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Wednesday, 8 May 2013

पुनर्पाठ : खिलेगा तो देखेंगे / विनोद कुमार शुक्ल

पढ़ने के जब संस्कार बन रहे थे तो कुछ ऐसी रचनाएँ हाथ लगी जिनकी अनुगूँज हमेशा मन में बनी रही. इधर मन हुआ कि ऐसी किताबों और प्रिय लेखकों को फिर से पढ़ा जाये और देखा जाये कि अपनी समझ में कुछ विस्तार हुआ कि नहीं. पुनर्पाठ के अन्तर्गत कुछ लेखकों की प्रिय रचनाओं पर लिखने की योजना है. यह लिखना इस तरह का होगा कि मैने उन्हें कैसे समझा. इस योजना में फिलहाल हजारी प्रसाद द्विवेदी, मंटो, विश्वनाथ त्रिपाठी, निर्मल वर्मा, उदय प्रकाश, मनोहर श्याम जोशी, श्रीलाल शुक्ल, काशीनाथ सिंह, हरिशंकर परसाई, भगवत रावत, मार्खेज़, मैत्रेयी पुष्पा, विष्णु खरे आदि लेखकों की रचनाएं हैं. शुरुआत अपने सर्वाधिक प्रिय और हिन्दी के सबसे बड़े समकालीन लेखक विनोदकुमार शुक्ल के उपन्यास खिलेगा तो देखेंगेसे कर रहा हूँ.

मिलान कुन्देरा ने उपन्यास की कला का ज़िक्र करते हुए एक जगह लिखा है—
उपन्यास यथार्थ का नहीं अस्तित्व का परीक्षण करता है. अस्तित्व घटित का नहीं होता, वह मानवीय संभावनाओं का आभास है. जो मनुष्य हो सकता है, जिसके लिए वह सक्षम है. उपन्यास-लेखक खोज के जरिए मानवीय संभावनाओं के अस्तित्व का नक्शा बनाता है. चरित्र और दुनिया, संभावनाओं के द्वारा जाने जाते हैं.”  खिलेगा तो देखेंगेउपन्यास की मुख्य-प्रतिज्ञा भी दरअसल आदिवासी ग्राम्य-जीवन के अस्तित्व का नक्शा खोजना ही है.

खिलेगा तो देखेंगे स्वरूप की दृष्टि से, उपन्यास के प्रचलित रूप से बहुत अलग और एक रचनात्मक प्रयोग है. इसकी आत्मा में कथा के बजाय आदिवासी इलाके के दृश्य हैं. ऐसा इलाका जो सामजिक बन पाने की प्रक्रिया में अभी भी सामुदायिक है. समुदाय में लोगों और चीज़ों का रिश्ता पूरी तरह अलग नहीं हुआ होता. मनुष्य और मनुष्येत्तर में इतनी दूरी नहीं होती, जितनी तथाकथित सभ्य समाज में है. यह आदिम जीवन का लक्ष्य है. विनोद कुमार शुक्ल विचारों से नहीं, स्रोतों से सामुदायिक जीवन को पकड़ते हैं. दृश्य और स्थितियाँ, इन्द्रियों के के जरिए इन्द्रियों से कितनी तटस्थ रह सकती हैं, इसको आज़माने का प्रयोग किया गया है इस उपन्यास में. नदी-नाले, पोखर, तालाब, जंगल, चन्द्रमा, सूरज, तारे, आकाश और घर—सब चीज़ों की तरह हैं. घर में ताला लगाकर सुरक्षा है, तो पेड़ में ताला लगा लें और रह जायें ! ताला अगर सुरक्षा है तो उसे कहीं भी होना चाहिए. इलाके के जीवन में सृष्टि में गांव और गांव का आकाश आता था”.

