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Sunday, 6 March 2016

अज्ञेय के सौ बरस

यह वर्ष बहुआयामी रचनाकार अज्ञेय का जन्म शताब्दी वर्ष है.अपने समय से आगे चलने वाले, अबूझ,अद्वितीय और सर्वाधिक विवादित लेखक सच्चिदानन्द हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय हिन्दी साहित्य में अपने सजग, अन्वेषी सृजनधर्मिता के कारण आधुनिक भावबोध के अग्रदूत के रूप में स्थापित हैं. अज्ञेय ने अपनी तात्विक दृष्टि से विभिन्न साहित्यिक विधाओं के सृजन और अन्वेषण को नए आयाम दिया. वास्तव में अज्ञेय को समझे बिना बीसवीं शताब्दी के हिंदी साहित्य के बुनियादी मर्म,उसके आत्मसंघर्ष, उसकी जातीय जीवनदृष्टि और उसके आधुनिक पुनराविष्कार को समझ पाना कठिन है.
हिंदी के वैचारिक,सृजनात्मक आधुनिक साहित्य पर अज्ञेय की गहरी और अमिट छाप है.             

परम्परा,प्रयोग और आधुनिकता ऐसे विषय हैं, जिन्होंने हिंदी जगत में कुछ बुनियादी परिवर्तन किये, अज्ञेय ने इन विषयों पर हिंदी में जितना सार्थक, सजग और रचनात्मक लेखन और चिंतन किया, उतना किसी अन्य ने नहीं. वस्तुतः हिंदी में परम्परा और आधुनिकता को सदैव अलग-अलग वैचारिक आयामों से मापा जाता रहा, लेकिन अज्ञेय ने इस धारणा को स्पष्ट रूप से खंडित किया, उनका मानना है परम्परा बदलती हुई परिस्थितियों के अनुरूप परिवर्तित होकर निरंतर जब नवीन होती जायेगी ,तभी उसकी प्रासंगिकता है. परम्परा और प्रयोग दोनों एक दूसरे से संपृक्त हैं. इन दोनों का संबंध ही जहा परम्परा को उसकी रुढिवादिता से आगे ले जाकर उसका पुनर्संस्कार करता है, वहीँ प्रयोगों की अनिवार्यता भी सिद्ध करता है.इस तरह कवि के लिए सिर्फ परम्परा नहीं, उसका अपने युग के अनुरूप परिष्कार भी जरुरी है. परम्परा एक व्यापक अनुभव के रूप में समकालीन लेखक और साहित्य के लिए सार्थक महत्व रखती है, इसीलिए साहित्य में नए आयामों का प्रस्तुतीकरण और निर्वैक्तिकता बिना परम्परा के  विशद ज्ञान के प्राप्त नहीं हो सकता और इस परम्परा का आगे के सार्थक उपयोग के लिए नए प्रयोगों की आवश्यकता होती है.                                                                                                                                                      
वास्तव में नई अनुभूतियों का स्वीकार और पुराने भाव – संयोजनो की रुढिवादिता  का त्याग अथवा उनके प्रति विद्रोह का भाव ही प्रयोग की आवश्यकता  को जन्म देता है. इसे ऐसे भी कहा जा सकता है कि जब रागबोध का स्वरुप जटिल हो जाता है तो उसके सहज सम्प्रेषण के लिए नए प्रयोगों की जरुरत होती है, यदि अज्ञेय की इस बात पर ध्यान दिया जाये ‘हमारे मूल राग-विराग नहीं बदले,उनको व्यक्त करने की प्रणाली बदल गयी है’ तो यह स्पष्ट होगा कि कलाकार की संवेदनाएं तभी जटिल रूप धारण करती हैं जब परवर्ती युगीन वास्तविकताओं से हमारे  मूल राग-विराग टकराते हैं. जैसे-जैसे ये वास्तविकताएं परिवर्तित होती जाती हैं, वैसे-वैसे रागात्मक संबंधो के व्यक्त करने की प्रणालियाँ भी बदलती जाती हैं,न बदले तो वास्तविकता से उनका संबंध टूट जाता है. प्रयोग एक सामाजिक आवश्यकता है और विकास का रास्ता भी वहीँ से गुजरता है. साहित्य की सार्थकता के लिए भी ऐसे परिवर्तनों की जरुरत होती है,                                                                           

जिसे तथाकथित प्रयोगवाद कहा जाता हैऔर अज्ञेय दूसरा  सप्तक की भूमिका में जिसका जोरदार रूप  से खंडन कर चुके थे उसमे आरम्भ से ही परम्परा के प्रति विद्रोह और प्रयोग पर बल देने का भाव देखा जा सकता है, अज्ञेय स्वंय लेखकों को परम्परा से हट कर सृजन के लिए एक नया मार्ग तलाशने पर जोर देते. अपने लिए भी वो यही कहते हैं -

मेरा आग्रह भी नहीं रहा
कि मैं चलूँ उसी पर
सदा पथ कहा गया, जो
इतने पैरों द्वारा रौंदा जाता रहा कि उस पर
कोई छाप नहीं पहचानी जा सकती थी
                                            (अरी ओ करुणा प्रभामय) 
अज्ञेय परम्परा को उसके समूचे रूप में ग्रहण करने के विरोधी हैं, क्योंकि परम्परा में न तो सब मूल्यवान है और न ही सारा कुछ व्यर्थ. यह रचनाकार के उपर निर्भर करता है कि वह उसमे से अपनी रचना के लिए क्या लेता है, क्या आत्मसात करता है. आत्मनेपद में वह कहते हैं – ऐतिहासिक परम्परा कोई पोटली बाँध कर रखा हुआ पाथेय नहीं है जिसे उठा कर हम चल निकले.वह रस है, जिसे बूँद-बूँद अपने में हम संचय करते हैं – या नहीं करते, कोरे रह जाते हैं.  इस टिप्पणी से स्पष्ट है कि अज्ञेय जहाँ एक तरफ परिस्थिति निरपेक्ष परम्परा  को स्वीकार नहीं करते, वहीँ दूसरी तरफ परिस्थिति के सम्मुख समर्पण कर देने के बजाय  परम्परा का सामर्थ्य इसमें मानते हैं कि वह नई परिस्थितयों का किस हद तक सामना कर सकती है, सामना करने और टकराने की यह स्थिति ही परम्परा का विकास या उसका नवीकरण है.
                                     
परम्परा को आत्मसात करना, उसको समय सापेक्ष बनाने के लिए प्रयोग की आवश्यकता और इन दोनों के समायोजन से आधुनिक रचना-दृष्टि की उत्पति; अज्ञेय के समूचे साहित्य की बुनियाद और प्रस्थान-बिंदु है..उनके लिए आधुनिकता का अर्थ परिस्थितियों के परिवर्तन के साथ नई प्रक्रियाओं का हिस्सा बन जाना है. इस प्रकार एक संवाद जो निरंतर परम्परा और वर्तमान के बीच चलता रहता है, वहीँ आधुनिकता को जन्म देता है. 

आधुनिकता का अर्थ अज्ञेय के लिए सिर्फ सामाजिक रूप से मूल्यनिरपेक्ष  हो जाना नहीं है, बल्कि उनका मानना है कि उन मूल्यों के प्रति सजग होने की हमारी ज़िम्मेदारी बढ़ जाती है, लगातार उनका परीक्षण करते रहना हमारा कर्तव्य हो जाता है.  वस्तुतः जैसे-जैसे कालबोध परिवर्तित होता है, वैसे ही बहुत सी चीजों के साथ हमारे संबंध भी अनिवार्य रूप से बदल जाते हैं जैसे इतिहास के साथ, सामाजिक परिवेश के साथ, तंत्र-श्रम और पूँजी के साथ, शासन-सत्ता एवं कला-साहित्य के साथ.

