Friday, 13 July 2012
Tuesday, 10 July 2012
हमारी निरुपायता का कोई जवाब भी है !
आप भी महसूस तो कर ही रहे होंगे की दिल्ली सरकार का रथ एक अर्से से
लड़खड़ाया हुआ है. न तो उसकी दिशा समझ में आ रही है,न ही उसकी गति का कोई अंदाज़ा
मिल पा रहा है. इस रथ के कुछ घोड़े कभी सरपट दौड़ लगाते हैं तो कुछ चलने को तैयार
ही नहीं हैं. जो सारथी है वह कभी बेचारा तो कभी अनाड़ी नज़र आता है.
राजनीतिक
स्वप्न-शून्यता की यह स्थिति तब है जब देश अनेक स्तरों पर गंभीर चुनौतियों का सामना
कर रहा है. बेतहाशा बढ़ती मंहगाई के बीच सरकार के कण्ठ से एक लाचार आश्वासन के
अलावा कुछ नहीं फूटता है. आम जनता न तो अर्थशास्त्र की सैद्धान्तिकी समझती है और न
ही उसे सेन्सेक्स की उत्तेजना से कोई फर्क पड़ता. दशमलव के इर्द-गिर्द,
मुद्रा-स्फीति किस तरह से ठुमके लगाती है, आम जनता का मन इससे भी नहीं बहलता. दावा
तो नहीं पर विश्वास है कि देश की अस्सी फीसदी जनता तो जानती भी नहीं है कि यह
मुद्रा-स्फीति किस बला का नाम है, और सेन्सेक्स की उत्तेजना किस वियाग्रा को खाने
से बढ़ती है !!
यही अस्सी फीसदी जनता
है जो सरकार के भरोसे नहीं, भगवान के भरोसे जी रही है. जिन माई-बापों को चुनकर
उसने दिल्ली-भोपाल भेजा, उन्हें न तो इस जनता से कोई लेना देना है और न ही देश
चलाने का शऊर है. आप अगर ध्यान से इन रहनुमाओं के बयान और हरकतें देखते होंगे तो
अपना माथा ज़रूर ठोंकते होंगे कि इन जाहिलों को उस गद्दी तक पहुँचाने में एक वोट
आपका भी है. आपका एक वोट आपको कितनी चोट पहुँचाता है, यह सिर्फ आप ही बेहतर जानते
हैं.
लेकिन सत्ता के गलियारों
में बे-खौफ़ घूमते ये सफेदपोश सचमुच इतने जाहिल भी नही हैं. हमारे भारत नाम के इस
राष्ट्रीय-उद्यान के ये राष्ट्रीय प्रतीक हैं. यह देश इनके लिए आरक्षित है. इन्हें
यह विशेषाधिकार है कि अब ये अपनी जनता खुद चुन लें.
जिन नेताओं को पहले
हमने चुना, उन्होने अब अपनी जनता चुन ली है. सौ में अस्सी घटाने के बाद जो बीस
फीसदी लोग बचते हैं-यह देश उनका है. तरक्की के सारे रास्ते उनके हैं. सारे
राग-रंग, रोशनी के सभी झरोखे इसी बीस फीसद जनता के हैं. यहीं अंबानी-टाटा,
कलमाणी,राजा और सत्यसाँईं जैसे लोग पैदा होते है, जिनकी सम्पत्तियों का कोई हिसाब
नहीं. सरकार का सारा खाद-पानी इन्हीं पौधों को पोषने में खत्म हो जाता है. इसी
हरियाली को दुनिया को दिखाकर सरकार वाहवाही लूटती है. अमेरिका और चीन के सामने
खड़े होकर ताल ठोकने वाली सरकार को क्या पता नहीं होगा कि देश की सत्तर प्रतिशत
आबादी बीस रुपये प्रतिदिन की औसत कमाई में क्या खाती और क्या पहनती होगी ? ये सत्तर प्रतिशत लोग अगर भ्रष्टाचार न करें, लूट-रहजनी न करें, डकैती
न डालें तो क्या जीना संभव है बीस रुपये रोज़ की कमाई में !!!
पता तो है.पता तो यह भी है कि ए.राजा,
राजा कैसे बने. पता तो यह भी है कि कलमांड़ी, कनुमोझी के दरवाज़े किधर खुलते हैं
और किधर बंद होते हैं. सरकार को पता तो यह भी है कि स्विटजरलैण्ड कौन जाता है और
वहाँ के बैंकों में किसका पैसा है. हम और आप, जिन्होंने स्विटजरलैण्ड का नक्शा तक
ठीक से नहीं देखा है, वहाँ पैसा जमा करने तो जा नहीं सकते. हमारी ज़ेबों में जो
पैसा होता है वह शाम को घर लौटते समय किराने की दूकान और सब्ज़ी के ठेलों पर जमा
हो जाता है.
तो बोलें जितने
अन्ना-बाबा बोलते हों....सरकार ने कान में रुई ठूंस लिया है. सुप्रीम कोर्ट का यह
कहते-कहते दम फूलने लगा है कि भाई काला धन जमा कराने वालों का नाम जाहिर करिए. कौन
बताएगा ? पक्ष या विपक्ष ?? किसका दामन साफ है.
जो सरकार में हैं, सारे संसाधनों पर उनका कब्ज़ा है. कमाई के अनन्त मनोरम स्रोत
हैं. जो विपक्ष में हैं वो कभी सत्ता में थे या आगे कभी होंगे. तो कौन अपने पैरों
पर कुल्हाड़ी मारेगा भला !
लोकपाल और काले धन को लेकर सरकार और
विपक्ष दोनो ने जिस तरह का चूहे-बिल्ली का खेल शुरू किया है वह बेहद शर्मनाक है.
यह पहली बार हुआ था कि देश की जनता ने अपने प्रतिनिधियों पर गंभीर अविश्वास जताते
हुए सीधा सवाल पूछा था कि क्यों न आपके ऊपर भी निगरानी रखी जाये ? इस सवाल पर सिब्बल-दिग्विजय की तिलमिलाहट को सारे देश ने देखा. उनके
बेशर्मी भरे बयानों को हर कान ने सुना. भ्रष्टाचार के खिलाफ इस सशक्त जनचेतना को
निश्चेत करने के लिए सरकार ने जो रवैया अपना रखा है, उसे देखकर ऐसा लगता ही नहीं
कि हम एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में रह रहे हैं.
दरअसल हमारा लोकतंत्र एक बहुत बड़ा भ्रम है. एक
इन्द्रजाल है. अपनी सारी मनमोहक अवधारणाओं के बावजूद इस देश में लोकतंत्र शोषण,
भ्रष्टाचार,अनैतिकता और शक्ति-प्रदर्शन की एक वैधानिक व्यवस्था बन गया है. बड़ा
हास्यास्पद और शर्मनाक लगता है यह उल्लेख करना कि इस देश में चपरासी जैसे सबसे
छोटे पद के लिए भी बारहवीं कक्षा उत्तीर्ण होना न्यूनतम योग्यता है, लेकिन देश का
राष्ट्रपति-प्रधानमंत्री-नेता प्रतिपक्ष बनने के लिए कोई योग्यता निर्धारित नहीं
है !!
यह ऐसा समय है जब न
तो ठीक से विलाप किया जा सकता और न ही पूरी तरह से आशावादी हुआ जा सकता. उम्मीद
बूमरेंग की तरह लौटकर अपने ही पास आ जाती है. बदलाव की ज़रूरत तो लगती है, लेकिन
उसके लिए न हौसला है, न समय. हमारी निरुपायता का कोई जवाब नहीं.
