित साहित्य और नौटंकी, रामलीला जैसी नाट्यविधाओं का प्रयोग जनता को चैतन्य करने के लिए किया जाता था. और यह असरदार भी था. तिलक ने महाराष्ट्र में गणेश पूजा को आजादी के आंदोलन से बड़े प्रभावी तरीके से जोड़ दिया था. जबकि उस समय देश में साक्षरता की स्थिति अत्यंत दयनीय थी. आज साक्षरता तो बढ़ गई है लेकिन ये माध्यम निष्प्रभावी होते गये. ऐसी दशा में असीम के कार्टूनों से मची हलचल उत्साहजनक है. यद्यपि मेरी व्यक्तिगत राय है कि किसी भी कलाकार  को राष्ट्रीय और धार्मिक अस्मिता से जुड़े प्रतीकों और भावनाओं से छेड़छाड़ करने से यथासंभव बचना चाहिए.
        
दरअसल भ्रष्टाचार की अभी तक की मुहिम में देश का बुद्धिजीवी वर्ग खुलकर सामने नहीं आया था.बल्कि यह कहना ज़्यादा ठीक होगा कि बौद्धिक वर्ग का रवैया कुछ-कुछ नकारात्मक रहा है. इसकी वज़ह शायद अन्ना और उनकी टीम का बेतुकापन हो. अन्ना, रामदेव और उनके साथियों की हर हरकत और बयान को बौद्धिक समाज अपनी कसौटी पर कसता रहा. लेकिन यकीन मानिए कि बुद्धिजीवी यह कतई नहीं चाहते थे कि यह आन्दोलन अकाल मृत्यु को प्राप्त हो.इस बात की संभावना प्रबल है और अवसर भी है, कि आगे आन्दोलन की कमान देश के लेखक-कलाकार अपने हाथ में ले लें. राजनीतिक दल और सरकार सतर्क दिखती है.
         
आप देख ही रहे होंगे कि पूरे देश में जितनी भी अकादमियां और कला-संस्थान हैं, उनमें सरकार ने अपने पक्षधर और बहुत औसत किस् के लोगों को बैठा रखा है. फिर ये संस्थाएँ चाहे केन्द्र सरकार की हों या राज्य सरकारों की.यह सब बहुत सुनियोजित तरीके से हुआ है. सरकार इन्हीं लोगों को पुरस्कृत भी करती रहती है. ये मठाधीश आपस में भी एक दूसरे को सम्मानित और उपकृत करते रहते हैं. इस रणनीति से सरकार ने बौद्धिक वर्ग के एक बहुत बड़े हिस्से की मेधा को पहले ही नियंत्रित कर रखा है. जो कुछ लोग सरकार की कृपा से महरूम हैं या कुछ जो अपनी क्षमताओं को सरकार का गुलाम नहीं बनाना चाहते, उन पर सरकार इस तरह के हमले करने लगी है.
         अपने देश के लिए यह अपेक्षाकृत नयी बात है. और ज़ाहिर है ख़तरनाक भी.मुस्लिम देशों और यूरोप-अमेरिका महाद्वीप के कुछ देशों में लेखक-कलाकारों पर प्रतिबन्ध के समाचार जब हम सुनते थे तो आश्चर्य तो होता था, पर इसकी गम्भीरता और छटपटाहट को महसूस नहीं कर पाते थे.लेकिन कुछ वर्षों में अपने देश में पनप रही इस प्रवृत्ति की चोट अब दर्द बन कर उभरने लगी है.
          
एक वाकया मैं आपको म.प्र. का बताता हूं. म.प्र. की साहित्य अकादमी पिछले कई वर्षों से प्रदेश के लगभग सभी शहरों में पाठक मंच चलाती है. उस शहर के किसी उर्जावान साहित्यकर्मी को संयोजक बना दिया जाता है.अकादमी अपनी ओर से 10-12 किताबें चुनकर सभी केन्द्रों में भिजवाती है.शहर के साहित्य प्रेमियों को ये किताबें पढ़ने को दी जाती हैं. हर महीने एक किताब पर सब लोग चर्चा करते हैं. इस चर्चा की समेकित रपट अकादमी के पास भेजी जाती है. दिखने में यह योजना बहुत शानदार लगती है. पुस्तक-संस्कृति को बढ़ावा देने की ऐसी योजना शायद किसी और प्रदेश में नहीं है.
          
लेकिन यहाँ भी सरकार के अपने छल-छद्म हैं. तीन साल पहले तक रीवा-पाठक मंच का संयोजक मैं था.तीन साल पहले अमरकंटक में पाठक मंच संयोजकों का वार्षिक सम्मेलन हुआ. वार्षिक सम्मेलन में प्रदेश-देश के ख्यात साहित्यकारों-विचारकों को बुलाकर विचार-विमर्श की परंपरा है. विडम्बना ये है कि सरकार बदलती है तो विचारक भी बदल जाते हैं और अकादमी का संचालक भी. म.प्र.में भाजपा की सरकार पिछले आठ वर्षों से है. अब आप अंदाजा लगा सकते हैं कि सम्मेलन में विशेषज्ञ के रूप में किन लोगों को बुलाया गया होगा. इस सम्मेलन के दौरान कुछ वरिष्ठ साहित्यकारों ने खुलेआम अकादमी संचालक को सलाह दी कि पाठक मंच के ऐसे संयोजकों को तत्काल हटाया जाय जो प्रगतिशील हैं. और नतीजा यह हुआ कि कुछ ही दिनों के अन्दर मेरे साथ ही कई संयोजक बदल दिए गये. कुछ पाला बदल कर बच गये. कहीं कोई शोर गुल नहीं हुआ.
            
सरकारों का चरित्र अब कुछ ऐसा हो गया है कि किसी भी आवाज. का उन पर अब कोई असर भी नहीं होता. आपको या
द ही होगा केन्द्रीय साहित्य अकादमी के उपाध्यक्ष पद पर अशोक चक्रधर की नियुक्ति का कितना विरोध किया था देश भर के साहित्यकारों ने. क्या फर्क पड़ा  ? लेखक-कलाकारों की आवाज़ सुनने की अब आदत ही नहीं रही सरकार को.
आखिर कोई किस आधार पर किसी वेबसाइट, लेख, नाटक, पेंटिंग या किताब पर प्रतिबंध लगा सकता है? सच कहना क्या कोई अपराध है? हमारे नेता या सरकार इतने कमजोर या डरपोक क्‍यों है? वे असलियत से क्‍यों डरते है? हमारे बोलने की, लिखने की, कहने की आजादी पर रोक क्‍यों लगाना चाहते है? ये केवल अभिव्यक्ति की आजादी का सवाल नहीं है, ये केवल लोकतांत्रिक हकों का हनन भर भी नहीं है, बल्कि ये एक चुनोती है, असल में ये हमारे संवैधानिक अधिकारो पर सीधा हमला है।

इसी बीच इस पूरे प्रकरण का एक सांप्रदायिक पहलू भी दबे स्वर में उभरा है. कुछ मित्रों ने पूछा कि अगर असीम की जगह कोई मुसलमान होता तब क्या होता ? उन लोगों ने मकबूल फिदा हुसैन का भी ज़िक्र किया. सवाल का आशय यह था कि अगर कोई मुसलमान इन राष्ट्रीय प्रतीकों के साथ छेड़छाड़ करता तो एकबारगी यही जनता उसके खिलाफ हो जाती और सरकार अपने को अल्पसंख्यकों का हितैषी दिखाने के लिए उसके साथ होती. यानी स्थिति एकदम उलट होती. इसका अर्थ है कि इस देश में अभिव्यक्ति की आज़ादी का सवाल निरापद नहीं है. इस सवाल का किन्ही संदर्भों में धार्मिक, साम्प्रदायिक और जातीय अस्मिताओं से भी संबन्ध है. साफ है कि जनता की नज़र से देखने पर अभिव्यक्ति की आज़ादी का अर्थ अलग-अलग संप्रदायों के लिए अलग-अलग हो जाता है.

