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Wednesday, 2 October 2013

गांधी को भूल जाइए !




गांधीजी की सांस्कृतिक उपस्थिति इतनी ज़बरदस्त है हमारे बीच कि एक आम भारतीय भी, जिसने गांधी को व्यवस्थित ढंग से नही भी पढ़ा है, उन पर बोलने का हक रखता है. गांधीजी की व्याप्ति जन-मानस में इतनी वृहद है कि उन्हें जानने के लिए उनके बारे में ज्यादा पढ़ने की ज़रूरत नहीं पड़ती. लेकिन गांधी के इस लोकव्यापीकरण की वजह से ही उन पर सोचने और उनको समझने के कम से कम दो नज़रिए हर वक्त रहे हैं.

लेकिन गांधीजी को समझा नहीं गया. जा मार्क्स को नहीं समझा गया. या यह कहना ज़्यादा सही होगा कि उन्हें गलत समझा गया. दरअसल विकास के क्रम में—चाहे वो गांधी हों या मार्क्स—उनके दर्शन के पूरे स्वरूपों को समझने के लिए हम एक विश्व-समुदाय की तरह विकसित नहीं हुए हैं. गांधीवाद और साम्यवाद के जो स्वरूप हमें बीसवीं सदी में दिखाई दिए थे, वे विकास के क्रम में ऐसा लगता है कि प्री-मेच्योर सामाजिक प्रयोग थे. जो इतिहास में अपनी गलत जगह उपस्थिति के कारण सफल नहीं हो पाये.

हम प्राणी जगत के विकास की प्रक्रिया को देखें तो पायेंगे कि बहुत सी प्रजातियां, जो अपने समकालीनों से हर दृष्टि से अधिक विकसित और श्रेष्ठ थीं, वे विकास के कालक्रम में समयपूर्व आ गयीं और नष्ट हो गयीं. उसके बाद जब उपयुक्त काल आया तो वे प्रजातियां सर्वाधिक सफल हुईं जो अपनी पूर्ववर्ती श्रेष्ठ और लुप्त प्रजातियों की नकल सी दिखाई देती थीं और कई बार उनसे हीन भी. इसके अतिरिक्त एक और बात भी किसी चीज़ के सफल या असफल होने की नियंता होती है.

इसे हम Law Of Randomization  से समझ सकते हैं. कई बार बहुत सी कमतर जातियाँ भी सफल हो जाती हैं, और कुछ बेहतर प्रजातियाँ भी असफल रह जाती हैं. इसके पीछे अकारण ही एक संयोग का तत्व काम करता है. विचारों या दर्शन के क्षेत्र में भी ऐसी ताकतें लगातार काम करती रहती हैं. मसलन गांधी या मार्क्स जैसे प्रयोग ही सौ बार हों, तो हो सकता है कि सत्तर बार कामयाब हो जायें और तीस बार नाकामयाब हों. जिन प्रयोगों को हमने देखा, वे हो सकता है पहले प्रयोग थे जो तीस प्रतिशत असफल के खाते में चले गये. ऐसी कारगर वैज्ञानिक ताकतों की हम अनदेखी नहीं कर सकते, जो अधिकांशतः मानव-निरपेक्ष चलती हैं.

किसी महापुरुष का उसके जीवनकाल में मूल्यांकन करना अथवा इतिहास में उसके स्थान का निर्धारण करना आसान काम नहीं होता. गांधीजी ने एक बार कहा था—सोलन को किसी व्यक्ति के जीवनकाल में उसके सुख के विषय में निर्णय देने में कठिनाई हुई थी, ऐसी सूरत में मनुष्य की महानता के विषय में निर्णय देना तो और कठिन काम है.गांधी की मृत्यु पर पूरी दुनिया ने ऐसा शोक मनाया, जैसा मानव इतिहास में किसी अन्य मृत्यु पर नहीं मनाया गया था. जिस तरह से उनकी मृत्यु हुई उससे यह दुख और बढ़ गया था.

गांधीजी के वे कौन से गुण हैं जो उन्हें महान बनाते हैं. इतिहास इस बात को भी दर्ज़ करेगा कि इस छोटे से दिखने वाले आदमी का अपने देशवासियों पर इतना ज़बरदस्त प्रभाव था कि उसकी मिसाल नहीं मिलती. यह आश्चर्य की ही बात है कि इस प्रभाव के पीछे कोई अलौकिक शक्ति या अस्त्र-शस्त्रों का बल नहीं था. गांधीजी की इस गूढ़ पहेली का रहस्य, लार्ड हैलीफेक्स के मतानुसार है-उनका श्रेष्ठ चरित्र और स्वयं को मिसाल के रूप में रखने वाला उनका आचरण था. लार्ड हैलीफेक्स नमक-सत्याग्रह के दिनों में भारत के वायसराय थे और गांधी के काफी नज़दीक आये थे.

लेकिन गांधीजी के अभूतपूर्व उत्कर्ष के पीछे केवल ये ही कारण नहीं थे. रेजिनॉल्ड सोरेनसन का मानना था कि गांधीजी का केवल भारत पर ही नहीं, बल्कि हमारे पूरे आधुनिक युग पर जो व्यापक प्रभाव था उसका कारण यह था कि वे आत्मा की शक्ति के साक्षी थे, और उन्होंने उसका अपने राजनीतिक कार्यक्रमों में इस्तेमाल करने का प्रयास  किया. अहिंसा और सत्य के सिद्धान्तों को गांधीजी ने एक अस्त्र की तरह इस्तेमाल करने की कला विकसित की थी.

आज़ादी के बाद की पीढ़ी का जो द्वंद्व है, वह भी गांधीजी ने दिया. गांधी न हों तो यह द्वंद्व न हो. गांधी इस द्वंद्व के मूल कारण हैं, न कि मार्क्स !  द्वंद्व देने वाले गांधी हैं, वरना अब तक यह सदी अमेरिका की हो गयी होती. अमेरिका के सामने भी गांधीजी द्वंद्व खड़ा करते हैं. इस बात पर हो सकता है मार्क्सवादियों को एतराज़ हो. पर ज़रा ध्यान से देखिए कि द्वंद्वाद के सबसे बड़े सिद्धान्तकार मार्क्स इसे ज़मीनी हकीकत में नहीं बदल सके. यह सिद्धान्त खूब पढ़ा और समझा गया, लेकिन दुर्भाग्य से बौद्धिक विमर्श तक ही सीमित रह गया. गांधी ने सिद्धान्त नहीं दृष्टान्त दिए. उन्होंने विश्व के सामने पूँजी-श्रम, हिंसा-अहिंसा, गोरे-काले, प्रकृति-मशीन, आत्म-अनात्म का द्वंद्व रखा और विश्वभर के मानव समुदाय का ध्रुवीकरण करने में सफल रहे. गांधी की इस सफलता ने ही संभवतः मार्क्सवादियों में उनके प्रति ईर्ष्या-भाव पैदा किया होगा. तत्कालीन हिन्दुस्तानी कम्युनिस्टों ने गांधी को एक चालाक नेता कहा, जो युवकों की ऊर्जा को ऐसी दिशा में मोड़ देता था ताकि ब्रिटिश साम्राज्यवादियों और भारतीय पूँजीपतियों के हितों पर आँच न आये.