विमलेन्दु
Friday, 6 July 2012
वह डरा हुआ है इन दिनों
एक कद्दावर पेड़ है वहऔर अपने काठ से डरा हुआ है.
वह एक समुद्र है
उसे पानी से बेहद डर लगता है इन दिनों.
ऊँचाई से डरा हुआ
एक पहाड़ है वो ।
जो चीज़ें जितनी सरल दिखती थीं
शुरू में उसे
वही उसकी सबसे मुश्किल पहेलियाँ हैं अब
जैसे नींद जैसे चिड़ियाँ
जैसे स्त्रियाँ जैसे प्रेम जैसे हँसी ।
जिसकी धार में वह उतर गया था
बिना कुछ सोचे
उस नदी को ही
अब नहीं था उस पर भरोसा ।
जिनका गहना था वो
वही अब परखना चाह रहे थे
उसका खरापन
किसी नयी आग में.
जिन्होंने काजल की तरह
आँजा था बरसों उसे
उन्हें अब
उसके सांवले रंग पर भी था एतराज़ ।
जिनका सपना था वह
वही उसके जीवन में
सबसे निर्दयी सच की तरह आये ।
वह इतना डरा हुआ है इन दिनों
कि अँधेरे में उठकर
अपने ही भीतर
बनाता रहता है एक गुफा ।
वह अपने ही खिलाफ़
कहीं अदृश्य हो जाना चाहता है ।।
---------------------- विमलेन्दु
Wednesday, 4 July 2012
क्यों चाहिए मोदी को यह देश !!
उस दिन जब डबलरोटी बेचने वाले ने कहा कि
नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री बनना चाहिए, तो मैं चौंका नहीं. इस देश के धर्म
निरपेक्ष शरीर की किसी धमनी में नरेन्द्र मोदी ग्रुप का खून भी दौड़ रहा है. उसने
कहा कि देख लीजिएगा, मोदी प्रधानमंत्री बन गये तो दो दिन के अंदर पूरा कश्मीर अपना
होगा और सारे कटुए पाकिस्तान भाग जायेंगे.....इधर मैने देखा है कि एक अनपढ़ से
लेकर पढ़े-लिखे लोगों की राय भी कमोबेश इस डबलरोटी वाले जैसी ही है. हाल के
घटनाक्रमों के बाद लोग खुलकर कहने लगे हैं कि भाजपा को चाहे न हो, देश को मोदी की
ज़रूरत है. मोदी भी इस बह रही अन्तर्धारा को भाँप गये हैं, और अपने सारे दाँव-पेंच
उसी के मुताबिक चल रहे हैं.
सवाल यह है कि आखिर इस देश को नरेन्द्र
मोदी क्यों चाहिए ? वो
कौन सी खूबियाँ हैं मोदी की जो बिन किसी तुक के उनका नाम प्रधानमंत्री पद के लिए
उछाल रही हैं ? इसी का पूरक प्रश्न
यह है कि वो कौन सी नाकामियाँ हैं हमारे हुक्मरानों की जो मोदी के लिए ज़गह तैयार
कर रही हैं ? क्या पूरे देश का
मानस ही आहिस्ता-आहिस्ता हिन्दूवादी होता जा रहा है ? और सवाल यह भी है कि क्या कभी भी यह देश एक हिन्दू
देश रहा है ?
इन सवालों पर सोचने से पहले हम मोदी की
पार्टी भाजपा पर थोड़ी बात कर लें, क्योंकि मोदी का ज़िक्र भाजपा के बिना पूरा
नहीं होगा , और आगे फिर इस ज़िक्र की गुंजाइश शायद न बने. अपने अन्तर्कलहों, अनिर्णयों
और सत्तालोलुप क्षत्रपों की महत्वाकांक्षाओं से जूझ रही भारतीय जनता पार्टी कुछ
वर्षों से सत्ता की दौड़ से बाहर चल रही थी. उनका राम मंदिर का मुद्दा, महगाई और
आर्थिक विषमता के मुद्दे के आगे अविश्वसनीय और अप्रासंगिक हो चुका था. भाजपा देश
की मूलधारा की राजनीति और संघ की हिन्दुत्ववादी राजनीति के बीचों-बीच ऐसे फँसी हुई
है कि वह एक सुसंगठित पार्टी होते हुए भी देश को एक बेहतर शासन दे पाने के लिए
आश्वस्त नहीं करती. अटल बिहारी बाजपेयी के वानप्रस्थ और नब्बे के दशक में चल रहे
आडवानी के गृहस्थ-आश्रम-मोह के चलते पार्टी में कोई नेतृत्व नज़र नहीं आता. आजवानी
की हालत उस जर्जर बुजुर्ग जैसी है, जो घर के एक कोने में खटिया पर पड़ा अब भी खुद
को घर का मालिक समझता है, और उसके बच्चे उसकी उपेक्षा किए जाते हैं.
ऐसे में नरेन्द्र मोदी एक नये तरह का
हिन्दुत्व लेकर आये हैं, जो राम मंदिर से नहीं, बल्कि विकास और समृद्धि से जुड़ता
है. मगर शर्त वही है अब भी—मुसलमानों
का सफाया. संघ का यह सपना भगवान राम तो पूरा नहीं कर पाये. उन्हें तलाश किसी और
देवता की थी. तो इस बार उन्होने देवी लक्ष्मी को पकड़ा है. कहा जा रहा है कि
गुजरात में लक्ष्मी बरस रही हैं. और यह उनके साधक नरेन्द्र मोदी की साधना का फल
है. तो अब नरेन्द्र मोदी संघ के नए क्रान्तिदूत बन गये हैं. संघ ने पूरी भाजपा को
दरकिनार करते हुए मोदी को अगला प्रधानमंत्री घोषित कर दिया है. यह राजनीतिक चूक
संघ हमेशा करता है. पर क्या जनता इस तरह की तानाशाही के लिए तैयार भी है ?
बहरहाल अब लौटते हैं अपने मूल प्रश्नों की ओर. क्यों चाहिए देश को मोदी ? पिछले एक दशक में देश ने कुछ आर्थिक तरक्की ज़रूर की है लेकिन उसकी छवि एक नरम या सच कहें तो डरपोक देश की बनी है. एक के बाद एक हुए आतंकवादी हमले, देश की संसद पर हुआ हमला, कश्मीर और अरुणांचल में पाकिस्तान-चीन का बढ़ता दबदबा, और तो और बंगलादेश और नेपाल का भी गाहे बगाहे आँखें तरेरना---इन घटनाओं पर सरकार के रवैये ने देश की जनता को निराश किया है. एक हद तक शर्मशार भी. हमारा देश इन घटनाओं के लिए ज़िम्मेदार लोगों के प्रति कभी भी असरदार प्रतिरोध नहीं जता पाया. अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में हमारी भूमिका लगातार बेअसर होती गई. पाकिस्तान खुलेआम हमें नुकसान पहुँचाता है और हम कहते हैं कि सुधर जाओ वरना नतीज़ा ठीक नहीं होगा !