खिलेगा तो देखेंगे में चरित्र सूत्रता का क्रम नहीं है. विनोद कुमार के शब्दों में, गांव का इलाका, ज़माने से कोई होता हुआ कार्यक्रम है.”  कार्यक्रम कैसा ? दुख और तकलीफ का, जहाँ कार्यक्रम अच्छी तरह प्रस्तुत होता है, वहाँ तालियाँ बज जाती हैं. इलाके में परिवर्तन होते होते पास के मुसुआ गाँव में रेल्वे स्टेशन खुल गया. ट्रेन से लोगों का उतरना चढन होने लगा. इस प्रक्रिया में सामान की जगह परिवार होता था. बसें भी उधर आनें लगीं. फर्क यह पड़ा कि गाड़ी बस में यात्रा करना, और दुखों की तरह एक और दुख हो गया. मज़बूरी में उठाने के और दुख थे. यात्रा का दुख जुड़ गया. कैसे स्टेशन में खड़ी ट्रेन से परिवार उतर जाता, कुछ सभ्य सामाजिक मनचले लोग बहाने से जवान लड़कियों को उसी के अन्दर रोक लेते और ट्रेन छूट जाती. लड़कियाँ ट्रेन में में चिल्लाती रहतीं, माता-पिता नीचे रोते रहते. लड़कियाँ दिन से रात में चली जातीं और माता पिता दिन में खोजते रहते. अधेड़ अवस्था में वे लौटकर बच जातीं. प्लेटफार्म में अधेड़ में अधेड़ पागल औरत अधनंगी लेटी होती. उसके शरीर के चिथड़े में एक आकार के दाग होते. मक्खियां भिनभिनातीं पर वह गर्भवती न होती.इस तरह के ब्यौरे रचना में दृश्य और वृत्तान्त की तरह हैं. दृश्यों, सूचनाओं, प्रसंगों, स्मृतियों और कल्पना से बुने बाल-सुलभ तानों-बानों की मालाएँ हैं.

खिलेगा तो देखेंगे एक अमनोवैज्ञानिक सामूहिक जीवन-वृत्त है. सर्वत्र क्रियात्मक छवियां हैं. प्रत्येक चीज़ के साथ हलचल है. पर्यावरण जीवन के साथ गुंथा है. एक कोने से देखने पर दूर तक क्षितिज दिखता है. इन्द्रियां दृश्यों को उतारती हैं. चीज़ें पेश होती हैं, फिर फैन्टसी द्वारा चीजें फैल जाती हैं. उदाहरण के लिए, डेरहिन को खोजने पहाड़ी पर पहुँचे सिपाही, थानेदार और जिवराखन के बीच एक सूचना के आधार पर यहाँ मुख्य वाद्य सितार था...कि डेरहिन की जाँघ में बिच्छू गोदा हु है. इस मुख्य वाद्य के साथ थानेदार का हृदय तबले की तरह धक् धक् धिन्ना कर रहा था. एक मुर्दा स्त्री की शिनाख्त के लिए जाँघ में चीन्हा देखने के बदले जिन्दा में देखना अच्छा होता. कहा जा रह था कि रेलगाड़ी में बैठकर ऐसी सामाजिकता आ गई थी कि स्त्री के ऊपर किया गया अत्याचार, अत्याचार नहीं हो रहा था. निर्वस्त्र करन छिलका उतार कर आम खन थ. गदराये आम को रसीला बनाया जाता और चोंपी तोड़कर चूस लिया जाता.

 
अनेक प्रसंग हैँ जहाँ आदिवासी समुदाय में घुसते सभ्यता के परिवर्तन की विकृतियों को लेखक नें क्रीड़ाभाव से विदग्ध बना दिया है. आसान सी बातों में गहरी विदग्धता का यह नया अभिव्यक्ति अंदाज है. फणींश्वरनाथ रेणु ने मैला आँचल और परती परिकथा में कुछ ऐसे प्रयोग किए थे, जहाँ अभिप्राय लेखक का न हो, चीजें अपना अभिप्राय खुद कहें. परती परिकथा में परती जमीन की परीकथाओं नें उसे जीवित पात्र बना दिया था. चिड़ियां-पशु, कीड़े-मकोड़े यथार्थ का हिस्सा थे. मनुष्येत्तर चीजें उपन्यास में जीवन की तरह थीं.

विनोद कुमार शुक्ल के गद्य की सरलता अपेक्षाकृत ज्यादा संश्लिष्ट और ऋजु है. क्रियाएँ संभावना में फैलती हैं. मसलन गुरूजी के बेटे को भूख लगती है तो बेहोश हो जाता है. पास में सिक्का रहे तो कुछ खा लेता है. माँ की दी हुई दो रोटियाँ हैं तो खाकर बच जाता है. पिता को पता है कि
भूख लगे और भोजन मिले ‘ – इस समीकरण से गुलाम बनना पड़ेगा. पूर्वजों को उन्होंने ऐसा ही देखा, खुद अनुभव किया और पुत्र भी स्टेशन की माल ढुलाई में फँस गया. अतः पुत्र को शिक्षा देते हैं और अभ्यास कराते हैं—भूखे रहकर पढ़ने का अभ्यास करो. पाठशाला जाओ, खेलो और भूखे पेट सो जाओ. भूखे उठो, मुंह हाथ धोओ. नहाओ, पढ़ने बैठ जाओ. दिनचर्या में खाना खाना भूल जाओ. और यह आप्त वाक्य है—भूखा रहने की जितनी आदत होगी, स्वाभिमान से जीना उतना आसान होता होगा. पिता और पुत्र इस उपन्यास में तयशुदा आदमी हैं. चरित्र चित्रण के लिए लेखक जीवन की बहुत सी चीज़ें छोड़ देता है. यहाँ चीज़ें यथासंभव नही छूटी हैं. उद्धृत वृत्तान्त के भीतर जीवन के अनन्त दृश्यों की कहानियाँ हैं. यह ट्रेजडी की तरह करुणा उपजाने की बात नहीं है, नियति की तरह होते रहने की प्रस्तुति है.