अलबत्ता उनकी नीतियों की उपादेयता और प्रासंगिकता पर बहस हो सकती है. गांधी की तरह के लोग विरले होते हैं. गांधीजी जितने सरल दिखाई देते हैं, उतने वो हैं नहीं. उनका व्यक्तित्व बहुत पेचीदा है. मसलन उन्होने वर्णवाद को तो बनाये रखने में रुचि दिखाई, मगर दूसरी ओर उन्होंने चाहा कि हिन्दू समाज से ऊँच-नीच खत्म हो. उन्होंने समतामूलक-समाज की कल्पना की और ट्रस्टीशिप की बात कही, मगर बिड़ला जैसे पूँजीपतियों को गले लगाये रखा. यह द्वंद्व बहुत पेचीदा और संश्लिष्ट व्यक्तित्व में हो सकता है.

मुझे लगता है कि गांधीजी की अचानक मृत्यु ने उनके बहुत सारे प्रश्नों को अनुत्तरित छोड़ दिया. सन् 62 के समय गांधीजी अगर जीवित होते तो दार्शनिक स्तर पर बहुत अजीब स्थितियों में फंस जाते. उनकी अहिंसा पर बहस शुरू हो जाती. गांधी का मानना है कि अहिंसा किसी भी सामाजिक अभियंता के लिए एक बहुत कारगर औजार है—जनचेतना का भी और परिवर्तन का भी. लेकिन हिंस्र पशुओं के बीच अहिंसा बेकार हो जाती है. बीसवीं सदी के उत्तरार्ध और इस सदी की शुरुआत में, जब मानव समाज में ही कई बड़े-बड़े रिश्ते हिंस्र पशुओं जैसा आचरण करने लगें, और  विचार कोई मुद्दा न रह जाये तो अहिंसा बेमानी सी लगती है. अहिंसा विकसित समाजों में ही संभव है.

गांधीजी ने हमारे समय की तीन प्रमुख क्रांतियों को चाहे आरंभ न किया हो, लेकिन उन्हें उद्दीप्त अवश्य किया. ये क्रांतियां हैं—नस्लवाद के विरुद्ध क्रांति, उपनिवेशवाद के विरुद्ध क्रांति और हिंसा के विरुद्ध क्रांति. वे इतना जिए कि पहली दो क्रांतियों में अपने प्रयासों की सफलता को देख सके. लेकिन हिंसा के विरुद्ध क्रांति अभी चल ही रही थी कि एक हत्यारे ने उन्हें मंच से हटा दिया.

गांधीजी उस दिन के लिए काम कर रहे थे जब अन्तर्राज्यीय झगड़ों मे भी हिंसा को उसी तरह अबैध घोषित कर दिया जायेगा, जैसे राष्ट्र/राज्यों की सीमाओं के भीतर उसे गैरकानूनी कर दिया गया है. यह विरोधाभास ही है कि साम्राज्यवाद के विरुद्ध राष्ट्रवाद का एक उग्रतम पक्षधर, एक उत्साही अंतर्राष्ट्रीयतावादी भी था. बहुत पहले 1924 में उन्होंने घोषणा की थी—संसार का बेहतर मस्तिष्क आज ऐसे पूर्ण स्वायत्त राज्य नहीं चाहता जो आपस में लड़ रहे हों, बल्कि मैत्रीपूर्ण, परस्पर निर्भर राज्यों का एक संघ चाहता है.

मशीनीकरण की जिन विकृतियों पर हम आज हाय-तौबा मचा  रहे हैं, गांधी ने उनकी तरफ 1909 में ही इशारा कर दिया था. वे कहते थे— ऐसा नहीं होना चाहिए कि मशीनें मनुष्य के हाथ-पैरों को ही बेजान बना दें.......मुझे आपत्ति मशीनों से नहीं, बल्कि मशीनों के पीछे दीवाना हो जाने से है. यह दीवानगी तथाकथित श्रम-बचाऊ मशीनों के लिए है. लोग तब तक श्रम बचाते जाते हैं जब तक कि हज़ारों लोग बेरोज़गार होकर भूखों मरने की स्थिति में सड़कों पर नहीं आ जाते..........मैं ऐसी मशीनों का कतई हिमायती नहीं हूँ जो या तो बहुत से लोगों को गरीब बनाकर मुट्ठीभर लोगों को अमीर बनाती हैं, या अनेक लोगों के उपयोगी श्रम को अकारण विस्थापित कर देती हैं.

गांधीजी भारत को समझते थे. उनकी परिकल्पना विकेन्द्रीकरण की ओर उन्मुख थी जहाँ संसाधनों पर और राज्यसत्ता पर एकाधिकार न हो. यह एक स्वप्नशीलता थी. गांधीजी ने नैतिकता का जो यूटोपिया बनाया, वह महत्वपूर्ण था. गांधीजी एक तरह से राजनीतिक व्यवहारिकता का प्रतिवाद भी कर रहे थे. गांधीजी मानते थे कि राजनीतिक सत्ता के जो तमाम अंगोपांग होते हैं, उनसे आक्रान्त होने के बावजूद नैतिक बने रहना संभव है. यह उनकी सबसे बड़ी ताकत थी और वह पिछली सदी के सबसे सहिष्णु व्यक्ति थे.

गांधीजी ने अतार्किकता का जो ढांचा बनाया था, वह एक तरह से आधुनिकता के तर्कवाद का बहुत सक्षम प्रतिवाद था. जिस सादगी और हिम्मत, निबंधता और स्वतंत्रता की उन्होंने परिकल्पना की, वह दरअसल आधुनिकता और उसमें छुपी हुई युयुत्सा और युद्धवाद का प्रतिपक्ष थी. मुझे लगता है कि जो आदिमयुगीनता गांधीजी के दर्शन में है, वह बहुत सारे अत्याचारों के विरुद्ध हमारा विकल्प बन सकती है.

बुद्ध के बाद गांधी ने ही समाज को एक बहुत बड़े परिप्रेक्ष्य में देखा. उन्होंने सिर्फ समाज के साथ मनुष्य के रिश्ते की ही चिन्ता नहीं की, बल्कि अपनी चिन्ता के दायरे में पर्यावरण को शामिल किया, मनुष्येत्तर प्राणियों को भी शामिल किया. समाज की सारी चिन्ताओं से अपने को जोड़ने की गांजीजी की क्षमता अप्रतिम थी. वह इस मायने में वाकई राष्ट्र के पिता की तरह लगते हैं जो पूरे परिवार का ध्यान रखता है.

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Saturday, 28 September 2013

84 बरस की लता और सदियों का सम्मोहन !