                                                         
इस तरह से देखा जा सकता है अज्ञेय के लिए परम्परा, प्रयोग और आधुनिकता तीनों एक दूसरे से संपृक्त होकर ही अपनी सार्थकता सिद्ध करते हैं,जो परिवर्तन  और नयेपन के लिए अनिवार्य है. नए संवेदना बोध के साथ सम्प्रेषण की पद्धतिया भी बदले, साहित्य और रचनाकार की प्रासंगिकता इसी से बची रह सकती है. आधुनिकता सम्बन्धी चिंतन अज्ञेय के लिए महज पश्चिमी नक़ल नहीं है, बल्कि वह स्वस्थ परिवर्तनों के अनुकूल रह कर उसे आत्मसात करने की प्रक्रिया है.वह आधुनिकता के संस्कार के लिए परम्परा की जड़ो तक लौट कर जाते हैं .अज्ञेय अपनी रचनाधर्मिता, अपने चिंतन से साहित्य को नई दिशा और दशा देते हैं और इस तरह से अपनी प्रासिंगकता को सिद्ध करते हैं.वास्तव में इस शती में जिन लोगो ने हिंदी साहित्य की स्थिति और नियति का निर्धारण किया है, उसमे अज्ञेय सर्वोपरि हैं.
विमलेन्दु                        
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Tuesday, 4 August 2015

मैं धर्म के अविरुद्ध काम हूँ !

मैं धर्म के अविरुद्ध ‘ काम ‘ हूँ !

              
              यह उद्घोषणा गीता के सातवे अध्याय के ग्यारहवें श्लोक में श्रीकृष्ण कर रहे हैं. मेरे भीतर कृष्ण का यह उद्घोष उसी दिन से धीरे-धीरे बजने लगा है, जिस दिन से फगुनहटी हवा चलने लगी. यह वसन्त के आने की मुनादी थी जो हवाओं में बज रही थी. यह मदनोत्सव की ऋतु है, जो सरसो के खेतों में उतर आयी है. यह सृजन का अनुनाद था जो आम और अशोक के पेड़ों में गूँज रहा है. जैसे-जैसे होली नजदीक आने लगी , मन कुछ और का और होने लगा. सिर्फ मेरा ही नहीं, प्रकृति के सभी चर-अचर कुछ और ही रंग में दिखने लगते हैं---

                                       औरैं भाँति कोकिल, चकोर ठौर-ठौर बोले,
                                       औरैं भाँति सबद पपीहन के  बै गए ।
                                       औरैं रति, औरैं रंग, औरैं साज, औरैं संग,
                                       औरैं बन, औरैं छन, औरैं मन ह्वै गए  ।।

वसन्त की यही असली पहचान है कि हम कुछ और का और हो जाते हैं. यह और हो जाना, जितना बाहर दिखता है, उससे भी ज़्यादा भीतर होता है. इस बदलाव की ठीक-ठीक पहचान भी कहां हो पाती है. बस अभिलाषाओं, आकांक्षाओं का एक ज्वार उमड़ता रहता है गहरे कहीं. कालिदास कहते हैं कि वसन्त आता है तो सुखित जन्तु (चैन से रहने वाला आदमी) भी न जाने किसके लिए पर्युत्सुक (बेचैन ) हो उठता है. जहां भी कुछ सुन्दर दिखा, मन बहक जाता है.

                   वसन्त 'काम' की ऋतु है और होली उद्दाम काम का उत्सव, प्राचीन भारत में वसन्त उत्सव काम-पूजा का उत्सव था. भारतीय सन्दर्भ में 'काम ', फ्रायड-युंग आदि के ' लिबिडो ' से अलग है. हमारे यहां काम सिर्फ ऐंद्रिक संवेदन नहीं है. हमारा काम दमित वासना की तुष्टि से आगे एक सर्जनात्मक आवेग है. यह हमारे जीवन का केन्द्रीय तत्व है. हमारे काम में थोड़ा मान, थोड़ा अभिमान, थोड़ा समर्पण, विपुल आकर्षण और सर्वस्व दान का भाव है. हमारी समस्त कलाएँ, राग-विराग, ग्रहण-दान, हमारे 'काम' से ही संचालित होते हैं.

                   हमारे धार्मिक ग्रन्थों में काम को परब्रह्म की एक विधायी शक्ति के रूप में माना गया है. यह परब्रह्म की उस मानसिक इच्छा का मूर्त रूप है, जो संसार की सृष्टि में प्रवृत्त होती है. इसीलिए कृष्ण कहते हैं---" धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोस्मि भरतर्षभ । "---मैं जीवमात्र में धर्म के अविरुद्ध रहने वाला 'काम' हूँ. साफ है कि जो इच्छा धर्म के विरुद्ध जाए वह काम का विकृत रूप है. शास्त्र इसे अपदेवता कहते हैं. ब्रह्मसंहिता कहती है कि धर्म के अविरुद्ध रहने वाला काम साक्षात् विष्णुस्वरूप है. यह प्राणिमात्र के मन में  'स्मर ' या काम के रूप में रहता है. काम का यह रूप हमारे भीतर सत्-चित्-आनन्द पैदा करता है.

                    काम का दूसरा रूप है जो धर्म के विरुद्ध जाता है. यह रूप व्यक्ति के विवेक को हर लेता है और उसे उद्दण्ड बना देता है. पश्चिम में काम के देवता ' किउपिद् ' माने जाते हैं, जो अन्धे हैं. यह प्रतीक है पश्चिम के उस विचार का जिसमें माना जाता है कि काम मनुष्य को अन्धा बना देता है. हमारे यहाँ इसी कोटि के मदन देवता हैं जो व्यक्ति को इतना कामातुर कर देते हैं कि अन्धा हो जाता है. शिव ने इसी मादक मदन देवता को भस्म कर दिया था. काम को  'मनसिज ' भी कहा जाता है. यह काम का भावात्मक रूप है. इसे पार्वती ने बचा लिया था. मनसिज, उद्दण्ड नहीं है. इसका स्वरूप सृजनात्मक है. यह सृष्टि का कारक है. यह हमारी शक्ति का स्रोत है. हमारे आनन्द की गंगोत्री है. हमारा काम देह की सीमाओं  का अतिक्रमण कर जाता है. हमारा काम प्रीति का, आह्लाद का, पारस्परिकता का, रसिकता का शिखर है.

                    वसन्त को कामदेव का सखा माना जाता है. हिन्दुस्तान में वसन्त की कोई निश्चित तारीख नही  होती. कवि केदारनाथ सिंह कहते हैं--" झरने लगे नीम के पत्ते, बढ़ने लगी उदासी मन की..."  नीम के पत्ते जब झड़ने लगें, आम बौरा जाएँ, पलाश पर जब अंगारे दहकने लगें और अशोक के कंधे से जब फूल फूट उठें तो समझिए वसन्त आ गया. प्राचीन ग्रंथों में अशोक में फूल खिला देने के बहुत रोचक अनुष्ठानों का वर्णन मिलता है.अशोक के फूलों का खिलना मतलब वसन्त का आना होता था. कालिदास के ' मालविकाग्नि मित्र ' और हर्ष की ' रत्नावली-नाटिका ' से पता चलता है कि मदन देवता की पूजा के बाद अशोक में फूल खिला देने का अनुष्ठान होता था. कोई सुन्दरी शरीर में गहने धारण करके, पैरों में महावर लगाकर नूपुर सहित अपने बांयें पैर से अशोक वृक्ष पर मृदु आघात करती थी.  इधर नूपुरों की हल्की झनझनाहट होती और उधर अशोक उल्लास में कंधे पर से फूट उठता. आमतौर पर यह अनुष्ठान रानी करती थी.

