
एक अनुमान के मुताबिक भारत की पचास
प्रतिशत स्कूलें बिना शाला-भवनों के अथवा अनुपयुक्त भवनों में चल रही हैं. बच्चे
ज़मीन पर बैठते हैं, पेयजल की व्यवस्था भी नहीं है और बिजली-पंखे तो बहुत दूर की
बात हैं. अतः इन विद्यालयों में शिक्षा के उच्च लक्ष्यों के प्राप्ति की बातें
करना बेमानी है. शेष पचास प्रतिशत में अधिकांश निजी स्कूल हैं, जिनमें फीस अधिक
होने और कठिन प्रवेश परीक्षा के कारण केवल उच्च वर्गीय बच्चे पहुँचते हैं. जबकि
संविधान प्राथमिक शिक्षा मुफ्त उपलब्ध कराने को कहता है और यशपाल समिति नर्सरी
कक्षाओं में प्रवेश-परीक्षा की परंपरा को बंद कराने की शिफारिश करती है. आलम यह है
कि स्कूलों में प्रवेश के लिए बच्चों के साथ-साथ अभिभावकों का भी टेस्ट लिया जा
रहा है. उधर यशपाल समिति बस्ते का बोझ कम करने और होमवर्क बंद करने को कहती है, और
इधर बच्चे धोबी के गधे बनाये जा रहे हैं तथा माता-पिता बच्चे के होमवर्क के साथ
जूझते दिखते हैं. नीति कहती है कि स्कूलों में खेल का मैदान अवश्य हो, तो असलियत
ये है कि आधी स्कूलों के पास मैदान नहीं हैं तो आधी स्कूलें मैदानों में ही लगती
हैं. एक और विडम्बना है कि छोटे बच्चों को ज्यादा योग्य शिक्षकों की जरूरत होती है
लेकिन उन्हें सबसे कम योग्यता वाले शिक्षक मिलते हैं. स्कूली शिक्षा उद्देश्यहीन
है, यह हमारी व्यावहारिक जरूरतों को पूरा
नहीं करती. कई लोगों की राय है कि प्राथमिक स्तर के शिक्षकों के लिए
मनोविज्ञान का अध्ययन अनिवार्य होना चाहिए और प्राथमिक स्तर पर सिर्फ प्रायोगिक
शिक्षा दी जानी चाहिए.


बहुत समय से भारतीय शिक्षा में एक
प्रयोग करने का विचार चल रहा है—यौन शिक्षा देने का. भारतीय मानस इस पर इतना
सकुचाया हुआ है कि वह बात करने में बी लजाता है. अधिकांश लोग यौन-शिक्षा के पक्ष
में नहीं हैं, और जो पक्ष में हैं, वे भी नाम गुप्त रखने की शर्त पर ही बातचीत के
लिए तैयार होते हैं. यौन-शिक्षा को लेकर कुछ भ्रम लोगों के मन में हैं. खासे
पढ़े-लिखे लोग भी यह सोचते हैं कि यौन-शिक्षा जब दी जायेगी तो उसमे अश्लील साहित्य
के चक्रवर्ती लेखक मस्तराम जैसी भाषा का उपयोग किया जायेगा और उसके बाद बच्चों को
अभ्यास के लिए खुला छोड़ दिया जायेगा. अथवा इन्हें डर है कि इनके जीवन के अत्यन्त
अन्तरंग और गोपन रहस्य बच्चों के सामने खुल जायेंगे !!. शिक्षक
भी दुविधा में हैं कि उस तरह की ‘गन्दी
बातें’ वे कैसे पढ़ायेंगे.
यही वज़ह है कि यौन-शिक्षा के पक्ष में जनमत नहीं बन पा रहा है. लोग यह नही समझ पा
रहे हैं कि यौन शिक्षा, जीव-विज्ञान के विषय के रूप में होगी और मनुष्य की जनन
क्रियाओं का विवेचन उसी तरह किया जायेगा जैसे नाक-कान अथवा हृदय के कार्यों का
किया जाता है. और यह वैसा ही नीरस और अनुत्तेजक होगा जैसे शरीर के अन्य अंगों का
होता है.
सरकारों की भी अपनी मज़बूरी है. कोई
परीक्षा पास करके तो सरकार बनती नहीं है. सरकार बनती है राजनीतिक प्रक्रिया से.
इसलिए सरकार के लिए अपने राजनीतिक हित ही सर्वोपरि होते हैं. शिक्षा का क्षेत्र भी
अब राजनीतिक लाभ के क्षेत्र के रूप में पहचान लिया गया है. जो पैसा स्कूलों की दशा
सुधारने और अच्छे शिक्षकों के लिए खर्च किया जाना चाहिए उसे सरकार बच्चों और उनके
अभिभावकों में बाँट रही है. देखिए कैसी विडम्बना है कि जिस स्कूल में भवन नहीं है,
पानी की सुविधा नहीं है, शिक्षक नहीं हैं, उसी स्कूल का हर छात्र पाँच से सात हजार
रुपये छात्रवृत्ति-साइकिल-गणवेश-भोजन-किताबों के बहाने पा रहा है. हकीकत ये है कि
ये पैसे छात्रों के अभिभावक अपने उपयोग में खर्च
करते हैं. सरकार यह समझती है कि विश्व बैंक और यूनिसेफ से मिले इन पैसों से
उसने अपने वोट बैंक को और मजबूत कर लिया है. गांवों की हालत इतनी खराब है कि वहाँ
लोग बच्चों को पढ़ाने की ज़गह मज़दूरी में लगाना ज़्यादा ठीक समझते हैं, कम से कम
दो वक्त की रोटी तो जुट सकेगी. छात्रवृत्तियाँ लेने के लिए बच्चों का नाम स्कूल
में लिखवा ज़रूर देते हैं, लेकिन ये बच्चे कभी-कभार ही स्कूल जाते हैं. कागज़ पर
हिसाब-किताब दुरुस्त रखा जाता है और विश्व बैंक और यूनिसेफ तक बढ़िया चमचमाती
रिपोर्ट पहुँचती है हमारे विकास की.
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