अपने करोड़ों प्रशंसकों के दिलों पर राज करते हुए, संकोची, भाग्यवादी, ईश्वरपरायण, पित़ृहीन, दृढ़ संकल्पी लता मंगेशकर आज चौरासी बरस की हो गईं. लता का जीवन यह बताता है कि भारत जैसे देश के, मुम्बई फिल्म उद्योग जैसे वातावरण में भी एक लड़की किन शिखरों को छू सकती है. दरअसल लता कोई दैवीय चमत्कार नहीं थीं, बल्कि वो मानवीय प्रयत्नों की पराकाष्ठा हैं. ये लता ही थीं जिन्होंने फिल्म संगीत को उसका वाज़िब हक दिलवाते हुए वैश्विक पहचान और स्वीकृति दिलवायी. भारत, पाकिस्तान, नेपाल, श्रीलंका, बंगलादेश पर तो वो आज भी राज कर रही हैं. साथ ही दुनिया भर में बसे अप्रवासी भारतीयों में उनके गीत एक नास्टैल्जिया पैदा करते हैं. ये अप्रवासी लता की आवाज़ के सहारे ही अपने देश की हवा, पानी, मिट्टी, जवानी और बचपन से जुड़े हुए हैं.
        
लता अगर भारत में न होकर किसी यूरोपीय देश, खासतौर से फ्रांस या जर्मनी में होतीं तो अब तक उन पर अनेक शोध हो चुके होते, जीवनियां लिखी जा चुकी होतीं. एक जमाने में यह खबर उड़ी थी कि अमेरिका ने भारत सरकार से यह पेशकश की थी कि मरणोपरान्त लता का गला उन्हें शोध के लिए दे दिया जाय, कि आखिर यह मिठास पैदा कैसे होती है ! खैर ! लेकिन भारतीय प्रशंसक लता को लेकर कभी भावुकता में गुम नहीं हुए. यद्यपि लता की आवाज़ हमें बहुत रचनात्मक रूप से भावुक करती है. दूसरी तरफ लता के कुछ गीत ऐसे हैं जिन्हें आधी रात के समय सुनकर पागल होने या यह दुनिया छोड़ देने की इच्छाएँ पैदा होने लगती हैं. लता के इस असर की स्वीकारोक्ति फिल्म गेटवे ऑफ इंडिया के एक गीत में है. इसमें संगीत पर मुग्ध ओम प्रकाश सपने में सजन से दो बातें, इक याद रही इक भूल गएगीत को ग्रामोफोन पर बार-बार सुनता है और विक्षिप्त होने लगता है. यह गीत, संगीतकार मदन मोहन की संभावनाओं का शिखर था, लेकिन लता के बिना इस शिखर को छुआ नहीं जा सकता था.
        
भारतीय उपमहाद्वीप में लता की लोकप्रियता इतनी चमत्कारिक है कि बच्चा-बच्चा उनके जीवन के बारे में जानता है. आप किसी से भी पूछिए वो बता देगा कि लता का जन्म इन्दौर के मराठी परिवार में 28 सितंबर 1929 को हुआ था. लता की माँ दीनानाथ मंगेशकर की दूसरी पत्नी थीं. जन्म के समय लता का नाम हेमारखा गया था. बाद में पिता दीनानाथ ने अपने एक नाटक भाव बन्धनकी पात्र लतिका से प्रभावित होकर उनका नाम लता रख दिया. वस्तुतः इनका उपनाम हार्डीकरथा. पिता दीनानाथ ने ही अपने मूल स्थान(मंगेशी, गोवा) की पहचान को जीवित रखने के लिए मंगेशकर उपनाम रख लिया था. लता की संगीत की आरंभिक शिक्षा स्वाभाविक रूप से पिता से ही शुरू हुई. फिर कच्ची उम्र में ही लता ने अमानत अली खान से संगीत सीखना शुरू कर दिया. आगे चलकर अमानत खान देवासवाले, पं. तुलसीदास शर्मा और बड़े गुलाम अली खाँ से भी सीखती रहीं. लता ने गाने के साथ ही 70 के दशक में कुछ मराठी फिल्मों के लिए संगीत भी तैयार किया. पिता दीनानाथ मंगेशकर अपनी संगीत-नाटक मंडली चलाते थे. लेकिन उनकी मंडली, सिनेमा में आवाज़ और संगीत के आगमन के कारण बर्बाद हो गई.
         
दीनानाथ शराब के आदी हो गए और चले गए. सिनेमा ने पारसी और अन्य थियेटर शैलियों को भी खत्म सा कर दिया. जिस सिनेमा ने दीनानाथ को बर्बाद किया, उन्हीं की बेटी फिल्म संगीत की साम्राज्ञी बन गई. लता जीवन भर जी जान से अपने पिता को भारतीय संगीत में प्रतिष्ठित करने में लगी रहीं, और अपने प्रचार के प्रति हद से ज्यादा उदासीन रहीं. लेकिन तब भी, जिसे बड़े गुलाम अली खान ने तीन मिनट की जादूगरनीकहा था, वो लगभग 66 बरसों से हमारे दिल, दिमाग, गले, होंठ, कान में बसी हुई हैं. वो अपने पिता का बकाया पिछले साठ सालों से फिल्म संगीत से वसूल रही हैं. लता के प्रभाव का अंदाज़ा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि अगर किसी धुन को सुनने के बाद उनकी त्यौरियों पर एक भी बल पड़ जाता था तो नामी से नामी संगीतकार भी शर्मिन्दा हो जाते थे. दोयम दर्जे के संगीतकारों की तो पूछिए मत.
       
लता का चौरासी बरस का हो जाना हमें विचलित नहीं करता. क्योंकि आज भी किसी संगीतकार को जब कोई कठिन धुन गवानी होती है या कोई अविस्मरणीय गीत रचना होता है तो वह लता की शरण में जाता है. यद्यपि अब लता जब ऊँचे सुरों में जाती हैं तो उनकी आवाज में कुछ रेशे निकल आते हैं, लेकिन कोई सर्वनाश नहीं हो जाता. चौरासी बरसों ने लता की आवाज़ के साथ वह नहीं किया जो उसने सुरैय्या, शमशाद बेगम, नूरजहाँ या इकबाल बानों के साथ कर दिया था.
        
फिल्म संगीत को आदर दिलवाने का काम सहगल ने शुरू किया था. बाद में मुकेश, मन्ना डे, किशोर और सबसे अधिक रफी ने इस काम को आगे बढ़ाया. लेकिन भारतीय फिल्म संगीत को वैश्विक पहचान और हमारे सुख-दुख-राग-विराग-जनम-मरण का अनिवार्य साथी बनाया लता मंगेशकर ने. लता की साधना और उपलब्धियों से उनके समय के साथी गायक भी प्रेरित होते थे. संसार में भारतीय संगीत अगर अपनी पूरी ताकत से प्रतिष्ठित है तो वह शास्त्रीय गायकों की वजह से नहीं. हमें ईमानदारी से यह स्वीकार कर लेना चाहिए कि यदि हमारा लोकप्रिय फिल्म संगीत न होता तो पाश्चात्य पॉप के तूफान में हमारे शास्त्रीय संगीत के उस्ताद अपने तानपूरे और तबलों के साथ उड़ गए होते. जब पूरी दुनिया में मैडोना और माइकल जैक्शन का दिग्विजयी आभियान चल रहा था, उस समय उपमहाद्वीप में भारतीय फिल्म संगीत अपनी पूरी ताकत से उसके मुकाबिल था. इसी का नतीज़ा है कि नाचने-गाने और मस्ती के लिए भले ही पॉप संगीत बजा लिया जाय, लेकिन दुखों का पहाड़ पिघलाने और खुशियों में उबाल लाने के लिए हमें अपने फिल्म संगीत की ही आँच चाहिए होती है. और यह आँच पैदा करती है एक लाल किनारे वाली सफेद साड़ी पहने हुए शर्मीली औरत. यह औरत पिछले 66 सालों से गाती जा रही है. और उसके साथ संसार के कोने-कोने में न जाने कौन-कौन गा रहा है !
             