असीम का आरोप है कि वेबसाइट को बैन करने की भी मुंबई पुलिस ने कोई जानकारी उन्हे नहीं दी। वेबसाइट की प्रोवाइडर कंपनी बिगरॉक्स डॉट कॉम ने एक मेल द्वारा असीम को साइट बंद करने की सूचना दी। जब बिगरॉक्स कंपनी से बात हुई, तो उन्‍होंने असीम को मुंबई पुलिस की क्राइम ब्रांच से संपर्क करने को कहा। क्राइम ब्रांच में कोई बताने वाला नहीं कि वेबसाइट को बैन क्‍यों किया गया? या साइबर एक्ट की किन धाराओं में केस दर्ज किया गया है? अब पता चला है कि महाराष्ट्र के बीड़ जिला अदालत ने स्थानीय पुलिस को असीम पर राष्ट्रद्रोह का केस दर्ज करने का आदेश भी दे दिया है। ये और भी शर्मनाक हरकत है।

आरोप है कि उनके कार्टूनो में संविधान और संसद का मजाक उड़ाया गया है। पर सवाल ये भी है कि जब सांसद संसद में हंगामा करते हैं, खुलेआम नोट लहराते हैं, लोकपाल बिल फाड़ते हैं, चुटकुलेबाजी करते हैं, तब क्या वे संसद का मजाक नहीं उड़ाते? देश की जनता का अपमान नहीं करते?

मैं असीम त्रिवेदी को आश्वस्त करना चाहता हूं कि वह अकेले नहीं हैं। सरकार की इस गैरलोकतांत्रिक कारवाई के खिलाफ, हम सब उनके साथ खड़े हैं।

Tuesday, 11 September 2012

अनुनाद

एक तितली गूँजती है
फूल की पंखुड़ियों पर
तो रंग खिलखिलाते हैं ।

चन्द्रमा गूँजता है
पृथ्वी की कक्षा में 
तो रोशनी मुस्कुराती है
गहरी रात में भी ।

धरती के भार में गूँजता है बीज
तो साँसें लय मे होकर
आ जाती हैं सम पर ।

समुद्र के भीतर गूँजता है अतल
तो पानी का संगीत बजता है ।

भोर की पत्ती पर
गूँजती है ओस की बूँद
तो सूरज जागता है ।

देह के भीतर
गूँजती है देह
तो जनमता है
जीवन का अनुनाद ।

Wednesday, 5 September 2012

आचार्य मृत्यु है !


आचार्य मृत्यु है ।                                        
आचार्य वरुण है ।
आचार्य सोम अथवा चन्द्रमा है ।
आचार्य औषधि है ।
आचार्य पय है ।........( अथर्ववेद )



हमारे मिथक साहित्य और प्राचीन-मध्यकालीन साहित्य में गुरु की महिमा का निर्द्वन्द्व बखान है.
जब भी गुरु की बात होती है, तो मुझे गुप्ता जी का ध्यान होता है........मेरे प्राथमिक विद्यालय के शिक्षक. उन्होने कभी मुझे पढ़ाया नहीं....बस अपने पास बैठा लेते थे. एक कस्बे के प्राथमिक विद्यालय में शिक्षक थे. तब एक कक्षा का एक ही शिक्षक होता था. गुप्ता जी कक्षा 5 के शिक्षक थे. मुझ पर उनका कुछ ऐसा स्नेह था कि मैं किसी भी कक्षा में रहा हूँ, बैठता कक्षा 5 में गुप्ता जी के पास था.

गुप्ता जी ने जो पहली चीज़ मुझे दी, वह थी---पान की तलब ! वो पान के बड़े शौकीन. हर आधे घंटे में पान का एक बीड़ा मुँह में दबा लेते. फिर ऐसी खुशबू फैलती कि मेरे मुँह में गुदगुदी होने लगती. शायद इसी गुदगुदी के चलते मेरी दोस्ती एक पान वाले से बड़ी गहरी हो गई थी. लेकिन गुप्ता जी ने सिर्फ पान की ही तलब नहीं दी.....उनका दिया हुआ सब कुछ आज भी मेरे भीतर विकसित होता है. उन्होने मुझे गाने की तलब दी, कविता की तलब दी. रामचरित मानस को मेरे भीतर रोपा. उन्होने ही बताया कि स्लेट पर सुन्दर चित्र भी बनाए जा सकते हैं.

विद्यालय में शनिवार को होने वाली बाल-सभा के कर्ता-धर्ता गुप्ता जी ही होते थे. उनका गायन, कविता-कहानी पाठ, अंत्याक्षरी प्रतियोगिता---बाल-सभा के स्थायी आकर्षण होते थे. उस सभा में गुप्ता जी मेरे द्रोण होते थे और मैं उनका अर्जुन ! उसी समय मैने पहला गीत लिखा था. यह उस समय के लोकप्रिय गीत---“ झुलनी का रंग साँचा, हमार पिया”---की पैरोडी थी. मानस की चौपाइयों पर आधारित अंत्याक्षरी प्रतियोगिता का, उन्होने मुझे अजेय योद्धा बना दिया था. दुर्भाग्य से मेरा उनका साथ कक्षा पाँच तक ही रहा. मैं आज भी जब अपने भीतर कुछ चीज़ों को पाता हूँ, जिनके सहारे राग-विराग, सुख-दुख से भरा यह जीवन गतिमान है, ---तो इन सबकी जड़ें उन्हीं वर्षों में मिलती हैं, जब मैं गुप्ता जी के पास बैठता था.....उनकी पोटली से रोटी निकाल कर खा लेता था.......और जब कभी गुरुदेव अत्यधिक प्रसन्न हों तो एक पान का बीड़ा भी दे देते थे.

हमारी भारतीय मनीषा में 18 उपनिषद हैं. उपनिषद का अर्थ ही होता है—गुरु के समीप बैठना. साफ है कि हमारे उपनिषदों में जो ज्ञान का भंडार है, वह प्राचीन आचार्यों से उनके शिष्यों में स्थानांतरित हुआ था. शिष्यों को आचार्य अपने साथ रखते थे. और जीवन की नानाविधि परिस्थितियों का सामना करते हुए सीखने-सिखाने की प्रक्रिया पूरी होती रहती थी. इस प्रसंग में पंचतंत्र का ध्यान सहज ही हो आता है. एक राजा के बिगड़ैल पुत्रों को शिक्षित करने के लिए राजा को मुनादी करवानी पड़ी थी. अंत में आचार्य विष्णु शर्मा ने उन्हें पढ़ाने जिम्मा लिया. वे राजपुत्रों को अपने साथ रखते और कहानियाँ सुनाते. शिष्यों को कभी लगने ही न पाया कि उन्हें पढ़ाया जा रहा है. राजपुत्रों ने न पढ़ने की जिद कर रखी थी. लेकिन कहानी सुनने में मज़ा आता था. बड़े चुपचाप तरीके से आचार्य उन्हें जीवन के शऊर सिखाते थे.

किस्से-कहानियों और गीतों के माध्यम से शिक्षित करने की हमारे यहाँ पुरानी परंपरा रही है. यह उन समाजों में भी शिक्षण की कारगर विधि थी जो अशिक्षित थे. ज्ञान के हस्तान्तरण की यह वाचिक परंपरा थी. यह ज़्यादातर क्रियात्मक होती थी. कथा-गीतों के द्वारा श्रम की साधना की जाती थी. लौकिक जीवन के विभिन्न अनुभवों से गुजरना होता था. अनुभवजन्य ज्ञान ज़्यादा स्थायी होता था. यह कहा जा सकता है कि शिक्षण की यह विधि अभाव से उपजी हुई विधि थी. तब संगठित रूप से शिक्षण की व्यवस्था समाज में नहीं थी. औपचारिक शिक्षा केवल राजपरिवारों तक ही सीमित थी. ऐसी परिस्थिति में सामान्य जनता ने शिक्षण की यह अपनी वाचिक परंपरा विकसित की.

