Pages

Saturday, 24 September 2011

हम जो हिन्दू हैं...!



 पिछले दिनों जब गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बिना वज़ह उपवास शुरू कर दिया, हमारे मीडिया-खासतौर से इलेक्ट्रानिक मीडिया ने मोदी की महानता के क़सीदे पढ़ना शुरू किया, और देश की जनता ने अपने भावी प्रधानमंत्री के चित्र बनाना शुरू किया, उसी समय फेसबुक में मैने मीडिया पर थोड़ा खीझते हुए, गुजरात में 2002 में हुए साम्प्रदायिक दंगों के दौरान, अल्पसंख्यक समुदाय की स्त्रियों के साथ हुई एक बर्बर और शर्मनाक घटना का उल्लेख किया. इस ज़िक्र के मार्फ़त मैं ये कहना चाह रहा था कि हमारे मीडिया के पास गुजरात दंगों के दौरान मोदी सरकार की भूमिका के अनगिनत साक्ष्य हैं. जलते हुए घरों की तस्वीरें हैं, बिलखते हुए लोगों के बयान हैं—फिर वह मोदी के गुणगान पर क्यों उतर आया है ?

फेसबुक पर इस ज़िक्र के बाद जो प्रतिक्रियायें आयीं उनसे मैं आश्चर्यचकित हो गया. अधिकांश लोगों ने मुझसे ऐसी बर्बर घटनाओं के प्रमाण मागे,जो मैं नहीं दे सकता था. लगभग सबका ये मानना था कि मैं और मेरे जैसे वो लोग जो अल्पसंख्यकों पर हुए अत्याचार की निन्दा करते हैं, वो इसी बहाने मशहूर होने और अपने आप को धर्मनिरपेक्ष साबित करने के किसी अभियान में शामिल हैं. लोगों ने यहां तक कह दिया कि अगर बहुत दर्द हो रहा है उनके लिए तो तुम भी मुसलमान बन जाओ...! मित्रों ने पूछा कि जब मुसलमान हिन्दुओं को मारते हैं तब आप कुछ नहीं कहते, लेकिन जब हिन्दू मुसलमानों को मार देता है तो छाती कूटने लगते हैं.....आप जैसे तथाकथित बुद्धिजीवियों को सिर्फ बहुसंख्यकों के दोष दिखायी पड़ते हैं...कुछ जागरूक पाठकों ने यह भी बताने की कोशिश की कि जो मीडिया चैनल उग्र हिन्दुत्व का समर्थन नहीं करते, उनको विदेशों से फंड और निर्देश मिलते हैं ताकि वो अल्पसंख्यक समुदायों के पक्ष में बोलें. और इन्हीं सब दलीलों के बीच मेरे हिन्दू होने पर भी सवाल उठाये गये....

मैं हिन्दू हूँ, क्योंकि मेरे माता-पिता हिन्दू हैं. मेरे पूर्वज हिन्दू थे. मैं जन्मना हिन्दू हूँ. मैं बहुत राहत और गर्व महसूस करता हूँ कि मेरा जन्म हिन्दू धर्म में हुआ. जितनी व्यक्तिगत स्वतंत्रता, खुलापन और सहिष्णुता हिन्दू धर्म में है, क्या दुनिया के किसी धर्म में है ? यह हिन्दू धर्म में ही संभव है कि हम उसकी रीतियों-परंपराओं को नकारते हुए भी  हिन्दू बने रह सकते हैं. हमें धर्मच्युत करने या हमारा परिष्कार करने का कोई फतवा जारी नहीं होगा. यह हिन्दू धर्म में ही संभव है कि हम नास्तिक हो जायें और अपने ईश्वर पर ही सवाल उठाते रहें और हमें मौत की सज़ा न सुनाई जाये....यह हिन्दू धर्म ही है जिसने बौद्ध और जैन धर्म के प्रवर्तकों गौतम बुद्ध और महावीर को भी ईश्वर का अवतार मान लिया...और अँग्रेजों ने अगर हिन्दू-मुसलमानों के बीच इतनी खाई न पैदा की होती, और विभाजन न हुआ होता तो शायद पैगम्बर हज़रत मोहम्मद साहब भी अवतारों में शामिल कर लिए गए होते...निजता को सम्मान देने वाला इतना उदार धर्म दुनिया में और कौन है ? हिन्दू धर्म ने हमारे सोचने, बोलने, आजीविका के साधन जुटाने पर कभी कोई पाबन्दी नहीं लगाई.

दरअसल गौर से देखने पर पता चलता है कि हिन्दू धर्म की प्रवृत्ति मुक्त करने की रही है. बांधना, संकुचित करना और शासन करना इस धर्म का ध्येय कभी नहीं रहा. हमारे यहाँ चार वेद, एक सौ आठ उपनिषद, अठारह महापुराण,गीता,महाभारत,मानस आदि ग्रंथ, हमारे प्रेरणास्रोत और मार्गदर्शक बने रहे. हिन्दू धर्म ने कभी यह दावा नहीं किया कि इनमें से कोई भी ग्रंथ पहला और अंतिम सत्य है, जैसा कि कुरान और बाइबिल के बारे में कहा जाता है. हिन्दू धर्म ने कभी भी किसी व्यक्ति को धर्म से बाहर नहीं निकाला, चाहे उसने कितना भी गैर-धार्मिक आचरण किया हो. हिन्दू धर्म के पुनर्संस्थापक आदि शंकराचार्य ने देश में घूमकर चार पीठों की स्थापना की. चारों पीठों पर चार शंकराचार्यों को बैठाया, लेकिन उनमे से किसी को भी अधिकार नहीं दिया कि वो कोई फतवा जारी करें...न तो आदि शंकराचार्य ने कभी कोई फतवा जारी किया.

लोकतंत्र, हिन्दू-धर्म के स्वभाव में है. कर्मफल में अडिग आस्था रखने वाले इस धर्म में साधारण मनुष्य तो क्या, देवताओं तक को कोई छूट नहीं दी गयी. यह इसका आंतरिक संविधान है. राम ने सीता के साथ अन्याय किया तो उन्हें अपने ही पुत्रों से पराजित होना पड़ा. सीता धरती में समा गयीं और राम को जीवन भर का पत्नी-वियोग मिला. गांधारी ने कृष्ण को श्राप दिया तो उनकी एक हज़ार सोलह पटरानियों का भीलों ने अपहरण कर लिया और महाबली अर्जुन देखते ही रह गये. अंत में एक बहेलिए ने कृष्ण का वध कर दिया. ब्रह्मा अपनी ही बेटी पर आसक्त हो गये तो उनका हाल देखिए....पुष्कर के अलावा,देश में कहीं भी उनका न मंदिर बना और न ही उनकी पूजा होती. महादेव शंकर को अपने ससुर से ही अपमानित होना पड़ा....ये दृष्टान्त, हिन्दू धर्म की उस मूल-प्रतिज्ञा को पुष्ट करते हैं, जिसमें कर्म को ही सर्वोच्च प्रधानता दी जाती है. यहाँ कर्म ही सर्वश्रेष्ठ पूजा है. इस धर्म में ये संकेत स्पष्ट हैं कि आपका कर्म ही आपकी प्रतिष्ठा का आधार है,धर्म इसमें हस्तक्षेप नहीं करेगा.

हिन्दू धर्म में पैदा होना मुझे जितनी राहत और आश्वस्ति देता रहा है, हिन्दुत्व से मुझे उतनी ही अधिक असहमति और विरक्ति रही है. आप सब भली प्रकार समझते ही हैं कि हिन्दू और हिन्दुत्व में कितना अंतर है !  हिन्दुत्व एक झटके में ही हिन्दू होने के हमारे गर्व, हमारी आश्वस्ति और हमारे औदार्य पर पर प्रश्न-चिन्ह लगा देता है. हम जब अपने धर्म की श्रेष्ठता के  प्रति दुराग्रही हो जाते हैं, तो अपनी श्रेष्ठता को ही खोने लगते हैं. हिन्दुत्व एक वर्चस्ववादी मानसिकता है. आदिकाल से ही इस देश का चरित्र और स्वभाव समावेशी रहा है. बौद्ध,जैन और सिख धर्म यहाँ पैदा हो गये. इस्लाम बाहर से आया और .
यहीं का हो गया. क्या किसी भी दूसरे देश और समाज में आप इतनी उदारता की कल्पना कर सकते हैं !  

इस देश के चरित्र और स्वभाव को बदलने की सुनियोजित और संगठित कोशिश की जा रही है. हिन्दुत्व इस कोशिश का वैचारिक आधार है...आडवानी, मोदी, तोगड़िया, कटियार आदि इसके चेहरे है. यह कोशिश कौन कर रहा है, सबको मालूम ही है. अयोध्या, गुजरात, मालेगांव आदि, हिन्दुत्व की मुखर अभिव्यक्तियां हैं. इन घटनाओं को हिन्दू धर्म से जोड़ना उतना ही ग़लत होगा, जितना मुसलमान आतंकियों की करतूतों को इस्लाम से जोड़ना...

अब कुछ बातें उन आपत्तियों पर जिनका ज़िक्र शुरू में किया था. मेरे मन में पहला सवाल यह था कि क्या वर्तमान की सफलता की चकाचौंध में अतीत में किये गये पापों को भुला देना ठीक है ? आज गुजरात की सफलता और विकास बेशक उल्लेखनीय है. इसका श्रेय मोदी और उनकी टीम के साथ-साथ गुजरात की जनता को दिया जाना चाहिए. दंगों और भूकम्प से हुए विनाश के बाद गुजरात की जनता ने पुनर्निर्माण की जैसी इच्छशक्ति दिखायी, उसने मोदी की राह आसान कर दी. लेकिन उन हज़ारों अल्पसंख्यकों की कीमत पर जो गुजरात से गायब हो गये. चुनाव आयोग ने भी इस बात की पुष्टि की थी कि दंगों के बाद गुजरात में हुए आम चुनाव में तैयार की गई मतदाता सूची से हज़ारों अल्पसंख्यकों के नाम गायब थे. ये कहाँ गये,आज तक किसी को पता नहीं ! दंगों के बाद प्रभावित लोगों को सरकार के राहत शिविरों में रखा गया था, वो सब लापता हैं. गुजरात दंगों के बाद जिन लोगों ने मीडिया के कवरेज़ को खुली आँखों से देखा होगा, वो जानते हैं कि यह दंगा सरकार की शह पर हुआ था. जिन लोगों पर सुरक्षा की ज़िम्मेदारी थी वो खुद लूट,हत्या और बलात्कार में शामिल हो गये थे. तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी ने कहा था कि गुजरात में जो कुछ हुआ वह हमारे लिए शर्म की बात है. हालांकि बाद में दबावों के चलते अटल जी ने अपना बयान बदल दिया था और मोदी की प्रशंसा की थी.

पिछले दिनों जब मोदी ने मीडिया के साथ मिलकर इस देश का प्रधानमंत्री बनने की अपनी महत्वाकांक्षा को ज़ाहिर किया और पूरे देश में जो अव्यक्त स्वीकृति दिखाई पड़ी-वह चिन्ता का सबब है. क्या इस देश के बहुसंख्यकों ने इस देश को एक हिन्दू राष्ट्र की मौन स्वीकृति दे दी है ?  जो लोग धर्मनिरपेक्षता के पक्षधर हैं , वो अल्पसंख्यक और निस्तेज क्यों होते जा रहे हैं ??  धर्मनिरपेक्षता मेरे लिए धर्म से च्युत होना नही है, बल्कि गहरे धार्मिक अवबोध से निकली हुई जीवन प्रणाली है. मेरी धर्मनिरपेक्षता किसी भी तरह की बर्बरता के खिलाफ है....मेरी धर्मनिरपेक्षता मुझे जितना इस्लामिक आतंकवाद के विरुद्ध करती है, उतना ही उग्र हिन्दुत्व से....मेरी धर्मनिरपेक्षता किसी भी साम्प्रदायिक सोच वाले व्यक्ति को अपना प्रधानमंत्री मानने से रोकती है....मेरी धर्मनिरपेक्षता इस महादेश की जनता की कमज़ोर होती स्मृति के आगे विवश दिखाई पडती है.

Friday, 16 September 2011

रहने-सहने की अवसादी चट्टान..!


 मध्यप्रदेश के शहडोल जिले का सीताराम द्विवेदी....पत्नी को  मायके से बुलाकर ला रहा था.रास्ते में उसने अपने दो महीने के दुधमुहे बच्चे को पत्नी की गोद से छीना और बहती हुई सोन नदी में फेंक दिया.पत्नी के साथ बैठे हुए तीन साल के दूसरे बेटे को भी नदी में फेंकने की कोशिश की लेकिन आसपास के लोगों ने उसे बचा लिया.सीताराम अब जेल पहुँच गया है. .....इसी तरह मध्यप्रदेश के ही सीहोर जिले के एक व्यक्ति ने अपनी पांच बेटियों को कुल्हाड़ी से काटकर मार दिया. इस व्यक्ति का अपने भाइयों से ज़मीनी विवाद चल रहा था. पत्नी  उसे गैरवाज़िब विवाद करने से रोकती थी और उसके भाइयों के समर्थन में तर्क देती थी. पत्नी के इस रवैये ने उसे इतना आवेशित कर दिया कि उसने अपने पांचों मासूम बच्चों को मार दिया.निचली अदालत ने उसे मौत की सज़ा सुनाई, जिसे हाईकोर्ट ने भी बरक़रार रखा है.

ये दोनो घटनाएँ अभी हाल की ही हैं, जो हमारे विकसित हो रहे समाज की छवियों,मनोविज्ञान,सहिष्णुता और पारिवारिक संरचना की नई तस्वीरें पेश करती हैं.इन घटनाओं के कारण और निहितार्थ बहुत पेचीदा हैं.इन्हें सिर्फ क्षणिक आवेश का परिणाम नहीं माना जा सकता.ये मानव जीवन की क्रूरतम घटनाएँ है. जीवन ओर समाज में यह क्रूरता कैसे आती गई ? वह कोन सी पारिवारिक-सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियां हैं जो हमारे भीतर इतनी क्रूरता पैदा कर रही हैं ? वो कौन सी चीज़ें हैं जिनकी अनुपस्थिति हमें इतना असहिष्णु बनाये जाती है ? हमारे संवेगों का यह नकारात्मक प्रवाह हमारी किस हताशा का परणाम है ?