उपन्यास में वृत्तान्त का जो केन्द्र है उसे गाँव कहा गया है. पड़ोस के कुछ गाँवों के नाम है लालपुर, हल्दी बड़गाँव मुसुआ आदि. लोगों में से कुछ के नाम हैं—घासीराम, जिवराखन, डेरहिन, पुसऊ, मनहर. इसके अलावा सब गुरूजी, कोटवार, मुन्ना, मुन्नी, पत्नि, शाला निरीक्षक, ग्रामसेवक, या स्टेशन मास्टर के रूप में हैं वृत्तान्त में. कहीं किसी के नाम न होने से कुछ नहीं खटकता. जातिवाचक जानकारी मामूली है मसलन, राउत, साव, देवर. समुदाय में ये चीज़ें अर्थ नहीं रखतीं. समुदाय का एक ही पोट्रेट होता है. स्थितियों के विरोधाभास उसी में खुलते हैं. दृश्यजगत की क्रियाएँ आभ्यन्तर प्रदेश की जानकारी देती हैं. विनोद जी गाँव के लक्षण को कई बार रेखांकित करते हैं. रेखांकन में अनुभव किया हुआ नतीज़ा होता है. जैसे गाँव के लोगों में सामान्य बातचीत में मीठा व्यंग्य और नाटकीयता होती है.
दुख में उपेक्षा की फीकी हँसी हँस देते हैं. हँसी इतनी फीकी होती है कि उसके बाद रोना आता. अधिकतर रोने में हँसी थी. कभी-कभी सचमुच रो देते. पचास पैसे की जलेबी की मिठास कई दिनों तक रहती, कभी-कभी पाँच-छः महीने तक रहती. यह उपन्यास के भीतर निबन्ध-कला है.

यूरोप में रोमैन्टिसिज्म और इनटलैक्चुअलिज्म के आन्दोलन आये. व्यक्ति अस्मिता की तलाश के नाम पर अस्तित्ववाद आया. शोषण के विरुद्ध मार्क्सवाद ने प्रतिज्ञा की. भारत के आदिम जीवन में पहले से ही ये प्रवृत्तियाँ सहज और कोमल ढंग से मौजूद हैं. संकेत और इशारे से ये चीज़ें उपन्यास में खुलती हैं.

खिलेगा तो देखेंगे में प्रेम-प्रसंगों की अभिव्यक्तियाँ दिलचस्प हैं. जिवराखन और डेरहिन पति-पत्नि हैं. डेरहिन सुन्दर है. वह गाय बाँध सकती है. रेडियो चलाना और बन्द करना वह नहीं जानती. जिवराखन रेडियो चालू करता और बन्द भी. डेरहिन किसी युवा को बार-बार रेडियो बन्द करने को न कहती, प्रेम होने के डर से. जिवराखन सोचता सोचता कि डेरहिन रेडियो चलाना सीख लेती तो वह प्रेम करता. जिवराखन से उधार खाये गाँव के लोग उसके आगे-पीछे होते हुए भी वे रेडियो बन्द करने का साहस नहीं करते. डेरहिन ऐसे आदमी की तलाश में थी जिसने जिवराखन से उधार न लिया हो. वह मेले में हो आई. वह पहाड़ी की ओर चली गई. मुक्त आदमी के साथ वह जिवराखन से मुक्त हो गई. वह पकड़ में नहीं आई. गुरूजी अपनी सयानी ज़िन्दगी में कभी-कभी मुन्ना-मुन्नी के जन्म के पहले वाले समय में जा कर पत्नी को देखते. इन रहवासियों की प्रेम व्यंजनाएँ उन्हीं को पता हैं, जो वहाँ हैं. उपन्यास लेखक ने इसे इस तरह कहा—जब किसी एक से प्रेम करने का बंधन हो, चाहे प्रेम न हो, तो दूसरे से प्रेम होने का डर गृहस्थी की चौहद्दी को मजबूत बनाता है.