गुरुओं की परंपरा को याद करते हुए, द्रोणाचार्य और कौटिल्य (चाणक्य) की विशेष याद आती है. आचार्य द्रोण का चरित्र हमारे समकालीन आचार्यों के अधिक निकट दिखता है. अपनी सारी योग्यताओं के बावजूद द्रोण को अपेक्षित सम्मान नहीं मिला था. राजकीय सुविधाएँ कृपाचार्य को मिली हुई थीं. कृपाचार्य राजकीय विवि के कुलपति रहे होंगे. द्रोणाचार्य धनुर्विद्या विभाग के विभागाध्यक्ष रहे होंगे. महाभारत में उल्लेख है कि द्रोण अपने पुत्र अस्वत्थामा को पीने के लिए दूध की व्यवस्था नहीं कर पाते थे तो आटा घोल कर पिला देते थे. बालक उसे दूध समझ कर बहल जाता था. अब आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि धृतराष्ट्र के राज में द्रोण की स्थिति कैसी रही होगी. और जब द्रोण की यह हालत थी तो बाकी आचार्यों की कैसी रही होगी ! यह अस्वाभाविक नहीं था कि आचार्य द्रोण को राजपुत्रों की खुशामद करनी पड़ती थी. राजपुत्रों से योग्य कोई और निकल जाता तो शायद राज्य शासन उन्हें नौकरी से निकाल देता. इसीलिए द्रोण को एकलव्य के साथ अँगूठा मागने की कूटनीति करनी पड़ी थी. कौटिल्य ने अपनी महत्वाकांक्षाओं और अपने अपमान का बदला लेने के लिए चन्द्रगुप्त को साधन बनाया. मगध के राजा घननंद को अपदस्थ करना उनका प्रधान लक्ष्य था. चन्द्रगुप्त में उन्हें वह क्षमता दिखी, जिसका उपयोग करके वो अपना लक्ष्य प्राप्त कर सकते थे. यद्यपि कालांतर में कौटिल्य-चन्द्रगुप्त की युति के कारण ही राजनीतिक अर्थों में एक सशक्त भारत राष्ट्र का उदय संभव हुआ.

ये दोनो उदाहरण शिक्षकों की अलग-अलग मनोवृत्तियों को उजागर करते हैं. साफ ज़ाहिर है कि समय और ज़माना चाहे जो भी रहा हो, आचार्यों के पास भी एक पेट होता था. उसका भरा होना भी उतना ही ज़रूरी था, जितना किसी और का. मान-अपमान का बोध तब के आचार्यों को भी था और अब भी है. अच्छे शिक्षक आसमान से न तब उतरते थे न अब टपकते हैं. अच्छे शिक्षकों को तैयार करना राज्य का धर्म है. उन्हें सम्मान देना और उनके उदर-पोषण की व्यवस्था करना राज्य का कर्तव्य है. जब राज्य ही शिक्षकों के महत्व को गंभीरता से नहीं समझेगा तो कैसे नागरिक मिलेंगे देश को—इसका अंदाज़ा लगाना कठिन नहीं है. भारत देश के नवनिर्माण की पटकथा लिखते समय शिक्षा और शिक्षकों के महत्व को लापरवाही से रेखांकित किया गया. गाँधी के अवसान के बाद से ही शिक्षा हमारी प्राथमिक चिन्ता नहीं रह गई थी. लेकिन इधर बीस वर्षों में शिक्षकों की स्थिति जितनी दयनीय हुई है, वह चिन्ता का विषय है. इधर शिक्षा-व्यवस्था में जो तदर्थवाद शुरू हुआ है, उससे देश में भविष्य की मेधा पर गंभीर प्रश्नचिन्ह लग गये हैं.

लगभग बीस साल पहले म.प्र. में शुरू हुए एक प्रयोग ने पूरे देश के शिक्षकों की नियति को घनघोर अंधकार में डाल दिया. बीस साल पहले म.प्र. सरकार ने ढाई सौ रुपये तनखाह पर शिक्षकों की भर्ती शुरू की. इन्हें नाम दिया गया—शिक्षाकर्मी. इन्हें शिक्षा विभाग की जगह पंचायत विभाग का अस्थायी कर्मचारी बनाया गया. इन्हें नियमित कर्मचारियों की तरह कोई सुविधा और भत्ते नहीं दिए गये. इनके लिए न तो कोई भविष्यनिधि थी न पेन्शन-प्लान. बीस साल बाद आज भी इनकी तनखाह महज़ 3500 रुपये है. इसी तनखाह पर काम करने के लिए इसी वर्ष केवल म.प्र. में 18 लाख युवक-यवतियों ने पात्रता परीक्षा दी. एक दिन में इतनी बड़ी परीक्षा आयोजित करने का यह गिनीज बुक रिकॉर्ड बन गया. यहाँ रिकॉर्ड उपलब्धि नहीं है. आप सब समझ रहे होंगे कि इतनी कम तनखाह पर भी अगर इतने लोग काम करने को तैयार हैं तो देश में बेरोजगारी की स्थिति क्या होगी. ये शिक्षक जिन स्कूलों में पदस्थ होते हैं, वहाँ के चपरासी की तनखाह इनसे पाँच गुना ज्यादा होती है. इन शिक्षकों को अपना और परिवार का भरण-पोषण करने के लिए बाकी समय में कोई और काम करना पड़ता है. यह केवल म.प्र. की स्थिति नहीं है. बाद में दूसरे प्रदेशों ने भी इसी नीति का अनुसरण किया. सरकारी स्कूलों में भवन और दूसरी आधारभूत सुविधाओं की इतनी खराब हालत है कि वहाँ सिर्फ गरीब और आरक्षित समुदाय के बच्चे ही पढ़ने आते हैं, वो भी सरकार द्वारा दी जाने वाली छात्रवृत्तियों, मध्यान्ह भोजन और दूसरी सुविधाओं के लोभ में. ज़ाहिर है कि ऐसे में शासकीय विद्यालयों की पढ़ाई का स्तर खराब ही होगा. सरकार इसका जिम्मेदार शिक्षकों को मानती है, और अनेक गैर-शिक्षकीय कार्यों में उन्हें लगाकर अपना पैसा वसूल करती है. यह शिक्षकों पर दोहरी मार है. इन अल्पआय वाले शिक्षकों से हमें किस गुरु-भाव की उम्मीद करनी चाहिए, ज़रा सोच कर देखिए.

आइये अब शिक्षको की मौजूदा हालत के बरक्स हम उस गुरु की महिमा को रखकर देखते हैं, जिसका ज़िक्र अथर्ववेद में बड़ी खूबसूरती से किया गया है...........ऋषि ने कहा---आचार्य मृत्यु है ! शिष्य को अगर एक योग्य गुरु मिल गया तो उसके अहंकार, अज्ञान, तामसिक वृत्तियों की उसी क्षण मृत्यु हो गई.....आचार्य वरुण है ! वरुण जल का देवता है. जल से प्यास बुझती है. गुरु, शिष्य की ज्ञान-पिपासा को तृप्त करता है. प्यास चाहे कितनी ही बड़ी हो, गुरु के पास अथाह जल है.........आचार्य सोम अथवा चन्द्रमा है ! शिष्य के समस्त दैहिक-दैविक-भौतिक तापों का शमन गुरु का वत्सल भाव कर देता है.........आचार्य औषधि है ! शिष्य को देशकाल से मिलने वाली सभी दैहिक और मानसिक बीमारियों को आचार्य का स्पर्शमात्र दूर कर देता है..........और आचार्य पय भी है !  दूध, बल-बुद्धि-वर्धक माना जाता है. एक शिष्य जब सच्चे गुरु को प्राप्त कर लेता है, तो उसके बल-बुद्धि निरंतर बढ़ते रहते हैं.