इस तरह की घटनाएँ अब आए दिन पढ़ने-सुनने-देखने को मिलने लगी हैं.कुछ लोगों का मानना यह भी है कि मीडिया के बढ़ते जाल की वज़ह से अब ऐसी घटनाएँ प्रकाश में आने लगी हैं. ऐसे लोग जीवन-समाज में हुए बदलाव को स्वीकार  करने में हिचकिचा रहे हैं. ये कौन लोग हैं, इसकी चर्चा कभी बाद में करेंगे, क्योंकि यह चर्चा इस लेख के मूल अभिप्रेत को बदल सकती है.

सामान्य तौर पर अगर ऐसी घटनाओं के पीछे के मनोविज्ञान को देखा जाये तो यह हमारे जीवन में सघन होते अवसाद की परिणति है. अवसाद एक छोटे अवधि का ही सही किन्तु स्थाई भाव होता है. इसका प्रभाव व्यक्तित्व का रूपान्तरण कर देता है. हमारे जीवन में अवसाद की उत्पत्ति नहीं होती, बल्कि निर्माण होता है. अवसाद हमारे जीवन के अनेकांगिक क्रिया-कलापों, आस-पास के परिवेश और रिश्तों की अंतर्क्रिया से पैदा हुए रसायन से बनता है. हमारी अक्षमता,असफलता,अविश्वास,निराशा,संदेह,रिश्तों की टूटन,प्राकृतिक संवेगों के दमन आदि लौकिक दुर्घटनाओं से जो सत् निकलता है, उसी के जमते जाने से हमारे भीतर अवसाद बनता है. इससे ग्रस्त व्यक्तियों की परिस्थिति के मुताबिक इन तत्वों की उपस्थिति अलग-अलग हो सकती है.

यह अवसाद का भाव-पक्ष है. इसका एक अभाव-पक्ष भी होता है. जीवन से उल्लास के क्षण और तत्व गायब होते जा रहे हैं. समाज और परिवार से सहकारिता की भावना का लोप होता जा रहा है. दुनिया इतनी विविधवर्णी और बहुमुखी होती जा रही है कि  निजी और सार्वजनिक जीवन में अब आदर्शों का निर्माण बन्द हो चुका है. आदर्शविहीन जीवन अराजक तो हो ही जाता है, भले ही उसमें उत्तेजना ज़्यादा हो. कुछ प्रतिभाशाली पाठकों को आदर्श की ज़रूरत पर आपत्ति हो सकती है. इसमें परंपरावाद, पुरातनपंथ और प्रतिभा के संकोच की गंध भी आ रही होगी. यह कैसे भूला जा सकता है कि हमारे इसी आधुनिक समाज में आदर्शों को नकारने, तोड़ने और उन्हें निरर्थक साबित करने के बौद्धिक प्रयास भी किये जाते रहे हैं. इन प्रयासों का सामान्य जन-जीवन में कितना असर हुआ, इसको लेकर निश्चित तौर पर ठीक से नहीं कहा जा सकता, क्योंकि कम से कम भारतीय समाज में बौद्धिक आन्दोलनों की पहुँच बहुत सीमित दिखाई पड़ती है.

पारिवारिक विखण्डन के बाद बढ़ते आर्थिक दबाव ने स्थिति को और ज़्यादा गंभीर बना दिया है. परिवारों के टूटने और आर्थिक दबाव के बीच बहुत सूक्ष्म किन्तु बहुत प्रभावकारी सम्बन्ध है. इसी सम्बन्ध के दुष्परिणाम की शक्ल में जीवन में अवसाद का निर्माण भी होता है.. यद्यपि कई बार मनोदैहिक सम्बन्धों की विफलता से भी निराशा और हताशा पैदा होती है, लेकिन उन स्थितियों में भी परिवार एक महत्वपूर्ण कारक होता है. अर्थशास्त्र ने समाजशास्त्र का गणित बिगाड़ दिया है.

उत्पादन और आय के स्रोतों के रंग-रूप में क्रांतिकारी बदलाव हो चुके हैं. आय के अवसर बड़े शहरों में केन्द्रित होते गये. गांवों, कस्बों और छोटे शहरों के अर्थतंत्र पूरी तरह से छिन्न-भिन्न हो चुके है. रोज़गार की तलाश और सीमित आय ने संयुक्त परिवारों को खत्म कर दिया. आर्थिक सर्वेक्षण कहते हैं कि देश की 70 प्रतिशत आबादी की औसत आय बीस रुपये प्रतिदिन है. इनस्थितियों में एकल परिवार हमारी विवशता है. इन एकल परिवारों के सदस्यों के आपसी मतभेद कभी-कभी इतने वीभत्स रूप ले लेते हैं, जिनका अंत ऊपर बताई गई घटनाओं जैसा होता है. संयुक्त परिवारों की यद्यपि अपनी दिक्कतें होती हैं, लेकिन उनमें आपसी विवादों के इस त्रासद ऊँचाई तक पहुँचने का अवकाश कम होता है. बड़े बुजुर्गों के हस्तक्षेप से ऐसी अमानवीय दुर्घटनाएँ बचा ली जाती हैं.

कुछ समय पहले तक ऐसी क्रूर घटनाएँ शहरीकरण का परिणाम मानी जाती थीं. शहरी ज़िन्दगी की अजनबीयत, एकाकीपन और मूल्यहीनता को ही इस अराजक मनोदशा का मूल कारण माना जाता था. शहरों की भाग-दौड़, जीवन को जीने और समझने का अवसर कम ही देती है. गांवों से पलायन कर लोग शहर की जीवन-शैली के लिए लालायित हैं. शहर अन्धी दौड़ों के मैदान बनते जा रहे हैं. महंगी शिक्षा, खर्चीली जीवन-शैली, घरों का हुलिया बिगाड़ देती है. बच्चे अकेलेपन और अनैतिकता के जंगल में छूट जाते हैं. ये बच्चे अपनी मौलिक सेस्कृति, अपने भूगोल और संस्कार से अलग एक कृत्रिम देशकाल में बड़े होते जाते हैं. अब किसी को आश्चर्य नहीं होता कि 15-16 वर्ष के किशोर अवसाद से ग्रस्त हो जाते है और उन्हें इलाज़ के लिए मनोचिकित्सकों के पास ले जाना पड़ता है. यौवन की देहरी पर कदम रखने वाले युवा, प्रेम-जनित अवसाद में में हत्या जैसे अपराधों में लिप्त हो जाते हैं. कुछ महीने पहले इन्दौर में इंजीनियरिंग की पढ़ायी कर रहे एक छात्र ने अपनी सहपाठी छात्रा को कार से रौंदकर मार डाला था.

ऐसी नृशंस घटनाएँ बताती हैं कि हमारे जीवन से सहिष्णुता जा रही है. हमारी मौजूदा सामाजिक संरचना हमें अतिवाद की ओर धकेलती है. कभी यह दमन की अति होती है, तो कभी उन्मुक्तता की, और अति सर्वत्र वर्जयेत ! स्थिर और स्थायी के लिए कोई ज़गह, इच्छा और हौसला दिखता ही नहीं. हमें एक क्षण में सब कुछ चाहिए. एक क्षण में ही हम आदि-अनन्त की दूरी तय करना चाहते हैं. एक क्षण का प्रेम--एक क्षण में अलगाव. एक क्षण का आरोह--एक क्षण का अवरोह.....इसके बीच रहना -सहना और कहना-सुनना.......ज़िन्दगी वहीं खत्म हो जाती है, जहाँ उसके खत्म होने की सबसे कम उम्मीद होती है. उम्मीद के लिए एक ज़िन्दगी की ज़रूरत होती है, और उम्मीद की एक ज़िन्दगी होती है.ज़िन्दगी की अपनी भी उम्मीद होती है. इन सबके बीच एक क्रिया चलती है अनवरत....अभीष्ट है एक ताप...हवा के उचित दबाव की भी खोज चल रही है...ज़िन्दगी साम्यावस्था में आना चाहती है.

Friday, 9 September 2011

ज़िन्दगी सस्ती है यहाँ..!


 दिल्ली उच्च न्यायालय के सामने विस्फोट हुआ.अनेक मारे गए और घायल हुए. जांच एजेन्सियाँ जुट गई हैं पता लगाने में कि विस्फोट के पीछे किस संगठन का हाथ है. देर-सबेर पता लग भी जायेगा. हमारी एजेन्सियाँ नाकाम भी हो जायेंगी तो कुछ दिन में कोई न कोई आतंकवादी संगठन विस्फोट की ज़िम्मेदारी ले लेगा. हमारे हुक्मरान विस्फोट की निन्दा करेंगे और आतंकवादियों से कड़ाई से निपटने का झुनझुना हमें पकड़ा देंगे.
   
 दिल्ली हाईकोर्ट का परिसर अतिसंवेदनशील क्षेत्रों में है, जहाँ उच्च सुरक्षा व्यवस्था के मापदण्ड अपनाये जाते हैं. उच्च सुरक्षा वाली तो हमारी संसद भी थी. जब संसद पर आतंकवादियों ने हमला किया, तभी से यह समझ में आ गया था कि अब देश में कोई ज़गह सुरक्षित नहीं है. संसद पर हमले के प्रतीकात्मक अर्थ थे. वह हमला हमारी सदियों की विकास प्रक्रिया, हमारे आत्मसम्मान, एक राष्ट्र के रूप में हमारे पुरुषार्थ और हमारे शासनतंत्र के सुरक्षाबोध पर हमला था.उस हमले के प्रतीकार्थ देश की जनता ने तो समझ लिये, लेकिन हमारे शासक इसे समझ नहीं पाये. अमेरिका में 9
/11 के आतंकवादी हमले के बाद अब तक कोई हमला आतंकवादी नहीं कर पाये. जबकि अमेरिका को इस्लामिक कट्टरपंथी अपना सबसे बड़ा दुश्मन मानते हैं. ब्रिटेन में भी सुरक्षा के चौकस इंतज़ाम के बाद आतंकवादी कोई हमला नहीं कर पाये.
     
लेकिन हमारे यहां आतंकवादी जब और जहां चाहते हैं वहीं धमाके करके ज़िन्दगियां खत्म कर देते हैं. हमारा सुरक्षा तंत्र हर बार आग लगने के बाद कुआं खोदने निकल पड़ता है. कुछ ही दिनों पहले मुम्बई में सीरियल विस्फोट में अनेक लोगों की जानें गईं थीं. दरअसल अब हमें याद भी नहीं रहता कि हमारे देश में कहां-कब हमले हुए और कितनी जानें गयीं. जो मारे गए,वो तो गये ही, जो बचे हैं उनमें न तो कोई दहशत दिखती है,और न कोई आक्रोश. एक या दो दिन के लिए अखबारों और चैनलों को सामग्री मिल जाती है.खुफिया और सुरक्षा-तंत्र की सूची में एक और काम जुड़ जाता है. कुछ नेताओं को सहानभूति जताने का मौका मिल जाता है,तो विपक्षी दल कों, सरकार से इस्तीफा मागकर अपनी लोकतांत्रिक ज़िम्मेदारी पूरी करने का एक और सुअवसर होता है यह. इसके बाद देश फिर जुट जाता है अपनी रोजी-रोटी में, अगले हमले की प्रतीक्षा में.
    
  अगर कुछ दिनों तक आतंकवादियों ने नहीं मारा तो इस बीच दो-चार रेलदुर्घटनाएँ हो जायेंगी और हज़ारों ज़िन्दगियां खत्म. इस देश में बहुत सस्ती है ज़िन्दगी. यहां मरने के इतने विविध और नायाब तरीके हैं, कि बढ़ती हुई जनसंख्या हमारे लिए चिन्ता का कारण नहीं बनती. हम अगर दहशतगर्दों और प्रकृति के हाथ से बच भी गए, तो हमारी ही भूख हमें मार डालती है. विकास के घोड़े पर सवार इसी देश में हज़ारों जानें भूख से चली जाती हैं.
      
इसी उच्च न्यायालय के गेट पर तीन महीने पहले भी आतंकियों ने विस्फोट किया था. दैवयोग से तब कोई जान नहीं गई थी. यद्यपि यह ज़गह देश के सबसे मज़बूत सुरक्षा वाले शहर दिल्ली के वीवीआईपी क्षेत्र में शुमार है, लेकिन हमारी सुरक्षा एजेन्सियों ने इस हमले से कोई सबक नहीं सीखा.आतंकवादियों ने तीन महीने में ही दोबारा हमला करके बता दिया कि यह उनके लिए कितना साधारण काम है, और हमारे देश का सुरक्षातंत्र कितना सजग और कारगर है. खबरों के मुताबिक दिल्ली हाईकोर्ट के गेटों पर लगे मेटल डिटेक्टर काम नहीं कर रहे थे और परिसर में कहीं भी क्लोज़ सर्किट कैमरे नहीं लगे थे. यह उस इलाके की सुरक्षा व्यवस्था का आलम है जहां से बस दो किलोमीटर की दूरी पर देश की संसद है और बिल्कुल ही नज़दीक सुप्रीम कोर्ट.
     