                    हमारा कोई प्राचीन काव्य बिना वसन्त के वर्णन पूरा ही नहीं होता. दरअसल हमारा जीवन ही वसन्त के बिना निरर्थक है. विशेष रूप से संस्कृत का कोई काव्य या नाटक उठाइए, किसी न किसी बहाने उसमें वसन्त आ ही जाएगा. ग़ज़ब तो तब हो गया जब कालिदास ने वर्षा ऋतु के काव्य ' मेघदूत ' में भी वसन्त को नहीं छोड़ा. उसमें भी यक्षप्रिया के उद्यान का वर्णन करते हुए, प्रिया के नूपुरयुक्त वामचरणों के मृदुल आघात से कंधे पर से फूट उठनेवाले अशोक और मुख मदिरा से सिंच कर उठने को लालायित वकुल की चर्चा कर ही दी. कालिदास सौन्दर्य और प्रेम के विलक्षण चितेरे हैं.

                    प्राचीन काव्य ग्रन्थों में वसन्त की महिमा का अक्सर अतिरंजन हो जाता है. वसन्त के प्रति कवियों का मोह इस कदर है कि जयदेव के ' गीत गोविन्दम् ' की पहली ही अष्टपदी वसन्त को समर्पित है----

                                                            ललित लवंगलतापरिशीलन, कोमल मलय शरीरे ।
                                                            मधुकरनिकरकरंबि कोकिल कूजित कुंज  कुटीरे ।।
                                                            विहरति हरिरिह  सरस  वसन्ते  ।
                                                            नृत्यति युवतिजनेन समं सखि विरहिजनस्य दुरंते ।।

( सखी राधा से कहती है---राधे ! सुन्दर दिखने वाले पुष्पों से लदी बेलों के स्पर्श से मादक बनी, मंद प्रवाहित होते मलय समीर के साथ, भौंरों की पंक्तियों से गुंजित तथा कोयलों के संगीत से कूजित कुंजों वाले तथा वियोगियों को संतप्त करनेवाली इस वसन्त ऋतु में प्रियतम श्रीकृष्ण, तरुणी गोपियों के साथ नृत्य कर रहे हैं. )

                    यह नृत्य वसन्त का रास है. इसमें समर्पण और यौवन के आत्मदान का भाव है. इसीलिए सखी ऱाधा को समझाती है कि मान छोड़कर, सब कुछ कृष्ण को अर्पण कर दो.....श्रीकृष्ण रसराज भी हैं. उनकी लय,ताल,यति-गति और मति से एकात्म हो जाओ....यह समय फूलने-फलने का है. यह समय भीतर-बाहर कुछ नया रचने का है. यह नृत्य आत्मोत्सर्ग का नृत्य है. यह समय हवा का हो जाने का है, फूलों का हो जाने का है....यह समय निसर्ग में खो जाने का है.

                    इसीलिए वसन्त ऋतु प्राचीन भारत में उत्सवों का समय होती थी. वात्स्यायन के कामसूत्र में इस समय कई उत्सवों का उल्लेख है. उनमें दो उत्सव सर्वाधिक प्रसिद्ध थे---सुवसन्तक और मदनोत्सव . सुवसन्तक आज का वसन्तपंचमी है, और मदनोत्सव आज की होली. होली का त्यौहार विशुद्ध रूप से उद्दाम काम का त्यौहार है. यह उस मायनों में भारत का त्यौहार है. भारत की संस्कृति से मेल खाता हुआ. यह हर भारतवासी का त्यौहार है. होली की इस व्यापक स्वीकृति का एक कारण यह है कि इसके साथ कोई धार्मिक परंपरा उस तरह से नहीं जु़ड़ी है, जैसी दूसरे भारतीय त्यौहारों के साथ. होलिका दहन की धार्मिक परंपरा अगर है भी तो वह रंग वाली होली के एक दिन पहले हो जाती है, और उसका कोई प्रभाव रंगों पर नहीं पड़ता.

                    प्राचीन भारत में फागुन से लेकर चैत के महीने तक वसन्त के उत्सव कई तरह से मनाये जाते रहे हैं. एक उत्सव सार्वजनिक तौर पर मनाया जाता था तो एक दूसरा रूप कामदेव के पूजन का था. सम्राट हर्ष की ' रत्नावली-नाटिका '  में इस सार्वजनिक उत्सव का बड़ा मोहक चित्र है. मदनोत्सव वाले दिन पूरे नगर को सजाया जाता. नगर की गलियां, चौराहे और राजभवन का प्रांगण नगरवासियों की करतल ध्वनि, संगीत और मृदंग की थापों से गूँज उठते. नगर वासी वसन्त के नशे में मस्त हो जाते. राजा अपने महल की सबसे ऊँची चन्द्रशाला में बैठकर , नागरिकों के आमोद-प्रमोद का रस लेते. यौवन से भरपूर युवतियां, जो भी पुरुष सामने पड़ जाता उसे श्रृंगक (पिचकारी ) के रंगीन जल से सराबोर कर देतीं. राजमार्गों के चौराहों पर चर्चरी गीत और मर्दल नाम के ढोल गूँज उठते. दिशाएँ सुगंधित पिष्टातक (अबीर) से रंगीन हो जातीं. अबीर के उड़ने से राजमार्ग और महल के आसपास ऐसी धुंध छा जाती कि प्रातःकाल का भ्रम हो जाता है. ऐसा लगता  मानो अपने वैभव से कुबेर को भी पराजित करने वाली कौशाम्बी नगरी सुनहरे रंग में डुबा दी गई हो.

                     दूसरा विधान था कामदेव के पूजन का. इसका एक चित्र भवभूति के मालती-माधव प्रकरण में मिलता है. इसका केन्द्र होता था --मदनोद्यान, जो मुख्यरूप से इसी उत्सव के लिए तैयार किया जाता था. यहां कामदेव का मंदिर होता था. नगर के स्त्री-पुरुष इकट्ठे होकर यहां कन्दर्प (कामदेव ) की पूजा और आपस में मनोविनोद करते थे. शिल्परत्न और विष्णुधर्मोत्तर पुराण आदि ग्रंथों में कामदेव की प्रतिमा बनाने की विधियां भी बतायी गयी हैं. कामदेव के बायीं ओर पत्नी रति, और दाहिनी ओर दूसरी पत्नी प्रीति की प्रतिमा बनायी जाती थी. शास्त्रों में काम के बाण और धनुष फूलों के बताए गये हैं. अरविन्द, अशोक, आम, नवमल्लिका और नीलोत्पल--ये उसके पांच बाण हैं. इन्हें क्रमशः  उन्मादन, तापन, शोषण, स्तंभन और सम्मोहन भी कहा गया है.

                     हम भारतवासियों के लिए, कृष्ण को याद किए बिना, न तो वसन्त का कोई अर्थ है और न ही होली का. होली का सर्वाधिक मनभावन चित्र , कृष्ण-कथा में ही मिलता है. कृष्ण के प्रेम में आसक्त गोपियां हर क्षण कृष्ण को अपने पास लाने की जुगत में रहतीं . होली का उत्सव उन्हें यह अवसर देता है. गोपियां कृष्ण का प्रेम चाहती हैं. राधा जलती-भुनती रहती हैं......" भरि देहु गगरिया हमारी, कहे ब्रजनारी ...."---कृष्ण कहते हैं कि पहले पूरा खाली करो ! प्रेम की ऐसी ही गति-मति है.....प्रेम पाना है तो गगरिया पूरी खाली करके जाना पड़ेगा........प्रेम मनसिज है..प्रेम सृजन है..प्रेम उद्दाम है..प्रेम काम है, और काम धर्म के अविरुद्ध है !!