उपन्यास में अनुच्छेद जैसी चीजें नहीं हैं. कुछ-कुछ दूरी पर अन्तराल हैं. अन्तराल में आगामी कार्यवाही की कुछ पंक्तियां उद्धृत होती हैं. पूरा वृत्तान्त निरंतरता में है. रचना में निरन्तरता का सूत्र कथन है—निरन्तरता समय का गोत्र है. जैसे भारद्वाज गोत्र होता है. विनोद जी के शीर्षक प्रायः रचना की निरन्तरता से होते हैं. जैसे—वह आदमी चला गया गरम कोट पहन कर विचार की तरह”. यह एक आविष्कृत गद्य का उदाहरण है. कविता में गद्य और गद्य में कविता का अद्भुत खेल विनोद जी के यहाँ है. मूल जीवन की आदिम अभिव्यक्ति, आविष्कृत गद्य में कुशल कला कर्म है. यह आविष्कार को सहज बना देता है. स्थानीय रंगत ऊपर आ जाती है. दोतरफा संवाद चमत्कार पैदा करते हैं. जैसे, गुरूजी ने पेड़ से कहा और पेड़ ने गुरूजी से कहा. सामुदायिक जीवन के तौर तरीकों और रीति-रिवजों को भाषा में ढालकर लेखक नया रूप दे देता है. जैसे, एक रिवाज के अनुसार दूल्हे की माँ दुलहिन के आने पर कुएँ में कूदने का अभिनय करती है. दूल्हा उसे भोजन और कपड़ा देने का वचन देता है. सेवा करने की प्रतिज्ञा भी. इस आश्वासन पर वह कुएँ से निकल आती है. आदत की तरह ये रिवाज जीवन को बाँधे रखते हैं. भैंस में चढ़ कर तालाब नहाना, जलेबी खाना, बाँसुरी बजाना, मेले में जाना और बात बात में मिथकीय जीवन में चले जाना—विनोद कुमार शुक्ल आविष्कृत गद्य में, दृश्य की तरह संभव बनाते हैं.

खिलेगा तो देखेंगे उपन्यास के जरिए आदिवासी गाँवों का गठन देखें तो न जातियाँ उठकर आती हैं और न वर्गवाद. सामन्ती जीवन प्रणाली के व्यवस्थित अवशेष भी नज़र नहीं आते. इतिहास के द्वारा जिस तरह सामाजिक विकास के चिन्ह गाँवों में प्राप्त किए  जाते हैं, वे इस जीवन में नहीं हैं. सामुदयिक मिथकीय विश्वासों, प्रथाओं और चलन की स्मृतियों में ये जीते हैं. इनके यहाँ स्वतंत्रता के अनुभव अपने हैं. डेरहिन के बहाने स्त्रियों की बंधन मुक्ति की प्रथा देखी जा सकती है. इनका अपना ढाँचा और उसके भीतर का आन्तरिक संतरण है. उपन्यास में गुरूजी, जिवराखन, स्टेशन मास्टर, थानेदार इस आन्तरिक संतरण में हस्तक्षेप हैं. पाठशाला, स्टेशन, थाना और दूकान के प्रभाव यहाँ के जीवन में अलग अलग पड़ते हैं. विनोद कुमार शुक्ल  इस जीवन में संचित तमाम लक्षणों का आंकलन दर्शाते और भावी संभावनाओं का अनुमान करते है. यथार्थ के प्रति किसी निर्धारित दृष्टि से जीवन की आलोचना का मार्ग नहीं अपनाते. उपन्यास की खूबी यह है कि इस जीवन की स्वयं की जो अभिव्यक्ति प्रणाली है, उसे रचना के कैनवास में ग्रहण करने का प्रयत्न किया गया हैं. और भाषा में रूपक और अन्योक्ति का जो बर्ताव है वह शास्त्रीय नहीं, लेखक का अपना चमत्कार है.


Saturday, 20 April 2013

'क' और 'ख' की लघुकथा



जिन दिनों '' प्रेम कविताएँ लिख रहा था,
उन दिनों '' प्रेम में डूबा जा रहा था ।

अब '' बहुत मशहूर हो चुका है ।
प्रेम कविताओं से एक पत्नी हुई....
पत्नी से दो बच्चे हुए.......
बीमार पिता शिखर-सम्मान से सम्मानित हुए.......
माता शुगर-थायराइड-माइग्रेन के साथ मुदित हुईं.......
भाई नौकरीशुदा हुए....................

इधर '' प्रेम में डूब गया था ।

उसे भी दो सलोने बच्चे हो सकते थे, अगर एक अदद पत्नी होती ।
बीमार पिता दिवंगत हो गए थे........
और माता कुपित थीं........
भाई कहीं गुमशुदा हो गए थे.......

कई साल बाद '' और '' की मुलाकात हुई.....
तो दोनो मुस्कुराए....।

Friday, 19 April 2013

लघुकथाः "परस्पर"




उसने कहाः  मैं सोचती हूँ कि दुनिया में तमाम लोगों के लिए दुनियादारी निभाने के लिए
               कुछ न कुछ करना पड़ता है, पर तुम्हारी तरफ से निश्चिन्त रहती हूँ
               कि तुम्हारे लिए कुछ न भी करूँ तो कोई हर्ज़ नहीं !