हर हमले के बाद ये सवाल उठाये जाते हैं कि आखिर चूक कहां हुई, और किसने की चूक ? इस सवाल का कभी भी जवाब नहीं मिला..क्या कभी आपने सुना कि किसी हमले के बाद चूक करने वालों को कोई सज़ा मिली हो ! सज़ा तो दूर की बात है, कभी किसी को ज़िम्मेदार तक नहीं ठहराया गया. हमारे यहां आतंकवादी घटनाओं को प्राकृतिक आपदा मान लिया जाता है. जबकि साफ दिखता है कि ये घटनाएँ हमारे तंत्र के नाकारेपन, राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी और सामाजिक विषमता का परिणाम है. पाकिस्तान को छोड़ दें, तो दुनिया के दूसरे सभ्य देशों में जहां इस तरह की घटनाएं हुई हैं, उन्होने अपनी ग़लतियाँ सुधारीं और इस तरह के अमानवीय हमलों से अपने देश की जनता को महफूज़ किया. लेकिन एक राष्ट्र के तौर पर हम अपने नागरिकों को ऐसा आश्वासन नहीं दे पाये.
     
आतंकवाद एक वैश्विक चुनौती है लेकिन अफसोस की बात है कि इस पर एक वैश्विक ढकोसले के सिवाय और कुछ नहीं हो रहा है. पाकिस्तान घोषित तौर पर आतंकवाद की सबसे बड़ी मंडी है, और अमेरिका घोषित तौर पर आतंकवाद के खिलाफ लड़ने वाला सबसे मुखर योद्धा. लेकिन अमेरिका-पाकिस्तान के प्रणय-सम्बन्ध अक्सर दुनिया को संशय और भ्रम की स्थिति में डाल देते हैं. पाकिस्तान में आतंकवादी प्रशिक्षित होते हैं. वहां उन्हे धार्मिक कट्टरपंथियों का खुला समर्थन मिलता है. 26/11 के मुम्बई हमलों के गुनहगार वहां खुलेआम घूमते हैं और जलसे करते हैं. सैकड़ों संगठन हैं जो आतंकवादियों का निर्यात पूरी दुनिया को करते हैं. अमेरिका यह सब जानता है. अमेरिका आतंकवाद से लड़ने के लिए पाकिस्तान को पैसा और हथियार देता है. पाकिस्तान की आम जनता खुद आतंकवाद की सबसे बड़ी शिकार है. पिछले दस सालों में वहां एक लाख से ज़यादा लोग आतंकवादी घटनाओं में मारे जा चुके हैं.
      
अमेरिका यह भी जानता है कि उसके दिए गये पैसों से पाकिस्तान के हुक्मरान अपनी तिजोरियां भरते हैं. पाकिस्तान का औद्योगिक और आर्थिक विकास ठप्प पड़ा है. वहां की अधिकांश आबादी आज भी क़बाब,सुरमा और दरी-चादर बनाकर अपना पेट पालती है. अमेरिका यह भी जानता है कि उसके दिए गये पैसों और हथियारों का प्रयोग पाकिस्तान कभी-कभी उसी के खिलाफ़ कर लेता है. फिर भी वह पाकिस्तान को अपने सीने से लगाये हुए है. रणनीतिकार समझते हैं कि पाकिस्तान को अपने साथ रखकर अमेरिका अपने बड़े हित साधता है. पाकिस्तान को साथ रखने के जो नुकसान अमेरिका उठाता है, फायदे उससे कहीं ज़्यादा हैं.
       
यही वज़ह है कि आतंकवाद के ख़िलाफ़ अमेरिका की लड़ाई हमेशा संदिग्ध रही है.इस बात को हमारे देश के शासक समझते तो ज़रूर होंगे. पिर भी देखा यह जा रहा है कि अपने ही देश और नागरिकों की सुरक्षा के लिए अमेरिका से उम्मीद लगाये बैठे हैं कि वह पाकिस्तान पर दबाव बनाए. हर बार हमलों के बाद कुछ आतंकियों की सूची अमेरिका और पाकिस्तान के पास भेज दी जाती है. यही हमारी कूटनीति की अंतिम सीमा होती है. भारत को सबसे पहले तो यह तय करना होगा कि आतंकवाद के ख़िलाफ़ पूरी लड़ाई उसे अपने बूते पर लड़नी होगी. जिन सामरिक परिस्थितियों में भारत फंसा है, उनमें कोई दूसरा देश उसकी मदद नहीं करेगा. चीन-अमेरिका के आपसी रिश्ते चाहे जैसे भी हों, लकिन भारत के मसले पर दोनो ही पाकिस्तान के साथ खड़े दिखते हैं. भारत को रूस और इज़राइल जैसे देशों के साथ कूटनीतिक सम्बन्धों को और मजबूत करना चाहिये. ये दोनो ही देश लंबे समय से इस्लामिक आतंकवाद से लड़ते आ रहे हैं. इज़राइल ने अपने दम पर अपनी सुरक्षा को लगभग अभेद्य बना लिया है. रूस ने भी अपने यहां एक हद तक नियंत्रण पा लिया है. एक दशक पहले और आज के रूस में आप फर्क देक सकते हैं.
     
फिलहाल बड़ा सवाल यह है कि हमारे देश में ऐसा जागरण कब होगा ? देश के नागरिकों के आत्मबल और इच्छाशक्ति का सीधा और गहरा सम्बन्ध राष्ट्र के राजनीतिक नेतृत्व की क्षमताओं से होता है. हम आतंकवाद से लड़ने में कमज़ोर साबित हो रहे हैं. खबरें ऐसी हैं कि दिल्ली हाईकोर्ट का यह हमला अफज़ल को फांसी दिये जाने के निर्णय के बदले में किया गया है.यह निर्णय बहुत देर से आया. मुम्बई हमलों का हमलावर कसाब अभी भी जेल में है. आतंकवाद के मसलों पर हमें एक त्वरित न्यायिक प्रक्रिया की भी दरकार है. जब इतने दिनों तक मुकदमें चलते हैं तो अपराधियों के प्रति जनभावनाओं में बदलाव भी आता है. अफज़ल की फांसी के विरोध के स्वर अपने ही देश से भी उठने लगे हैं
       
हमारे विकास और महाशक्ति बनने के सारे दावे बेमानी हो जायेंगे अगर हम अपने देश के नागरिकों को एक सुरक्षित जीवन नहीं दे सकते. किसी भी राष्ट्र के हुक्मरानों का यह पहला धर्म होना चाहिए.निर्दोष ज़िन्दगियों का यह सामूहिक कत्ल, हमारे पौरुष पर सबसे बड़ा कलंक है.

Wednesday, 7 September 2011

शाम,छत और लड़कियाँ



शाम को छत पर टहलती लड़कियाँ
किसी और समय की लड़कियों से 
होती है अलग.

टहलते-टहलते
ज़रा सी एड़ी उठा
होकर थोड़ा बेचैन
देखतीं बार बार--
कि आ रहा होगा 
तीन दुर्गम पहाड़ियों को करता पराजित
उनका राजकुमार
लेकर दुर्लभ फल.

सूरज उतर रहा होता है उस वक़्त
भीतर उनके
चाँद निकल रहा होता है
स्वप्नलोक के किसी दूत सा
उनके अपने आकाश में.

जुमलों से पीछा छुड़ा
वे निकल भागती हैं वेदों से
और छुप जाती हैं
मोनालिसा की मुस्कान में.

न जाने कहाँ कहाँ से निकल
आ जाती हैं वे छत पर.

सड़क से गुज़रते हुए
छत की ओर देखने पर
आकाश के करीब दिखती हैं
शाम को छत पर टहलती लड़कियाँ.

Saturday, 3 September 2011

गिरते हैं शहसवार ही..!

अन्ना के आन्दोलन से किसी और को चाहे फायदा न हुआ हो, भारतीय क्रिकेट टीम और कप्तान महेन्द्र सिंह धोनी को बहुत फायदा हुआ. जिन दिनों देश का सारा मीडिया और जनता धरना-प्रदर्शन में व्यस्त था, उन्हीं दिनों हमारी टीम परदेस में चुपचाप पराजित हो गयी. भारत के टेस्ट-क्रिकेट इतिहास की सबसे करारी शिकस्त. कोई और दिन होते तो हमारा मीडिया चौबीस घंटे, एक-एक खिलाड़ी की बखिया बड़े करीने से उखाड़ रहा होता. अब तक कई खिलाड़ी देश-द्रोही करार दिए जा चुके होते. हमारे खिलाड़ियों की कुण्डलियाँ टीवी और अखबार पर ज्योतिषी बाँच रहे होते,और राहु-केतु-शनि से निपटने के नुस्खे बताए जा रहे होते. अब तक यह तो सिद्ध ही किया जा चुका होता कि अमुक खिलाड़ी, फलां हिरोइन या माडल के चक्कर में खेल पर ध्यान नहीं लगा पा रहा है, तो कुछ खिलाड़ियों के बुरे प्रदर्शन के पीछे पड़ोसी देश की साजिश की तरफ भी इशारे किए जा रहे होते. हमारे भावुक क्रिकेट प्रेमियों ने अब तक धोनी, तेन्दुलकर,सहवाग,ज़हीर आदि के घर पर तोड़-फोड़ और पथराव कर दिया होता.

हम भारत के लोग क्रिकेट को ऐसे ही देखते हैं. हम मूर्ख होने की हद तक भावुक हो जाते हैं. लेकिन इस बार ऐसा कुछ नहीं हुआ, क्योंकि इस बार मीडिया की भेड़ें एक सीध में दूसरी तरफ जा रही थीं. इस बार का ठंडापन देख कर डर भी लगा कि कहीं इस खूबसूरत खेल से हमें विरक्ति तो नहीं हो रही है ! क्या हो गया इस देश की उन्मादी जनता के संवेदी तन्तुओं को ? जिस देश में किसी मैच को देखने की तैयारी महीने भर पहले से शुरू हो जाती थी, जहाँ मैच के समय सारा सरकारी काम-काज और व्यवसाय ठप्प हो जाता हो, जिस देश में क्रिकेटरों की मूर्तियाँ बनाकर पूजी जाती हों और जहाँ रामलीला-नौटंकी में भी सचिन-धोनी-सहवाग के किरदार बना दिए जाते हों—उसी देश की टीम परदेस में जाकर ऐसे दिलशिकन अंदाज़ में हार रही हो और किसी के मुंह से आह तक न निकले !

 यह गंभीर चिंता की बात है. देश के करोड़ों क्रिकेट के दीवानों के लिए भी और BCCI के लिए भी. भले ही भारतीय क्रिकेट बोर्ड दुनिया का सबसे मालदार बोर्ड हो, भले ही उसमें सरकार की कैबिनेट को भी बेअसर कर देने की कुव्वत हो, लेकिन उसे यह नहींभूलना चाहिए कि उसकी इस बादशाहत के पीछे इन करोड़ों क्रिकेट प्रेमियों की दीवानगी ही है. प्रेम का अतिरेक, मोहभंग की गली में ही समाप्त होता है. BCCI का चरित्र और कार्यप्रणाली धीरे-धीरे तानाशाही का होता जा रहा है. उसकी यह इच्छा अब साफ दिखने लगी है कि वह सोने के अण्डे देने वाली मुर्गी को हलाल करके सारे अण्डे एक साथ निकाल लेना चाहता है. इसे आप भले ही मूर्खता कहें लेकिन BCCI की सेहत पर इसका कोई असर नहीं पड़ता.

 असर पड़ता है तो हमारे खिलाड़ियों की सेहत पर और उनके प्रदर्शन पर. अभी कुछ दिनों पहले ही विश्वकप जीतने के बाद,जब ढाई महीने का IPL चल रहा था, तभी लगने लगा था कि कुछ अनिष्ट होने वाला है. 45-46 डिग्री ताममान पर जब हमारे खिलाड़ी जूझ रहे थे, घायल हो रहे थे, तभी यह अनुमान लगाया जाना चाहिए था कि आगे हमारी क्रिकेट का क्या हश्र होने वाला है...IPL के बाद कुछ नौजवान खिलाड़ियों को लेकर हम वेस्टइंडीज गये. वहां हमने अपने से भी कमज़ोर और कुव्यवस्थित टीम के साथ बराबरी की श्रृंखला खेली. इंग्लैण्ड जाने वाली टीम में हमारे दिग्गज लौट तो आए पर आधे से अधिक घायल थे जिनका इलाज चल रहा था.

घायलों को टीम में चुनना केवल खिलाड़ियों की बदमाशी भर नहीं होती, इसमें क्रिकेट बोर्डों के व्यावसायिक और राजनीतिक हित भी साधे जाते हैं. फुटबाल, हाकी,एथलेटिक्स से इतर, क्रिकेट के खेल में इतनी गुंजाइश भी होती है कि एक-दो कम फिट खिलाड़ी भी चल जाते हैं. लेकिन इतना अवकाश तो यह खेल भी नहीं देता कि आपके आधे से अधिक प्रमुख खिलाड़ी पूरी तरह से फिट न हों. सहवाग,ज़हीर,गंभीर, हरभजन,प्रवीण कुमार,युवराज सिंह पूरी तरह स्वस्थ्य नहीं थे, फिर भी टीम में थे. ये टीम के आधार खिलाड़ी हैं. सहवाग तो घोषित तौर पर कंधे की चोट से जूझ रहे थे. उनका चयन तीसरे टेस्ट से किया गया था. ऐसा पहली बार देखने में आया कि किसी खिलाड़ी को स्वस्थ हो जाने की प्रत्याशा में टीम में चुन लिया गया हो. 

घायल खिलाड़ियों की इस सेना की एक दिक्कत यह भीथी कि पिछले तीन-चार सालों में इस टीम ने जिन ज़गहों पर क्रिकेट खेली उनका मिजाज़ इंग्लैण्ड के इन स्थानों से बिल्कुल अलग था. इंग्लैण्ड में इस समय कड़ाके की ठंड होती है और हवा में इतनी नमी होती है कि गेंद अकल्पनीय ढंग से स्विंग करती है. वहाँ की पिचों का उछाल, किसी भी दूसरे देश की पिचों से ज़्यादा होता है. इंग्लिश टीम के खिलाड़ी इन पिचों के अभ्यस्त हैं. साथ ही उनके घरेलू क्रिकेट का स्तर और फार्मेट भी शानदार है. उनके क्रिकेट प्रशासक अपने यहाँ होने वाली क्रिकेट श्रृखलाओं के कार्यक्रम बनाते समय बहुत सजग रहते हैं. वो यह सुनिश्चित करते हैं कि उनके खिलाड़ी अंतर्राष्ट्रीय श्रृंखला खेलने से पहले घरेलू मैचों और पिचों पर पर्याप्त अभ्यास कर लें. यही वज़ह थी कि इंग्लैण्ड ने IPL में अपने प्रमुख खिलाड़ियों को खेलने के लिए नहीं भेजा. वो पिछले दो साल से इस श्रृंखला की तैयारी कर रहे थे.