                     

Saturday, 4 July 2015

अंधकार से अंधकार की ओर

अब आप ही बताइये कि इस बात पर हम शर्म करें या गर्व कि भारत की शिक्षा प्रणाली, विश्व में तीसरे नम्बर की सबसे बड़ी शिक्षा-प्रणाली है, और बेरोजगारों को पैदा करने में दुनिया में इसका पहला नम्बर है.

गरीबों का ही देश सही, पर भारतमें कर्ज़ लेकर जीवन-यापन करने को हमेशा नीची नज़र से देखा गया है. हमारी प्राचीन सुक्तियों में कर्ज़ को पाप तक की संज्ञा दे दी गई है. फिर भी छोटे-मोटे कर्ज़ लेना-देना तो बहुत स्वाभाविक दिनचर्या है समाज की. लेकिन शिक्षा के लिए माँ-बाप का कर्ज़दार हो जाने का चलन इस देश में पिछले कुछ ही वर्षों में शुरू हुआ है. दरअसल यह मज़बूरी का चलन है. इस देश में शिक्षा की जो नई व्यवस्था चल निकली है, उसने इसे एक बड़े उद्योग में बदल दिया है. चूँकि शिक्षा अब हमारी बुनियादी ज़रूरत है, इसलिए मध्यवर्ग और निम्न-मध्यवर्ग बच्चों की शिक्षा के पीछे कर्ज़दार हुआ जा रहा है. ये वही देश है जहाँ कृष्ण और सुदामा एक साथ और बराबर की शिक्षा ग्रहण करते थे. बीस साल पहले तक एक भिखारी का भी बच्चा आराम से पढ़ाई कर लेता था. हमारे देश में शिक्षा को लेकर सरकारी स्तर पर एक आत्मघाती किस्म का ठंडापन तो अभिभावकों में दुविधा, इधर के वर्षों में रही है. हमारी अदूरदर्शी नीतियों का ही ये नतीज़ा है कि आज यह चिन्ता की बात बन गई है कि अब इस देश में योग्य वैज्ञानिक, विषय-विशेषज्ञ और कलाकार नही मिल पा रहे हैं. स्कूली शिक्षा बच्चों को व्यावहारिक रूप से अपाहिज बना रही है. विभ्रम के शिकार हमारे शिक्षा मंत्रियों को सरकारी और निज़ी विद्यालयों के बीच की चौड़ी खाई दिखाई नहीं पड़ती. उच्चशिक्षा के लिए माँ-बाप को बैंकों से कर्ज़ लेना पड़ रहा है. जिनकी हिम्मत नहीं पड़ती, उनके योग्य वच्चे भी उपयुक्त  शिक्षा से महरूम रह जाते हैं. जिन IIM’s और IIT’s  पर सारा ध्यान केन्द्रित है सरकार का, वहाँ तक कितने बच्चों की पहुँच है ?

आज़ादी के बाद देश की शिक्षा-प्रणाली पर खूब माथा-पच्ची की गई और निष्कर्ष भी आदर्शवादी निकले. योजनाएँ भी लुभावनी बनीं. लेकिन स्थितियां बिगड़ती गईं. दुनिया को दिखाने और रिझाने के लिए अनिवार्य शिक्षा के लिए अधिनियम बना दिया गया, लेकिन यह नहीं बताया गया कि दुनिया के विकसित और विकासशील देशों के मुकाबले बहुत कम राशि हमारे यहाँ शिक्षा पर खर्च की जाती है. माँ-बाप को कर्ज़दार और बच्चों को निरर्थक बनाने वाली इस शिक्षा-प्रणाली के विकास को समझने की कोशिश की जानी चाहिए.

“………इतने सालों की पढ़ाई मेरे लिए दो जून की रोटी भी नहीं जुटा पाई. माँ-बाप और इस दुनिया पर बोझ बन गया हूँ. आखिर सहने की भी एक हद होती है. बस अब नहीं.........”  यह स्युसाइड नोट था एम.ए. , एल.एल.बी. पास और विगत छः वर्षों से आइ.ए.एस. की तैयारी कर रहे इलाहाबाद के मेधावी छात्र आशुतोष पाण्डेय का. दुर्भाग्य से यह इस तरह की पहली घटना नहीं है. दिल्ली और इलाहाबाद में न जाने कितने मेधावी छात्र आठ-आठ सालों से एक ही कमरे में बन्द एक अदद नौकरी के लिए अपना सब कुछ न्यौछावर  कर चुके हैं. उनमें से अधिकांश अपना मानसिक संतुलन खोकर अपने जनपदों में वापस आ जाते हैं. सवाल यह पैदा होता है कि हमारी शिक्षा-प्रणाली ने हमें किस मुकाम पर पहुँचाया है ? अगर आशुतोष पाण्डेय की तरह आत्महत्या वाला मुकाम ही इसका हासिल है तो ऐसी शिक्षानीति के निर्धारकों को भारतीय दण्ड संहिता के अनुरूप दण्ड क्यों नहीं दिया जाना चाहिए ?लेकिन दण्ड देगा कौन ? क्या हम उस बिल्ली से न्याय की अपेक्षा करें जिसके जिम्मे चूहों के लिए उचित कानून बनाने का काम है ?

यह भी हमारी स्वतंत्रता और इच्छाशक्ति की पोल खोलता है कि आज़ादी के चौसठ साल गुजार लेने के बाद भी हमारे सिर से मैकाले का भूत नहीं उतर पाया है.मैकाले महोदय भारतीय भाषाओं, साहित्य एवं कला को ‘ गँवारू’ मानते थे तथा वे भारत को उस ज्ञान से परिचित कराना चाहते थे जिसे ‘विश्व की सर्वाधिक बुद्धिमान जाति(अँग्रेज) ने रचा है’. उनके अनुसार सम्पूर्ण प्राच्य ज्ञान-भंडार, यूरोप के किसी पुस्तकालय की एक आलमारी में रखे ज्ञान से भी कम है. वे भारत की समस्त देशी शैक्षणिक संस्थाओं को बंद कर, पूरी शिक्षा अँग्रेजी भाषा के माध्यम से, यूरोपीय साहित्य, कला एवं विज्ञान की देना चाहते थे. दरअसल उन दिनों मैकाले सहित अन्य अँग्रेज (वुड, शैडलर, हण्टर), अँग्रेजी शिक्षा के माध्यम से एक ऐसा वर्ग तैयार करना चाहते थे भारतीयों का जो अँग्रेजों का समर्थन करें. मैकाले कहता था---“ हमें इस समय एक ऐसे वर्घ को उत्पन्न करने का भरसक प्रयत्न करना चाहिए, जो हमारे और उन लाखों लोगों के बीच दुभाषिया बन सके जिन पर हम शासन करते हैं.” कहा गया कि सरकार को उच्च वर्ग को शिक्षा देनी चाहिए, जिससे शिक्षा छन-छन कर जनता तक पहुँचे. उन दिनों यह सिद्धान्त ‘ अधोमुखी निस्यंदन’ के नाम से मशहूर हुआ था. उच्च वर्ग से छन-छन कर  कैसी शिक्षा निम्न वर्ग तक आई , हम सब देख ही रहे हैं. हाँ, उन दिनों मैकाले अपनी नीति में सफल हो गया था.हमारे देश में अँग्रेजों के कई भारतीय पिट्ठू तैयार हो गये हैं. मैकाले की शिक्षानीति 1835 में आई थी. भारत में हर साल अप्रैल से जुलाई के महीनों में मैकाले का भूत दिखता है. अँग्रेजी स्कूलों में दाखिले के लिए भारतीय जनता का मध्यमवर्गीय प्रलाप तथा देशी हिन्दी विद्यालयो के छात्रों के हीनभावना से ग्रसित सामूहिक विलाप से ये महीने आक्रांत रहते हैं.सारे अभिभावक और नेतागण ‘एडमिशन’ की राष्ट्रीय समस्या से जूझ रहे होते हैं. भारतीय मध्यमवर्ग की अँग्रेजी स्कूलों के प्रति ललक और हताशा देखते उन्हें अत्यन्त दयनीय दशा में पहुँचा देती है. अँग्रेजी शिक्षा की प्रासंगिकता पर मैं यहाँ फिलहाल बहस नहीं करना चाहता, लेकिन इतना ज़रूर मानता हूँ कि कोई भी बाहरी भाषा अपनी मातृभाषा से ज्यादा ज़रूरी, उपयोगी और प्रासंगिक नहीं हो सकती. फिलहाल ज़ेर-ए-ज़हन जो बात है वह यह कि आखिर क्यों 1835 से चली आ रही शिक्षा-प्रणाली की मूल भावना ही आज भी बनी हुई है, जबकि इतने सालों में दुनिया का मिज़ाज़ कहाँ से कहाँ पहुँच गया है. गुलामी के दिनों की विवशता को स्वीकार कर भी लें, लेकिन आज़ाद भारत में उसी उपनिवेशवादी शिक्षा पद्धति को किस तर्क से स्वीकार करें. कहीं ऐसा तो नहीं कि आज़ाद भारत के शासन की बागडोर, अँग्रेजों द्वारा तैयार किए गये अँग्रेजी परस्त लोगों के वंशजों के हाथ में रहने के कारण इस परंपरा का पोषण होता रहा ? क्या आज के भारत की अँग्रेजी शिक्षण संस्थाएँ, मैकाले द्वारा कल्पित उसी अभिजात्य वर्ग को तैयार नहीं कर रही हैं, जो पब्लिक स्कूल के बच्चों-भारतीय संस्क-ति और साहित्य को घृणा करते हैं ??