इसी सच्चे गुरु को कबीर सतगुरु कहते हैं. कबीर को सतगुरु मिला काशी में रामानन्द के रूप में. कैसा था कबीर का सतगुरु
?------

                                 सतगुरु की महिमा अनँत, अनँत किया उपगार ।
                   लोचन अनँत उघाड़िया,   अनँत दिखावणहार ।।

ऐसा गुरु मिल गया था कबीर को. जिसने उन्हें असंख्य आँखें दे दीं. सारी दुविधा, भेद-अभेद खत्म हो गये. और अब वो उसे भी देखने के काबिल हो गये, जो अनन्त था, अनिर्वचनीय था, अदृश्य था, जो सत्य था. जिसे देखना सबके वश की बात नहीं थी. कबीर अब इन आँखों से जीवन-सत्य भी देख रहे थे, और जीवन-पार के सत्य को भी देख पा रहे थे. उन्हें अब वह सब आडम्बर भी दिख रहा था, जिसमें वो खुद अब तक लिप्त थे.

लेकिन गुरु कितना भी योग्य क्यों न हो, हर शिष्य को यह दिव्य ज्ञान नहीं मिल पाता. बड़े भाग वाले होते हैं वो लोग जो गुरु का सम्पूर्ण गुरुत्व ले पाने की पात्रता हासिल कर पाते हैं. इसके लिए कृती भाव होना चाहिए कबीर की तरह. अहंकार-शून्य होना चाहिए, जैसे कृष्ण के सामने अर्जुन हो गये थे. सेवक भाव होना चाहिए, जैसे राम में था विश्वामित्र के लिए. समर्पण चाहिए, जैसे चन्द्रगुप्त में था कौटिल्य के लिए. आस्था चाहिए, जैसी एकलव्य में थी आचार्य द्रोण के लिए.

और तब देखिए, यह भी घटित होगा.
जैसे कुमुदिनी पानी में रहती है, और चन्द्रमा आकाश में. लेकिन प्रेम दूरी नहीं जानता. भेद नहीं मानता, जाति नहीं मानता, कुछ नहीं देखता. जो जिसका मनभावन है, वह सदा पास में ही रहता है. अगर गुरु वाराणसी में होते और कबीरदास समुद्रपार, तो भी उनका वत्सल स्नेह शिष्य के पास पहुँचकर ही रहता-------

                       कमोदनी जल हरि बसै, चन्दा बसै अकास ।
                       जो जाही का भावता,  सो ताही  कै  पास ।।
                       कबीर गुरु बसै बनारसी, सिक्ख समंदर पार ।
                       बिसास्या नहि बीसरै , जे गुण  होइ सरीर ।।
                                                   (कबीर)

Monday, 20 August 2012

हमारा चाँद दिख जाये, हमारी ईद हो जाये !























ईद आने को होती है तो मुझे ग़ालिब याद आने लगते हैं--

हमें क्या वास्ता ग़ालिब, ज़माने भर की ईदों से ।
हमारा चाँद दिख  जाये, हमारी  ईद  हो  जाये ।। 


बड़ी खूबसूरती से शायर ने ईद की मिठास को मुहब्बत की दीवानगी से जोड़ दिया है. दरअसल ईद के साथ चाँद का जुड़ा होना, इस त्यौहार को एक कॉस्मिक विस्तार देता है. दुनिया भर की तमाम मान्यताओं में चाँद प्रेम और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक रहा है. प्रेमियों के लिए वस्ल और फ़िराक यानी मिलन और विरह, दोनों ही दशाओं में चाँद की उपस्थिति भावोद्रेक का माध्यम बन जाती है. चाँद की रोशनी और शीतलता कल्याणकारी मानी जाती है. यद्यपि ईद के लिए चाँद दिखने का अर्थ एक महीने के खत्म होने और नये महीने की शुरुआत से है लेकिन चाँद के वृहत्तर प्रतीकार्थों को ज़हन में रखने से यह त्योहार सार्वभौमिक और धर्मनिरपेक्ष अर्थ ग्रहण कर लेता है.

लेकिन ईद का मतलब होता है--खुशी, हर्ष, उल्लास. ...और फितरा, एक तरह के दान को कहते हैं. यानी ईद-उल-फितर का का अर्थ हुआ--दान से मिलने वाली खुशी. अरबी कैलेण्डर का नौवां महीना रमजान का होता है. और नौवें महीने की समाप्ति के बाद दसवां महीना शवाल का आता है. इसी माह-ए-शवाल के पहले दिन ईद मनाई जाती है. 

दरअसल ईद, उन लोगों के लिए एक ईनाम है जो एक महीने तक बगैर अन्न-जल के अल्लाह की इबादत में लगे रहते हैं. यह अनन्य आस्था का पुरस्कार है. यह इन्सान के पौरुष, ईमानदारी और समर्पण का पुरस्कार है. इस एक महीने की इबादत भी कुछ अलग और ज़रा कठिन होती है. अपनी सुबह की खूबसूरत नींद को छोड़कर सहरी खाना और रात की नमाज़ तरावी पठ़ना. कुरआन का यथासंभव अतिरिक्त पाठ और आख़ीर के दिनों में शब-ए-क़दर की खास नमाज़........इतनी कठिन इबादत के बाद जो खुशी मनाने का दिन मिलता है वही है---ईद.
 
साफ ज़ाहिर है कि ईद के त्यौहार के साथ दो तरह के भाव जुड़े होते हैं. पहला, जीवन में संघर्ष और तकलीफ उठाने की महत्ता स्थापित करना और दूसरा, दीन-हीनों के प्रति अल्लाह के नुमाइंदे के बतौर दयाभाव रखना. अपने जीवन में अगर तकलीफें न हों तो हमें दूसरे की तकलीफ उतनी गहरी नहीं लगती. पराई पीर को वही बेहतर जान सकता है जिसके पैर में कभी बिबाई फटी हो. शायद इसीलिए इस्लाम एक महीने का कठिन रोज़ा रखने का प्रावधान करता है.

ईद-उल-फितर  को मीठी ईद भी कहते है. इस त्यौहार में मीठी चीज़ें खाने और खिलाने का रिवाज़ है. मांसाहारी भोजन का ज़िक्र नहीं है. साथ ही कुछ और भी शर्तें है. मसलन, इस त्यौहार को मनाने के पहले फितरा और ज़कात निकालना ज़रूरी होता है. हज़रत मोहम्मद साहेब (मुसलमानों के पैगम्बर ) ने साफ तौर पर  कहा है कि जो कोई फितरा (दान ) नहीं निकालेगा, वह ईद की नमाज़ पढ़ने ईदगाह नहीं आये.

फितरा और ज़कात दो अलग चीज़ें हैं. फितरा, अनाथ, मासूम और गरीबों के लिए होती है ताकि वो भी अपनी खुशियों का उत्सव मना सकें. फितरे और ज़कात की अदायगी के बगैर रमज़ान अधूरा माना जाता है. ये सरकार की ओर से लगाये जाने वाले कर नहीं हैं. इन्हें अपने निज़ी पैसों से अदा किया जाता है. इस्लाम में यह आदेश है कि सबसे पहले अपने पड़ोस में देखो कि कौन ज़रूरतमंद है, फिर मोहल्ले में, फिर रिश्तेदारों में, फिर अपने शहर में, उसके बाद कोई और जडरूरतमंद हो तो उसकी ज़रूरत भी पूरा करो. फितरा, उन रोज़ेदारों का कर्तव्य है जो वयस्क हैं. हर वयस्क रोज़ेदार के लिए ईद की नमाज़ पढ़ने के पहले दान करना अनिवार्य है, अन्यथा उनका रोज़ा और ईद स्वीकार नहीं की जायेबीगी. 