लता पर मुग्ध रहते हुए हमें गुलाम हैदर के एहसान को भी नहीं भूलना चाहिए. भले ही लता ने तेरह की उम्र में मराठी फिल्म पाहिली मंगला गौर में गा लिया था, लेकिन इस साँवली और मरियल सी लड़की में लता को गुलाम हैदर ने ही खोजा था. उस लता को जो करोड़ों लोगों को न सोने देती है न जागने देती है. गुलाम हैदर तो लगभग भुला दिए गए, लेकिन लता को भुलाना रहती दुनिया तक संभव नहीं होगा.
        
यह अमरत्व लता को आसानी से नहीं मिला. इसके लिए उन्हें मीरा बनना पड़ा. पिता की मृत्यु के बाद पूरे परिवार की परवरिश का जिम्मा तो उठा ही लिया था. उन्होने अपनी निजी लालसाओं और सुखों को भी होम कर दिया. लता उन अर्थों में सुन्दर नहीं थीं जिनसे हम किसी स्त्री को देखते हैं, लेकिन लता के करोड़ों प्रेमी आज भी हैं. 1950-55 के बीच जब राजसिंह डूँगरपुर उनके जीवन में नहीं थे, तब भी सी. रामचन्द्र, नौशाद, अनिल विश्वास, मदन मोहन, चितलकर, शंकर-जयकिशन जैसे कई पुरुष उन पर मोहित रहे हैं. लेकिन लता ने अपना जीवन संगीत और पिता की स्मृतियों को संजोने में समर्पित कर दिया था. उन्होने राग-द्वेष के जीवन से पारगमन करके, संगीत में समाधि लगा ली. उनकी साधना का फल यह निकला कि उनकी पूरी देह ही उनकी आवाज़ बन गई.
       
पचास के दशक के मध्य में भारतीय फिल्म संगीत और फिल्मों में संवेदना के स्तर पर एक शालीन परिवर्तन हो रहा था. सहगल, पंकज मलिक, पहाड़ी सान्याल, सुरेन्द्र दुर्रानी, के.सी. डे, जगमोहन, काननबाला, जोहराबाई, जूथिका राय, अमीरबाई कर्नाटकी जैसे गायक-गायिकाएँ अचानक पुराने लगने लगे. इनकी आवाजें अटपटी और करुणा में भी हास्य पैदा करने वाली लगीं. 1945-46 के आसपास हिन्दी फिल्मों में चकाचौंध पैदा करने वाले परिवर्तन रहे थे. संवेदना, सोच, तकनीक और आस्वाद—सब कुछ बदल रहा था. भारतीय फिल्म-कला वयस्क और अंतर्राष्ट्रीय हो रही थी. इसी समय लता, रफी, मन्ना डे, हेमन्त कुमार, नौशाद, मदन मोहन आदि भारतीय संगीत-रसिकों के संस्कार बदल रहे थे.
        
इस सुदीर्घ और प्रदीप्त संगीत साधना में लता किन किन रुपों में आयीं हमारे सामने. बच्ची के रूप में, किशोरी की तरह, नायिका की तरह......यानी एक स्त्री जिन जिन रूपों में घटित हो सकती है, सब में. लता की आवाज़ ने ब्याहता, परित्यक्ता, साध्वी, विधवा, विरहिणी, नौकरानी, पटरानी, कोठेवाली, पतिव्रता आदि नारियों की भावनाओं को समय समय पर जिया. स्त्री की सम्पूर्णता को लेकर वो करोड़ों पुरुषों की आकांक्षाओं में बस गयीं, तो न जाने कितनी अवसादग्रस्त स्त्रियों को जीवनदान देती रहीं. लता की आवाज़ में ऐन्द्रिकता और मांसलता नहीं है. उनकी आवाज़ में एक पवित्र समर्पण है. वहीं उनकी बहन आशा की आवाज़ में मांसलता और अधिकार भाव है. याद कीजिए बुड्ढा मिल गया गीत में लता की आवाज़ कितनी अटपटी लगती है. आशा के गीत मोरे अंग लग जा बालमा....’  वाला असर क्या लता की आवाज़ में आ सकता था !
               
ऐसा नहीं था कि शुरू से ही लता में ऐसा चमत्कार था. मजबूर से लेकर लाडली तक लता की आवाज में साफ तौर पर एक कच्चापन था. लेकिन इसके बाद सी. रामचन्द्र और नौशाद ने उनकी आवाज़ को इस कदर सँवारा कि पाँच सालों के भीतर ही दूसरी गायिकाएं दृश्य से गायब हो गयीं. लता को लेकर यह बहस भी चली कि उन्होने किसी दूसरी गायिका को पनपने नहीं दिया. यह इमानदारी से सोचने की बात है कि लगभग 21 साल की उम्र में क्या उनके पास संगीत की दुनिया की इतनी ताकत आ गई होगी कि वो अपने से वरिष्ठ गायिकाओं को चुप करवा सकतीं ?

                



लता उस भारतीय स्त्री की आवाज़ हैं जो हर पुरुष के भीतर कस्तूरी की तरह छुपी रहती है. जिसे पुरुष जन्म लेने के साथ ही खोजने लगता है. लता न सिर्फ हमारा अभिमान हैं, बल्कि हमारी जीवनीशक्ति भी हैं. आधी रात को हमारे अस्तित्व पर उग आये प्रश्नचिन्ह का जवाब हैं लता के गीत. हमारे बचपन, यौवन, बुढ़ापे की सदाबहार साथी लता की आवाज़ तब तक रहेगी जब तक इस धरती पर मनुष्य है.

Thursday, 19 September 2013

जिस आवाज़ को सुनने वाला कोई न हो

जिस आवाज़ को
सुनने वाला कोई न हो
उसे गुम हो जाना चाहिए
अपनी ही स्वरपेटी में ।

उसे नहीं देखना चाहिए
सात स्वरों का समन्दर
और हवा अगर कान में कुछ कहे
तो उसे अनसुना कर देना चाहिए ।

जिस आवाज़ को
सुनने वाला कोई न हो
उसे बन्द कर लेने चाहिए
सारे खिड़की दरवाज़े
और रौशनी के सारे सूराखों में
डाल देनी चाहिए
पिघली हुई मोम ।

उसे बैठना चाहिए कुछ देर
अपनी ही आवाज़ के अँधेरे में ।

इसी अँधेरे में मिलेंगे
कुछ ऐसे लोग
जिनकी ज़ुबानें
काट ली गई थीं
एक मौन जुलूस में
शामिल होने के अपराध में ।

जिस आवाज़ को
सुनने वाला कोई न हो
उसे शामिल हो जाना चाहिए
इन्हीं बेज़ुबान लोगों के मौन में,
नक्शे के मुताबिक
उसे चलते जाना चाहिए
अँधेरे की रौशनी में
जंगलों और पहाड़ों के बीच से ।


उसे तब तक
कोई सवाल नहीं करना चाहिए
जब तक उसके बेज़ुबान साथी
आवाज़ों के किले पर
उसे फहरा नहीं देते
विजय पताका की तरह ।

Wednesday, 11 September 2013

संतन को कहाँ सीकरी सों काम !