Thursday, 4 June 2015

बनारस मण्डली : बिहार मण्डली

ऐसा लगता है कि हिन्दी साहित्य की सल्तनत में, 'बनारस-मण्डली' को 'बिहार-मण्डली' प्रतिस्थापित कर रही है। दिल्ली पर भी बिहार मण्डली का प्रभाव ज़्यादा दिखता है।

कई दशकों तक हिन्दी में बनारस मण्डली का दबदबा रहा है। एक से बढ़कर एक तेजस्वी लेखकों ने हिन्दी की विभिन्न धाराओं को काशी की धारा का पर्याय बना दिया। बिहार में भी शूरवीरों की कतई कमी नहीं थी लेकिन न्यायाधीश की गद्दी बनारस मण्डली के पास ही रहती आई है।

यद्यपि प्रखरता और संवेदना में दोनों मंडलियां एक सी हैं। अपनी जातीय अस्मिता, भाषाई गौरव और देशज संवेदनाओं को, दोनों ही साहित्यिक और कलात्मक रूपाकार देते रहे हैं। अपनी बोलियों और लोकरीतियों को वैश्विक पहचान और सम्मान दिलाया। अड़ना और लड़ना, दोनों मण्डलियों का स्वभाव है। इसके साथ ही बनारस मण्डली और बिहार मण्डली(खासतौर से पटना) के बीच एक प्रतिस्पर्धा हमेशा दिखती रही।

बनारस मण्डली के वर्चस्व का कारण भी था। उन्होंने अपने आपको समकाल के साथ ही विपुल भारतीय मनीषा से जोड़ा। संस्कृत और अपभ्रंस साहित्य को अपना प्रस्थान विन्दु बनाया। इसीलिए शास्त्रार्थ में वे अपने प्रतिद्वंद्वियों से आगे निकलते दिखते रहे।

बिहार मण्डली के पास अपने समकाल से संघर्ष के साथ साथ भविष्य के स्वप्न थे। उनके साहित्य में चिंतन की प्राचीन धारा कम ही दिखती है। यद्यपि भाषा और रूप सौष्ठव उनका भी बनारस मण्डली जैसा ही है।

बनारस मण्डली के अधिकाँश योद्धा अब वानप्रस्थ या सन्यास आश्रम की ओर बढ़ चले हैं। नये लोगों में वह तेजस्विता दिखाई भी नहीं पड़ती। पुराने सारे आचार्य दिल्ली में बस कर विगत हो रहे हैं। कोई रहनुमा भी न बचा ।

दूसरी ओर, बिहार मण्डली ने अपने संघर्षों से एक अकाट्य चातुर्य अर्जित कर लिया। उनकी क्षेत्रीयता और एकजुटता अखण्ड है। उनकी दृष्टि दूर तक जाती है। दृष्टिकोण सदैव स्वहित पर अवस्थित रहता है। उन्होंने बाज़ार के आग्रहों को भी बेहतर समझा है। वे हमेशा आक्रमण की मुद्रा में रहते हैं।

इसीलिए हिन्दी की दिल्ली, अब बिहार मण्डली के हाथ में जाने को है।

Monday, 8 December 2014

प्रेम के पहले दिन

उस दिन हमने
एक दूसरे को
सौंप दी थी अपनी दुनिया
अब मैं उसका एकांत था
और वो मेरी।

हमने अपने चेहरे
सपाट कर लिए
और रगड़ रगड़ कर
मिटाते रहे
उस पर लिखी इबारतें।

उसी दिन
हमने एक बाड़ लगाई
अपने चारों ओर
और खुद को
बेदखल कर लिया
धरती और आकाश से।

हमने भुला दिए सभी स्वाद
आँखों से उतार कर
सभी तस्वीरें
फेंक आए समन्दर में।

बस इतना ही किया
प्रेम के पहले दिन !

Monday, 27 October 2014

वो आदमी

वो आदमी
जो उठ कर अँधेरे मुह
चलता रहता है दिन भर
देर रात
ऐसे लौटता है घर
कि कोई गुनाह करके लौटा हो।

जिसके पसीने में
होती है विद्रोह की गंध
और माथे की सलवटों में
असहमति की लिपि।

जो मित्रों के बीच भी
हँसता नहीं
और भीड़ में
हो जाता है भूमिगत।

बसंत जिसके लिए
एक मौसम परिवर्तन से अधिक
कुछ नहीं।

और कविता
एक परदा है
जिसे गिराकर
वह बदलता है कपड़े।

उस आदमी के बारे में
सबसे दयनीय सूचना यह है
कि उसके खिलाफ
कोई रिपोर्ट दर्ज़ नहीं है
किसी थाने में !