जकात, आय का चालीसवाँ भाग, यानी एक रुपये में 2.5 रु. होता है. इसमें साल भर की अपनी कमाई का इतना हिस्सा दान करना होता है, वशर्तें दान देने वाला कर्ज़दार  न हो. इस्लाम में दान पर बहुत ज़ोर है. दान की राशि निर्धन, अपंग लोगों को देना ज़्यादा अच्छा माना गया है. सबसे पहले उन पड़ोसियों, रिश्तेदारों को दान देना जो ज़रूरतमंद हैं. ईदगाह अथवा नमाज़ के लिए जाने और लौटने के लिए मुख़्तलिफ रास्तो का इस्तेमाल किया जाता है ताकि हम यह देख सकें कि कौन ऐसा है जो इस खुशी में शरीक नहीं हो पा रहा है. उसकी मदद करने से ईद की नमाज़ का फल बढ़ जाता है. 

हमारे देश में होली और ईद , ये दो ऐसे त्यौहार हैं जिनमें धार्मिक आग्रह कम हैं और प्रेम, सौहार्द्र का भाव अधिक. दोनों ही समुदाय के लोग इन त्यौहारों में शरीक होते हैं क्योकि इस दिन उन्हें अल्लाह या ईश्वर के करीब नहीं, मनुष्य के करीब जाना होता है. 

Wednesday, 15 August 2012

पुरानी आज़ादी के नये दुख !


पहले महात्मा गांधी का यह कथन देखिए—“ स्वाभिमानी व्यक्ति के लिए सोने की ज़ंजीरें भी उतनी ही क्लेशकारी होती हैं जितनी कि लोहे की ज़ंजीरें. दंश ज़ंजीर मे निहित है, उस धातु में नहीं जिससे ज़ंजीर बनाई जाती है......मेरी दृष्टि में सोने की ज़ंजीरें लोहे की ज़ंजीरों की तुलना में कहीं ज़्यादा बुरी हैं, क्योंकि लोहे की ज़ंजीर की क्लेशकारी प्रकृति मनुष्य आसानी से समझ पाता है, जबकि सोने की ज़ंजीर का दुख प्रायः भूल जाता है. इसलिए अगर भारत को ज़जीरों में बंधे रहना है तो मैं चाहूँगा कि ये सोने या किसी अन्य बहुमूल्य धातु की अपेक्षा लोहे की ही हो. “
         
65 साल की आज़ादी को जवान तो नहीं कहा जा सकता. किसी भी देश की काया परिवर्तन में इतने साल पर्याप्त होते हैं. इसे हम जापान के उदाहरण से समझ सकते हैं. दूसरे विश्व-युद्ध के परमाणु हमले में तवाह हो चुके जापान ने लगभग 30-40 सालों में ही अपने देश को दुनिया का सिरमौर बना दिया, और वह भी लोकतांत्रिक प्रक्रिया से गुजरकर. एक समय था जब जापान में प्रतिव्यक्ति आय, दुनिया में सबसे अधिक थी. इन सबके बीच जापान में आने वाले भूकम्पों और उनसे होने वाली तबाही को भुलाया नहीं जा सकता. जापान ने यह चमत्कार किसी विदेशी या दैवीय मदद से नहीं किया. यह जापानियों की दृढ़ इच्छाशक्ति, स्वाभिमान और अनुशासन का सुफल था.
        
दूसरी ओर भारत में हमने पैंसठ सालों में अलग तस्वीर देखी. गरीबी और बेरोजगारी के मोर्चे पर हम लगभग जहाँ के तहाँ हैं. सरकार भी मानती है कि 26 रुपये प्रतिदिन खर्च करने वाला गरीब नहीं है. स्पष्ट है कि सरकार जानती है कि वह अपने नागरिकों को कितना दे पा रही है. एक गैर सरकारी सर्वेक्षण के मुताबिक देश की 70 प्रतिशत आबादी की औसत कमायी 20 रुपये प्रतिदिन है. इस  बात पर यकीन करना किसी के लिए भी तब मुश्किल हो जाता है, जब वह मुकेश अंबानी के अरबों रुपयों के महल को देखता है. जब वो देखता है कि अफसरों और मंत्रियों के यहाँ छापे में टनों सोना निकल रहा है, और राजा, कलमाड़ी, सुखराम जैसों को चुराने के लिए अकूत रुपया इसी देश में है. विदेशों में जमा धन की तो बात ही मत कीजिए. हमारे देश के साहूकार, विदेशी कम्पनियों को धड़ाधड़ खरीद रहे हैं. अब ऐसे मोहक रंगमंच पर किस गरीब की हिम्मत है कि वह कहे कि मैं गरीब हूँ !!
                 
ऐसा नहीं कि देश आगे नहीं बढ़ा. औद्योगिक और आर्थिक क्षेत्र में विकास की ऐसी गति रही है पिछले 20 वर्षों में कि भारत के महाशक्ति बनने की कूटनीतिक घोषणाएँ भी होने लगी हैं. लेकिन आप भी देखते होंगे कि भारत ने विकास का शीर्षासन किया है. सरकार ने जड़ों को नहीं पत्तियों को पानी दिया है. नब्बे के दशक मेंजब यह मान लिया गया कि उदारीकरण के अलावा अब कोई और रास्ता नहीं बचा है देश को दिवालिएपन से बचाने का, तब जो भी नीतियां बनाई गयीं वो सब देश के पूँजीपतियों और विदेशी कंपनियों के हक में बनाई गयीं. उनके लिए लायसेंस प्रणाली को लचीला करना, ब्याज दरों में कमी करना, भूमि-अधिग्रहण को सरल करना और पर्यावरणीय दुष्प्रभाव की अनदेखी करना......साफ ज़ाहिर कर रहा था कि सरकार औद्योगिक घरानों के साथ. हमारी आँखों के सामने ही देशी और सार्वजनिक उद्योग मरते गये और सरकार देखती रही. खेती-बाड़ी और छोटे उद्योग-धंधे भगवान भरोसे दम तोड़ गये. देश का निम्न-मध्यवर्ग गरीबी रेखा से नीचे चला गया. औद्योगिक घरानों के मालिक दुनिया के कुबेर बनते गये.
        
सबसे दुखद पतन देश की राजनीति में हुआ. आज़ादी के आन्दोलन में जो पीढ़ी सक्रिय थी, उसके अवसान के बाद भारत की राजनीति अपराधियों और निकम्में लोगों की भी शरणस्थली बनती गई. किसी भी देश की राजनीतिक दृढ़ता, उस देश के नागरिकों के मनोबल का भी प्रतिनिधित्व करती है. अपराधियों के बढ़ते वर्चस्व और क्षेत्रवाद के उभार नें भारत के संघीय ढाँचे को भी कमज़ोर बनाया है. अलग-अलग राज्यों के केन्द्र के साथ और आपस में हो रहे टकरावों को गौर से देखिए, तो पता चलेगा कि इस माला को पिरोने वाला कितना कमज़ोर हो चुका है.
         
आज आज़ादी की वर्षगांठ है. इस मौके पर गांधी का यह कथन याद आ रहा है तो यह बेसबब नहीं है, पर इस पर बात थोड़ा आगे चलकर करूँगा...पहले मेरे ज़हन में वे दृश्य आ रहे हैं, जहां एक गली के स्कूल में बस्ती का एक लुच्चा और दिल्ली के लाल किले पर प्रधानमंत्री हमें आज़ादी का मतलब समझा रहे हैं. हम हाथ में एक रुपये की झंडियां लिए यह दिखाने की कोशिश में हैं कि हम एक आज़ाद देश के नागरिक हैं, और हमें आज़ादी की समझ भी है.
         