बहरहाल अब लौटते हैं अपने मूल प्रश्नों की ओर. क्यों चाहिए देश को मोदी ? पिछले एक दशक में देश ने कुछ आर्थिक तरक्की ज़रूर की है लेकिन उसकी छवि एक नरम या सच कहें तो डरपोक देश की बनी है. एक के बाद एक हुए आतंकवादी हमले, देश की संसद पर हुआ हमला, कश्मीर और अरुणांचल में पाकिस्तान-चीन का बढ़ता दबदबा, और तो और बंगलादेश और नेपाल का भी गाहे बगाहे आँखें तरेरना---इन घटनाओं पर सरकार के रवैये ने देश की जनता को निराश किया है. एक हद तक शर्मशार भी. हमारा देश इन घटनाओं के लिए ज़िम्मेदार लोगों के प्रति कभी भी असरदार प्रतिरोध नहीं जता पाया. अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में हमारी भूमिका लगातार बेअसर होती गई. पाकिस्तान खुलेआम हमें नुकसान पहुँचाता है और हम कहते हैं कि सुधर जाओ वरना नतीज़ा ठीक नहीं होगा !
तो पाकिस्तान सुधरता नहीं है और देश के
लोग नतीज़ा चाहते हैं. देश में टाटा-अंबानी तो बढ़ रहे हैं पर गरीबी कम नहीं हो
रही है ! इसलिए देश के लोग भारत को गुजरात बनाना चाहते
हैं !! इसलिए देश के लोग
नरेन्द्र मोदी को चाहते हैं.
अदालत से बाइज़्ज़त बरी नरेन्द्र मोदी
को जनता गुजरात में सामूहिक नरसंहार का अपराधी मानती है. 2002 के दंगों में सरकार
ने मुसलमानों के कत्लेआम की छूट दी जिसके प्रमाण यद्यपि किसी भी अदालत के पाल नहीं
हैं, लेकिन गुजरात के कण-कण में मौजूद हैं. ये कहानी शायद वो लोग बता सकेंगे
जिन्हें दंगों के बाद गुजरात सरकार के राहत शिविरों में रखा गया और उसके बाद आज तक
उनका पता नहीं चला. इस बात की तस्दीक चुनाव आयोग ने भी की थी. गुजरात दंगों के बाद
हुए विधानसभा चुनावों के लिए आयोग ने जब मतदाता सूची का नवीनीकरण करवाया तो लाखों
मुसलमान सूची से गायब मिले. इन गायब लोगों का पता आज भी नहीं चल पा रहा है. गुजरात
में आज मुसलमानों की वही स्थिति है जो कश्मीर में पंडितों की है---पराजित,
विस्थापित !
चलिए अदालतों के पास नहीं हैं सबूत.
पीड़ितों का भी कोई अता-पता नहीं. पर उस मीडिया के वो फुटेज कहाँ गये जिनमें
गुजरात के पीड़ितों की सिसकियाँ, उनके यौनांगों से रिसते खून के धब्बे कैद हैं ? आज यही मीडिया मोदी का गुणगान करते थकता
नहीं है. दंगों के बाद हुए चुनावों से ही लोगों ने कहना शुरू कर दिया था कि मोदी
ने मीडिया को खरीद लिया है. मीडिया का तर्क है कि क्या मीडिया के पेट नहीं होता ? उसके बाल-बच्चे नहीं होते ?? किसी और के पास क्षमता हो तो वो खरीद ले
! हम तो बिकने के लिए
तैयार ही बैठे हैं !!
मोदी और मीडिया के हौसले तब और बुलन्द
हो गये जब कुछ समय पहले ‘टाइम’ मैगज़ीन में मोदी पर एक आलेख छप गया,
जिसमें उन्हें एक कुशल राजनीतिक प्रबंधक और दृढ़ इच्छाशक्ति वाला व्यक्ति कहा गया.
इन दोनों ही विशेषणों से हमें कोई आपत्ति नहीं है. ‘टाइम’ द्वारा मोदी की प्रशंसा चौंकाती नहीं
है. हम जानते हैं कि वर्षों भाजपा का आर्थिक और नैतिक पोषण अमेरिका से ही होता रहा
है. यह वही अमेरिका है जिसने एक बार नरेन्द्र मोदी को अपने यहाँ आने के लिए वीज़ा
देने से इन्कार कर दिया था. फिर भी एक हिन्दू राष्ट्र ‘भारत’ , कई मायनों में अमेरिका के लिए ज़्यादा
सुविधाजनक होगा. इसकी चर्चा हम कभी बाद में करेंगे.
मोदी की इन योग्यताओं के अलावा, कुछ और
बातें हैं जो उनके स्वप्न के आड़े आती हैं. दरअसल सरकार किसी एक आदमी के तपोबल से
नहीं चलती है. जैसे मनमोहन सिंह जैसे इमानदार और योग्य व्यक्ति नहीं चला पा रहे
हैं. सरकार एक समूह के प्रयास से चलती है. अब मोदी के साथ के समूह को ज़रा देखिए.
आडवानी, सुषमा, जेटली, वेंकैया नायडू, जयललिता, नीतीश कुमार, चन्द्रबाबू नायडू,
जसवंत सिंह, मुरली मनोहर जोशी----ये सभी पी.एम. इन वेटिन्ग हैं, और नरेन्द्र मोदी
से अग्रिम पंक्ति के नेता हैं. संघ की हज़ार घोषणाओं के बाद भी इनमें से किसी ने
आज तक नहीं कहा कि मोदी प्रधानमंत्री बनें. आप खुद ही सोचिए, इनके रहते क्या मोदी
गुजरात जैसा कथित करिश्मा कर पायेंगे ? मोदी
पर अविश्वास का आलम यह है कि ये नेता अपने प्रदेशों में चुनाव के समय मोदी को
प्रचार के लिए आने से रोक देते हैं. साफ है कि मोदी की साम्प्रदायिक छवि को कहीं न
कहीं उन्हीं के साथी स्वीकार करते हैं. ऐसे में मोदी की राह और कठिन ही दिखती है.
तो अमेरिका भी भारत को एक
हिन्दू-राष्ट्र देखना चाहता है, और संघ-भाजपा-मोदी भी इसे हिन्दू-राष्ट्र बनाकर
इसका गौरव पुनः वापस लाना चाहते हैं. यह गौरव की वापसी का ढोंग ही एक बड़ी समस्या
है. इतिहास को ज़रा गौर से देखें तो समझ में आता है कि भारत कभी भी हिन्दू-राष्ट्र
नहीं रहा. बहुत समय तक तो यह ठीक से एक राष्ट्र भी नहीं रहा. छोट-छोटे राज्यों का
एक समूह था जो तीन तरफ से समुद्र और एक तरफ से पहाड़ से घिरा होने के कारण एक
राष्ट्र का भ्रम पैदा करता था. ये राज्य आपस में लड़ते थे और दूसरे को परास्त करने
के लिए विदेशी हमलावरों को सहायता के लिए आमंत्रित करते थे. महमूद गजनवी और
मोहम्मद गौरी इसी के चलते इस उपमहाद्वीप में घुस पाये.
भारत के एक राष्ट्र की तरह संगठित होने
की शुरुआत हुई थी चन्द्रगुप्त मौर्य के समय. गुप्त वंश में कुछ और मजबूत हुआ.
लेकिन सही तस्वीर बनी मुगलों के शासन काल में ही. जिस भारत को हम आज देख रहे हैं,
उसकी राजनीतिक शक्ल मुगलों ने ही बनाई. उसके बाद अँग्रेज आ गये. कोई भी हिन्दू
राजा, पूरे भारत का राजा कभी नहीं रहा. फिर यह हिन्दू-राष्ट्र कैसे हुआ और क्यों
होना चाहिए ? और फिर हिन्दू भी
कहाँ थे पहले ? द्रविण और आर्य थे.