इसने कहाः और मैं सोचता हूँ कि दुनिया के तमाम लोगों की चिन्ता तुम्हें रहती है. 
               लेकिन मेरा--जो तुम्हें सबसे अधिक प्यारा है--ही खयाल रखने में तुम लापरवाही क्यों
               करती हो !!

Saturday, 6 April 2013

घर संसार में घुसते ही

(मेरे प्रिय कवि विनोद कुमार शुक्ल की एक कविता.....)


घर संसार में घुसते ही
पहिचान बतानी होती है
उसकी आहट सुन
पत्नी बच्चे पूछेंगे ' कौन है ?'
'मैं हूँ ' वह कहता है
तब दरवाजा खुलता है ।

घर उसका शिविर है
जहाँ घायल होकर वह लौटता है ।

रबर की चप्पल को
छेद कर कोई जूते का खीला उसका तलुआ छेद गया है ।
पैर में पट्टी बाँध सुस्ताकर कुछ खाकर
दूसरे दिन अपने घर का पूरा दरवाजा खोलकर
वह बाहर निकला

अखिल संसार में उसकी आहट हुई
दबे पाँव नहीं
खाँसा और कराहा
' कौन है '  यह किसी नें नहीं पूछा
सड़क के कुत्ते ने पहिचानकर पूँछ हिलायी
किराने वाला उसे देखकर मुस्कुराया
मुस्कुराया तो वह भी ।
एक पान के ठेले के सामने
कुछ ज्यादा
देर खड़े होकर
उधारपान माँगा
और पान खाते हुए
कुछ देर खड़े होकर
फिर कुछ ज्यादा देर खड़े होकर
परास्त हो गया !

Monday, 18 March 2013

सोलह बरस की बाली उमर के सवाल !

स्त्रियों की उम्र को लेकर ऐसी देशव्यापी चर्चा पहले कभी नहीं चली होगी. हाल ही में स्त्रियों के साथ होने वाले दुष्कर्म से पूरे देश में जो जन-जागृति दिखाई पड़ रही रही है, उसमें कुछ चौकाने वाली प्रपत्तियाँ सामने आ रही हैं. दिल्ली गैंगरेप के बाद भारतीय मीडिया इस तरह से दुष्कर्म पर एकाग्र हुआ कि ऐसा लगने लगा है कि इस देश में दुष्कर्म के अलावा कुछ होता ही नहीं, और इस देश के पुरुषों के पास बलात्कार करने के अलावा कोई काम ही नहीं है. अखबारों और खबरिया चैनलों मे ऐसी ही खबरें हैं. बलात्कार की मनोवृत्ति और उसके समाधान को लेकर लम्बी-लम्बी बहसें आयोजित की गईं, जिनमें गृहस्थ, नेता, पुलिस अधिकारी, समाजशास्त्रियों से लेकर, चोर-लबार-संत-मुनि-ज्ञानी, सब शामिल हुए.

देशव्यापी आंदोलन और बहसों का सरकार और न्यायपालिका पर ऐसा दबाव बना कि न्यायलों ने दूसरे काम छोड़कर दुष्कर्म क मामलों को धड़ाधड़ निपटाना शुरू कर दिया. हफ्ते भर में फैसले आने शुरू हो गए और कठोरतम सज़ा सुनाई गई. थानों में दुष्कर्म की रिपोर्ट दर्ज होने लगी. अखबारों में छेड़खानी की खबर भी दुष्कर्म के शीर्षक से छपने लगी. गाँव, शहर और कस्बों में, कुएँ और हैंडपंपों पर होने वाले झगड़े पुलिस तक पहुँचते पहुँचते दुष्कर्म में तब्दील होने लगे. पहले ऐसी किसी घटना पर टीवी रिपोर्टर के सामने आपबीती सुनाते हुए पीड़िता दुपट्टे या साड़ी से चेहरा ढँक लेती थी. लेकिन अब वह निस्संकोच होकर कैमरे के सामने बयान देने लगी है. साफ है कि देश भर में जिस तरह से लोगों ने आवाज उठाई है, उससे पीड़ितों का आत्मविश्वास बढ़ा है. यह भी लगा कि देश भर के महिला संगठनों को मानो जीवनदान मिल गया हो, तो वहीं महिला लेखकों का विषय का अकाल खत्म हुआ.