Tuesday, 10 June 2014

जीवन के उत्तरार्ध में

यूँ तो कुछ सीखना

उतना आसान नहीं होता अब

फिर भी मैं
कुछ प्रयत्न करता हूँ
जीवन के उत्तरार्ध में।

असंभव वानप्रस्थ के बीच
मैं एक ऐसा गृहस्थ
बने रहना चाहता हूँ
जो नहीं हुआ किसी हादसे का शिकार
और बचा ले गया पुरखों की पगड़ी।

इसी अवधि में
मैं सीख लेना चाहता हूँ
सीली तीलियों से आग सुलगाना
और राख के ढेर में उसे बचाये रखना
और गठानें खोलने जैसे मामूली काम।

मैं चाहता हूँ
कि निकलूँ जब बाज़ार की तरफ
तो चौंधिआया न करें आँखें
और बचा रहे
दोबारा वहाँ आने का हौसला।

मेरा मन है
कि अब भी सुनाई पड़ें मुझे
चिड़ियों के गीत
और उन्हें मैं
चीखों के अंतराल में
गुनगुना भी लूँ।

लंबी यात्राएँ अब मुमकिन भी नहीं
और ज़रूरी भी
लेकिन कुछ बची रह गई दूरियों को
चल लेने की बेचैनी
खाये जाती है दिन रात।
मैं भटक कर भी
कुछ ऐसे रास्ते खोजना चाहता हूँ
जो इन दूरियों की ओर जाते हैं।

ऐसे तो कोई शौक बचे नहीं अब
और नींद भी
आती नहीं उतने भरोसे की
फिर भी कुछ एक
टूटे फूटे सपनों में
मैं नाव चलाते देखता हूँ खुद को
मेरे साथ एक परछाईं होती है
दोनों जन बैठे हैं
एक एक किनारे पर।

सच पूछिए तो अब
निकालते निकालते चक्रविधि ब्याज
परीकथाएँ लिखने का होता है मन
कि कुछ तो ऐसा छोड़ सकूँ
जिन्हें बच्चे छोड़ सकें
अपने बच्चों के लिए।

जाने कौन यक्ष
रोज़ पूछता है मुझसे प्रश्न
और यह जानते हुए
कि युधिष्ठिर नहीं हूँ मैं
उनके उत्तर खोजना चाहता हूँ
जीवन के उत्तरार्ध में।
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Friday, 6 June 2014

कविता कामिनी के कुटिल कान्त !


हमारे नगर में एक महाकवि हुआ करते हैं।
वयोवृद्ध के अलावा मतिवृद्ध भी हो चुके हैं अब। एक सम्मानित पद पर रहते हुए अब शासकीय सेवा से निवृत्त हो गये हैं

चालीस वर्ष पहले उन्होंने लगभग भीष्म पितामह के टक्कर की एक प्रतिज्ञा कर डाली। देवी सरस्वती को साक्षी मानकर उन्होंने निश्चय किया कि चाहे सूखा पड़े या बूड़ा आये, वे प्रतिदिन तीन कविताओं का प्रसव, आजीवन करते रहेंगे। माता सरस्वती ने अपने इस अद्भुत उपासक पर अपनी कृपा बनाए रखी। महाकवि आज भी बिला नागा कविताओं का उत्पादन किए जा रहे हैं। उनकी प्रतिज्ञा के आधार पर गणना की जाये तो अब तक लगभग 44 हज़ार कविताओं के वे जायज़ जनक बन गये हैं।

महाकवि के कई कविता संग्रह उनकी आलमारी की शोभा बढ़ा रहे हैं। और कई अवतरित होने की कतार मे हैं। सभी संग्रहों का प्रकाशन उनके ही पराक्रम से संभव हुआ। इसके लिए उनके बढ़िया सरकारी पद की उर्वराशक्ति को नकारा नहीं जा सकता। विन्ध्य के एक मध्यकालीन संस्कृत कवि की स्मृति में वे केन्द्रीय मंत्रालय के अनुदान पर एक सालाना कार्यक्रम का आयोजन, सघन जंगल के बीच करते हैं। शरद की यही कमनीय रात्रि उनके नये संग्रहों की सुहागरात होती है।

महाकवि अलंकार-युक्त कविता के पक्षधर नहीं हैं। उनका प्रयास रहा है कि कविता-कामिनी के कलेवर को अलंकारों से मुक्त कर, जीवन और प्रकृति के नजदीक लाया जाय। इसीलिए उनकी कविताओं में ब्रश-मंजन-पाखाने से लेकर संभोग तक के नितान्त सजीव चित्र मिलते हैं। कविता के अलंकारों को एक-एक कर उतारते हुए उन्होंने कामिनी को लगभग निर्वस्त्र कर दिया। अब उनकी कविता प्रकृति के बहुत नजदीक पहुँच चुकी है। उनके कविता-संग्रहों के शीर्षक इस प्रकार हैं---‘अनुभूतियों का सच’, ‘अनुभूतियों का महाज्वार’, ‘अनुभूतियों का अन्तर्जाल’, ‘घास के फूल’ इत्यादि।

अब निरीह पाठकों के बीच एक सवाल हमेशा तनकर खड़ा रहा कि लगभग 44 हज़ार कविताओं के विषय आते कहाँ से हैं !?
हम और आप भले ही स्तंभित हों, लेकिन महाकवि के सामने यह सवाल कभी नहीं खड़ा हो सका।

महाकवि बवासीर के मुस्तकिल रोगी हैं। “वियोगी होगा पहला कवि, आह से उपजा होगा गान....”। इस फार्मूले को थोड़ा सामयिक रंग दे दें---“ रोगी होगा पहला...”----तो महाकवि की प्रेरणाओं का पहला अक्षय स्रोत यही मुआ बवासीर ही लगता है। इसी आह से उपजा होगा गान।
इसके अलावा तीन और स्रोत हैं जहाँ से महाकवि अपनी कविताएँ लाते रहे होंगे।

प्रथम, श्रीहरि ने महाकवि को ठीक उसी तरह की शक्ल-सूरत दी थी, जैसी उन्होंने स्वयंवर के समय देवर्षि नारद की कर दी थी। इसीलिए महाकवि की कविताओं में सौन्दर्य के लिए खुली चुनौती आजीवन बनी रही।

द्वितीय, महाकवि पत्नी-पीड़ित भी थे। उनके पास-पड़ोस के लोग रात में चौंककर उठ जाते थे, जब कवि-पत्नी महाकवि को पीटने लगतीं। कई बार तो वे अल्पवस्त्रों में ही आधी रात भड़भड़ा कर बाहर भागते देखे गए। उपरोक्त परिस्थिति भी कविता के लिए बहुत उर्वर भाव-भूमि तैयार करती है।

तृतीय, सेवानिवृत्त होते ही महाकवि अपने से पन्द्रह वर्ष छोटी एक सद्यःविधवा प्राध्यापिका पर मुग्ध हो गए। वे प्रेम में इतने असहाय हो उठे कि दिन-दिन भर प्राध्यापिका के घर बैठे प्रेम की याचना करते रहते। पर महोदया नहीं पिघलीं। बात कवि-पत्नी तक भी पहुचनी ही थी। तभी वियोग-श्रृंगार घटित हुआ। एक अप्रिय संयोग के चलते महाकवि-प्राध्यापिका-कविपत्नी की मुठभेड़ हो गई। भाव-विभाव-अनुभाव-संचारी भावों का उच्चतम प्रस्फोट हुआ। और महाकवि जब बाहर निकले तो उनके माथे से रक्त-धार  बह रही थी।

महाकवि आज भी पूरे वेग से कविता-कामिनी के कलेवर को अलंकार-मुक्त करके उसे प्रकृतिस्थ करने की अपनी महासाधना में तल्लीन हैं। 


Thursday, 5 June 2014

वन्दे मात्र रम !