आर्य भी बाहर से ही आये इस देश में. ये सब जो इस देश को हिन्दू-राष्ट्र बनाने का
सपना देख रहे हैं, मूलतः आर्य ही हैं, जो खुद कहीं बाहर से आये हैं. फिर क्या
औचित्य है इस बेमतलब की फसाद का ?
मोदी आयें. सम्भालें देश की बागडोर अगर क्षमता है तो. लेकिन मुसलमानों की लाशों और हिन्दुओं के कंधों पर सवार होकर न आयें. उन्हें आना है तो लोकतांत्रिक परंपरा से आयें. मीडिया की वैन में चढ़कर न आयें. पहले गुजरात के विस्थापितों को लोटाएँ, उसके बाद भारत के गौरव को लौटाने की फिक्र करें ।
मोदी आयें. सम्भालें देश की बागडोर अगर क्षमता है तो. लेकिन मुसलमानों की लाशों और हिन्दुओं के कंधों पर सवार होकर न आयें. उन्हें आना है तो लोकतांत्रिक परंपरा से आयें. मीडिया की वैन में चढ़कर न आयें. पहले गुजरात के विस्थापितों को लोटाएँ, उसके बाद भारत के गौरव को लौटाने की फिक्र करें ।
Thursday, 28 June 2012
मंज़िल न दे चिराग न दे, रास्ता तो दे...! : शिक्षा (2)
अनिर्णय और अंधकार के
जिस मुकाम तक हमारी शिक्षा-प्रणाली आज पहुँच गई है, वो किन रास्तों से होकर यहाँ
तक आयी है, इसका भी एक संक्षिप्त जायज़ा लेना इसलिए ठीक रहेगा कि ऐसा न लगे कि
हमारे नीति-नियंता एकदम ही नाकारा थे. आप सब जानते ही हैं कि संविधान के चौथे भाग
में उल्लिखित नीति निदेशक तत्वों में कहा गया है कि प्राथमिक स्तर तक के सभी
बच्चों को अनिवार्य एवं निःशुल्क शिक्षा की व्यवस्था की जाय. इसी को थोड़ा और आगे
बढ़ाते हुए हमारी मौजूदा सरकार ने अनिवार्य शिक्षा अधिनियम-2009 (RTE) पारित किया, जिसमें
14 वर्ष तक के बच्चों को निःशुल्क शिक्षा देने का संकल्प व्यक्त किया गया है. 1948
में डॉ.राधाकृष्णन की अध्यक्षता में विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग के गठन के साथ ही
भारत में शिक्षा-प्रणाली को व्यवस्थित करने का काम शुरू हो गया था. 1952 में लक्ष्मीस्वामी
मुदालियर की अध्यक्षता में गठित माध्यमिक शिक्षा आयोग, तथा 1964 में दौलत सिंह
कोठारी की सदारत में गठित शिक्षा आयोग की शिफारिशों के आधार पर 1968 में शिक्षा
नीति पर एक प्रस्ताव प्रकाशित किया गया जिसमें ‘ राष्ट्रीय
विकास के प्रति वचनबद्ध, चरित्रवान तथा कार्यकुशल’ युवक-युवतियों
को तैयार करने का लक्ष्य रखा गया. मई 1986 में नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति लागू की
गई, जो अब तक चल रही है. इस बीच राष्ट्रीय शिक्षा नीति की समीक्षा के लिए 1990 में
आचार्य राममूर्ति की अध्यक्षता में एक समीक्षा समिति, तथा 1993 में प्रो. यशपाल की
अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया गया. राष्ट्रीय शिक्षा नीति की धज्जियाँ किस
तरह से उड़ाई गई हैं इसका पता तो हमे अपने आस-पास की स्कूलों और उच्चशिक्षा
केन्द्रों को देख कर ही चल जाता है.
एक अनुमान के मुताबिक भारत की पचास
प्रतिशत स्कूलें बिना शाला-भवनों के अथवा अनुपयुक्त भवनों में चल रही हैं. बच्चे
ज़मीन पर बैठते हैं, पेयजल की व्यवस्था भी नहीं है और बिजली-पंखे तो बहुत दूर की
बात हैं. अतः इन विद्यालयों में शिक्षा के उच्च लक्ष्यों के प्राप्ति की बातें
करना बेमानी है. शेष पचास प्रतिशत में अधिकांश निजी स्कूल हैं, जिनमें फीस अधिक
होने और कठिन प्रवेश परीक्षा के कारण केवल उच्च वर्गीय बच्चे पहुँचते हैं. जबकि
संविधान प्राथमिक शिक्षा मुफ्त उपलब्ध कराने को कहता है और यशपाल समिति नर्सरी
कक्षाओं में प्रवेश-परीक्षा की परंपरा को बंद कराने की शिफारिश करती है. आलम यह है
कि स्कूलों में प्रवेश के लिए बच्चों के साथ-साथ अभिभावकों का भी टेस्ट लिया जा
रहा है. उधर यशपाल समिति बस्ते का बोझ कम करने और होमवर्क बंद करने को कहती है, और
इधर बच्चे धोबी के गधे बनाये जा रहे हैं तथा माता-पिता बच्चे के होमवर्क के साथ
जूझते दिखते हैं. नीति कहती है कि स्कूलों में खेल का मैदान अवश्य हो, तो असलियत
ये है कि आधी स्कूलों के पास मैदान नहीं हैं तो आधी स्कूलें मैदानों में ही लगती
हैं. एक और विडम्बना है कि छोटे बच्चों को ज्यादा योग्य शिक्षकों की जरूरत होती है
लेकिन उन्हें सबसे कम योग्यता वाले शिक्षक मिलते हैं. स्कूली शिक्षा उद्देश्यहीन
है, यह हमारी व्यावहारिक जरूरतों को पूरा
नहीं करती. कई लोगों की राय है कि प्राथमिक स्तर के शिक्षकों के लिए
मनोविज्ञान का अध्ययन अनिवार्य होना चाहिए और प्राथमिक स्तर पर सिर्फ प्रायोगिक
शिक्षा दी जानी चाहिए.
उच्च शिक्षा की हालत भी कम बुरी नहीं
है. देश के 80 प्रतिशित महाविद्यालय उच्चशिक्षा के न्यूनतम मानदण्ड भी पूरा नहीं
करते. हमारे विश्वविद्यालय और महाविद्यालय बेरोजगार पैदा करने के सबसे बड़े
कारखाने हैं.दरअसल भारत में रोजगारोन्मुखी शिक्षा की परम्परा अभी भी ठीक से नहीं
बन पाई है. प्रबन्धन की शिक्षा की अपनी सीमाएँ हैं और वह ग्रामीण भारत और छोटे
शहरों की आवश्यकता को पूरा नहीं कर पाती है. कुछ लोग तो बेरोज़गारी की समस्या के
लिए सरकार की नीतियों से ज़्यादा मध्यवर्ग के ‘ प्रतिष्ठा-बोध’ को दोषी मानते हैं.
मध्यमवर्गीय अभिभावक आज भी अपने बच्चों का एम.ए.,एम,एस.सी, पी.एच.डी. होने को अपनी
प्रतिष्ठा मानते हैं. जबकि आज के भारत में ये डिग्रियाँ रोज़गार की दृष्टि से
निरर्थक साबित हो रही हैं. उन समाजों में जहाँ समय की गति को समझ लिया गया है,
वहाँ रोजगार की समस्या इतनी ज्यादा नहीं है. जिन लड़कों को आप टाई बाँधे,
चम्मच-कटोरी-तेल-साबुन-वाशिंग पावडर लेकर घर-घर जाकर बेचते देखते हैं , जो लड़के
अपने मोटर गैराज खोल रहे हैं, अथवा जो फाइनेंस और बैंकिंग कम्पनियों के एजेन्ट के
बतौर आपके घर खाता खुलवाने दौड़े आ रहे हैं, वे सब भी प्रतिष्ठित लोगों के ही
बच्चे हैं. इन्हें रोज़गार की कोई समस्या नहीं है. प्रतिष्ठावादी मध्यमवर्ग को
तत्काल अपना नज़रिया बदलने की जरूरत है.