 वो मैचों का क्रम निर्धारित करते समय भी यह ध्यान रखते हैं कि पहले ही मैच में प्रतिद्वन्द्वी को हराने के लिए कौन सा मैदान सबसे उपयुक्त रहेगा. इसके लिए वो अपने और विपक्षी टीम के रिकार्ड का बारीकी से अध्ययन करते हैं.पहले मैच में ही विपक्षी को चित कर देने के बाद आगे का काम आसान हो जाता है.यही वज़ह है कि उन्होने श्रृंखला का पहला मैच लार्ड्स में रखा, जहाँ दिलीप वेंगसरकर और सौरव गांगुली के अलावा किसी भी भारतीय खिलाड़ी का प्रदर्शन ठीक नहीं रहा है. दुर्योग से ये दोनो ही खिलाड़ी हमारी टीम में नहीं हो सकते थे. हम अपना पहला मैच हारे और हारते चले गये. क्रिकेट में जिस ‘माइण्ड गेम’ की बहुत अहमियत होती है, वह उनका मीडिया खेलता है. महीनों पहले से वहां के मीडिया ने भारतीय टीम पर दबाव बनाना शुरू कर दिया था. वहां का मीडिया श्रृंखला के बीच में ही सम्मान या उपाधि के बहाने आयोजन भी करता है, जिनमें अप्रत्यक्ष रूप से खिलाड़ियों पर दबाव बनाने के हथकंडे आजमाये जाते हैं.

 बहरहाल, इंग्लैण्ड में हम टेस्ट श्रृंखला अप्रत्याशित रूप से हार चुके हैं,और आगे एक दिवसीय श्रृंखला है. हमारी टीम की मौजूदा मनोदशा को देखते हुए, ज़यादा आशावादी होना हमें घनघोर निराशा दे सकता है. फिर भी इस प्यारे खेल के लिए हमें अपनी दीवानगी बनाए रखनी होगी. हमें सचिन के स्ट्रेट ड्राइव, सहवाग के स्क्वेयर कट और द्रविड़ के आन ड्राइव से बजता हुआ संगीत कहीं और मिलता भी तो नहीं !!

Saturday, 27 August 2011

जो तटस्थ हैं...!

हम इन दिनों बेहद संवेदनशील लोकतांत्रिक उथल-पुथल से गुज़र रहे हैं. यह आस्थाओं के दरकने और आत्मविश्वास के पुनर्जागरण का वक़्त है. एक लम्बे अवधि के भ्रष्टाचार ने देश की पूरी व्यवस्था और हम नागरिकों के आचरण को संदिग्ध बना दिया है.एक राष्ट्र और उसके नागरिक होने के नाते हमारी विश्वसनीयता पर इतना ज़बरदस्त संकट कभी नहीं आया था. लोकतांत्रिक ताने-बाने पर इतना अविश्वास पहले कभी नहीं था, और न ही लोकतंत्र की सामर्थ्य पर इतने प्रश्न-चिन्ह पहले कभी लगे देखे गये. सरकारों का चरित्र कब तानाशाही होता गया, इसकी तरफ किसी का ध्यान ही नहीं गया. वो कौन सी वज़हें हैं जिन्होने हमारी सरकारों को तानाशाह जैसा बना दिया, इस पर शायद अब सोचने का वक़्त आ गया है.

ऐसा दिख रहा है कि अन्ना हजारे ने अपने कुछ सहयोगियों के साथ मिलकर देश की साधारण जनता,खासतौर से महत्वाकांक्षी युवावर्ग को एक वृहद् आंदोलन की राह पर ला दिया है. पूरे देश में लोकपाल विधेयक को पास कराने के लिए धरना-प्रदर्शन हो रहे हैं. काँग्रेस-नीत सरकार महीनों से टाल-मटोल करते हुए रोज़ एक नयी पतली गली ढूँढ़ लेती है. सरकार के इस रवैये का सर यह हुआ कि भ्रष्टाचार पर नियंत्रण की जो एक तार्किक पहल अन्ना और उनके सहयोगियों ने शुरू की, वह अतार्किकता और जड़ता के बियावान में भटक गयी. लोकतंत्र की वैध माग, एक ऐसे संघर्ष में बदल गयी है जहाँ हर पक्ष अपने लक्ष्य और तर्कों से भटक गया है.

एक लोकतांत्रिक देश के लिहाज से, मुझे यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण और ख़तरनाक लगता है कि एक छोटी सी जायज़ माग के लिए देश की इतनी ऊर्जा लग रही है. एक लोकपाल के नियुक्त हो जाने से किसे समस्या है भला ? वह भ्रष्टाचार पर निगरानी ही तो रखेगा ! वो कौन लोग हैं जो अपनी निगरानी नहीं चाहते ? अब यह कितना साफ है कि जो लोग महीनों से,या कहें वर्षों से इस लोकपाल पर अड़ंगा लगा रहे हैं, उनका चरित्र क्या है.

चूँकि बहुमत सत्ताधारी दल के पास होता है, इसलिए गतिरोध की पहली ज़िम्मेदारी सरकार पर ही जाती है. लेकिन इस पूरे आंदोलन में दिख रहा है कि कुछ और लोग हैं जो विरोध तो नहीं कर रहे हैं, पर तटस्थ हैं. ये ऐसे लोग हैं जो देश को समय-समय पर बताते रहे हैं कि वही भारत-भाग्य-विधाता हैं. दो दिन पहले दुलिया की एक शीर्ष पत्रिका ने अपने सर्वेक्षण के आधार पर बताया कि सोनिया गांधी, संसार की सातवें नम्बर की सबसे प्रभावशाली महिला हैं. भारत में आज उनसे बड़ा राजनीतिक कदकिसी का नहीं है. प्रधानमंत्री का पद ठुकराकर उन्होंने बड़े-बड़े राजनीतिक पंडितों को चकित कर दिया था.उनके इस एक कदम ने सबसे बड़े विपक्षी दल भजपा और सदाबहार पी.एम. इन वेटिंग, लालकृष्ण आडवानी की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को लक्ष्यमूढ़ कर दिया.

वहीं सोनिया गांधी इस पूरे प्रकरण पर खामोश हैं. यह उनकी रणनीति ही होगी. वह इस आग में अपना हाथ नहीं जलाना चाहतीं. पर उन्हें यह समझ तो होगी ही कि सार्वजनिक जीवन के शिखर पर बैठे लोगों के लिए पीछे लौटने के दरवाज़े बन्द हो जाते हैं. अगर वो निर्णायक स्थिति में हैं तो उन्हें निर्णय लेना पड़ेगा, अन्यथा समय और समाज उन्हें क्षमा नहीं करेंगे. कलावती के शुभचिंतक राहुल गांधी की चुप्पी सवसे ज़्यादा विचलित करने वाली है. ऐसा लगने लगा था कि राहुल देश की बदलती चेतना के मुख्य संवाहक बन सकते हैं. उनकी चिन्ताएँ असली लगने लगी थीं. उनके व्यक्तित्व का करिश्माई तत्व युवाओं को अपनी ओर खींच रहा था. लेकिन अपनी सवसे बड़ी परीक्षा में वह भी फेल हो गये. हमारे देश में राजनेता बनने की आवश्यक योग्यताएँ क्या हैं, यह तो हम सब जानते हैं. पक्ष या विपक्ष में होना तो समय का फेर है.स्थायी चरित्र तो सभी नेताओं का एक ही है. विपक्ष छीके के टूटने का इन्तज़ार कर रहा है. आडवानी-अटल तो चुप ही हैं. जो लोग थोड़ा बहुत बोल रहे हैं, वो सिर्फ अपनी वाक्पटुता का ही प्रदर्शन कर रहे है.

सबसे ज़्यादा हास्यास्पद स्थिति बुद्धिजीवी कहे जाने वाले वर्ग की है. इसमें कवि-लेखक और समाजसेवा से जुड़े लोग माने जाते हैं. इन लोगों ने अपने आत्मबल के बूते चुप्पी साध रखी है. इनका दर्द यह हो सकता है कि जनता ने इन्हें इस आन्दोलन का नेतृत्व करने का आमंत्रण क्यों नहीं दिया. या कम से कम इनसे राय तो ली गई होती.कलम के ये सिपाही ज़मीन की खुरदुरी सतह पर चलने के उतने अभ्यस्त नहीं हों यह समझा जा सकता है. बुढ़ापे में सरकार से मिलने वाले पुरस्कार और सम्मान संजीवनी का काम करते है, इसे भी नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता.आग में हमेशा घी डालने की आदी अरुन्धती राय पहले तो चुप थीं, पर जब उनकी प्रज्ञा जाग्रत हुई तो उन्होने अन्ना के कुछ सहयोगियों के आचरण पर सवाल ठोंक दिए.ऐसा करने वाली वो अकेली नहीं हैं. कई नौजवान बुद्धिजीवी लगातार अन्ना और उनके सहयोगियों का छिद्रान्वेषण कर रहे हैं.ये लोग यह सिद्ध करने में जुटे हुए हैं कि ,चूँकि आन्दोलनकारी बेदाग नहीं हैं इसलिए उनका यह आग्रह औचित्यहीन है.

ऐसा नहीं है कि जो तटस्थ हैं वो कायर लोग हैं.ये अवसरवादी लोग हैं. हम सब देखेंगे कि अगर इस आन्देलन का कुछ सार्थक परिणाम निकलता है तो उसके विजय जुलूस में यही लोग सबसे आगे दिखेंगे. यही इनका कौशल है.इन्हें प्रणाम करिये.

Sunday, 21 August 2011

छछिया भर छाछ पर नाचने वाला...!


ईश्वर के अस्तित्व पर विश्वास न होने के बाद भी कृष्ण मेरे प्रिय पात्र रहे हैं. कई बार जब किसी प्रश्न का जवाब ढूढ़ना मेरी सामर्थ्य के बाहर हो जाता है तो मैं कृष्ण की शरण में जाता हूँ. ज़्यादातर ऐसा हुआ है कि बियाबान में कोई राह चमक गई है. कृष्ण से भी ज़्यादा मुझे उन लोगों पर श्रद्धा है जिन्होंने कृष्ण जैसा पात्र रचा है. मुझे नहीं लगता कि कृष्ण किसी एक आदमी की रचना हैं. पौराणिक ऋषियों से लेकर, व्यास, सूर, रसखान और इस देश की जन-जातियों तक ने कृष्ण को गढ़ा है, और कितना अद्भुत गढ़ा है ! कृष्ण के व्यक्तित्व के इतने आयाम हैं कि उसमें हर किसी के लिए कुछ न कुछ है.

जीवन से थक चुके लोगों के लिए वहाँ वैराग्य है, लड़ने के लिए निकले व्यक्ति के लिए उत्साह है, गृहस्ती के नुस्खे हैं तो प्रेम और विवाह करने वालों के लिए अनुपम दृष्टान्त....सुभद्रा और अर्जुन की प्रेम कहानी बीच में ही खत्म हो जाती अगर भैया कृष्ण उनके भागने का प्रबन्ध न करते. प्रेम की अव्यक्त और विडम्बनात्मक स्थितियों में घिरे लोगों के लिए द्रौपदी-कृष्ण का सम्बन्ध ग्रंथियों को खोलने वाला है.

भारतीय मान्यताओं में कृष्ण अकेले ऐसे देवता हैं जो मनुष्य की तरह जीते-मरते हुए दिखते हैं. लोगों को उनमें सखा-बन्धु-गुरु, सब दिखते हैं. कोई भी व्यक्ति जितनी सहजता से कृष्ण के साथ अपना तादात्म्य स्थापित कर लेता है उतना किसी और देवता से नहीं कर पाता. कृष्ण अकेले ऐसे देवता हैं जिनकी उत्पत्ति भय से नहीं, बल्कि प्रेम और साख्य-भाव से हुई है. कृष्ण प्रकट नहीं होते, पैदा होते हैं. उनके जन्म के समय जो स्थितियाँ थीं, वह विशुद्ध रूप से मानवीय धरातल पर थीं. आप आज की उन प्रसूताओं का ध्यान करिए जिनके पास प्रसव की सुरक्षित परिस्थितियाँ ही नहीं हैं.

पैदा होने के साथ ही माता-पिता से वियोग के बाद जो बालक नन्द और यशोदा के संरक्षण में बड़ा हुआ, उसके पास जीवन को समझने और जीने की कुछ विशिष्ट पद्धतियाँ तो होनी ही थीं. मथुरा में गोपियों का जो साथ मिला, उसने कृष्ण को जीवन के अधिकतम विस्तार तक पहुँचाया. कृष्ण का जीवन उत्सव का संदेश बन गया. कृष्ण की लीलाएँ मनुष्य की सहज और संभाव्य आकांक्षाएँ बन गयीं.

कृष्ण, जीवन को उसके पूरे आयतन में देखने का आग्रह करते हैं. एक साधारण मनुष्य की तरह लीला करते हुए वो चमत्कारों का बहुत कम सहारा लेते हैं. अगर कोई चमत्कार किया भी तो उसकी व्याख्या लौकिक धरातल पर करने की कोशिश करते हैं. जब ऐसा करना मुश्किल हो जाता है तो योगेश्वर रूप बना लेते हैं. अपने किसी भी कौतुक को नकारते हुए यह बताने लगते हैं कि ये शक्तियाँ सबके भीतर हैं, जिन्हें जागृत किया जा सकता है.