पिछले दिनों आसाराम की रंगबाज़ी और बैकुण्ठ-प्रवास पर पूरे देश का मीडिया एकाग्र रहा। यह जगजाहिर हो चुका है कि आसाराम पर आरोप है कि उन्होंने अपने ही एक शिष्य की नाबालिग पुत्री का यौन शोषण किया। यद्यपि इस प्रकार के यौन शोषण संबंधी आरोप आसाराम पर के लिए नए नहीं हैं। वैसे भी एक संतों का यौन शोषण के आरोप में गिरफ्तार किया जाना हमारे देश के लिए कोई चौंकाने वाली घटना नहीं है। और भी कई स्वयंभू संत, मौलवी, पादरी, मुनि व ज्ञानी भाई जैसे तथाकथित धर्मगुरु पहले भी यौन शोषण,  हत्या, ज़मीनों पर नाजायज़ कब्ज़े जैसे विभिन्न अपराधों में आरोपी रह चुके हैं।
                    
जब भी इस तरह के संतों का दिव्यलोक उजागर होता है, मीडिया में इस बात को लेकर बहस छिड़ती है कि आख़िर दूसरों को उपदेश व प्रवचन देने वाले ऐसे तथाकथित संत स्वयं आपराधिक व अनैतिक गतिविधियों में क्यों शामिल पाए जाते हैं। जिन संतों को उनके अंधभक्त शिष्य भगवान का दर्जा देने लग जाते हों, जिनके चित्र उनके अनुयायी अपने घरों के मंदिरों में, घर की दीवारों यहां तक कि अपने गले के लॉकेट में तथा जेब में रखने लगते हों ऐसे पूज्यसंतों की विभिन्न अपराधों में संलिप्तता के समाचार मिलने के बाद उनके शिष्यों व अनुयाईयों पर आख़िर क्या गुज़रती होगी?  क्या हमारे समाज को ऐसे ढोंगी,पापी व अपराधी लोगों को धर्मगुरु का दर्जा देकर उन्हें सिर पर बिठाना चाहिए? और इन सबसे बड़ा प्रश्र यह है कि धर्म प्रचारक बने बैठे यह स्वयंभू संत धर्म की इज़्ज़त बढ़ा रहे हैं या उसे संदिग्ध बना रहे हैं ?

आसाराम सहित उनके समर्थकों ने व उन्हें समर्थन देते आ रहे तथाकथित हिंदुत्ववादी संगठनों व उनके नेताओं ने देश को यह कहकर गुमराह करने की कोशिश की कि आसाराम पर झूठे आरोप लगाकर हिंदू धर्म को बदनाम करने के प्रयास किए जा रहे हैं। कुछ स्वयंभू हिंदूवादी नेताओं ने कहा कि-योजनाबद्ध तरीक़े से हिंदू संतों को झूठे मामलों में फंसाया जा रहा है। मुझे नहीं मालूम कि आसाराम ने पीडि़ता नाबालिग़ लडक़ी के साथ क्या व्यवहार किया। परंतु यह बात तो दुनिया सुन ही रही है कि एक नाबालिग लडक़ी होने के बावजूद आसाराम के शिष्य की इस नाबालिग पुत्री ने उनपर यौन शोषण के गंभीर व घिनौने आरोप लगाए हैं। और निश्चित रूप से प्रत्येक अपराधी की तरह आसाराम भी इन आरोपों से बचने का प्रयास करते हुए स्वयं को बेगुनाह बता रहे हैं।
                            
आख़िरकार न तो आसाराम के समर्थक संगठनों का कोई दांवपेंच काम आया न ही आसाराम की मनगढ़ंत बातों पर किसी ने अपने कान धरे। क़ानून ने अपना काम किया। पुलिस ने पीडि़ता की एफ़ आईआर दर्ज की और बड़े ही नाटकीय ढंग से काफ़ी हिला-हवाली और बहानेबाज़ी का सामना करने के बाद जोधपुर पुलिस ने उन्हें उनके इंदौर स्थित आश्रम से गिरफ्तार कर लिया और अदालत ने उन्हें जेल भेज दिया।
सवाल यह है कि आसाराम के साथ उनपर लगे आरोपों के बाद जो कुछ भी हो रहा है क्या उससे हिंदू धर्म की बदनामी हो रही है? या फिर आसाराम अथवा इन जैसे दूसरे तथाकथित स्वयंभू सतों द्वारा जिस प्रकार तरह-तरह की आपराधिक गतिविधियों में उनके शामिल होने के मामले प्रकाश में आते हैं उनसे हिंदू धर्म बदनाम होता है?

वास्तविक घटनाक्रम क्या था इस विषय में सच्चाई तो केवल पीडि़ता नाबालिग़ लडक़ी या आसाराम को ही पता है। फिर आख़िर उमा भारती जैसी महिला नेता किस आधार पर आसाराम को बेगुनाह बता डालती हैं? अपने इन अंधभक्तों की ही तरह आसाराम ने भी अपने बचाव में कई अस्त्र चलाए। उनमें एक हथियार यह भी इस्तेमाल किया कि उन्हें सोनिया गांधी व राहुल गांधी के कहने पर फंसाया जा रहा है। एक और चाल उसने अपनी इसी बात के समर्थन में यह चली कि वे मिशनरी के द्वारा धर्म परिवर्तन के विरोधी थे इसलिए उन्हें यह दिन देखने पड़ रहे हैं।
         
बड़ी आसानी से समझा जा सकता है कि हिन्दू धर्म को कौन बदनाम कर रहा है  आज पूरी दुनिया में इस्लाम पर संकट व बदनामी के बादल मंडरा रहे हैं। मुस्लिम जगत में इस विषय पर यह कहा जा रहा है कि इस्लाम पर आए संकट के पीछे पश्चिमी देशों की साजि़श शामिल है। मज़े की बात तो यह है कि यही बातें उन तथाकथित इस्लामपरस्तों द्वारा भी की जा रही हैं जोकि मुसलमान का रूप धारण कर दिन-रात केवल आतंकवादी गतिविधियों को बढ़ावा देने में लगे हुए हैं। जो ताकतें मानव बम से बेगुनाह लोगों की आए दिन हत्याएं करवा रही हों उनका यह कहना है कि इस्लाम को दूसरी ताकतें नुकसान पहुंचा रही हैं,हास्यास्पद व्युत्पत्ति है । यहां भी सवाल यही उठता है कि जिस इस्लाम में किसी एक बेगुनाह की मौत को पूरी मानवता की हत्या की संज्ञा दी गई हो, जिस इस्लाम में जीव-जंतु तो क्या पेड़-पौधों को भी बेवजह काटने या उखाड़ फेंकने के लिए मना किया गया हो उस धर्म में ख़ूनरेज़ी व हत्याओं का खेल खेलने वाले स्वयंभू इस्लामी ठेकेदार इस्लाम की बदनामी का कारण हैं या फिर पश्चिमी शक्तियां अथवा दूसरे उदारवादी मुस्लिम जगत के लोग?