बात खत्म करने से पहले एक-दो बच रही
बातों पर मुख़्तसर तौर पर पर विचार कर लेना चाहिए. इधर कई तबकों से माग उठती रही
है और सरकारें भी इस पर गंभीरता से सोचती रही हैं कि शिक्षा का निजीकरण कर दिया
जाये. एक समय यू.जी.सी. तो इस तरह की योजना भी बनाने लगा था कि व्यापारिक
प्रतिष्ठान, शिक्षण संस्थाओं को गोद ले लें. इस तरह की माग करने वाले शायद यह सोच
रहे होंगे कि ऐसा करने से संविधान की भावना, सबके लिए अनिवार्य शिक्षा, पूरी हो
सकेगी और होनहार चरित्रवान युवक-युवतियाँ तैयार हो सकेंगे. लेकिन यह ख़ामख़याली
है. औद्योगिक घरानों के हाथों में जाने से शिक्षण संस्थाएँ उनके लिए एक नये मासूम
और विवश बाजार की तरह सुलभ हो जायेंगी. औद्योगिक घरानों को अपने उत्पादों के लिए
विज्ञापन का विस्तृत एवं फायदेमंद क्षेत्र आसानी से मिल जायेगा. मुमकिन है कि आपको
ऐसा दृश्य भी दिखे कि किसी शराब कम्पनी द्वारा गोद लिए गए स्कूल के बच्चों को उसका
मोनो लगाना पड़े ! और
‘विल्स वर्ल्ड कप’ या ‘गोल्ड फ्लेक ओपन
टेनिस’ की तर्ज़ पर ‘विल्स छात्र’ और ‘गोल्ड फ्लेक छात्र’ मिल जायें. अधिक फीस
का रोना अभिभावक अभी रोते है, निजीकरण के बाद किस तर्क से वह कम हो जायेगी—मेरी
समझ से तो बाहर है.
बहुत समय से भारतीय शिक्षा में एक
प्रयोग करने का विचार चल रहा है—यौन शिक्षा देने का. भारतीय मानस इस पर इतना
सकुचाया हुआ है कि वह बात करने में बी लजाता है. अधिकांश लोग यौन-शिक्षा के पक्ष
में नहीं हैं, और जो पक्ष में हैं, वे भी नाम गुप्त रखने की शर्त पर ही बातचीत के
लिए तैयार होते हैं. यौन-शिक्षा को लेकर कुछ भ्रम लोगों के मन में हैं. खासे
पढ़े-लिखे लोग भी यह सोचते हैं कि यौन-शिक्षा जब दी जायेगी तो उसमे अश्लील साहित्य
के चक्रवर्ती लेखक मस्तराम जैसी भाषा का उपयोग किया जायेगा और उसके बाद बच्चों को
अभ्यास के लिए खुला छोड़ दिया जायेगा. अथवा इन्हें डर है कि इनके जीवन के अत्यन्त
अन्तरंग और गोपन रहस्य बच्चों के सामने खुल जायेंगे !!. शिक्षक
भी दुविधा में हैं कि उस तरह की ‘गन्दी
बातें’ वे कैसे पढ़ायेंगे.
यही वज़ह है कि यौन-शिक्षा के पक्ष में जनमत नहीं बन पा रहा है. लोग यह नही समझ पा
रहे हैं कि यौन शिक्षा, जीव-विज्ञान के विषय के रूप में होगी और मनुष्य की जनन
क्रियाओं का विवेचन उसी तरह किया जायेगा जैसे नाक-कान अथवा हृदय के कार्यों का
किया जाता है. और यह वैसा ही नीरस और अनुत्तेजक होगा जैसे शरीर के अन्य अंगों का
होता है.
सरकारों की भी अपनी मज़बूरी है. कोई
परीक्षा पास करके तो सरकार बनती नहीं है. सरकार बनती है राजनीतिक प्रक्रिया से.
इसलिए सरकार के लिए अपने राजनीतिक हित ही सर्वोपरि होते हैं. शिक्षा का क्षेत्र भी
अब राजनीतिक लाभ के क्षेत्र के रूप में पहचान लिया गया है. जो पैसा स्कूलों की दशा
सुधारने और अच्छे शिक्षकों के लिए खर्च किया जाना चाहिए उसे सरकार बच्चों और उनके
अभिभावकों में बाँट रही है. देखिए कैसी विडम्बना है कि जिस स्कूल में भवन नहीं है,
पानी की सुविधा नहीं है, शिक्षक नहीं हैं, उसी स्कूल का हर छात्र पाँच से सात हजार
रुपये छात्रवृत्ति-साइकिल-गणवेश-भोजन-किताबों के बहाने पा रहा है. हकीकत ये है कि
ये पैसे छात्रों के अभिभावक अपने उपयोग में खर्च
करते हैं. सरकार यह समझती है कि विश्व बैंक और यूनिसेफ से मिले इन पैसों से
उसने अपने वोट बैंक को और मजबूत कर लिया है. गांवों की हालत इतनी खराब है कि वहाँ
लोग बच्चों को पढ़ाने की ज़गह मज़दूरी में लगाना ज़्यादा ठीक समझते हैं, कम से कम
दो वक्त की रोटी तो जुट सकेगी. छात्रवृत्तियाँ लेने के लिए बच्चों का नाम स्कूल
में लिखवा ज़रूर देते हैं, लेकिन ये बच्चे कभी-कभार ही स्कूल जाते हैं. कागज़ पर
हिसाब-किताब दुरुस्त रखा जाता है और विश्व बैंक और यूनिसेफ तक बढ़िया चमचमाती
रिपोर्ट पहुँचती है हमारे विकास की.
बहरहाल ! आजादी
के बाद देश में शिक्षा के विकास को संतोषजनक भी मानना मुश्किल है. नीति-निर्धारकों
को मैकाले के भूत से पीछा छुड़ाना होगा और भारतीय बच्चों के लिए ऐसी शिक्षा की
व्यवस्था करनी होगी जो उन्हें आत्महत्या के मुकाम तक न पहुँचाए, उन्हें बेहतर और
मजबूत इंसान बनाए. हमारे बच्चों को ऐसी शिक्षा की ज़रूरत है जो उन्हें रोजमर्रा की
दिक्कतों का सामना करने लायक बना सके. हमारे बच्चों के भीतर नागरिक-बोध पैदा हो.