यह जनाक्रोश का ही दबाव था कि महिला सुरक्षा को लेकर सरकार को अतिरिक्त सक्रिय होना पड़ा. सरकार ने मंत्रियों का समूह बनाकर महिलाओं की सुरक्षा को और अधिक पुख्ता बनाने के लिए सुझाव देने को कहा. मंत्रियों ने अपना काम किया. जाहिर है उन्होने दुष्कर्म के लिए जिम्मेदार प्रत्यक्ष और परोक्ष सामाजिक, मनोवैज्ञानिक और जैविक कारणों पर गहन विचार किया होगा. इस मंथन के बाद महिलाओं से जुड़े कुछ अधिनियमों में संशोधन की ज़रूरत महसूस की गई और इन संशोधनों को संसद से पास कराने की कसरत शुरू हुई. हम अपनी संसद का चरित्र तो जानते ही हैं. यहाँ चर्चा कम होती है, बहिर्गमन ज्यादा होता है. बिना चर्चा के ही प्रस्ताव पास होते हैं, इसीलिए अधिकतर जनहित के नहीं बल्कि सरकारहित के होते हैं. विपक्षी दल पहले हो-हल्ला करते हैं, लेकिन प्रस्ताव पास हो जाने के बाद चुप हो जाते हैं. वो जानते हैं कि जब उनकी सरकार बनेगी तो यही उन्हें भी करना है. खैर !!

सरकार की तरफ से मंत्री समूह नें एक विचित्र संशोधन की सिफारिश की है. यह यौन-सम्बन्धों की वैधता से जुड़ी  सिफारिश है. आप जानते हैं कि अभी जो कानून है उसके मुताबिक 18 वर्ष की उम्र पूरी कर चुकी लड़की से यदि कोई पुरुष उसकी सहमति से यौन-सम्बन्ध बनाता है तो वह कानून की नज़र में दणडनीय नहीं है. मंत्री-समूह ने सिफारिश की है कि अब इस तरह के सहमति के यौन सम्बन्धों में लड़की की उम्र 18 से घटाकर 16 कर दी जाये.

इस प्रस्ताव में कुछ बातें गौर करने की हैं. पहली यह कि यह संशोधन महिलाओं से होने वाले दुष्कर्म को कम करने के लिए किया जा रहा है. दूसरी यह कि इसमें पुरुषों की उम्र का कोई उल्लेख नहीं है. तीसरी यह कि सहमति से बनने वाले यौन-संबन्धों में आपत्ति करने वाले कौन हैं ? चौथी यह कि जिस तर्क से विवाह के लिए लड़की की न्यूनतम आयू 18 वर्ष रखी गई है, उस तर्क को यहाँ क्यों प्रासंगिक नहीं माना गया ? पाचवीं यह कि क्या इस देश की यौन-आकांक्षाओं में बदलाव हुआ है ?

यद्यपि सरकार ने अपने प्रस्ताव पर ऐसा कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया है, जिससे उपरोक्त जिज्ञासाएँ शान्त हो सकें. सरकार का पूरा ध्यान अभी इस संशोधन को संसद की मंजूरी दिलाने में है. यह प्रस्ताव दिखता ही कुछ इतना विचित्र है कि पहला मन इसके विरोध में जाने का होता है. इसीलिए विपक्षी दलों के साथ साथ सरकार के कई सहयी दल भी धीरे-धीरे इसके विरोध में होते जा रहे हैं. मजे की बात तो ये है कि मंत्री-समूह में शामिल कुछ सदस्य भी अब ये कहने लगे हैं कि वो इससे सहमत नहीं थे. इसमें सबसे मुखर स्वर कृष्णा तीरथ का है.

आइए पहले यह देखने की कोशिश करते हैं कि इस संशोधन पर सरकार का संभावित स्पष्टीकरण क्या हो सकता है ! शायद सरकार यह मानती होगी कि 16 वर्ष की आयु तक लड़कियों का शरीर यौन संबन्ध बनाने के लिए पूर्णतः तैयार हो जाता है. चूँकि दुष्कर्म के अधिकांश मामले कम उम्र की लड़कियों के साथ होते हैं, अतः अगर इसे कानूनी वैधता दे दी जाये तो लड़कियां सहमति से यौन संबन्ध बना लेंगी और बलात्कार की नौबत ही नहीं बनेगी. साथ ही यह भी कि कई बार सहमति के संबन्धों का खुलासा होने पर उनकी शिकायत बलात्कार के रूप में दर्ज कराई जाती है. आयु सीमा घटा कर 16 कर देने पर सरकार के दुष्कर्म के राष्ट्रीय आंकड़ों में तेजी से गिरावट प्रत्याशित है.

सरकार ने पुरुष के लिए कोई आयु सीमा नहीं रखी है. शायद वह मानती है कि पुरुष स्वाभाविक यौनाचारी है, और यौनक्रिया सम्पन्न करने के लिए उसके शारीरिक विकास की कोई भूमिका नहीं है. वह यह भी मानती होगी कि यौन क्रिया में पुरुष आक्रान्ता है और स्त्री दयनीय.