स्वतंत्रता दिवस  पर हर सरकारी-गैर सरकारी संस्थान में ध्वजारोहण और भाषण देने की परंपरा है. यह हमारा फ़र्ज़ भी है. इस मौके पर हर वर्ष यह याद किया जाता है कि आज़ादी कितने संघर्ष के बाद मिली है. अंग्रेजों के अत्याचार और भगत सिंह, आज़ाद, बिस्मिल वगैरह की कुर्बानी भी याद की जाती है. लता के गाये कालजयी गीत—“ ऐ मेरे वतन के लोगों...” ---को हर लाउडस्पीकर अपने ही अंदाज़ में सुबह से शाम तक बजाता है.
         
प्रायः विद्यालयों में आयोजित होने वाले समारोह ज़्यादा रोचक होते हैं. इन समारोहों में, विद्यालय-प्रमुख की यह मज़बूरी होती है कि वह उस इलाके के कुछ सर्वाधिक बदनाम लोगों को बतौर अतिथि आमंत्रित करे. विद्यालय  के निरीह शिक्षक उनका माल्यार्पण करें और प्रसाद की प्रतीक्षा में बैठे छात्र, इन महानुभावों के महान उद्गारों पर ताली बजाएँ—जिसकी उन्हें बराबर ताकीद की जाती है. वक्तागण एक मंजे हुए देशभक्त की मुद्रा मे झंडे को सलाम करते हैं, गांधी की जय बोलते हैं, और सीधे विद्यालय के शिक्षकों को उनके कर्तव्य याद दिलाते हुए यह भी चेता देते हैं कि उनके जैसे देशभक्तों के रहते किसी भी शिक्षक को इस देश के भविष्य के साथ खिलवाड़ नहीं करने दिया जायेगा.
         
आज प्रधानमंत्री भी लाल किले पर चढ़े. वो बड़े आदमी हैं, इसलिए उन्हें बड़ा देशभक्त माना जाना चाहिए. उनकी चिन्ता को बड़ी चिन्ता मानना चाहिए. प्रधानमंत्री हर साल चिंतित होते हैं. जब वो चिन्तित होते हैं तो देश की जनता का आह्वान करते हैं. आह्वान करना प्रधानमंत्री का विशिष्ट धर्म होता है, तो कतरा कर निकल जाना उनका अद्भुत कौतुक. हो सकता है. प्रधानमंत्री कह रहे हैं कि हमारे पड़ोसी, हमारे ऊपर बुरी नज़र लगाये हुए हैं...पर इस देश की जनता इतनी बहादुर है कि वह उनके मंसूबों पर पानी फेर देगी. इस देश की जनता अपने घर के दुश्मनों का तो कुछ कर नहीं पाती, बाहर वालों से कैसे निपटेगी, यह प्रधानमंत्री ही जानते होंगे. सेना के प्रमुख बार-बार प्रस्ताव भेजते हैं कि सेना के लिए बुनियादी ढाँचा तैयार करने की ज़रूरत है. चीन की सीमा पर जहां चीन अपनी सेनाओं को महज़ दो-तीन घंटे में भेज सकता है, वहां हमारे सैनिकों को पहुंचने में 15 दिन लगते हैं. सेना के प्रस्ताव रक्षा-मंत्रालय में दबे रहते हैं, उन्हे मंजूरी नही मिलती. बांग्लादेश और नेपाल परोक्ष रूप से पाक-चीन की मदद करते हैं. ऐसे में प्रधानमंत्री का आशावाद काबिले तारीफ है.
         
आज़ादी के पर्व पर यह भी याद दिलाया गया कि भारत कभी सोने की चिड़िया  था, जिसे अंग्रेजों ने कैद कर लिया था. फिर उसे इंगलैण्ड ले गये....इमानदारी तो इतनी थी कि घरों में लोग ताले नहीं लगाते थे. आज सरकार की नीतियों और उद्यमशीलता के चलते यह देश फिर से सोने की चिड़िया में बदलने लगा हैं. लगभग 75 प्रतिशत बदल चुका है. 2025 तक यह चिड़िया सौ-फीसदी सोने की हो जायेगी. यह उत्साहवर्धक विचार, एक ही साथ सत्य भी है और भ्रामक भी. इसे आप तर्कशास्त्र में अपवाद की तरह भी देख सकते हैं. जिस काल में भारत को सोने की चिड़िया होना बताया जाता है, तब भी सम्पत्ति के सारे भंडार शासकों और व्यापारियों के ही पास थे.उसी की चकाचौंध विदेशियों को खींच लाती थी. आम जनता के घर में कुछ था ही नहीं तो ताले किसके लिए लगाते ? तत्कालीन इतिहास के जितने स्रोत हैं, वे शासकों के नियंत्रण में थे. राजा खुद अपनी निगरानी में इतिहास लिखवाते और स्तम्भ गड़वाते थे. इसलिए उनके विवरण पर भरोसा करना ठीक नहीं. कोई मीडिया तो तब था नहीं. तो यह मानने में कोई हर्ज़ नहीं कि सोने की चिड़िया का चित्र राजा के भाड़े के चित्रकारों ने बनाया था.
          
अब गांधी जी के उस कथन पर लौटते हैं जिसका जिक्र शुरुआत में किया था. यह कथन उन दिनों का है, जब भारत की आज़ादी लगभग तय हो गयी थी, और शीर्ष स्तर पर आज़ादी का खून चूसने की तैयारियां चल रही थीं. गांधीजी की केन्द्रीय भूमिका अब मात्र एक आवरण थी. संभवतः उन्हें यह आभास था कि अँग्रेजों से मुक्त होकर यह देश किन लोगों के हाथ में जाने वाला है. वो बार-बार कह रहे थे कि स्वराज का अर्थ है कि देश के कमज़ोर से कमज़ोर व्यक्ति को भी उन्नति का अवसर मिले...पर तब तक उनकी बातों को सुनना भावी शासकों ने कम कर दिया था. जब उन्होने यह कहा कि सोने की ज़ंजीर में बंधने से बेहतर है कि हम लोहे की ज़ंजीर में ही जकड़े रहें---तो यह उनकी दूरदृष्टि और गहन हताशा को दिखाता है.
          



आज 65 साल बाद इस देश के लोग ऐसे पूंजीपतियों के गुलाम हैं जिनकी कोई नागरिकता नहीं है. ये विश्व-नागरिक कहलाते हैं. 15 अगस्त को स्वतंत्रता का जश्न मनाते हुए हमारे पास कोई स्वप्न नहीं हैं. हम कुछ घिसे-पिटे जुमलों और बीस रुपए प्रतिदिन की औसत कमाई में अमर हैं.

Friday, 10 August 2012

संभवामि युगे युगे !


ईश्वर के अस्तित्व पर विश्वास न होने के बाद भी कृष्ण मेरे प्रिय पात्र रहे हैं. कई बार जब किसी प्रश्न का जवाब ढूढ़ना मेरी सामर्थ्य के बाहर हो जाता है तो मैं कृष्ण की शरण में जाता हूँ. ज़्यादातर ऐसा हुआ है कि बियाबान में कोई राह चमक गई है. कृष्ण से भी ज़्यादा मुझे उन लोगों पर श्रद्धा है जिन्होंने कृष्ण जैसा पात्र रचा है. मुझे नहीं लगता कि कृष्ण किसी एक आदमी की रचना हैं. पौराणिक ऋषियों से लेकर, व्यास, सूर, रसखान और इस देश की जन-जातियों तक ने कृष्ण को गढ़ा है, और कितना अद्भुत गढ़ा है ! कृष्ण के व्यक्तित्व के इतने आयाम हैं कि उसमें हर किसी के लिए कुछ न कुछ है.
   