समाज और समाज में हो रहे बदलावों से तालमेल बैठा सकें.ऐसी शिक्षा की ज़रूरत है जो
बच्चों के भीतर के रस को सुखाए बिना उन्हें अपने पैरों पर खड़ा कर सके. और यह सब
कम से कम खर्चे में उपलब्ध होना चाहिए. सरकार को भी यह समझना होगा कि अगर वो ऐसे
शिक्षित और स्वस्थ नागरिक देश के लिए तैयार कर सकी तो फिर देश को आगे बढ़ने के लिए
किसी की मदद की ज़रूरत नहीं होगी. मध्यमवर्गीय मानस को भी अपनी प्रतिष्ठा अपने
बच्चों के भविष्य की कीमत पर नहीं प्राप्त करनी चाहिए. लेकिन सबसे पहले उस भेदभाव
को खत्म करने की ज़रूरत है जो गुलामी के दिनों से ही उच्चवर्ग और सामान्य जनता के
शिक्षण में किया जा रहा है.Sunday, 24 June 2012
शिक्षा : अंधकार से अंधकार की ओर ! ( 1 )
अब आप ही बताइये कि इस बात पर हम शर्म
करें या गर्व कि भारत की शिक्षा प्रणाली, विश्व में तीसरे नम्बर की सबसे बड़ी
शिक्षा-प्रणाली है, और बेरोजगारों को पैदा करने में दुनिया में इसका पहला नम्बर
है.
गरीबों का ही देश सही, पर भारतमें कर्ज़
लेकर जीवन-यापन करने को हमेशा नीची नज़र से देखा गया है. हमारी प्राचीन सुक्तियों
में कर्ज़ को पाप तक की संज्ञा दे दी गई है. फिर भी छोटे-मोटे कर्ज़ लेना-देना तो
बहुत स्वाभाविक दिनचर्या है समाज की. लेकिन शिक्षा के लिए माँ-बाप का कर्ज़दार हो
जाने का चलन इस देश में पिछले कुछ ही वर्षों में शुरू हुआ है. दरअसल यह मज़बूरी का
चलन है. इस देश में शिक्षा की जो नई व्यवस्था चल निकली है, उसने इसे एक बड़े
उद्योग में बदल दिया है. चूँकि शिक्षा अब हमारी बुनियादी ज़रूरत है, इसलिए
मध्यवर्ग और निम्न-मध्यवर्ग बच्चों की शिक्षा के पीछे कर्ज़दार हुआ जा रहा है. ये
वही देश है जहाँ कृष्ण और सुदामा एक साथ और बराबर की शिक्षा ग्रहण करते थे. बीस
साल पहले तक एक भिखारी का भी बच्चा आराम से पढ़ाई कर लेता था.
हमारे देश में शिक्षा को लेकर सरकारी स्तर पर एक आत्मघाती किस्म का ठंडापन तो अभिभावकों में दुविधा, इधर के वर्षों में रही है. हमारी अदूरदर्शी नीतियों का ही ये नतीज़ा है कि आज यह चिन्ता की बात बन गई है कि अब इस देश में योग्य वैज्ञानिक, विषय-विशेषज्ञ और कलाकार नही मिल पा रहे हैं. स्कूली शिक्षा बच्चों को व्यावहारिक रूप से अपाहिज बना रही है. विभ्रम के शिकार हमारे शिक्षा मंत्रियों को सरकारी और निज़ी विद्यालयों के बीच की चौड़ी खाई दिखाई नहीं पड़ती. उच्चशिक्षा के लिए माँ-बाप को बैंकों से कर्ज़ लेना पड़ रहा है. जिनकी हिम्मत नहीं पड़ती, उनके योग्य वच्चे भी उपयुक्त शिक्षा से महरूम रह जाते हैं. जिन IIM’s और IIT’s पर सारा ध्यान केन्द्रित है सरकार का, वहाँ तक कितने बच्चों की पहुँच है ?
हमारे देश में शिक्षा को लेकर सरकारी स्तर पर एक आत्मघाती किस्म का ठंडापन तो अभिभावकों में दुविधा, इधर के वर्षों में रही है. हमारी अदूरदर्शी नीतियों का ही ये नतीज़ा है कि आज यह चिन्ता की बात बन गई है कि अब इस देश में योग्य वैज्ञानिक, विषय-विशेषज्ञ और कलाकार नही मिल पा रहे हैं. स्कूली शिक्षा बच्चों को व्यावहारिक रूप से अपाहिज बना रही है. विभ्रम के शिकार हमारे शिक्षा मंत्रियों को सरकारी और निज़ी विद्यालयों के बीच की चौड़ी खाई दिखाई नहीं पड़ती. उच्चशिक्षा के लिए माँ-बाप को बैंकों से कर्ज़ लेना पड़ रहा है. जिनकी हिम्मत नहीं पड़ती, उनके योग्य वच्चे भी उपयुक्त शिक्षा से महरूम रह जाते हैं. जिन IIM’s और IIT’s पर सारा ध्यान केन्द्रित है सरकार का, वहाँ तक कितने बच्चों की पहुँच है ?
आज़ादी के बाद देश की शिक्षा-प्रणाली पर
खूब माथा-पच्ची की गई और निष्कर्ष भी आदर्शवादी निकले. योजनाएँ भी लुभावनी बनीं.
लेकिन स्थितियां बिगड़ती गईं. दुनिया को दिखाने और रिझाने के लिए अनिवार्य शिक्षा
के लिए अधिनियम बना दिया गया, लेकिन यह नहीं बताया गया कि दुनिया के विकसित और
विकासशील देशों के मुकाबले बहुत कम राशि हमारे यहाँ शिक्षा पर खर्च की जाती है.
माँ-बाप को कर्ज़दार और बच्चों को निरर्थक बनाने वाली इस शिक्षा-प्रणाली के विकास
को समझने की कोशिश की जानी चाहिए.
“………इतने सालों की पढ़ाई
मेरे लिए दो जून की रोटी भी नहीं जुटा पाई. माँ-बाप और इस दुनिया पर बोझ बन गया
हूँ. आखिर सहने की भी एक हद होती है. बस अब नहीं.........”
यह स्युसाइड नोट था एम.ए. , एल.एल.बी. पास और
विगत छः वर्षों से आइ.ए.एस. की तैयारी कर रहे इलाहाबाद के मेधावी छात्र आशुतोष
पाण्डेय का. दुर्भाग्य से यह इस तरह की पहली घटना नहीं है. दिल्ली और इलाहाबाद में
न जाने कितने मेधावी छात्र आठ-आठ सालों से एक ही कमरे में बन्द एक अदद नौकरी के
लिए अपना सब कुछ न्यौछावर कर चुके हैं.
उनमें से अधिकांश अपना मानसिक संतुलन खोकर अपने जनपदों में वापस आ जाते हैं. सवाल
यह पैदा होता है कि हमारी शिक्षा-प्रणाली ने हमें किस मुकाम पर पहुँचाया है ? अगर आशुतोष पाण्डेय की तरह आत्महत्या
वाला मुकाम ही इसका हासिल है तो ऐसी शिक्षानीति के निर्धारकों को भारतीय दण्ड
संहिता के अनुरूप दण्ड क्यों नहीं दिया जाना चाहिए ?लेकिन
दण्ड देगा कौन ? क्या हम उस बिल्ली
से न्याय की अपेक्षा करें जिसके जिम्मे चूहों के लिए उचित कानून बनाने का काम है ?