ये बात कई साल पहले की हुई।
उन दिनों हम सच में जवान थे। न सिर्फ जवान थे बल्कि कवि भी थे। उन दिनों देखा यह गया था कि अगर किसी डरपोक किस्म के भावुक जवान को इश्क मोहब्बत हो जाए तो उसका मोक्ष कवि-योनि में होता था।

हमने भी एक हसीना से प्रेम किया। प्रेम ही नहीं किया, प्रेम-पत्र भी लिखा। कॉलेज का बसन्त था। हमने प्रेम-पत्र बड़े सलीके से हसीना की साइकिल के ब्रेक-लीवर में फँसा दिया ताकि उसकी नज़र से बच न पाए। उसकी नज़र पड़ी भी। दो दिन बाद उसकी माँ का बुलावा आ गया। हम गए। और जब लौटे तो हमारे भीतर कविता का बीज पड़ चुका था। बाद को मेरे एक दोस्त—जो  मुझसे कुछ ही पहले कवि-योनि में प्रवेश कर चुके थे—ने उसी प्रेम-पत्र को फेर-बदल करके कविता की शक्ल दे दी। वही मेरी पहली कविता थी। एक अंश-----

“ मेरी प्रिय तुम
वक्त से एक लम्हा तोड़कर
ऐसे छुपाता हूँ तुम्हें
जैसे बचपन में
अमावट चुराकर
अम्मा से छुपाता था।“
(दूसरी लाइन गुलज़ार से प्रेरित। आखीर में अमावट और अम्मा में अनुप्रास की छटा !!)

खैर !  बात मुझे कुछ दूसरी ही करनी थी।
कवि हो जाने के बाद हम खूब सक्रिय हुआ करते थे। उन्हीं दिनों कमान्डर कमला प्रसाद के नेतृत्व में हमने समीपी पर्यटन स्थल गोविन्दगढ़ में प्रगतिशील लेखक संघ का एक रचना-शिविर लगाया। झील के बीच बने टापू पर प्रदेश के नवोदित कवियों के साथ, भगवत रावत, चन्द्रकान्त देवताले, मलय, ज्ञानरंजन, प्रमोद वर्मा जैसे कवि/कथाकार/आलोचक तीन दिन तक चर्चा करते रहे।

इस शिविर के आयोजन में गोविन्दगढ़ स्थित पुलिस ट्रेनिंग स्कूल के एसपी महोदय का सहयोग लेना पड़ा। बाद में पता चला कि एसपी साहब साहित्य-प्रेमी ही नहीं, कवि भी हैं।

शिविर सत्रों में चलता था। सारे काम-धाम छोड़कर एसपी साहब एक दयनीय उत्सुकता और एक खूबसूरत सी डायरी लिए समय से पहले ही हर सत्र में उपस्थित हो जाते। एक दो सत्रों तक तो हम समझ नहीं सके। लेकि बाद में समझ आ गया कि ये अपनी कविताएँ सुनाना चाहते हैं। चर्चाओं के दौरान उनका उत्साह देखते बनता था। वो वक्तव्यों पर भी ऐसी दाद उछालते जैसे किसी मुशायरे में बैठे हों ! वाह वाह ! के साथ उनका वही हाथ उठता जिसमें कविताओं वाली डायरी होती। उनकी दाद में इतना घोष होता कि वक्ता भी अचकचा जाता।

खैर दैव-दुर्योग से एसपी साहब को कविताएँ सुनाने का मौका नहीं मिल पाया तो संयोजक कमला प्रसाद चिन्तित हुए। उन्हें लगा कि आदमी यह काम का है। आगे भी जरूरत पड़ सकती है। उन्होंने एक रास्ता निकाल ही लिया। कविता-पाठ तो अब संभव नहीं था। शिविर के समापन सत्र में उन्हें जबरन मेजबान की भूमिका में बाँध दिया गया और गोविन्दगढ़ की धरती पर पधारे देश के मूर्धन्य विद्वानों के प्रति आभार प्रदर्शन की महती ज़िम्मेदारी देकर माइक पर आमंत्रित किया गया।

आमतौर पर आभार-प्रदर्शन की रवायत में अतिथियों के साथ-साथ पत्रकारों, नेताओं, प्रायोजकों, साउण्ड वाले, भोजन व्यवस्था वालों, और स्थानीय गुण्डों के प्रति आभार जता कर बात खत्म कर दी जाती है। लेनिक एसपी साहब जैसे ताक में थे। उन्होने यहाँ भी गुंजाइश निकाल ही थी। कविता तो नहीं सुनाई, लेकिन नायाब चीज़ हमें दी !!

उन्होंने कहा कि कविता पर आप लोगों ने तीन दिनों तक लॉ एण्ड ऑर्डर को तोड़कर जो बलवा किया, उससे मुझे लगा कि मैं भी कुछ बोलूँ। मैं आपके सामने राष्ट्रगीत-‘ वन्दे मातरम्……’ की एक नई व्याख्या पेश कर रहा हूँ----------

एसपी साहब कह रहे थे---“ बंकिमचन्द्र रसिया आदमी थे। इसीलिए उन्होने लिखा---वन्दे मात्र रम।–मैं केवल रम की वन्दना करता हूँ।
सुजलां सुफलां मलयज शीतलाम्।–साथ में स्वच्छ जल हो, कुछ अच्छे फल आदि हों तथा मन्द शीतल हवा बह रही हो, तब यह और प्रभावी हो जाती है !
सश्य श्यामलां मातरम्। --ध्यान रहे, समय शाम का ही होना चाहिए !
शुभ्र ज्योत्सनाम पुलकित यामिनी
फुल्ल कुसुमित द्रुमदल शोभिनीम्।–धवल चांदनी में बौराई रात हो। घर का उपवन हो। आस-पास फूलों की सुगन्ध आ रही हो और आप बोतल खोलकर बैठे हों।
सुभाषिणीम् सुमधुर भाषिणीम्। सुखदां वरदाम् मातरम्।----और अगर सुमधुर कण्ठों वाली कोई सुन्दरी भी साथ में हो तब, अहा !  यह रम आपको अलौकिक सुख का वरदान प्रदान कर देती है !!

एसपी साहब के चेहरे की आभा में मूर्धन्य विद्वत-जन स्तब्ध थे। इसी के साथ शिविर का समापन हो गया।

Friday, 11 April 2014

कामिनी काय कांतारे / महेश कटारे

 

जीवन तो वही वरेण्य हे जो कथा बन सके। 
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भोगों को हमने नहीं भोगा, भोगों ने हमें ही भोग लिया। हमने तप नहीं किया, त्रितापों ने तपा दिया हमें। समय नहीं बीता, हम स्वयं बीत गए....तृष्णा न बुढ़ाई, बूढ़े हुए हम ही।
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स्त्री प्रथमतः और अंततः जननी होती है। वेश्या या ब्राह्मणी के आरोप तो काल और स्थितिगत अवस्थाएँ हैं।
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दुर्लभ पुरुष के प्रति प्रेम है। मन में भारी लज्जा है। और शरीर दूसरे के अर्थात पति के अधीन है। प्रिय सखि ! ऐसी स्थिति में प्रेम बहुत संकट भरा है।
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संन्यास से संसार नहीं चलता। भूख,प्यास,प्रेम,क्रोध,राग,भय आदि प्रकृति प्रदत्त हैं। योगी इन पर विजय पा सकता है, इन्हें मिटा नहीं सकता।

----कामिनी काय कांतारे


एक हफ्ते से मैं इसी उपन्यास के प्रेम में हूँ। ऊपर उद्धरण भी उसी से हैं। महेश कटारे के इस उपन्यास में राजा भर्तृहरि की जीवनकथा है।
यह कथा राग और वैराग के बीच करवटें बदलते जीवन की कथा है। यह राजा भर्तृहरि, भोगी भर्तृहरि, योगी भर्तृहरि, कवि भर्तृहरि, वैयाकरण भर्तृहरि की कथा है। यह कथा ऐसी भाषा में रची गई है, जो हमें चमत्कृत करते हुए सम्मोहित कर लेती है। कथा बुनने की ऐसी तकनीकी जो जासूसी कथाओं जैसी व्यग्रता पैदा करती है। और समापन ऐसा जो हमें मूर्तिवत कर दे।