जीवन से थक चुके लोगों के लिए वहाँ वैराग्य है, लड़ने के लिए निकले व्यक्ति के लिए उत्साह है, गृहस्ती के नुस्खे हैं तो प्रेम और विवाह करने वालों के लिए अनुपम दृष्टान्त....सुभद्रा और अर्जुन की प्रेम कहानी बीच में ही खत्म हो जाती अगर भैया कृष्ण उनके भागने का प्रबन्ध न करते. प्रेम की अव्यक्त और विडम्बनात्मक स्थितियों में घिरे लोगों के लिए द्रौपदी-कृष्ण का सम्बन्ध ग्रंथियों को खोलने वाला है.


भारतीय मान्यताओं में कृष्ण अकेले ऐसे देवता हैं जो मनुष्य की तरह जीते-मरते हुए दिखते हैं. लोगों को उनमें सखा-बन्धु-गुरु, सब दिखते हैं. कोई भी व्यक्ति जितनी सहजता से कृष्ण के साथ अपना तादात्म्य स्थापित कर लेता है उतना किसी और देवता से नहीं कर पाता. कृष्ण अकेले ऐसे देवता हैं जिनकी उत्पत्ति भय से नहीं, बल्कि प्रेम और साख्य-भाव से हुई है. कृष्ण प्रकट नहीं होते, पैदा होते हैं. उनके जन्म के समय जो स्थितियाँ थीं, वह विशुद्ध रूप से मानवीय धरातल पर थीं. आप आज की उन प्रसूताओं का ध्यान करिए जिनके पास प्रसव की सुरक्षित परिस्थितियाँ ही नहीं हैं.
     
पैदा होने के साथ ही माता-पिता से वियोग के बाद जो बालक नन्द और यशोदा के संरक्षण में बड़ा हुआ, उसके पास जीवन को समझने और जीने की कुछ विशिष्ट पद्धतियाँ तो होनी ही थीं. मथुरा में गोपियों का जो साथ मिला, उसने कृष्ण को जीवन के अधिकतम विस्तार तक पहुँचाया. कृष्ण का जीवन उत्सव का संदेश बन गया. कृष्ण की लीलाएँ मनुष्य की सहज और संभाव्य आकांक्षाएँ बन गयीं.
     
कृष्ण और अर्जुन की मित्रता भी बड़ी गहरी है. दरअसल, मैत्री-भाव को जो ऊँचाई कृष्ण ने दी है, वैसा कोई भी दूसरा उदाहरण दुर्लभ है. बाल्यकाल में गोकुल के ग्वालों के साथ उनके मैत्री-भाव का उत्कर्ष तब दिखता है जब वो मथुरा के राजा हो गये. सुदामा के लिए उनके हृदय में जो भाव उमड़े थे, वह मित्रता का शिखर तो है ही, साथ ही उसमें सामाजिक बराबरी, करुणा, और शासक वर्ग के लिए आदर्श भी अन्तर्निहित हैं.
     
कृष्ण-अर्जुन की मित्रता, सुदामा-कृष्ण की मित्रता से अलग है. अर्जुन के साथ कृष्ण की मैत्री ऐसी है जो अर्जुन के व्यक्तित्व का परिष्कार करती है. अर्जुन के साथ कृष्ण सारथी बने. यह निर्णय कृष्ण ने बहुत सोच समझ कर किया था. लम्बे समय की मित्रता के बाद कृष्ण, अर्जुन के व्यक्तित्व की कमज़ोरियों को जानते थे. बेशक अर्जुन सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर थे, लेकिन जीवन और संसार की उनकी समझ गहरी नहीं थी. भयभीत होने का उनका स्वभाव था. एकलव्य को देख कर भी डर गये थे अर्जुन. ऐसे में कृष्ण यह समझ गये थे कि महाभारत जैसे निर्णायक युद्ध में अर्जुन को रास्ता दिखाने वाला कोई साथ में चाहिए. कृष्ण नहीं चाहते थे कि अर्जुन का पराक्रम उनकी मनोदुर्बलताओं के कारण व्यर्थ चला जायें. इसीलिए कृष्ण ने अर्जुन का रथ हाँकने का विकल्प चुना. वो सिर्फ अर्जुन के पास ही नही रहना चाहते थे, बल्कि वो चाहते थे कि अर्जुन पूरी तरह से उन पर निर्भर रहें और उसी रास्ते पर चलें जिसे कृष्ण बता रहे थे.
     
महाभारत में कृष्ण अर्जुन के सखा भी हैं और गुरु भी. एक सच्चा मित्र एक सच्चा गुरु भी होता है किन्हीं बिन्दुओं पर. ज्ञान की गति भी अजब होती है. ज्ञान वहीं जा सकता है जहाँ अहंकार न हो. ज्ञान वहीं टिक सकता है जहाँ अहंकार न आये. यह सोचने की बात है कि श्रीकृष्ण ने गीता का दिव्य ज्ञान देने के लिए पाचों पाण्डवों में अर्जुन को ही क्यों चुना ? युधिष्ठिर तो बड़े ज्ञानी थे. तो ज्ञान और कर्म की ये गूढ़ बातें उन्हें बताई जा सकती थीं. युधिष्ठिर की मेधा प्रखर थी. शिक्षक तो मेधावी छात्र ही ढूढ़ते हैं पढ़ाने के लिए. छात्र जब कोई बड़ी परीक्षा उत्तीर्ण कर लेता है तो शिक्षक की कीर्ति भी बढ़ती है !
     
फिर कृष्ण ने गीता का ज्ञान देने के लिए अपेक्षाकृत कमज़ोर छात्र अर्जुन को क्यों चुना ?  कारण है. पाण्डवों में अर्जुन के अलावा चारों भाइयों से कृष्ण के सम्बंध मित्रता के नहीं थे. बुआ के पुत्र होने के नाते युधिष्ठिर, भीम, नकुल, सहदेव उनके लिए सम्मानीय और प्रिय थे, लेकिन अर्जुन के साथ बात दूसरी थी. अर्जुन, कृष्ण के सखा थे. दोनों के बीच कोई अहंकार नहीं था. अर्जुन, कृष्ण के सामने अपना मन खोल कर रख सकते थे. अर्जुन ही ऐसा कर सकते थे कि कुरुक्षेत्र में दोनो ओर की विशाल सेनाओं के बीच कृष्ण के सामने घुटनों के बल बैठकर कहें कि मुझे कुछ नहीं सूझ रहा है मित्र, मुझे राह दिखाओ. कल्पना कीजिए, कि ऐसी भीड़ के सामने जब आपकी छवि एक परम प्रतापी की हो, हम अपने पिता के सामने भी हाथ जोड़ने में संकोच कर जायेंगे. अर्जुन तो घुटनों के बल बैठ गये थे मित्र के सामने.
        
तो, इसीलिए कृष्ण ने अर्जुन को चुना दिव्य ज्ञान देने के लिए. क्योंकि अर्जुन ही खाली थे उसे लेने के लिए. और यह खाली जगह बनी थी मैत्री-भाव से. अहंकार का लोप कृष्ण की मित्रता से हुआ था. और फिर अर्जुन पात्र हो गये थे. युधिष्ठिर तो पहले से ही भरे हुए थे. पूरे महाभारत में, अर्जुन जब-जब हताश और दुर्बल हुए, कृष्ण ने उन्हें उबारा. कृष्ण ने अर्जुन को युद्ध के लिए तैयार करके, देश की राजव्यवस्था में एक ऐतिहासिक और अभूतपूर्व परिवर्तन का उन्हें वाहक बनाया.
     