कृष्ण का जन्म कारागृह में हुआ. अँधेरे में हुआ. दुनिया में हर जन्म अँधेरे में ही होता है. बीज से अंकुर को फूटते कभी देखा है किसी ने ? हमारे भीतर भी जो चीज़ें पैदा होती हैं, वह सब गहरे अंधकार के भाव में ही होती हैं.एक कविता, एक चित्र या एक राग का जन्म मन की जिन गहराइयों में होता है, वहाँ गहन अंधकार ही है. यह अचेतन का अंधकार होता है.


कृष्ण एक ऐसा जीवन हैं जिनके सामने मौत बार-बार और अनेक रूपों में आती है, लेकिन हर बार हार कर लौट जाती है. कभी पूतना बन कर तो कभी कालिया नाग की तरह. कृष्ण के जन्म के साथ ही उनके मारे जाने का डर है. मृत्यु की आवश्यक शर्त है जन्म. जन्म के बाद का एक-एक क्षण मृत्यु की यात्रा है. यही जीवन है. मृत्यु कृष्ण को रोज़ घेरती है. और कृष्ण जीवन की तरह रोज़ जीतते चले जाते हैं. कृष्ण का जीवन मृत्यु को पराजित किए जाने का आख्यान बन जाता है. और इसी बिन्दु पर हमारा जीवन, कृष्ण का जीवन बन जाता है. यही सिरा है जहाँ से हमारा तादात्म्य कृष्ण के साथ शुरू हो जाता है. कृष्ण जैसा व्यक्तित्व जब हमें मिल गया तो उस व्यक्तित्व में हमने अपने आपको खोजना और पहचानना शुरू कर दिया.

हमारी इस आत्म-खोज को कृष्ण थोड़ा सरल बना देते हैं, जब वो कहते हैं—“ सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज “ . यह एकाग्र होने की बात है. जब तक हम दस रास्तों पर नज़र रखेंगे, तो जहाँ हैं वहीं खड़े रह जायेंगे. जड़ हो जायेंगे. गति जीवन है. जड़ता मृत्यु है. कृष्ण इस जड़ता को खत्म करने की बात करते हैं. सभी धर्मों को छोड़कर तू मुझ एक की शरण में आ....सब को छोड़कर एक पर एकाग्र हो जा...यहाँ कृष्ण व्यक्तिवाची नहीं रहते, भाववाची हो जाते हैं—यह द्वैत से अद्वैत की ओर आमंत्रण है.
यह किसी और की शरण में जाने की भी बात नहीं है. यह आत्मशरण में होने की बात है. कृष्ण कहते हैं कि अपने ‘ स्वभाव ‘ में स्थिर होना है. सारी चेतना और शक्तियों का केन्द्र यही ‘स्व’ है. इसी को ठीक-ठीक पहचान लेना है.

बहुत आश्चर्य होता है कि जो कृष्ण माखन चुराता है, गोपियों के वस्त्र लेकर छुप जाता है, वह गीता का गंभीर योगी कैसे हो जाता है ! यही कृष्ण के व्यक्तित्व की निजता है. यही वह विशेषता है जिससे कृष्ण हमारे इतने नज़दीक लगते हैं. विरोधों का समागम हैं कृष्ण. हर आदमी में होते हैं दस-बीस आदमी---निदा फाज़ली की इस पंक्ति को कृष्ण के जीवन से भी समझा जा सकता है. हमारा सारा जीवन ही विरोधों पर खड़ा है. लेकिन इन विरोधों में एक लय है. एक प्रवाह है. सुख-दुख, बचपन-बुढ़ापा, रोशनी-अँधेरा, जन्म-मृत्यु----ये सब विरोधी प्रत्यय हैं, लेकिन एक लय में बंधे होते हैं. इसी लय में जीवन संभव होता है.

गोपियों के साथ कृष्ण की काम-लीला से बहुत से शुद्धतावादियों को आपत्ति रही है. कृष्ण के जीवन में काम की सहज स्वीकृति है. मनुष्य के जीवन में ही नहीं, सारी सृष्टि के सृजन में काम-ऊर्जा केन्द्रीय तत्व है. फ्रायड इसे ‘लिबिडो’ कहते है. पुराण कहते हैं कि ब्रह्मा ने काम से पीड़ित होकर ही जगत् को बनाया है. जीवन के हर उद्यम, हर रचना,हर अभिव्यक्ति के पीछे काम की ऊर्जा होती है. कृष्ण के जीवन में काम का कहीं निषेध नही है. कहीं कोई दमन नहीं है. काम एक निर्बाध प्रवाह है. काम का दमन हमें रोगी बनाता है. पोखर के पानी और नदी के पानी में फर्क देखा होगा आपने ! पोखर में पानी को बांध दिया गया है. नदी में प्रवाह है, उन्मुक्तता है. पोखर का पानी रोग और बीमारियाँ देता है, नदी का पानी जीवनदायी है.

कृष्ण जीवन को एक उत्सव की तरह देखते हैं. वे खुद को जीवन की तरफ मुक्त करते हैं. बौद्धिकों ने संसार और जीवन को बहुत जटिल कर दिया है. कृष्ण सरलता का संदेश देते हैं. कृष्ण हँसते हैं,गाते हैं,नाचते हैं, रास करते हैं. रास उनके लिए ,उस केन्द्रीय काम-ऊर्जा का विखंडन है. कृष्ण एक-एक क्षण को उसकी अधिकतम लब्धता में जी लेने के हिमायती हैं. कृष्ण हमारी आदिम और मौलिक आकांक्षाओं के प्रतिबिम्ब हैं

Wednesday, 17 August 2011

देखो तो !

अक्षांशों और देशांतर के जाल में
मेरी स्थिति
इन दिनों कुछ इस तरह है
कि लोग मुझे
पराजित और उदास कहते है.

मैं यहां एक निर्द्वन्द्व प्रतीक्षा में
बीत रहा हूँ
और वहाँ तुम
एक दुर्निवार व्याकुलता में गतिशील हो.

हमारे पास समय और
दूरी का
एक सीधा सा सवाल है
चुनौती सिर्फ इतनी है
कि इसे हल करने के लिए
हमें अपने गुरुकुलों को छोड़ना होगा.

इस समय यहाँ रात के
ग्यारह बजकर पैंतालीस मिनट हुए हैं
आकाश साफ है
और सप्तऋषि अपनी जगहों पर अटल
न जाने किस मंत्रणा में लीन हैं.

यह कर्क रेखा
जो मेरे शहर के थोड़ा बांये से गुजरती है
तुम्हारे शहर से बस ज़रा सा ही दायें तो है.

यहां मेरे चारों तरफ
हवा है,आकाश है, अकेलापन और उम्मीद है.

अगर यही चीज़ें
तुम्हारे आस पास भी हैं
तो देशकाल और वातावरण के तर्क से
हम कितने पास हैं...
देखो तो...!

Sunday, 14 August 2011

घिसे-पिटे जुमलों का पर्व


पहले महात्मा गांधी का यह कथन देखिए—“ स्वाभिमानी व्यक्ति के लिए सोने की ज़ंजीरें भी उतनी ही क्लेशकारी होती हैं जितनी कि लोहे की ज़ंजीरें. दंश ज़ंजीर मे निहित है, उस धातु में नहीं जिससे ज़ंजीर बनाई जाती है.
मेरी दृष्टि में सोने की ज़ंजीरें लोहे की ज़ंजीरों की तुलना में कहीं ज़्यादा बुरी हैं, क्योंकि लोहे की ज़ंजीर की क्लेशकारी प्रकृति मनुष्य आसानी से समझ पाता है, जबकि सोने की ज़ंजीर का दुख प्रायः भूल जाता है. इसलिए अगर भारत को ज़जीरों में बंधे रहना है तो मैं चाहूँगा कि ये सोने या किसी अन्य बहुमूल्य धातु की अपेक्षा लोहे की ही हो. “

कल आज़ादी की वर्षगांठ है. इस मौके पर गांधी का यह कथन याद आ रहा है तो यह बेसबब नहीं है, पर इस पर बात थोड़ा आगे चलकर करूँगा...पहले मेरे ज़हन में वे दृश्य आ रहे हैं, जहां एक गली के स्कूल में बस्ती का एक लुच्चा और दिल्ली के लाल किले पर प्रधानमंत्री हमें आज़ादी का मतलब समझा रहे हैं. हम हाथ में एक रुपये की झंडियां लिए यह दिखाने की कोशिश में हैं कि हम एक आज़ाद देश के नागरिक हैं, और हमें आज़ादी की समझ भी है.

स्वतंत्रता दिवस पर हर सरकारी-गैर सरकारी संस्थान में ध्वजारोहण और भाषण देने की परंपरा है. यह हमारा फ़र्ज़ भी है. इस मौके पर हर वर्ष यह याद किया जाता है कि आज़ादी कितने संघर्ष के बाद मिली है. अंग्रेजों के अत्याचार और भगत सिंह, आज़ाद, बिस्मिल वगैरह की कुर्बानी भी याद की जाती है. लता के गाये कालजयी गीत—“ ऐ मेरे वतन के लोगों...” ---को हर लाउडस्पीकर अपने ही अंदाज़ में सुबह से शाम तक बजाता है.

प्रायः विद्यालयों में आयोजित होने वाले समारोह ज़्यादा रोचक होते हैं. इन समारोहों में, विद्यालय-प्रमुख की यह मज़बूरी होती है कि वह उस इलाके के कुछ सर्वाधिक बदनाम लोगों को बतौर अतिथि आमंत्रित करे. विद्यालय के निरीह शिक्षक उनका माल्यार्पण करें और प्रसाद की प्रतीक्षा में बैठे छात्र, इन महानुभावों के महान उद्गारों पर ताली बजाएँ—जिसकी उन्हें बराबर ताकीद की जाती है. वक्तागण एक मंजे हुए देशभक्त की मुद्रा मे झंडे को सलाम करते हैं, गांधी की जय बोलते हैं, और सीधे विद्यालय के शिक्षकों को उनके कर्तव्य याद दिलाते हुए यह भी चेता देते हैं कि उनके जैसे देशभक्तों के रहते किसी भी शिक्षक को इस देश के भविष्य के साथ खिलवाड़ नहीं करने दिया जायेगा.

कल प्रधानमंत्री भी लाल किले पर चढ़ेंगे. वो बड़े आदमी हैं इसलिए उन्हें बड़ा देशभक्त माना जाना चाहिए. उनकी चिन्ता को बड़ी चिन्ता मानना चाहिए. प्रधानमंत्री हर साल चिंतित होते हैं. जब वो चिन्तित होते हैं तो देश की जनता का आह्वान करते हैं. आह्वान करना प्रधानमंत्री का विशिष्ट धर्म होता है, तो कतरा कर निकल जाना उनका अद्भुत कौतुक. हो सकता है कल प्रधानमंत्री कहें कि हमारे पड़ोसी, हमारे ऊपर बुरी नज़र लगाये हुए हैं...पर इस देश की जनता इतनी बहादुर है कि वह उनके मंसूबों पर पानी फेर देगी. इस देश की जनता अपने घर के दुश्मनों का तो कुछ कर नहीं पाती, बाहर वालों से कैसे निपटेगी, यह प्रधानमंत्री ही जानते होंगे. सेना के प्रमुख बार-बार प्रस्ताव भेजते हैं कि सेना के लिए बुनियादी ढाँचा तैयार करने की ज़रूरत है. चीन की सीमा पर जहां चीन अपनी सेनाओं को महज़ दो-तीन घंटे में भेज सकता है, वहां हमारे सैनिकों को पहुंचने में 15 दिन लगते हैं. सेना के प्रस्ताव रक्षा-मंत्रालय में दबे रहते हैं, उन्हे मंजूरी नही मिलती. पाकिस्तान से आतंकवादी घुसते हैं और हमारे जवानों के सिर काटकर ले जाते हैं. बांग्लादेश और नेपाल परोक्ष रूप से पाक-चीन की मदद करते हैं. ऐसे में प्रधानमंत्री का आशावाद काबिले तारीफ है.

आज़ादी के पर्व पर यह भी याद दिलाया जायेगा कि भारत कभी सोने की चिड़िया था, जिसे अंग्रेजों ने कैद कर लिया था. फिर उसे इंगलैण्ड ले गये....इमानदारी तो इतनी थी कि घरों में लोग ताले नहीं लगाते थे. आज सरकार की नीतियों और उद्यमशीलता के चलते यह देश फिर से सोने की चिड़िया में बदलने लगा हैं. लगभग 75 प्रतिशत बदल चुका है. 2025 तक यह चिड़िया सौ-फीसदी सोने की हो जायेगी. यह उत्साहवर्धक विचार, एक ही साथ सत्य भी है और भ्रामक भी. इसे आप तर्कशास्त्र में अपवाद की तरह भी देख सकते हैं. जिस काल में भारत को सोने की चिड़िया होना बताया जाता है, तब भी सम्पत्ति के सारे भंडार शासकों और व्यापारियों के ही पास थे.उसी की चकाचौंध विदेशियों को खींच लाती थी. आम जनता के घर में कुछ था ही नहीं तो ताले किसके लिए लगाते ? तत्कालीन इतिहास के जितने स्रोत हैं, वे शासकों के नियंत्रण में थे. राजा खुद अपनी निगरानी में इतिहास लिखवाते और स्तम्भ गड़वाते थे. इसलिए उनके विवरण पर भरोसा करना ठीक नहीं. कोई मीडिया तो तब था नहीं. तो यह मानने में कोई हर्ज़ नहीं कि सोने की चिड़िया का चित्र राजा के भाड़े के चित्रकारों ने बनाया था.