सरकार यह दलील भी दे सकती है कि विवाह और यौन क्रिया में पर्याप्त अंतर है. विवाह के बाद लड़की पर पारिवारिक, आर्थिक और मातृत्व संबन्धी जटिल प्रक्रियाओं का दबाव होता है. इसीलिए उसका शारीरिक और मानसिक रूप से अधिक परिपक्व होना आवश्यक है. इसीलिए विवाह की उम्र 18 वर्ष रखी गई है. लेकिन यौन क्रियाओं के लिए लड़की का शरीर पहले ही तैयार हो जाता है, और उसकी यौन-जिज्ञासाएँ भी कम उम्र में ही बढ़ जाती हैं. साथ ही समाज समाज में आये खुलेपन और लड़कियों के बाहरी दुनिया से बढ़े सम्पर्क के कारण यौन संबन्धों को रोक पाना मुश्किल काम है. इसीलिए 16 की उम्र में ही इसे कानूनी वैधता दे देनी चाहिए.

सरकार यह भी महसूस करती होगी कि देश की यौन-आकांक्षाओं में तेजी से बदलाव हुआ है. वह इस बदलाव की गुणात्मकता का अंदाज़ा भले न लगा पाए, लेकिन इतना तो जानती होगी कि लोगों की यौन-इच्छाओं के जो आत्मबन्ध थे वो ज्यादातर टूट रहे हैं. उपभोक्तावाद सिर्फ बाज़ार को ही नहीं प्रभावित करता, वह हमारे चरित्र को भी बदल देता है. नैतिकता के बंधन कब टूट जाते हैं, हमें पता ही नहीं चलता. हम उथले और स्वेच्छाचारी होते जाते हैं. कुछ ही समय में यह उथलापन और स्वेच्छाचारिता हमारी आदत बन जाती है. और बड़ी ठसक के साथ यही हमारे जीवन में नैतिक मूल्य की तरह विराज जाती है.

उदारीकरण से जो व्यापारिक प्रतिस्पर्धा पैदा हुई, उसने विज्ञापन की पूरी संस्कृति को ही बदल दिया. अब ऐसा कोई उत्पाद नहीं है, जिसे बेंचने के लिए अर्धनग्न लड़कियों का इस्तेमाल न किया जाता हो. मनुष्य के यौन-जीवन की गोपन बातें बच्चों को चॉकलेट और चिप्स के साथ मिलने लगी हैं. इंटरनेट निर्बाध पोर्न सामग्री उपलब्ध करा रहा है. एकल परिवारों के छोटे घरों में परदे उड़ रहे हैं और बच्चे वह सब देख लेते हैं जो उन्हें नहीं देखना चाहिए. नशाखोरी की बढ़ती सामाजिक मान्यता सबको उश्रृंखल बना रही है. ऐसे में देश का यौन-आचरण तो बदलना ही था. अब अधिकांश लोग प्रेमिका/प्रेमी नहीं, शिकार ढूढ़ते हैं.

अब मूल बात पर लौटना चाहिए. कि सहमति से यौन संबन्धों की आयु सीमा घटा देने से क्या लड़कियां सुरक्षित हो जायेंगी ?  क्या आपको लगता है कि दुष्कर्म का आयु से कोई गंभीर संबन्ध है. जिस मानसिकता में बलात्कार किए जाते हैं क्या उस समय इस बात से फर्क पड़ेगा कि लड़की की उम्र 16 है या 18. और अगर सहमति से यौन संबन्ध बनाया गया है तो वह दुष्कर्म कहाँ हुआ ! चाहे यह संबन्ध सोलह में बने या साठ में. और क्या आप यह मानने की ज़िद भी करेंगे कि अभी तक 18 से कम उम्र की लड़कियां सहमति से यौन संबन्ध बनाती ही नहीं थीं !! या यह मान लेंगे कि नया अधिनियम बन जाने के बाद लड़कियां धडल्ले से यौन संबन्ध बनाने लगेंगी !!!