इन संतों व उपदेशकों को भी यह बात समझनी चाहिए कि उनके अनैतिक व आपराधिक क्रियाकलाप व उनकी सांसारिक गतिविधियां धर्म को बदनाम कर रही हैं न कि उनके विरुद्ध कोई साजि़श रची जा रही है। दूसरों को मोहमाया से दूर रहने की सीख देने वाले ये कर क्या रहे हैं ! मायामोह की ऐसी जकड़न क्यों है !  सत्संग भवनों के नाम पर प्रापर्टी डीलिंगके व्यापार में शामिल रहना, धर्म व आस्था के नाम पर अपने साथ जुडऩे वाले अपने भक्तों की भीड़ को उपभोक्ता समझ कर उनके साथ व्यवसायिक रिश्ते जोडऩा, अपने शिष्यों व अनुयाईयों की बहन-बेटियों को अपनी हवस का शिकार बनाने का प्रयास करना, गद्दी की ख़ातिर हिंसा यहां तक कि हत्या तक में शामिल पाया जाना  तथा धर्म के नाम पर अपने साम्राज्य का निरंतर विस्तार करते जाना-- क्या यही संत स्वभाव है ? जिन्हें धर्म की बदनामी का भय है, उन्हें किसी बलात्कारी अथवा अपराधी धर्मगुरु का बचाव करने के बजाए आम लोगों को ऐसे पाखंडियों से दूर रहने व इनसे बचने की सलाह देनी चाहिए।
           
ऐसे अपराधी प्रवृति के लोगों को क़तई यह अबसर और अधिकार नहीं देना चाहिए कि वे व्याभिचार, ज़मीन-जायदाद तथा धन संपदा के साम्राज्य का विस्तार करने में जुटे रहें। धर्म की भी यह कैसी विडंबना है कि कहीं शराब का अवैध धंधा करने वाला धर्मगुरु बना बैठा है तो कहीं कोई साईकल का पंक्चर बनाने वाला व्यक्ति लोगों को जीने के सलीक़े सिखा रहा है। ऐसे स्वयंभू संतों की पृष्ठभूमि ख़ुद ही यह बता देती है कि इस व्यक्ति की वास्तविकता आखिर क्या है?

दरअसल धर्म की बदनामी का कारण ऐसे ही कलयुगी संत व धर्मोपदेशक हैं न कि उनकी आलोचना या इनकी निंदा करने वाले लोग। और यही लोग उस समय सबसे ज्यादा तिलमिलाते हैं जब कोई धर्म की आलोचना कर बैठता है. जब जीवन के हर क्षेत्र में आलोचना अनिवार्य और स्वीकार्य है तो फिर धर्म क्यों इतना घबराता है ! ये आश्रम बनाकर व्यभिचार करें तो धर्म की सेवा है, और कोई उँगली उठा दे तो वो काफिर हो गया ! अगर हम सच्चे धार्मिक हैं और अपने धर्म पर गर्व करते हैं तो ऐसे कुकर्मियों की पैरवी करना बन्द कर देना चाहिए. इनकी जगह धर्म-स्थलों में नहीं बैकुण्ठमें ही है. हमने आलोचनाओं पर ध्यान दिया होता तो ऐसी सड़न न पैदा होती धर्म में. तब न आसाराम होते न अजहर मसूद ।

       

Wednesday, 28 August 2013

कृष्ण के कपट और महाभारत की दुविधाएँ !


ईश्वरवादियों के सामने एक सवाल हमेशा खड़ा रहता है, कि यदि ईश्वर है तो फिर संसार में इतनी बुराइयाँ क्यों हैं ? अगर इस सवाल का जवाब देने की कोशिश किसी ने की तो वह और फँसता चला जाता है. मसलन, या तो ईश्वर बुराई का नाश करना चाहता है, और वह कर नहीं सकता. या फिर वह कर तो सकता है पर करना नहीं चाहता....यदि वह चाहता है लेकिन कर नहीं सकता तो वह नपुंसक है. यदि वह कर सकता है पर चाहता नहीं, तो फिर वह दुष्ट है. यानी ईश्वर अगर अच्छा है, तो उसका संसार इतना बुरा क्यों है ?
           
ऐसा ही सवाल करके कृष्ण को परेशान कर दिया था महाभारत के एक एकांतवासी ऋषि उत्तंक नें. कृष्ण की मुलाकत उत्तंक से राजस्थान के किसी निर्जन क्षेत्र में हुई थी. उन्हें जब कुरुक्षेत्र के जनसंहार का पता चला तो नाराज़ होकर कृष्ण से पूछा कि आपने इस नरसंहार को रोका क्यों नहीं ? कृष्ण ने जब यह कहा कि मैं असमर्थ था, तो ऋषि चकित हुए. एक ईश्वर असहाय होने का हवाला दे रहा है !
            
अब कृष्ण यह कैसे बताते कि इस महाभारत के असली नियंता तो वही हैं. पृथ्वी को क्षत्रिय और यादव वंश से मुक्त कर देने की उनकी वृहद योजना का एक हिस्सा था महाभारत का नरसंहार. अपने लक्ष्य को पाने के लिए कृष्ण कदम-कदम पर छल-कपट का सहारा लेते हैं. यद्यपि कृष्ण महाभारत में घोषणा करते हैं कि जब जब धर्म की हानि होती है तो मैं धर्म की रक्षा के लिए प्रकट होता हूँ. लेकिन पूरे युद्ध के दौरान किए गए अपने छल-कपट से कृष्ण हम सबके सामने एक नैतिक दुविधा पैदा कर देते हैं. अच्छाईऔर बुराई के बीच की विभाजक रेखा को खुद कृष्ण ने धुँधला कर दिया. छल कृष्ण के चरित्र का अभिन्न हिस्सा है, और उनकी चालबाजियाँ पारंपरिक नैतिकता को एक खुली चुनौती हैं, जो कर्म के समग्र अर्थ के संदर्भ में बड़ी महत्वपूर्ण हैं.
       