अब गांधी जी के उस कथन पर लौटते हैं जिसका जिक्र शुरुआत में किया था. यह कथन उन दिनों का है, जब भारत की आज़ादी लगभग तय हो गयी थी, और शीर्ष स्तर पर आज़ादी का खून चूसने की तैयारियां चल रही थीं. गांधीजी की केन्द्रीय भूमिका अब मात्र एक आवरण थी. संभवतः उन्हें यह आभास था कि अँग्रेजों से मुक्त होकर यह देश किन लोगों के हाथ में जाने वाला है. वो बार-बार कह रहे थे कि स्वराज का अर्थ है कि देश के कमज़ोर से कमज़ोर व्यक्ति को भी उन्नति का अवसर मिले...पर तब तक उनकी बातों को सुनना भावी शासकों ने कम कर दिया था. जब उन्होने यह कहा कि सोने की ज़ंजीर में बंधने से बेहतर है कि हम लोहे की ज़ंजीर में ही जकड़े रहें---तो यह उनकी दूरदृष्टि और गहन हताशा को दिखाता है.

आज 64 साल बाद इस देश के लोग ऐसे पूंजीपतियों के गुलाम हैं जिनकी कोई नागरिकता नहीं है. ये विश्व-नागरिक कहलाते हैं. 15 अगस्त को स्वतंत्रता का जश्न मनाते हुए हमारे पास कोई स्वप्न नहीं हैं. हम कुछ घिसे-पिटे जुमलों और बीस रुपए प्रतिदिन की औसत कमाई में अमर हैं.

Saturday, 6 August 2011

सिमोन...


नारी पुरुष को आदर्श का सृजनकर्तो तभी बना सकती है,जब उसके सम्बंध पुरुष के साथ नकारात्मक हों.
नकारात्मक सम्बंध पुरुष को असीमित बना देता है,जबकि सकारात्मक सम्बंध उसे सीमित कर देता है.
नारी तब तक ही आवश्यक है, जब तक वह विचार के रूप मे रहती है....

Sunday, 31 July 2011

वे प्रेमचंद को ' हिप-पॅाकेट ' में रखते हैं..!


प्रेमचंद हिन्दी साहित्य के तोरण-द्वार हैं.
कोई भी पाठक जब हिन्दी साहित्य के प्रति प्रेमोन्मुख होता है तो वह प्रेमचंदोन्मुख ही होता है. प्रेमचेद ने हिन्दी कथा साहित्य को जो लोकप्रियता, पठनीयता और सम्प्रेषणीयता दी, वह अद्वितीय है. उन्होने भारत को भारत से ही परिचित कराया.

लेकिन जैसा तोरण-द्वार के साथ होता है कि उसके नीचे से गुजरकर लोग उसे पीछे छोड़ देते हैं, प्रेमचंद के साथ भी यही हुआ. हिन्दी साहित्य और साहित्यकार आगे बढ़ गये और प्रेमचंद पीछे छूट गये.आगे की पूरी पीढ़ी उन्हें कथासम्राट, शोषितों-दलितों का मसीहा, गाँधीवादी, प्रगतिशील इत्यादि कहकर जयंती मना लेती है...फिर चुप.

इसमें कोई शक नहीं है कि 12 उपन्यासों और लगभग 300 कहानियों में विस्तीर्ण प्रेमचंद का कथा-साहित्य, अपने विषय-सेवेदना-पात्रों-भाषा और प्रभाव में दुनिया के सर्वश्रेष्ठ साहित्य के साथ साधिकार खड़ा होता है. मैं बिना संकोच और लिहाज के कहना चाहता हूँ कि उनकी लोकप्रियता और विश्व-साहित्य में उनके स्थान के पीछे न तो हमारे आलोचकों की कोई सदभावना है और न ही आगे के कथाकारों का परम्पराबोध. प्रेमचंद को यह स्थान दिलाते हैं--घीसू, माधव, होरी, धनिया और सूरदास जैसे पात्र एवम् कफ़न,गोदान,रंगभूमि जैसी रचनाएँ.

यह प्रश्न विचारणीय है कि भारतीय समाज,खासतौर से भारतीय ग्राम्य जीवन के इस अप्रतिम कथाकार की कोई परंपरा आगे के कथाकारों में नहीं मिलती, या इसे ऐसे कहना ज़्यादा ठीक रहेगा कि आगे का कोई कथाकार अपने को प्रेमचंद की परंपरा से जोड़ने में कतराता हुआ सा दिखता है. हमारे समकालीन कथाकार रेणु की परंपरा से जुड़ने को आतुर दिखते हैं, यश से जुड़ने में गर्व मानते हैं. यहाँ तक कि कमलेश्वर, राजेन्द्र यादव तक की परंपरा की बात होने लगी है, लेकिन किसी भी कथाकार के बारे में ऐसा कोई नहीं कहता कि यह प्रेमचंद के आगे का या पीछे का कथाकार है.

बाद के कथाकारों की दिक्कत समझ में आती है. प्रेमचंद का साहित्य ,यथार्थ की चाहे जितनी ठोस ज़मीन पर क्यों न खड़ा हो, उसकी परिणति आदर्शवाद में होती है. आप उनकी कोई भी रचना देखिए, प्रेमचंद एक आदर्श व्यवस्था की रचना करते हुए दिखते हैं--वह व्यवस्था चाहे जीवन में हो या समाज या राजनीति या अर्थनीति में.

मेरे खयाल में यही वह बिन्दु है जहाँ से प्रेमचंद अपने उत्तराधिकारियों द्वारा भुलाये जाने लगे. उनका आदर्शवाद आगे के रचनाकारों को प्रेरित नहीं कर सका क्योंकि युग और समय का यथार्थ उस आदर्श से अलग था. समय और जीवन, दोनो उत्तरोत्तर जटिल होते जा रहे थे.यथार्थ को पकड़ना और समझना इतना कठिन हो गया कि उसे व्यक्त करना और अधिक मुश्किल होता गया. ऐसे में कथाकारों की सारी रचनात्मक मेधा एक अजीबोगरीब आत्महन्ता यांत्रिकी में उलझती गई. अब प्रेमचंद के ज़माने जैसी मासूम किस्सागोई नहीं रह गई थी. अब कई कथाकार यथार्थ की पड़ताल और 'कथाश्रम' में विक्षिप्त भी होने लगे थे...उनके सामने समय अपने रूप और यौवन की दुर्निवार चुनौतियाँ पेश कर रहा है...तो रचनाकारों ने प्रेमचंद को 'सालिगराम ' बनाकर झोरी में रख दिया.

लेकिन मुझे लगता है कि यह एक भूल थी. इतने वर्षों बाद आज हम कहानी मे जिस 'कहन' और किस्सागोई के लिेए छटपटा रहे हैं, उसे हमने ही निकाल कर फेंक दिया था.उसी के साथ फेंक दिए गये थे प्रेमचंद. जो समय और महाजनी कुचक्र हमें विक्षिप्त किए जा रहे थे , उसी की दवा थी प्रेमचंद की कथाशैली.



प्रेमचंद के साहित्य की जो बात मुझे सबसे ज़्यादा प्रभावित करती है वह है, उसकी 'शाश्वत -समकालीनता'. या कम से कम , दीर्घ-समकालीनता. समय का चरित्र , उस समय के लोग बनाते हैं, और लोगों को बनाती है वह संस्कृति जो शताब्दियों की अंतर्क्रिया और अनुभवों के द्वंद्व से बनती है. प्रेमचंद की खूबी है कि वो संस्कृति की मुख्यधारा मे उतरते हैं.तट से नदी की धार को नहीं देखते. संस्कृति की यही पहचान प्रेमचंद के साहित्य को एक दीर्घ-समकालीनता प्रदान करती है. यही वज़ह है कि हम आज कोई भी प्रशन उठायें तो पाते हैं कि प्रेमचंद पहले ही उन प्रश्नों से टकरा रहे थे. फर्क सिर्फ इतना था कि उस समय उन्हें अपने प्रश्नों के उत्तर जल्दी और सहजता से मिल जा रहे थे ( जाहिर है, ज़्यादातर उत्तर उनके आदर्शवाद से ही निकल कर आ रहे थे.). जबकि आज एक प्रश्न के कई उत्तर रचनाकारों के सामने हैं. विडंबना यह है कि सब सही भी लगते हैं.

इसी से जुड़ी हुई एक और बात कहना चाहता हूँ....प्रेमचंद ने अपने वर्गशत्रु को पहचाना था. उनके सामने वह महाजन बिल्कुल साफ था जो सब कुछ खरीद लेने और सबको बेंच देने को तैयार था. वो पुरोहित-पंडे-ज़मींदार स्पष्ट थे जो समाज में होरी-धनिया और सूरदास बनाते थे. जीवन के वे अन्तर्विरोध भी स्पष्ट थे जो घीसू-माधव जैसे व्यक्तित्वों का निर्माण कर रहे थे...लेकिन आज हमारा वर्गशत्रु या तो अस्पष्ट है या हम अपने वर्गशत्रु के साथ मिले हुए हैं...हमारा साहित्य अगर किसी भी परिवर्तन का आधार बन पाने में अक्षम लग रहा है, तो उसके पीछे शत्रुओं के साथ हमारा रात्रिभोज एक प्रमुख कारण है.

प्रेमचंद किसी विचारधारा के प्रवक्ता नहीं बने. राजेन्द्र यादव प्रेमचंद की 'हंस ' को चाहे जो बना दें, प्रगतिशील भले ही प्रेमचंद को अपनी ' हिप-पॅाकेट ' में रखें, गाँधी के अनुयायी चाहे उन्हें लाठी बना लें, पर सच यही है कि प्रेमचंद इनमें से किसी के साथ कभी बंधे नहीं. फिर भी वो महान लेखक थे ! यहाँ यह सवाल उठता है कि क्या विचार धारा किसी लेखक को छोटा या बड़ा बनाती है ? अगर ऐसा होता तो एक महान विचारधारा का हर लेखक बड़ा होना चाहिए..!



मेरी समझ में बड़ा लेखक वही बनता है जो अपने 'समय' को बड़े समय में और अपनी ' स्थानीयता ' को 'देश ' में बदलने का हौसला करता है. प्रेमचंद ने यही किया. वो किसी विचार के प्रवक्ता नहीं बने , बल्कि भारत के उन दलितों, शोषितों और स्त्रियों की आवाज़ बने जिनका कोई नही था...जिनकी नारकीय ज़िन्दगी को सामाजिक गौरव की तरह गाया जा रहा था, और जिसे वेद-पौराणिक उदाहरणो से पुष्ट करके, प्राकृतिक न्याय के तहत कानून बनाने की तैयारी चल रही थी.

प्रेमचंद के बारे में जब लोग कहते है कि वे गाँधीवादी थे तो हँसी आती है. अव्वल तो ये कि गाँधीवाद जैसा कोई वाद हो नहीं सकता, क्योंकि गाँधी खुद इतने अंतर्विरोधों से घिरे हुए थे, और उनके सिद्धान्तों में इतनी सापेक्षता होती है कि उनका कोई ' वाद ' चलाया ही नहीं जा सकता. गाँधी जी की नैतिकताओं को आधार मानकर प्रेमचंद को देखा जाये तो भी उनका कथा साहित्य और विचार-साहित्य एकदम अलग जाते हुए दिखते हैं. गाँधी सत्य के अन्यतम् आग्रही होते हुए भी सामाजिक रीतियों को तोड़ने का साहस कम ही कर पाते हैं, जबकि प्रेमचंद ने रचनाओं में कई ऐसी मान्यताओं से विद्रोह किया है जो न केवल सर्वमान्य थीं, बल्कि उन्हें संवैधानिक और धार्मिक स्वीकृति भी मिली हुई थी.

प्रेमचंद ' श्रमिक चेतना ' के नहीं बल्कि ' कृषक चेतना ' के कथाकार थे. शायद यही वज़ह है कि प्रगतिशीलों ने उन्हें इतनी तरजीह नहीं दी और अपने को प्रेमचंद की परंपरा से जोड़ने में संकोच किया. इसे दुर्भाग्य ही कहा जाना चाहिए कि कुछ छिटपुट लेखन के अलावा आज भी 'किसान' की उपस्थिति , प्रगतिशील लेखन की मुख्य धारा में नहीं है. भारत के वामपंथी राजनेताओं और बुद्धिजीवियों ने किसानों के लिए वैसी लड़ाई कभी महीं लड़ी जैसी कि किसी मिल के दस-पांच मज़दूरों के लिए ही लड़ जाते हैं.

हम अगर आज भी शुरुआत करें तो प्रेमचंद अभी ज़्यादा पुराने नहीं हुए हैं कि 'छूट गये ' लगने लगें. हम चाहें तो उनकी शाश्वत समकालीनता में लेखन की सार्थकता और परिवर्तन का हौसला पा सकते हैं.

Friday, 29 July 2011

साहित्य और सिनेमा का आस-पड़ोस


अभी हाल ही में वरिष्ठ और मेरे अत्यंत प्रिय कथाकार काशीनाथ सिंह P.hd. की एक मौखिकी के सिलसिले में रीवा आये तो विवि के हिन्दी विभाग में उनका एक व्याख्यान आयोजित कर लिया गया. मेरा दुर्भाग्य ही था कि सूचना न मिल पाने के कारण मैं उन्हें सुन नहीं पाया. अख़बारों और मित्रों से ही जानकारी हुई कि काशीनाथ जी की मशहूर कृति ‘ काशी का अस्सी ‘ पर चन्द्रप्रकाश द्विवेदी एक फिल्म बना रहे हैं, जिसमें सनी देओल, रवि किशन आदि कलाकार भूमिका निभा रहे हैं.

इस सूचना से मन मे यह सवाल पैदा हुआ कि क्या सिनेमा का माध्यम इतना सक्षम है कि वह एक साहित्यिक कृति के साथ न्याय कर सके ? मैं इसको लेकर आश्वस्त नहीं हूँ. मैने ‘काशी का अस्सी’ दो-तीन बार पढ़ा है. इस कृति में—जिसे लेखक ने उपन्यास कहा है—बनारस के अस्सी चौराहे के इर्द-गिर्द के जीवन के संस्मरण हैं, जिन्हें लेखक ने अलग-अलग समय पर लिखा है. इन लेखों के पात्रों और घटनाओं में इतना स्वाभाविक तारतम्य है कि सभी लेखों को एक ज़गह इकट्ठा कर देने में इसका स्वरूप औपन्यासिक दिखने लगता है, लेकिन उपन्यास का सहज प्रवाह फिर भी नहीं सध पाया है.