कृष्ण, जीवन को उसके पूरे आयतन में देखने का आग्रह करते हैं. एक साधारण मनुष्य की तरह लीला करते हुए वो चमत्कारों का बहुत कम सहारा लेते हैं. अगर कोई चमत्कार किया भी तो उसकी व्याख्या लौकिक धरातल पर करने की कोशिश करते हैं. जब ऐसा करना मुश्किल हो जाता है तो योगेश्वर रूप बना लेते हैं. अपने किसी भी कौतुक को नकारते हुए यह बताने लगते हैं कि ये शक्तियाँ सबके भीतर हैं, जिन्हें जागृत किया जा सकता है.
     
कृष्ण का जन्म कारागृह में हुआ. अँधेरे में हुआ. दुनिया में हर जन्म अँधेरे में ही होता है. बीज से अंकुर को फूटते कभी देखा है किसी ने ? हमारे भीतर भी जो चीज़ें पैदा होती हैं, वह सब गहरे अंधकार के भाव में ही होती हैं.एक कविता, एक चित्र या एक राग का जन्म मन की जिन गहराइयों में होता है, वहाँ गहन अंधकार ही है. यह अचेतन का अंधकार होता है.
    
कृष्ण एक ऐसा जीवन हैं जिनके सामने मौत बार-बार और अनेक रूपों में आती है, लेकिन हर बार हार कर लौट जाती है. कभी पूतना बन कर तो कभी कालिया नाग की तरह. कृष्ण के जन्म के साथ ही उनके मारे जाने का डर है. मृत्यु की आवश्यक शर्त है जन्म. जन्म के बाद का एक-एक क्षण मृत्यु की यात्रा है. यही जीवन है. मृत्यु कृष्ण को रोज़ घेरती है. और कृष्ण जीवन की तरह रोज़ जीतते चले जाते हैं. कृष्ण का जीवन मृत्यु को पराजित किए जाने का आख्यान बन जाता है. और इसी बिन्दु पर हमारा जीवन, कृष्ण का जीवन बन जाता है. यही सिरा है जहाँ से हमारा तादात्म्य कृष्ण के साथ शुरू हो जाता है. कृष्ण जैसा व्यक्तित्व जब हमें मिल गया तो उस व्यक्तित्व में हमने अपने आपको खोजना और पहचानना शुरू कर दिया.
     
हमारी इस आत्म-खोज को कृष्ण थोड़ा सरल बना देते हैं, जब वो कहते हैं—“ सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज “ . यह एकाग्र होने की बात है. जब तक हम दस रास्तों पर नज़र रखेंगे, तो जहाँ हैं वहीं खड़े रह जायेंगे. जड़ हो जायेंगे. गति जीवन है. जड़ता मृत्यु है. कृष्ण इस जड़ता को खत्म करने की बात करते हैं. सभी धर्मों को छोड़कर तू मुझ एक की शरण में आ....सब को छोड़कर एक पर एकाग्र हो जा...यहाँ कृष्ण व्यक्तिवाची नहीं रहते, भाववाची हो जाते हैं—यह द्वैत से अद्वैत की ओर आमंत्रण है.
     
यह किसी और की शरण में जाने की भी बात नहीं है. यह आत्मशरण में होने की बात है. कृष्ण कहते हैं कि अपने ‘ स्वभाव ‘ में स्थिर होना है. सारी चेतना और शक्तियों का केन्द्र यही ‘स्व’ है. इसी को ठीक-ठीक पहचान लेना है.
    
बहुत आश्चर्य होता है कि जो कृष्ण माखन चुराता है, गोपियों के वस्त्र लेकर छुप जाता है, वह गीता का गंभीर योगी कैसे हो जाता है ! यही कृष्ण के व्यक्तित्व की निजता है. यही वह विशेषता है जिससे कृष्ण हमारे इतने नज़दीक लगते हैं. विरोधों का समागम हैं कृष्ण. हर आदमी में होते हैं दस-बीस आदमी---निदा फाज़ली की इस पंक्ति को कृष्ण के जीवन से भी समझा जा सकता है. हमारा सारा जीवन ही विरोधों पर खड़ा है. लेकिन इन विरोधों में एक लय है. एक प्रवाह है. सुख-दुख, बचपन-बुढ़ापा, रोशनी-अँधेरा, जन्म-मृत्यु----ये सब विरोधी प्रत्यय हैं, लेकिन एक लय में बंधे होते हैं. इसी लय में जीवन संभव होता है.
     
गोपियों के साथ कृष्ण की काम-लीला से बहुत से शुद्धतावादियों को आपत्ति रही है. कृष्ण के जीवन में काम की सहज स्वीकृति है. मनुष्य के जीवन में ही नहीं, सारी सृष्टि के सृजन में काम-ऊर्जा केन्द्रीय तत्व है. फ्रायड इसे ‘लिबिडो’ कहते है. पुराण कहते हैं कि ब्रह्मा ने काम से पीड़ित होकर ही जगत् को बनाया है. जीवन के हर उद्यम, हर रचना,हर अभिव्यक्ति के पीछे काम की ऊर्जा होती है. कृष्ण के जीवन में काम का कहीं निषेध नही है. कहीं कोई दमन नहीं है. काम एक निर्बाध प्रवाह है. काम का दमन हमें रोगी बनाता है. पोखर के पानी और नदी के पानी में फर्क देखा होगा आपने ! पोखर में पानी को बांध दिया गया है. नदी में प्रवाह है, उन्मुक्तता है. पोखर का पानी रोग और बीमारियाँ देता है, नदी का पानी जीवनदायी है.
     
कृष्ण जीवन को एक उत्सव की तरह देखते हैं. वे खुद को जीवन की तरफ मुक्त करते हैं. बौद्धिकों ने संसार और जीवन को बहुत जटिल कर दिया है. कृष्ण सरलता का संदेश देते हैं. कृष्ण हँसते हैं,गाते हैं,नाचते हैं. रास करते हैं. रास उनके लिए ,उस केन्द्रीय काम-ऊर्जा का विखंडन है. कृष्ण एक-एक क्षण को उसकी अधिकतम लब्धता में जी लेने के हिमायती हैं. कृष्ण हमारी आदिम और मौलिक आकांक्षाओं के प्रतिबिम्ब हैं.

Monday, 6 August 2012

एक दोस्त के उदास होने पर

एक दोस्त क्यूँ उदास है
मैं नहीं जानता था
पर मैं उदासी को जानता था ।

एक दोस्त सब दोस्तों जैसा नहीं था
पर उसकी उदासी
सब उदासियों जैसी थी ।

एक दोस्त के बगल में
जब खड़ा हो गया मैं
तो वह पिघलने लगा,
वह अपने पिघलने को नहीं जानता था
पर मेरा बगल में खड़ा होना
उसे अच्छा लग रहा था ।

मेरे लिए
उसके उदास होने का मतलब
पूरी दुनिया उदास है से था.
कि सबकी दुनिया
मेरी दुनिया नहीं थी,
कि वह दोस्त
सबका दोस्त नहीं था.
जैसे मेरी दुनिया
सबकी दुनिया नहीं थी ।

मेरा दोस्त उदास था का मतलब
सबके दोस्त उदास थे नहीं था,


और सवाल यह था भी नहीं
कि उदास कौन है,
लेकिन यह उदासी
दुनिया पर एक सवाल थी ।

Thursday, 2 August 2012

अपनी मानस बहन अर्चना पंत के लिए


सपने में रोते हुए
सचमुच के आँसू निकल आते हैं.
सपने में गूँजती है
सचमुच की हँसी ।

कुछ लोग
सपने में ही बिछड़ जाते हैं
तो कुछ लोगों का मिलना
किसी सपने जैसा ही होता है ।

वो नींद
कितनी पवित्र होती होगी
और कैसी अदम्य छटपटाहट से भरी,
जिसके सपने सच हो जाते हैं ।

ऐसी ही किसी नींद के
एक अप्रत्याशित स्वप्न में
मुझे तुम मिलीं
और मेरा पूरब
एक सूर्योदय की लालिमा से भर गया ।