कृष्ण के दो रूप जनमानस में लोकप्रिय हैं. एक वह जो भागवत पुराण और सूरदास आदि कवियों ने बनाया है. जिसमें कृष्ण की सम्मोहक लीलाएँ हैं. राधा-कृष्ण का प्रेम है. कृष्ण-सुदामा की मैत्री है. दूसरा वह रूप जो महाभारत का संपादक-मंडल बनाता है. इस रूप में कृष्ण का विराट स्वरूप है, जो अर्जुन को दिखाते हैं कुरुक्षेत्र में. कृष्ण के छल-कपट और रण-कौशल हैं, जिसके दम पर वो बडे-बड़े महारथियों को मरवा देते हैं. इन दोनो ही रूपों में एक चीज उभयनिष्ठ है—वह है उनका छली स्वभाव. माखन चुराना और फिर सफाई में कहना कि चीटियाँ निकाल रहे थे. सरोवर में नहाती हुई गोपियों के वस्त्र चुराकर उनके दैहिक सौन्दर्य को देखना. अपने ग्वाल साथियों को डाँट लगवाना—उनकी कपट-प्रियता की आरंभिक निशानियां हैं.
       
महाभारत की कथा में कृष्ण का प्रवेश होता है द्रौपदी के स्वयंवर से. और यहीं से उनके छल-कपट का सिलसिला भी शुरू हो जाता है. आप जानते ही हैं कि द्रुपद ने मछली की आँख भेदने की शर्त रखी थी द्रौपदी के वरण के लिए. कृष्ण दूसरे महारथियों को पराजित करवा देते हैं विभ्रम पैदा करके. क्योंकि अपनी बुआ के पूत्र अर्जुन को जिताना था. द्रौपदी अर्जुन को मिल गई. यहीं से कृष्ण पाण्डवों के अभिन्न मित्र हो गए. बाद में छल से ही अपनी बहन सुभद्रा को अर्जुन के साथ भगवा दिया और विवाह करा दिया. इसके बाद तो पूरी महाभारत, जिसे अच्छाईऔर बुराई के बीच युद्ध कहा गया, कृष्ण की चालबाजियों की कहानी है.
       
महाभारत के युद्ध में एक-एक करके कौरव सेना के सारे महारथी मारे गए. पूरे युद्ध में युद्ध-संहिता का घनघोर उल्लंघन हुआ. अच्छाई के प्रतीक पाण्डवों ने भीष्म, द्रोण, कर्ण, दुर्योधन जैसे वीरों को उस तरह से मारा जो युद्ध-संहिता के अनुसार अनीतिपूर्ण था. इसके लिए उन्हें कृष्ण ने उकसाया, वरना अर्जुन समेत पांचों पाण्डव ऐसा करने से बार-बार हिचक रहे थे. युद्ध शुरू होने से पहले पाण्डवों की माता कुन्ती ने भी कहा था--- हे शत्रुहर्ता ! तुम्हारे विचार से, जो कुछ उनके (पाण्डवों) लिए उत्तम हो, तुम करो. पर ध्यान रहे, धर्म की कोई हानि नहीं होनी चाहिए और कोई छल-कपट भी न हो.”….लेकिन कृष्ण धर्म की परवाह किए बिना, रणनीतिके नाम पर इसका उल्टा ही करने की सलाह देते हैं----हे पाण्डु-पुत्रों, नीति को परे रख, येन-केन-प्रकारेण विजय प्राप्त करो.
               
कर्ण की मृत्यु के बाद युद्ध लगभग समाप्त हो चुका था. हताश दुर्योधन रणक्षेत्र से निकल पास की ही एक झील पर चला जाता है. वहीं पर वह शान्तिपूर्ण जीवन बिताने का संकल्प लेता है. माया के प्रयोग से झील के पानी को ठोस बना देता है और उसके अन्दर प्रवेश कर जाता है. लेकिन पाण्डव उसे ढूढ़ लेते हैं. भीम उसे गदायुद्ध के लिए ललकारते हैं. दोनों में युद्ध होता है. दुर्योधन को गान्धारी क वरदान था कि उसकी मृत्यु तभी हो सकती है, जब कोई उसकी जंघा पर प्रहार करेगा. गदायुद्ध की नियमावली में नाभि से नीचे प्रहार करना वर्जित है. युद्ध में दुर्योधन भीम पर भारी पड़ता जा रहा था. तब कृष्ण ने अनीति का सहारा लिया. उन्होने अर्जुन से भीम को इशारा करवाया कि दुर्योधन की जंघा पर प्रहार करो. भीम ने वैसा ही किया.
        
युद्ध के अठारवें दिन रणक्षेत्र में मरणासन्न पड़ा हुआ दुर्योधन कृष्ण को इस पूरे युद्ध में, उनके द्वारा किए गए सारे छल गिनवाता है----- हे कंस के दास के उत्तराधिकारी ! इस तरह अनीतिपूर्ण ढंग से मुझे मार गिराने में क्या तुम्हें किंचितमात्र भी शर्म नहीं आई ? तुम्हें क्या ज़रा भी श्म नहीं कि तुमने उन सारे राजाओं को छलपूर्वक मरवा डाला जो युद्ध में नीतिपूर्वक व बड़ी वीरता से लड़ रहे थे. शिखण्डी को सामने रख कर तुमने हमारे पितामह का वध करवाया. अश्वत्थामा नामक हाथी के मारे जाने पर भी तुमने दुष्टतापूर्ण व्यवहार किया. फिर जब शोकाकुल हो हमारे गुरु द्रोण ने अपना धनुष भूमि पर रख दिया , तब भी तुमने उस नीच धृष्टद्युम्न को उन्हें मार गिराने से नहीं रोका. और फिर तुमने मानवों में श्रेष्ठ कर्ण जैसे योद्धा को उस समय मरवाया जब वह कठिनाई में था व कीचड़ में धँसे अपने रथ के पहिए को निकाल रहा था.यदि तुम कर्ण, भीष्म, द्रोण व मेरे साथ नीतिपूर्वक लड़े होते तो निश्चय ही विजय तुम्हारी कभी न होती.
                
आइए देखते हैं कि महाभारतकालीन युद्ध-संहिता क्या कहती है. इन नियमों का विस्तृत विवरण महाभारत के भीष्म पर्व में मिलता है. इसके अनुसार----युद्ध में वाणी के सहारे लड़ रहे योद्धा का प्रत्युत्तर वाणीसे ही दिया जाना चाहिए. रणक्षेत्र छोड़ चुके व्यक्ति को नहीं मारा जाता. रथी, रथी से ही लड़ेगा. हाथीसवार, हाथीसवार से, घुड़सवार, घुड़सवार से और पैदल सैनिक, पैदल सैनिक से लड़ेगा. उपयोग, वीरता, शक्ति व आयु के अनुसार किसी को किसी पर भी वार करने की अनुमति है, पर पहले उसे चेताया जाना चाहिए. जो असतर्क है, कठिनाई में है या अन्य से युद्धरत है, या किसी और दिशा में देख रहा है, या निःशस्त्र है, या जिसके अस्त्र-शस्त्र खत्म हो गए हैं, उन पर वार नहीं किया जाता. सारथियों, अस्त्र-शस्त्र सहायकों, शंख और नगाड़े बजाने वालों पर वार नहीं किया जाता. सूर्यास्त के बाद युद्ध रोक देना चाहिए.
                 