इस कृति में संकलित हर संस्मरण एक अद्भुत आस्वाद पैदा करता है. चर-अचर सभी पात्रों को लेखक काशीनाथ सिंह ने जिस नज़र से देखा और प्रस्तुत किया है, मुझे नहीं लगता कि सिनेमा के पास वही आस्वाद पैदा कर पाने की क्षमता है. पात्रों की समय और स्थान के साथ अन्तर्सम्बंधों की जो डिटेलिंग और निहितार्थ लेखक ने शब्दों और इशारों से दिए हैं, उन्हें सिनेमा में व्यक्त कर पाना बहुत कठिन है. इन संस्मरणो में अधिकांश समय, लेखक पात्रों के बगल में बैठा हुआ है, जो उन पात्रों की हरकतों और उनके आपसी संवादों की व्याख्या करता चलता है. जाहिर है कि जो मर्म पाठक के सामने खुलता है, वह दृष्टा-लेखक की रुचि-संस्कार और निष्ठा से गुज़र कर आता है.

यहीं पर साहित्य और सिनेमा की सीमाएँ सामने आती हैं. साहित्य किसी दृश्य या घटना की जो व्याख्या या विश्लेषण करता है, हर पाठक के पास वही पहुँचता है. पाठकों के आस्वाद के स्तर में अंतर के आधार पर उसका प्रभाव अलग-अलग हो सकता है. यह अंतर प्रभाव की तीव्रता में होता है, उसके रूप में नहीं. सिनेमा के पास दृश्य होते हैं. उनकी व्याख्या और विश्लेषण की सुविधा बहुत ही कम होती है उसके पास. मज़े की बात यह है कि साहित्य में जो व्याख्या उसके प्रभाव को बढ़ा देती है, उसी व्याख्या की कोशिश सिनेमा के असर को चौपट कर देती है. जो विवरण साहित्य की ताकत होता है, वही सिनेमा की कमज़ोरी बन जाता है.

वहीं सिनेमा के पास अपनी कुछ विशिष्ट शक्तियाँ होती हैं जो साहित्य के पास नही हैं. संगीत के प्रयोग की शक्ति, सिनेमा को सम्प्रेषणीयता की ऐसी क्षमता प्रदान करती है जो उसे दूसरे और माध्यमों से अलहदा बनाता है. सिनेमा अपने ध्वनि और प्रकाश माध्यमों से ऐसे बहुत कुछ अव्यक्त को को व्यक्त कर देता है, जिसे कह पाने मे महान लेखक भी लड़खड़ा जाते हैं. काल के अतिक्रमण की जो सुविधा सिनेमा के पास होती है, वह साहित्य के पास ठीक उसी तरह से नहीं होती. मौन की जिस भाषा का इस्तेमाल सिनेमा सहजता से कर लेता है, उसी मौन को रचने के लिए साहित्य को पहले और बाद में बहुत सी वाणी खरचनी पड़ती है.

इस अंतर को और आसानी से समझने के लिए कुछ देर के लिए हम ऐसा करें कि कुछ महान कृतियों की अपनी कल्पना में फिल्म बनायें और कुछ महान फिल्मों की कल्पना मे ही कहानी लिखें. फिर देखिए कैसी हास्यास्पद स्थिति बनती है.
साहीत्य और सिनेमा का सम्बंध भी दो पड़ोसियों की तरह रहा. दोनो एक दूसरे के काम तो आते रहे लेकिन यह कभी सुनिश्चित नही हो पाया कि इनमे प्रेम है या नही. सिनेमा ने अपने आरंभिक चरण में साहित्य से ही प्राण-तत्व लिया. यह उसके भविष्य के लिए ज़रूरी भी था. दरअसल सिनेमा और साहित्य की उम्र में जितना अधिक अंतर है, उतना ही अंतर उनकी समझ और सामर्थ्य में भी है. सिनेमा अभी सिर्फ 117 साल का हुआ है. साहित्य की उम्र से इसकी तुलना की जाय तो यह अभी शिशु ही है साहित्य के सामने.

साहित्य के पास सिनेमा की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए अथाह भंडार है. भाव-दशा, पात्रों, दृश्यों, वास्तुकला, परिवेश और भावनात्मक स्थितियों के दृश्यात्मक ब्यौरे हैं. साथ ही भाव-भंगिमा, ध्वनियों, शब्दों और संगीत के सूक्ष्म प्रभावों तक के विवरण साहित्य के पास मौज़ूद हैं. सुखद बात यह है कि साहित्य ने सिनेमा की मदद में कभी कोताही नहीं की. सिनेमा को जब-जब ज़रूरत हुई साहित्य ने खुले मन से उसका सहयोग किया. यह बात और है कि आगे चलकर सिनेमा ने अपना खुद का एक लेखक-वर्ग तैयार कर लिया.

सिनेमा ने साहित्य के अनेक मनीषियों को अपनी ओर खींचा. पं.बेताब, मुंशी प्रेमचंद, जोश मलीहाबादी, पं.सुदर्शन, सआदत हसन मंटो, कृष्न चंदर, कैफ़ी आज़मी, जावेद अख़्तर, राजेन्द्र सिंह बेदी और गुलज़ार जैसे खालिस साहित्यिक व्यक्तित्व सिनेमा में अभिव्यक्ति के नये आयाम खोजने गये. पर दुर्भाग्य से अधिकतर के हाथ निराशा ही लगी. दरअसल सिनेमा एक व्यावसायिक माध्यम है और उसके सिद्धांत, लेने में अधिक और देने पर कम ही आधारित होते हैं. एक और बात ध्यान देने की है कि सिनेमा त्वरित और सहज लोकप्रियता के लिए रचा जाता है. यह भी एक वज़ह धी कि गंभीर साहित्यिक लेखक इस माध्यम से अपना सामंजस्य नहीं बनाये रख सके.

साहित्यकार फिल्मों में जाकर भले ही उतने सफल न रहे हों, लेकिन जब-जब सिनेमा ने साहित्यिक कृतियों पर फिल्में बनायी हैं तो एक नये रचनात्मक लोक की सृष्टि की है. प्रेमचन्द के ‘ गोदान ‘ पर बनी फिल्म को छोड़ दें तो रेणु की कहानी पर बनी ‘तीसरी कसम’ ने दुनिया को कुछ अमर पात्र दिये. महाश्वेतादेवी की कहानी पर बनी ‘रुदाली’ के दृश्य अविस्मरणीय हैं. विमल मित्र के उपन्यास पर बनी ‘साहब,बीवी और गुलाम’, टैगोर की कहानी-‘नष्टनीड़’ पर सत्यजीत राय की फिल्म ‘चारुलता’, सृजन के नये आयामों की तलाश करती हैं.


एक बहुत बड़ा फर्क अब साहित्य और सिनेमा की भाषा मे आया है. इसका सीधा संबन्ध दर्शकों-पाठकों की भागीदारी से है. सिनेमा का दर्शक सीधे शामिल होता है. हर दर्शक के पास हर स्थिति के लिए सुझाव होते हैं. सिनेमा की सारी सफलताओं-असफलताओं का दारोमदार इसी दर्शक-वर्ग पर होता है. सिनेमा को समीक्षकों की उतनी जरूरत नही होती जितनी साहित्य को होती है. यही वज़ह है कि सिनेमा रचने वालों ने दर्शक से तादात्म्य बैठाना शुरू किया तो सिनेमा की रचनात्मकता धीरे-धीरे कम होने लगी. सिनेमा ने बहुत आरंभिक समय मे ही अपने आप को एक स्वतंत्र विधा के रूप में महसूस करना शुरू कर दिया था. दर्शकों के मेल से उसने अपनी जो सिनेमाई भाषा विकसित की उस पर उसका भरोसा दिनो-दिन बढ़ता गया. साहित्य और सिनेमा की भाषा का अंतराल अब इतना बढ़ चुका है कि ये दोनो माध्यम अब महानगरीय पड़ोसियों की तरह दिखने लगे हैं.

Thursday, 21 July 2011

अहा और आह के बीच ग्राम्य जीवन !


जिन दिनों एक कवि के कण्ठ से फूट पड़ा था—“ अहा ग्राम्य जीवन भी क्या है “—उन दिनों भारत के गांव इतने हीनताबोध से ग्रस्त नहीं रहे होंगे जितने आज हैं. वह समय ऐसा था जब देश में शहरों की संख्या भी कम थी और उनके मायालोक की सूचनाएँ भी गांवों तक बहुत कम ही पहुँचती थीं. यह बात भले ही बहुत पुरानी न हो लेकिन इस समय भी गांवों के आर्थिक स्वाबलंबन के भग्नावशेष मौजूद थे. तब से लेकर आज तक में भारतीय गांवों के चित्र और चरित्र दोनो ही बहुत बदल गये हैं. हमारी बुजुर्ग और अधेड़ पीढ़ी जिस पीपल की छाँव और धानी चूनर के नास्टेल्जिया में जी लेती है, उसकी हकीकत बेहद दिल-शिकन है.

अभी हाल ही में सरकार ने जनगणना-2011 के अस्थाई आंकड़े जारी किये जो यह बताते हैं कि 121 करोड़ की आबादी के इस महादेश में 83 करोड़ लोग यानी लगभग 70 फीसदी लोग गांवों में ही रहते हैं. जब यह कहा जाता है कि भारत की आत्मा गांवों में बसती है, तो यह कथन अलंकारिक होने के बावजूद सच के बेहद करीब ठहरता है. भारत की आत्मा जिन गांवों में बसती है उनकी खुशहाली का अंदाज़ा लगाने के लिए यह जान लेना ठीक रहेगा कि पिछले एक दशक (2001-2011) में 3.5 फीसदी लोगों ने गांव छोड़ दिया और शहरों में जा बसे. 121 करोड़ की आबादी में साढ़े तीन प्रतिशत, सुनने मे चाहे भले ही छोटा लगे लेकिन हल करने में जो आँकड़ा सामने आता है वह इतना समझने के लिए पर्याप्त है कि इतनी जनसंख्या जब शहरों में पहुँची होगी तो उन शहरों पर दवाब कितना बढ़ गया होगा ?

लेकिन मैं यहाँ मैं सिक्के के दूसरे पहलू को देखना चाहता हूँ. मेरी दिलचस्पी इसमें है कि वो कौन से हालात हैं जिनकी वज़ह से इतनी बड़ी तादात में गांवों से शहर की ओर लोगों का पलायन हो रहा है, इस पर विचार करने से पहले यह भी जानते चलें कि पिछले दस सालों में भारत की आबादी में 18.14 करोड़ की बढ़ोतरी हुई है, जिसमें गांवों में 9.04 करोड़ और शहरों में 9.10 करोड़ लोग बढ़ गये हैं. और यह भी ध्यान मे रखना ठीक रहेगा कि इसी बीच केवल म.प्र. में ही लगभग 82 शहर बढ़ गये हैं और लगभग 500 गांव खत्म हो गये हैं.

नये शहरों की पैदाइश और पुराने गांवों की की मृत्यु चिन्ता की बात नहीं है. इसको लेकर भावुक होने की कोई ज़रूरत नहीं है क्योंकि यह विकास की एक सहज प्रक्रिया है. असल चिन्ता की वज़ह वह खाई है जो भरत के शहरों और ग्रामीण इलाकों के बीच बनी हुई है.

देश की अर्थव्यवस्था में ग्रामीण क्षेत्रों की हिस्सेदारी कम होते होते ऐसी दयनीय अवस्था में पहुँच गई है कि जो गांव पहले खुदमुख्तार हुआ करते थे वो आज आज शहरी उत्पादन-इकाइयों के टुकड़ो पर पलने के लिए मज़बूर हो गये हैं. इस देश की अर्थव्यवस्था इतनी तेजी से एकांगी हुई है कि अब भी अगर कोई इसे मिश्रित अर्थव्यवस्था कहता है तो उसका भ्रम बहुत जल्दी ही टूट जाएगा. उत्पादन और वितरण के लगभग सभी साधनों पर पूँजीवादी संस्थाओं का नियंत्रण हो चुका है. सार्वजनिक क्षेत्र की सभी इकाइयाँ बीमार होकर दम तोड़ रही हैं. ऐसी दशा में यह तो तय था कि नियंत्रण की डोर उन्हीं के हाथों में रहनी है जिनके पास पूँजी है.



जाहिर है कि पूँजी के सभी केन्द्र भारत के नगरों में स्थानान्तरित हो चुके हैं. गांव से कुम्हार,जुलाहे, तेली, मोची,दर्जी,दरवेश,बनिए,लोहार आदि विलुप्त हो चुके हैं. ये गांव की उत्पादन इकाइयां थीं. औद्योगीकरण की विक्षिप्त नीतियों के चलते ग्रामीण अर्थव्यवस्था के ये सभी स्तम्भ ध्वस्त हो चुके हैं. जनगणना के जब और आँकड़े सामने आयेंगे तो निश्चित ही यह पता चल जायेगा कि ग्रामीण क्षेत्रों में बेरोजगारी बढ़ने की दर, शहरी क्षेत्रों से बहुत अधिक होगी.

गांवों के पास उत्पादन की केवल एक इकाई रह गई है, वह है-कृषि. और यही उनकी दुर्दशा का भी कारण है. हमारे देश में तमाम प्रयासों के मायाजाल के बाद भी कृषि प्रकृति की कृपा पर ही निर्भर है. पिछले दो दशकों में प्रकृति का मिजाज़ कुछ इस तरह से बिगड़ा है कि गांव के बड़े-बड़े ज़मींदारों तक की मूँछों का पानी उतर गया है.आज से बीस साल पहले गांव के लोग जितनी ज़मीन और जितनी खेती में जिस रौब के साथ अपने परिवार को रखते थे , उतनी ही ज़मीन वाले कृषक आज दरिद्रता में जी रहे हैं.