यह भी हमारी स्वतंत्रता और इच्छाशक्ति
की पोल खोलता है कि आज़ादी के चौसठ साल गुजार लेने के बाद भी हमारे सिर से मैकाले
का भूत नहीं उतर पाया है.मैकाले महोदय भारतीय भाषाओं, साहित्य एवं कला को ‘ गँवारू’ मानते
थे तथा वे भारत को उस ज्ञान से परिचित कराना चाहते थे जिसे ‘विश्व की सर्वाधिक बुद्धिमान
जाति(अँग्रेज) ने रचा है’. उनके
अनुसार सम्पूर्ण प्राच्य ज्ञान-भंडार, यूरोप के किसी पुस्तकालय की एक आलमारी में
रखे ज्ञान से भी कम है. वे भारत की समस्त देशी शैक्षणिक संस्थाओं को बंद कर, पूरी
शिक्षा अँग्रेजी भाषा के माध्यम से, यूरोपीय साहित्य, कला एवं विज्ञान की देना
चाहते थे. दरअसल उन दिनों मैकाले सहित अन्य अँग्रेज (वुड, शैडलर, हण्टर), अँग्रेजी
शिक्षा के माध्यम से एक ऐसा वर्ग तैयार करना चाहते थे भारतीयों का जो अँग्रेजों का
समर्थन करें. मैकाले कहता था---“
हमें इस समय एक ऐसे वर्घ को उत्पन्न करने का भरसक प्रयत्न करना चाहिए, जो हमारे और
उन लाखों लोगों के बीच दुभाषिया बन सके जिन पर हम शासन करते हैं.” कहा गया कि सरकार को उच्च वर्ग को
शिक्षा देनी चाहिए, जिससे शिक्षा छन-छन कर जनता तक पहुँचे. उन दिनों यह सिद्धान्त ‘ अधोमुखी निस्यंदन’ के नाम से मशहूर हुआ था. उच्च वर्ग से
छन-छन कर कैसी शिक्षा निम्न वर्ग तक आई ,
हम सब देख ही रहे हैं. हाँ, उन दिनों मैकाले अपनी नीति में सफल हो गया था.हमारे
देश में अँग्रेजों के कई भारतीय पिट्ठू तैयार हो गये हैं.
मैकाले की शिक्षानीति 1835 में आई थी. भारत में हर साल अप्रैल से जुलाई के महीनों में मैकाले का भूत दिखता है. अँग्रेजी स्कूलों में दाखिले के लिए भारतीय जनता का मध्यमवर्गीय प्रलाप तथा देशी हिन्दी विद्यालयो के छात्रों के हीनभावना से ग्रसित सामूहिक विलाप से ये महीने आक्रांत रहते हैं.सारे अभिभावक और नेतागण ‘एडमिशन’ की राष्ट्रीय समस्या से जूझ रहे होते हैं. भारतीय मध्यमवर्ग की अँग्रेजी स्कूलों के प्रति ललक और हताशा देखते उन्हें अत्यन्त दयनीय दशा में पहुँचा देती है. अँग्रेजी शिक्षा की प्रासंगिकता पर मैं यहाँ फिलहाल बहस नहीं करना चाहता, लेकिन इतना ज़रूर मानता हूँ कि कोई भी बाहरी भाषा अपनी मातृभाषा से ज्यादा ज़रूरी, उपयोगी और प्रासंगिक नहीं हो सकती.
फिलहाल ज़ेर-ए-ज़हन जो बात है वह यह कि आखिर क्यों 1835 से चली आ रही शिक्षा-प्रणाली की मूल भावना ही आज भी बनी हुई है, जबकि इतने सालों में दुनिया का मिज़ाज़ कहाँ से कहाँ पहुँच गया है. गुलामी के दिनों की विवशता को स्वीकार कर भी लें, लेकिन आज़ाद भारत में उसी उपनिवेशवादी शिक्षा पद्धति को किस तर्क से स्वीकार करें. कहीं ऐसा तो नहीं कि आज़ाद भारत के शासन की बागडोर, अँग्रेजों द्वारा तैयार किए गये अँग्रेजी परस्त लोगों के वंशजों के हाथ में रहने के कारण इस परंपरा का पोषण होता रहा ? क्या आज के भारत की अँग्रेजी शिक्षण संस्थाएँ, मैकाले द्वारा कल्पित उसी अभिजात्य वर्ग को तैयार नहीं कर रही हैं, जो पब्लिक स्कूल के बच्चों-भारतीय संस्कृति और साहित्य को घृणा करते हैं ??
मैकाले की शिक्षानीति 1835 में आई थी. भारत में हर साल अप्रैल से जुलाई के महीनों में मैकाले का भूत दिखता है. अँग्रेजी स्कूलों में दाखिले के लिए भारतीय जनता का मध्यमवर्गीय प्रलाप तथा देशी हिन्दी विद्यालयो के छात्रों के हीनभावना से ग्रसित सामूहिक विलाप से ये महीने आक्रांत रहते हैं.सारे अभिभावक और नेतागण ‘एडमिशन’ की राष्ट्रीय समस्या से जूझ रहे होते हैं. भारतीय मध्यमवर्ग की अँग्रेजी स्कूलों के प्रति ललक और हताशा देखते उन्हें अत्यन्त दयनीय दशा में पहुँचा देती है. अँग्रेजी शिक्षा की प्रासंगिकता पर मैं यहाँ फिलहाल बहस नहीं करना चाहता, लेकिन इतना ज़रूर मानता हूँ कि कोई भी बाहरी भाषा अपनी मातृभाषा से ज्यादा ज़रूरी, उपयोगी और प्रासंगिक नहीं हो सकती.
फिलहाल ज़ेर-ए-ज़हन जो बात है वह यह कि आखिर क्यों 1835 से चली आ रही शिक्षा-प्रणाली की मूल भावना ही आज भी बनी हुई है, जबकि इतने सालों में दुनिया का मिज़ाज़ कहाँ से कहाँ पहुँच गया है. गुलामी के दिनों की विवशता को स्वीकार कर भी लें, लेकिन आज़ाद भारत में उसी उपनिवेशवादी शिक्षा पद्धति को किस तर्क से स्वीकार करें. कहीं ऐसा तो नहीं कि आज़ाद भारत के शासन की बागडोर, अँग्रेजों द्वारा तैयार किए गये अँग्रेजी परस्त लोगों के वंशजों के हाथ में रहने के कारण इस परंपरा का पोषण होता रहा ? क्या आज के भारत की अँग्रेजी शिक्षण संस्थाएँ, मैकाले द्वारा कल्पित उसी अभिजात्य वर्ग को तैयार नहीं कर रही हैं, जो पब्लिक स्कूल के बच्चों-भारतीय संस्कृति और साहित्य को घृणा करते हैं ??
Thursday, 21 June 2012
मेरा तुम्हारा रिश्ता
मेरा तुमहारा रिश्ता वही है
जो आग का ताप से है
जो पहाड़ का ऊँचाई से है
जो पेड़ का अपनी जड़ों से होता है ।
जैसे नदी का होता है तल से
जैसे चन्द्रमा का है अपनी पृथवी से
जैसे सोने का होता है सुनहरेपन से ।
कि तुम मेरे लिए इतनी ज़रूरी हो
जैसे नीली चीज़ के लिए नीला रंग
लाल के लिए लाल
या कह लो
कि जैसे इन्द्रधनुष के लिए सात रंग ।
मैं तुम्हें वैसे ही याद करता हूँ
जैसे खेत याद करता है बीज को
जैसे धरती याद करती है पहली बारिश को
जैसे घर की मुंडेर याद करती है
एक नीले पंखों वाली चिड़िया को
जैसे कविता याद करती है लय को ।
तुम्हारे होने की आश्वस्ति
वैसी ही है
जैसे संसार के वायुमंडल में ऑक्सीजन का
होना
जैसे लगातार हमारी सांसों का चलना
और सीने की धक् धक् ।
कि तुम्हें जब भी महसूस करना होता है
मैं अपनी नब्ज़ पर हाथ रखता हूँ ।
----------------------- विमलेन्दु
Friday, 15 June 2012
भाग न बाँचे कोय !