महाभारत की यह युद्ध-संहिता बहुत कुछ मध्यकालीन कैथोलिक चर्च की रण-संहिता के नियमों से मिलती-जुलती है. कैथोलिक चर्च का धर्मयुद्ध मुख्यतः दो नियमों पर आधारित हैविभेद का नियम, और आनुपातिकता का नियम. विभेद का नियम यह बताता है कि युद्ध के दोरान वैध लक्ष्य कौन-कौन से हैं. यानी एक सैनिक युद्ध में जिन्हें निशाना बन सकता है. आनुपातिकता का नियम यह बताता है कि किसी समय में कितना बल-प्रयोग नैतिकता के तकाज़े से सही होगा. इन नियमों के बावजूद हमेंशा युद्ध में नियमों का उल्लंघन होत रहा. हर युद्ध इस बात के लिए अभिशप्त है कि उसमें कुछ निर्दोष लोगों को भी हानि होती है. अमेरिकी सैन्य शब्दावली में इसे कोलैटरल डैमेजयानी समानांतर क्षति कहा जाता है.
        
किसी महानायक द्वारा येन-केन-प्रकारेण, छल-कपट से विजय प्राप्त करना कोई असामान्य बात नहीं है. महाभारत युद्ध के दौरान, पूरे समय कृष्ण पाण्वों को यही समझाते रहे कि आपने अनीति के विरुद्ध धर्मयुद्ध शुरू किया है, तो अब इसे किसी भी हाल में जीतना होगा. युद्ध शुरू होने के बाद केवल एक ही बात महत्वपूर्ण रह जाती है, वह है विजयश्री. दुनिया भर के युद्धवादीभी समय-समय पर यही तर्क देते रहे हैं. युद्ध,जायज़ है या नाजायज, इसका विचार युद्ध शुरू होने के पहले किया जाता है.
         
यद्यपि महाभारतकार की स्पष्ट सहानुभीति पाणडवों के पक्ष में रहती है क्योकि कौरवों ने उनके साथ अन्याय किया राज-पाट तो हड़प ही लिया था, लाक्षाग्रह में उन्हें जलाकर मारने की भी कोशिश की. लेकिन कृष्ण की अवसरवदिता की वह निन्दा भी करता है. एक तरफ महाभारत, कृष्ण के दैवीय स्वरूप की भी स्थापना करता है, तो दूसरी ओर उनके सांसारिक व्यवहार को भी परिभाषित करता है. दरअसल महाभारत में कृष्ण के दैवीय और सांसारिक पक्षों का अद्भुत संतुलन है. पूरे महाकाव्य में लगातार एक नैतिक दुविधा बनी रहती है. यह दुविधा है—ईश्वर और मनुष्य की, साध्य और साधन की. कृष्ण यदि देवाधिदेव हैं तो फिर मनुष्यों की तरह उनका कपटपूर्ण व्यवहार क्या उचित है ? किसी धर्मानुकूल साध्य को पाने के लिए क्या धर्मविरुद्ध साधन अपनाए जा सकते हैं ?? स्पष्ट रूप से महाभारत में साधन, साध्य पर भारी पड़ते दिखते हैं.
         
अंत में यह देखना अनिवार्य हो गया है कि महाभारत में कृष्ण की तरफ से होने वाली अनीति के पक्ष में कौन से तर्क हैं. खुद कृष्ण, महाकाव्य के कुछ पात्र, और परिस्थितियां इन दुविधाओं का जवाब देने की कोशिश करती हैं. हिन्दू-मान्यताओं के अनुसार भारत में काल के शास्त्रीय बोध के परिप्रेक्ष्य में लगातार धर्म की अवनति हो रही है. धर्म के चार स्तम्भ थे प्रारंभिक काल-सतयुग में. उसके बाद आने वाले हर युग में धर्म का एक-एक स्तम्भ ढहता गया और अधर्म बढ़ता गया. कुछ देवताओं को धरती से अधर्म खत्म करके फिर से सतयुग लाने का दायित्व सौंपा गया. उन्हीं में से एक विष्णु भी थे, जिन्होने कृष्ण के रूप में मनुष्य जन्म लिया. यानी महाभारत, पृथ्वी को अधर्म से मुक्ति दिलाने की एक वृहद् योजना का हिस्सा भर था.
         
उत्तंक ने जब कृष्ण को याद दिलाया कि आप तो ईश्वर हैं, आप इस नरसंहार को रोक सकते थे. तब कृष्ण ने सफाई दी थी कि मैने मनुष्य के रूप में जन्म लिया है, इसलिए मेरा आचरण मनुष्य के बुद्धि और आचरण की सीमाओं के भीतर ही हो सकता है. चौपड़ के खेल में जब द्रौपदी को अपमानित किया गया तो द्रौपदी ने कहा था----मुझे लगता है कि कालचक्र अपनी धुरी से उखड़ गया है.....इस प्राचीन सनातन धर्म का पालन कौरव नहीं कर पाए.चौपड़ के खेल का यह आयोजन और द्रौपदी का कथन इशारा कर रहे हैं कि दरअसल कलियुग समय-पूर्व आ गया है. और अनीति-अधर्म का बोलबाला है. कृष्ण भी दुर्योधन के आरोपों के जवाब में यही कहते हैं. ऐसे युग में जहाँ धर्म का पतन हो चुका हो, युद्ध में न्याय-संगत होने के लिए उन्हें छल-कपट का सहारा लेना पड़ा. कलियुग के इस दूषित समय में धर्म की रक्षा हेतु उन्हें एक बड़े न्याय की खातिर छोटे-छोटे छलकरने पड़े.
          
और भारतीयों ने कृष्ण के इस युग-शोधन के तर्क को स्वीकार भी कर लिया. वो स्पष्ट रूप से यह मानते हैं कि कृष्ण हैं जहाँ, धर्म है वहाँ; धर्म है जहाँ, विजयश्री है वहाँ.साफ है कि हमारे लिए कृष्ण का आचरण ही धर्म है. अर्जुन को गीता का उपदेश देते हुए यही घोषणा कृष्ण भी करते हैं. भारत का श्रद्धालु कहता है कि यह संसार तो एक मंच है, जहाँ प्रभु अपनी लीला रचते हैं. मनुष्य तो ईश्वर के खिलौने हैं. इसीलिए भारतीय जनमानस में हमेशा का वह रूप ही ताकतवर रहा, जिसमें उनकी बाल-लीलाएँ और रासलीला है.
              
बहुत आश्चर्य होता है कि जो कृष्ण माखन चुराता है, गोपियों के वस्त्र लेकर छुप जाता है, वह गीता का गंभीर योगी कैसे हो जाता है ! यही कृष्ण के व्यक्तित्व की निजता है. यही वह विशेषता है जिससे कृष्ण हमारे इतने नज़दीक लगते हैं. विरोधों का समागम हैं कृष्ण. हमारा सारा जीवन ही विरोधों पर खड़ा है. लेकिन इन विरोधों में एक लय है. एक प्रवाह है. सुख-दुख, बचपन-बुढ़ापा, रोशनी-अँधेरा, जन्म-मृत्यु----ये सब विरोधी प्रत्यय हैं, लेकिन एक लय में बंधे होते हैं. इसी लय में जीवन संभव होता है.