इस दरिद्रता के आने की वज़ह भी साफ हैं. गांवों में दूरदर्शन पहुँचा, मोबाइल फोन पहुँचा. इनके साथ कुरकुरे,पेप्सी और अंकल चिप्स पहुँच गये. कारखानों में बनी पैकेट-बन्द चीज़ों ने गांव-घर की हस्तकला को समूल नष्ट कर दिया. लोगों की आकांक्षाओं को नागर पंख तो मिल गये, लेकिन आय के हाथ-पैर काट लिए गये. नगरों के दृश्य और महत्वाकांक्षाएं तो गांवों में पहुच गईं, लकिन उत्पादन और आय की विधियाँ वहाँ तक नहीं पहुँची. ऐसे में दरिद्रता के अलावा गांवों में और हो भी क्या सकता था.

दरिद्रता गांवों का भाग्य नही थी. इस इबारत को हमारे नीति-निर्माताओं ने लिखा है. मैने जिन गांवों को देखा है उनमे से अधिकांश में दूरदर्शन और मोबाइल के नेटवर्क तो मिल जाते हैं, लेकिन बिजली, पानी और सड़कें नहीं मिलतीं. जहां बिजली पहुँच भी चुकी है वहां कुछ इस तरह से पहुँची है कि पचास प्रतिशत लोग ही उसका उपयोग कर पाते हैं, वह भी चौबीस में से छः या आठ घंटे ही. पानी के लिए लोगों को दो-तीन मील दूर जाना पड़ता है. जिन गांवों तक सड़कें पहुँची भी हैं तो उनकी दशा पगडंडियों से बेहतर नहीं है.

सबसे खराब दशा शिक्षा और स्वास्थ्य की है. ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा का जो बुनियादी ढाँचा और स्तर है, उसकी तुलना शहरी शिक्षण संस्थाओं से करने पर भारत के गांवों की दरिद्रता के सारे राज़ खुल जाते हैं. दो झोपड़ीनुमा कमरों या किसी पेड़ के नीचे दो किसाननुमा मास्टरों के आगे उछल-कूद करते ढाई-तीन सौ बच्चे. पेट में दर्द होने पर किसी तलैया या घर की तरफ भगते बच्चे...स्कूल के साथ-साथ खेत की निदाई-गहाई भी निपटाते मास्टर जी—अमूमन यही है हमारे गांवों की शिक्षा व्यवस्था का विहंगम दृश्य. इन विद्यालयों से पढ़कर निकले बच्चे सिर्फ इतनी ही योग्यता हासिल कर पाते हैं कि वो शहरी बच्चों की दासता कर सकें. इन्टरमीडियट तक की शिक्षा के लिए इन्हें 10 से 15 किमी दूर जाना पड़ता है तथा उच्चशिक्षा के लिए कम से कम 50 किलोमीटर. ऐसे में आधे छात्रों की पढ़ाई इन्टर के बाद बन्द हो जाती है.



स्वास्थ्य सुविधाओं का हाल यह है कि गांव के हर घर के पिछवाड़े में नसबन्दी और पोलियो उन्मूलन के नारे तो पोत दिए गये हैं, लेकिन गांव के किसी व्यक्ति का मलेरिया भी ज़रा बिगड़ जाये तो कोई इलाज़ करने वाला नहीं मिलता. आस-पास के स्वास्थ्य केन्द्रों में जो चिकित्सक तैनात हैं वो कभी वहां जाते ही नही. हालांकि सरकार ने इन्हें खूब धमकाया भी और प्रलोभन भी दिया.

ऐसा भी नहीं है कि सरकार गांवों की दशा के प्रति बिल्कुल ही असंवेदनशील है. हर वर्ष केन्द्रीय और प्रादेशिक बजट में भारी भरकम राशि ग्रामीण विकास के लिए समर्पित की जाती है. रोज़गार से लेकर शिक्षा और स्वास्थ्य के लिए एक से बढ़कर एक योजनाओं का उद्घाटन और शिलान्यास चलता रहता है, लेकिन गांवों की छाती पर पड़ी दरिद्रता की शिला टस से मस नहीं होती. ऐसे में जो लोग भाग सकते हैं वो शहर भाग जाते हैं. शहर पहुँचकर उनका क्या हाल होता है, इसकी चर्चा फिर कभी करेंगें.

Monday, 18 July 2011

विभागाध्यक्ष की कार्पेट पर अमीबा...

हमेशा की तरह राजा विक्रमादित्य बेताल को लेकर चले तो शर्त के मुताबिक बेताल ने कहानी शुरू की--------


राजन, विश्वविद्यालय के अँग्रेजी के विभागाध्यक्ष प्रो.मिश्रा कई दिनो से परेशान थे...उनके साथ एक विचित्र किन्तु सत्य टाइप की घटना हो रही थी कई दिनों से ,जिसे वो किसी से कह नहीं पा रहे थे......

कोई उनके चेम्बर में, फर्श पर बिछी कीमती कालीन पर पेशाब कर जाता था.....

प्रो.मिश्रा शौकीन तबीयत के आदमी थे. सो अँग्रेजी विभाग में अपने चेम्बर को खूब आकर्षक रंग-रूप दे रखा था...एक रोज़ जब विभाग में पहुचे तो देखा कि उनकी टेबल के ठीक सामने हरे रंग की कालीन पर फाइन आर्ट टाइप का एक धब्बा बना हुआ है. चपरासी को बुलाकर पूछा----" ये धब्बा कैसा है यहाँ पर ? ".....
चपरासी कुछ सकपकाते हुए बोला----" साहब पानी का होगा.".....प्रो.मिश्रा ने उँगलियों से धब्बे को दबाया और सूँघकर बोले----" बेवकूफ , पानी का नही पेशाब का धब्बा है !"

उस दिन से रोज़ कोई उनके पहुँचने से पहले कलीन पर पेशाब कर जाता था. विभाग का दरवाज़ा खोलकर , चपरासी साफ-सफाई के बाद जब पानी लेने चला जाता, इसी बीच कोई आकर ये कारनामा कर जाता....

प्रो.मिश्रा ने तंग आकर पेशाब करने वाले को पकड़ने की योजना बनाई...

एक दिन वो अपने समय से काफी पहले विभाग पहुँच गये.दरवाज़ा उन्होने खुद खोला, और जाकर आल्मारी के पीछे छुप गये....लगभग पौन घंटा बाद एक आकृति ने उनके कमरे में प्रवेश किया....इधर-उधर देखकर आकृति विभागाध्यक्ष के टेबल के सामने बैठ गई.....और जब उठी तो वहाँ पर अमीबा की तरह का एक गीला धब्बा बन गया था.....

आकृति जाने को ही थी कि प्रो. मिश्रा आल्मारी के पीछे से कूद पड़े----" मिसेज़ तिवारी आप !! ये क्या करती हैं आप !!!"....
असिस्टेन्ट प्रो., मिसेज़ तिवारी अवाक् रह गईं थीं...सर..सर.. करते हुए सर्रर्रर्रर्र.....से बाहर भागीं......


माज़रा ये था कि प्रो. मिश्रा चाहते थे कि मिसेज़ तिवारी मातहत होने के नाते उन्हें अपना प्रेम-पात्र बनायें, जबकि मिसेज़ तिवारी अपना बसन्त रसायन विभाग के विभागाध्यक्ष पर लुटा रही थीं....बहुत समझाने-बुझाने के बाद भी जब मिसेज़ तिवरी नहीं समझीं तो प्रो. मिश्रा ने उनकी वेतनवृद्धि में अड़ंगा लगा दिया था....खिसियाकर मिसेज़ तिवारी ने उनके चेम्बर में पेशाब करना शुरू कर दिया.

कहानी खत्म कर बेताल ने प्रश्न पूछा-----" अब तू ही बता विक्रम ! असली अपराधी कौन है, मिसेज़ तिवारी--कि प्रो. मिश्रा ?? "

Sunday, 17 July 2011

स्व. चिड़ीमार वनवासी तीरंदाजी सम्मान




जब कई दिनों तक राजा विक्रमादित्य बेताल को पकड़ने नहीं आया तो बेताल उदास रहने लगा. चुड़ैलों के नृत्य-गान भी उसका मन न बहला पाते. शाम होते ही वह श्मशान के मुख्य दरवाज़े पर जाकर बैठ जाता और विक्रम की प्रतीक्षा करता.

बहुत दिन बाद जब विक्रम श्मशान आया तो कुछ दुर्बल दिखाई पड़ रहा था. उसे देखकर बेताल ने कुछ चिन्तित होकर उसकी दुर्बलता का कारण पूछा. विक्रम ने बताया कि उसे बवासीर की बीमारी हो गई थी. गुदामार्ग से निरंतर रक्त-स्राव के कारण दुर्बलता आ गई है.

विक्रम की यह दशा देखकर बेताल उसके साथ पैदल ही चल पड़ा...रास्ता काटने के लिए उसने कहानी शुरू की----

राजन् ! तुमने महाभारत के गुरु द्रोण का नाम तो सुना ही होगा , जिनके प्रिय शिष्य अर्जुन ने तीरंदाजी में बड़ी ख्याति अर्जित की थी. गुरु द्रोण युद्ध-कला से सम्बंधित एक त्रैमासिक पत्रिका ' आखेट ' का प्रकाशन भी किया करते थे, जिसका अधिकतर काम-काज अर्जुन ही देखता था. यह पत्रिका राजवंश से आर्थिक सहायता प्राप्त थी.

एक दिन गुरु द्रोण अपने शयनकक्ष में विश्राम कर रहे थे. गर्मी का समय था. अर्जुन आम की गुठली को पीसकर, सरसो के तेल में मिलाकर ले आया. यह लेप गुरु द्रोण के तलवों में मलने लगा. इस लेप से गर्मी का प्रकोप कदाचित कुछ कम हो जाता था.

तलवों में लेप मलते हुए अर्जुन किंचित सकुचाते हुए गुरु द्रोण से कहा--" गुरुवर, आपकी कृपा से आज मुझे संसार का सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर माना जाता है. एकलव्य का अंगूठा मागकर ,मेरे पथ के सभी कांटे आपने दूर कर दिए. कर्ण का प्रमाणपत्र तो आपने पहले ही निरस्त कर दिया था. अब मेरा कोई प्रतिद्वन्द्वी नहीं है...गुरुवर अब तीरंदाजी का कोई सम्मान भी मिल जाता तो मेरी भी प्रतिष्ठा बढ़ जाती और आपकी भी."



गुरु द्रोण ने करवट बदली. उदर में अठखेलियां करती हुई वायु को मुक्त किया और बोले---" हाँ अर्जुन, मैं भी कई दिनों से यही सोच रहा था. तुम्हें सम्मान मिल जाने से हमारी कोचिंग संस्था का नाम ऊँचा होगा और विद्यार्थियों की संख्या भी बढ़ जायेगी....ऐसा करो, हमारी पत्रिका के इसी अंक में एक सम्मान की घोषणा कर दो---' स्व. चिड़ीमार वनवासी तीरंदाजी सम्मान ' .....अर्जुन ने बीच में टोंका---" गुरुदेव,ये चिड़ीमार कौन था ?"

" यह एक बहेलिया था "---गुरु द्रोण ने बताया. " मेरे ही गांव का था. बाल्यावस्था में हम लोग इससे तीतर और बटेर मरवाकर चुपके से खाया करते थे. बड़ा अचूक निशानेबाज़ था." " और सुनो, ऐसा करना "---गुरु द्रोण ने रणनीति समझाते हुए कहा---" इस सम्मान के लिए एक तीन सदस्यीय निर्णायक मंडल बना लो...एक तो कृपाचार्य ही हो जायेंगे. दो और लोगों के नाम सोचकर उन्हें पत्र लिख दो.मगध और काशी के आचार्यों को ही रख लो, उनकी नियुक्ति के समय मैं ही एक्सपर्ट था.कोई गड़बड़ न होगी. अपना बायोडाटा बनाकर तीनो निर्णायकों के पास भेज दो...अगर दूसरे लोगों की प्रविष्टियां आती हैं तो उन्हें भेजने की आवश्यकता नहीं है...यह तो सभी जानते ही हैं कि तुम संसार के सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर हो."

अर्जुन ने पुलकित होकर द्रोण के चरणो में सिर रखा और सीधे पत्रिका-कार्यालय चला गया.

त्रैमासिक पत्रिका-' आखेट ' के ताज़ा अंक में ' स्व. चिड़ीमार वनवासी तीरंदाजी सम्मान ' की सूचना प्रकाशित हुई. पात्र व्यक्तियों से प्रविष्टियां मगाई गई थीं. अन्य लोगों के साथ कर्ण और एकलव्य ने भी प्रविष्टि भेजीं जिन्हें पत्रिका कार्यालय में ही जमा कर दिया गया. गुरु द्रोण की तरफ से एक पत्र लिखकर कर्ण और एकलव्य को सूचित किया गया कि चूँकि आपने अपने बायोडाटा में जाति-प्रमाणपत्र नहीं लगाया था, अतएव आपकी प्रविष्टि विचार योग्य नहीं पाई गई.

'आखेट ' के दीपावली विशेषांक में, 'स्व. चिड़ीमार वनवासी तीरंदाजी सम्मान ' अर्जुन को देने की घोषणा प्रकाशित हुई और यह भी सूचना दी गई कि नववर्ष के प्रथम दिन हस्तिनापुर नरेश धृतराष्ट्र यह सम्मान प्रदान करेंगे.

इस सूचना के बाद दुर्योधन वगैरह ने कुछ हो-हल्ला मचाया लेकिन पितामह ने उन्हें " घर की ही बात है "-का हवाला देकर शांत करा दिया.

कहानी खत्म कर बेताल ने विक्रम से पूछा---" राजन् तनिक विचार कर बताओ ! यह सम्मान देकर द्रोण ने किसकी प्रतिभा का अपमान किया है ??? "
1>