अब आपको याद आ गया होगा कि भर्तृहरि अवन्ति के राजा हुए थे, जिसे अब उज्जैयिनी कहा जाता है। कहते तो यह भी हैं कि भर्तृहरि ने सात बार वैराग्य धारण किया और लौटकर फिर से गृहस्थ बन जाते। अंत में गोरखनाथ के शिष्य बनकर गृह त्याग दिया। उनके गृहत्याग का दृश्य इतना करुण था कि यह कथा लोकजीवन में आज भी हृदय विदारक रुदन के साथ सुनी और मंचित की जाती है।

अब आपको उस जोगी का स्मरण भी हो आया होगा, जो साल में एक या दो बार सारंगी बजाते कुछ अस्पष्ट सी करुण धुन गाते हुए आपके दरवाजे पर आ जाता था। इस जोगी को भरथरी कहते हैं। भरथरीयानी भर्तृहरि। यह नाम इसलिए इन्हें मिला क्योंकि ये भर्तृहरि के जोगी बनने और पत्नी पिंगला से गृहत्याग की भिक्षा मागने की कथा गाते हैं।

इसी कथा को महेश कटारे ने दो खण्डों और लगभग छः सौ पृष्ठों में अद्भुत कथा-कौशल से रचा है। कुछ इतिहास से, कुछ मिथकों से और कुछ कल्पना से। बिना प्रवाह को बाधित किए लेखक ने प्रेम, काम, वैराग्य, नीति, जैन आचार, नाथ संप्रदाय, ज्योतिष, राजनीति, कूटनीति, आयुर्वेद, स्त्री जीवन, दास जीवन और जन जीवन का प्रमाणिक विवेचन किया है।


सन् 2012 में यह उपन्यास प्रकाशित हुआ था। मुझे संदेह है कि यह कितने पाठकों तक पहुँचा होगा। इसके दो खण्डों की कीमत 830/- रु. है, जो हिन्दी पाठकों को दूर रखने के लिए पर्याप्त है। मैं अंतिका प्रकाशन और श्री गौरीनाथ जी से आग्रह करता हूँ कि इस पुस्तक को जनसुलभ पेपरबैक संस्करण में छापें तो यह और पाठकों तक पहुँच सके।

मध्यकालीन परिवेश में होते हुए भी यह उपन्यास हमें समकालीन जीवन से अप्रत्याशित रूप से जोड़ता है।

Saturday, 29 March 2014

ऐसे तो, समय रुकता नहीं कभी !


ऐसे तो
समय रुकता नहीं कभी
पर उसकी धार के किनारे
हमारा कोई क्षण
ठिठका रह जाता है सालों साल।

दीवार और कलाइयों पर
निशान छोड़ती
घड़ी की सूइयाँ घूमती रहती हैं
और हमारा
छः बजकर तीस मिनट
वहीं खड़ा रहता है अवाक्
ठंड की शाम में भी
माथे पर उभर आये
पसीने की एक परत लिए।

कैलेण्डर बदलता रहता है शताब्दियाँ
लेकिन
अक्टूबर, सत्तान्नवे की
सत्रह तारीख पर
लगाए गए गोले को
नहीं मिटा पाया वह किसी जतन।

सूर्य घूमा
पृथ्वी ने लगाए चक्कर
चन्द्रमा ने बदलीं कलाएँ
हवाएँ, ऋतुएँ बदलती रहीं
और हमारा कोई एक क्षण
हो गया इन सबसे बैरागी।

सूर्य पृथ्वी और चन्द्रमा से
छुपी रह जाती हैं
क्षणों में घटने वाली
खगोलीय घटनाएँ
स्थिर में आने वाले भूकम्प
चरखा चलाने वाली बुढ़िया का रहस्य
और दो खरगोशों की कहानी।

ऋतुओं की खुर्दबीन से
ओझल ही रहता है
हमारे उस क्षण का मौसम विज्ञान।

यह गति में
स्थिरता का सौन्दर्य है
ध्वनि में मौन का नाद
और जीवन के नृत्य में
मृत्यु का स्थायी।

Monday, 10 March 2014

मैं सोशल मीडिया पर, प्रिन्ट मीडिया का कवि हूँ !

[योगेश्वर बोले ही चले जा रहे थे----
मैं प्रकाशों में सूर्य हूँ। वेदों में सामवेद, देवों में इन्द्र, रुद्रों में शिव हूँ। पर्वतों में मेरु, पुरोहितों में बृहस्पति, वाणी में ओंकार, वृक्षों में अश्वत्थ, देवर्षियों में नारद, घोडों में उच्चैःश्रवा, हाथियों में एरावत और सांपों में वासुकि हूँ।
मैं प्रजनकों में कामदेव, अक्षरों में अकार, समासों में द्वन्द्व समास हूँ।

मैं ऋतुओं में वसन्त, छलियों में जुआ, विचारकों में उशना, और रहस्यों में मौन हूँ।

मैं सोशल मीडिया में, प्रिन्ट मीडिया का कवि हूँ ! ] 


--हाँ, मैं कवि-लेखक हूँ. अपने को विशिष्ट, ऊपर और सुरक्षित बनाने के लिए हम क्या-क्या नहीं करते !

--मैं आपकी अच्छी कविता को भूलकर भी like नहीं करता, लेकिन आपकी ऊल-जलूल और बेमतलब पोस्ट पर वाह-वाह कर देता हूँ--ताकि आप धन्यभाग मानकर मेरी प्रशंसा में कभी कमी न रखें।

--मैं अक्सर ऐसी पोस्ट लगाता हूँ जो किसी को समझ न आए !
 और आप एहसासे-कमतरी के मुस्तकिल मरीज़ बने रहें।

--मैं अक्सर महान व्यक्तियों और महान विचारों का धत्-करम करता हूँ !
ताकि छोटे-मोटे जीवधारी तो बम् के धमाके से ही खेत रहें।

--मैं अपनी रचनाएं अपने मित्रों से शेयर करवाता हूँ, और उनकी मैं करता हूँ !
इससे मेरा बडप्पन, भाईचारा और सहिष्णुता असंदिग्ध बनी रहती है।

--मैं बिला नागा, नामालूम कौन सी दुनिया की, कौन सी पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित अपनी रचना की,
अस्पष्ट तस्वीरें व़़ॉल पर लगाते हुए सकुचाता हूँ।

--मैं आए दिन सभा-गोष्ठियों में सदारत करने जाता हूँ !
और यह जानते हुए भी कि आप चार सौ कोस दूर रहते हैं, आपको आमंत्रित करना नहीं भूलता हूँ।

--अब यह कहने की ज़रूरत नहीं है, कि मुझे कवियत्रियों में ज्यादा प्रतिभा और संभावना दिखायी पड़ती है !
आरम्भ में मैं उन्हें छन्द और बहर जैसी, व्याकरण-सम्मत, नितान्त गैर-रूमानी सलाहें दिया करता हूँ।

--मैं अपनी प्रशंसिकाओं से inbox में चैट तभी करता हूँ, जब वो बहुत इसरार करती हैं !
और वहाँ मैं बहुत विषय-निष्ठ रहता हूँ।

--मैं इन अबलाओं को बहुधा, अपने समकालीन दुष्ट कवि-लेखकों से कैसे बचा जाये, के उपाय बताता हूँ।

--मुझे इन सुमुखि ललनाओं की निष्फल जाती प्रतिभा, उकसाने की हद तक प्रेरित कर रही है !
अब मैने निश्चय किया है कि मैं कुछ ही दिनों में संपादक-प्रकाशक बन जाऊँगा।

--लेकिन आप मायूस न हों। मैं इन अबलाओं को उनके मुकाम तक पहुँचा कर फिर लौट आऊँगा साहित्य-सेवा के लिए फेसबुक पर।