दरअसल यह कानूनी समस्या है ही नहीं. यह हमारी सामाजिक समस्या है. हमारा समाज पति के अलावा किसी भी यौन संबन्ध को बर्दाश्त नहीं कर सकता, चाहे वो किसी भी उम्र में सहमति से ही क्यों न बनाए जायें. अगर स्त्री-पुरुष में परस्पर सहमति भी हो तो दूसरे लोग उसे नहीं होने देंगे. इस देश में अभी भी हमारी अपनी ही देह और मन पर हमारा अधिकार नहीं है. यौन संबन्धों में कानून की इतनी ही भूमिका रही है अब तक कि 90 प्रतिशत बलात्कार के मुकदमें झूठे रहे हैं. इसमें लड़की-लड़के के परिवार वालों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है. यौन संबन्ध चौराहों पर तो बनाए नहीं जाते. पहले तो इन्हें भरसक छुपाए रखने की कोशिश की जाती है. और दुर्भाग्य से अगर यह खुल गया और लड़की नाबालिग(18 से कम) हुई तो लड़के पर बलात्कार का केस बनवा दिया जाता है. ऐसे मामलों में पुलिस बहुत जल्दी असलियत भाँप लेती है. और वह दोनों पक्षों से अपना हित साधती है.

उम्र सीमा 18 से 16 करने का भले ही स्त्रियों की सुरक्षा पर खास असर न पड़े लेकिन एक डर है. 16 की उम्र की लड़कियों में उत्साह ज्यादा होता है और समझ कम. उनकी यौन-जिज्ञासाओं का फायदा कोई भी कुशल शिकारी उठा सकता है. विवाह पूर्व के यौन संबन्ध कई बार लड़कियों के लिए बहुत बड़ी मानसिक समस्या बन जाते हैं. शारीरिक और सामाजिक समस्या तो वो होते ही हैं. इसीलिए सरकार का उम्र घटाने का यह निर्णय स्वागत करने लायक तो नहीं ही है, विशेषकर तब जबकि इसका स्त्री-सुरक्षा से कोई लेना-देना नहीं है.

Friday, 15 March 2013

हवा ने पेड़ से प्रेम किया


हवा ने पेड़ से प्रेम किया

और मुक्त हो गई.

सूरज ने आग से प्रेम किया 
और मुक्त हो गया.

चन्द्रमा बर्फ से
प्रेम करते हुए मुक्त हुआ.
सुमुद्र पानी के प्रेम में इतना फैला.

तुमने मुझसे प्रेम किया
और मुझे
कभी पेड़ आग बर्फ
फिर पानी बनाती रहीं.

इस तरह
तुम्हें मुक्ति मिली नहीं
और मैने भी
आवर्त सारिणी के बाहर
मैन्डलीफ के कॉल को
रिजेक्ट कर दिया है ।

Wednesday, 13 March 2013

नींद की ज़गह पर नींद का ख़याल था


नींद की ज़गह पर
नींद का ख़याल था
और सपनों की ज़गह पर
कुछ सचमुच के डर थे ।

नींद आने के ख़याल में 
रात का सन्नाटा था
जिसमें मैं
एक सुनसान सड़क के ख़याल में
घर से निकल गया जैसे निकला था ।

मेरे एक हाथ की उँगलियाँ
मेरे होठों से लगी थीं
और दूसरा हाथ
ज़ेब में रखी चाभियों पर था.
हालाँकि मैं न तो सिगरेट पीता हूँ
और ताला भी नहीं लगाया था घर में ।

जिस बायीं कलाई को
मैं बीच बीच में देख लेता था
उस पर घड़ी बाँधना
जानबूझ कर भूल गया था ।

घर से निकलते वक्त
समय से बाहर निकलने का ख़याल था ।

मैं जिस सड़क पर
जाने के ख़याल में था
वह समय के बाहर थी
और मेरे पास
किसी दोस्त का फोन नम्बर भी नहीं था ।

लेकिन सड़क
समय के इतने
समानान्तर जा रही थी
कि समय के अन्दर के एक घर से
सुनाई पड़ रही थी
दबाकर निकाली गई एक कराह
एक बूढ़ा
एकदम समय की कगार पर
कुछ ऐसे खाँस रहा था
जैसे वो प्रक्षेपित हो जाना चाहता हो 
समय से बाहर ।
घर के अन्दर 
एक नौजवान
इधर उधर बिखरी किताबों के बीच
अधेड़ हो रहा था ।

उम्र बढ़ना
जीवन बढ़ना नहीं होता होगा
कि उम्र
समय के भीतर बढ़ती होगी ।

जीवन बढ़ने के लिए
समय का अतिक्रमण करना होता होगा
समय से बाहर जाना
समय का अतिक्रमण नहीं होता ।

तो इस वक्त मैं
अतिक्रमण के ख़याल में
समय से बाहर था ।

मैं समय से बाहर की सड़क पर
बायीं ओर चल रहा था ।।

Saturday, 2 March 2013

अंतिम सर्ग

यह एक समुद्र है
जिसका केवल एक छोर होता है.

इतना पानी है
कि आग की तरह 
उठती है प्यास की लपट.

इसके भीतर जो भी आता है
नमक में तब्दील हो जाता है.

और नमक
अब भी
सबसे सस्ता जिंस है दुनिया में.