कई बरस पहले शहर में एक बड़े नामी बाबा पधारे. बिहार के रहने वाले थे. भाग्य बाँचने और भविष्य सुधारने में महारथी माने जाते थे. कुंडली देखना, बनाना, और तदनुसार यज्ञ-हवन-जाप-रत्नादि का विधान करवाते थे. लोगों की शक्ल देख कर मुस्कुराते हुए झट से भाई-बहनों की संख्या, पेशा, माता-पिता से संबन्धित जानकारी बता देते थे. इस कौतुक के लिए न तो उन्हें कुंडली देखनी पड़ती थी न हाथ.
बाबा आये तो रेडियो कॉलोनी मे अपने एक चेले के यहाँ डेरा जमाया. जैसे-जैसे लोगों को खबर होती गई, तो भूत-भविष्य को लेकर परेशान रहने वाले लोगों का तांता लगने लगा. किसी का गुरु वक्री था, किसी को राहु की महादशा चल निकली. किसी को शनि की साढ़े साती चल रही थी तो किसी का मंगल नीच का था. कोई ऐसा नहीं जिसको कोई न कोई बाधा न हो, और ऐसी कोई बाधा नहीं थी जिसका उपाय बाबा के पास न हो. बाबा तरह-तरह के यज्ञ-जाप-हवन आदि के उपाय बताते. अब साधारण नौकरीपेशा, दुकान-धंधा करने वाले संसारी मनुष्य से यज्ञ-जाप-हवन कहाँसधता है ! ज़रा सी भी चूक हो गई तो लेने के देने पड़ जायें......तो बाबा ही ठेका ले लेते थे यथाविधि यज्ञादि करने का. इसका सबसे बड़ा लाभ यह था कि पीड़ित का काम-धंधा भी प्रभावित नहीं होता था. बाबा उसके नाम से सारे कृत्य सम्पन्न करा देंगे. बस उसे सारे बिधान का एक मुश्त खर्च बाबा के पास जमा करा के निश्चिन्त होना होता था. लोगों के लिए बड़ा सुविधाजनक रास्ता खोल दिया था बाबा ने.
मेरा एक मित्र था. उसके पिता PWD में इंजीनियर थे. बेहिसाब रुपया घर में आ रहा था. फिर भी न जाने कौन सी बाधाएँ थीं घर में कि अक्सर कोई न कोई पूजा-पाठ, महाम़त्युंजय जाप आदि घर में चलता ही रहता. मेरा मित्र खुद जिस कक्षा में था उसमें दो बार फेल हो चुका था. जबकि इसके पहले वाली कक्षा भी तीसरे प्रयास में उत्तीर्ण करने के बाद मेरा क्लासफेलो बना था. इस लिहाज से उम्र और अनुभव में वो मुझसे बड़ा था. बड़ा नेकदिल था. आधी रात को भी किसी की मदद करने को हाजिर रहता. मेरे लिए उसका स्कूटर सबसे बड़ा आकर्षण था, जिसमें मैं दिन भर घूमा करता. हमारी मित्र मंडली में अक्सर लोगों को उसी के मार्गदर्शन में चलना पड़ता था.
बाबा आये तो मेरा मित्र भी उनके पास गया. और बाबा ने उसकी बाधा के मुताबिक कोई जाप भी शुरू कर दिया था. वह लगभग दिन भर बाबा के ही पास रहता और शहर भर से अपने परिचितों को भी उनके पास ले जाता. हालाँकि मेरा इन सब बातों पर विश्वास नहीं था, पर एक दिन वह मुझे भी पकड़ ले गया....यूँ ही घुमाने के बहाने.
बाबा अन्दर के कमरे में विराजते थे. दरवाज़ा बंद रहता था. धूप और अगरबत्ती की खुशबू बाहर के कमरे और उसके बाहर बरामदे, और उसके बाहर लॉन और पेड़ों तक बिखरती रहती थी. जिनका नम्बर कुछ ही देर बाद लगना होता वो दूसरे नम्बर के कमरे में बुला लिए जाते थे. जिन्हें नम्बर लगाना होता था वो बरामदे में होते. और जो कौतूहलवश पहुँचते वे पेड़ों के इर्द-गिर्द बैठे या खड़े होते. मुझे अंदाज़ा नहीं था कि मेरे मित्र की धाक इतनी जमी हुई है कि मुझे सीधे दूसरे नम्बर के कमरे में पहुँचा देगा. मैं बैठ गया. कुछ और लोग भी बैठे थे. बाबा के दो-तीन चेले भी साधुवेश में वहीं बैठे लोगों से हँसी ठिठोली करते. किसी का हाथ देखते, किसी की पेशानी....या किसी की गुप्त परेशानी पूछकर मुस्काते.....कुछ देर में एक चेले ने मेरे दाहिने हाथ को नरमी से पकड़ा और हथेली की रेखाएँ देखने लगा.....
कुछ देख कर बोला—“ क्यों महराज, दो-भाई, एक-बहन है तुम्हारे ?”
मैने कहा—नहीं तीन-भाई, एक-बहन.....वो मुस्कुराया.
“ पापा बैंक में हैं ?” उसने फिर कहा.
“ नहीं टीचर हैं.”…मैने कहा......वो फिर मुस्कुराया.
“ और माता ?”_____
वो भी टीचर है-----मैने कहा....वो मुस्कुराता रहा.
“ प्यार करते हो किसी को ?”------ मैने कहा—हाँ...
“ दूसरी जाति की होगी ?”
“ मेरी ही जाति की है “---मैने बताया.
इस बार वो हँसा---“ चिन्ता न करो, बाबा सब ठीक कर देंगे..”----कहता हुआ वो वहाँ से उठ गया.
मैं सोचने लगा कि मेरा तो कुछ गड़बड़ ही नहीं है, बाबा क्या ठीक कर देंगें !!
इतने में एक दूसरा चेला एक कागज और पेन लेकर आया और उसमें मेरा नाम, जन्मतिथि, जन्म का स्थान और समय लिख कर ले गया.
लगभग दो घंटे बाद बाबा ने मुझे भीतर बुलवाया, तो मुझे डर लगा. मैने अपने मित्र की तरफ देखा तो उसने पीठ पर धौल जमाते हुए कहा कि चल,मैं भी चलता हूँ. मैं अन्दर चला गया. बाबा ज़मीन पर ही आसन जमाये बैठे थे. बगल में एक चौकी पर तरह-तरह के देवता विराजे थे. बाबा के पास कुछ पोथियाँ और पत्रे पड़े हुए थे. मुझे सामने बैठने का इशारा किया. मेरे बैठते ही सीधे मेरी आँखों में अपनी नज़रें उतार दीं......मुस्कुराते हुए कहने लगे-----“ ब्राह्मन हो...बहुत बर्हिया.....माँ-बाप मास्टर हैं ?.....पर तुम बड़े भाग्यशाली हो.....कितने, तीन-भाई, एक-बहन हैं ?..... ‘ हाँ.’…..एक भाई से बड़ा सुख मिलेगा......और परेम भी करते हो..?..... ‘ हाँ.’……लड़की ब्राह्मन ही है, पर तब भी कुछ बाधा है.......”--------------
मैं भौंचक ! इन्हें सब कैसे पता !?-------लोग ठीक ही कहते थे.
बाबा आगे बोले---“ ये तुम्हारा कुंडली बना दिया है. बाकी सब ठीक है पर कुछ बाधाएँ हैं. ठीक हो जायेंगी, एक जाप करा लो. कोई पंडित हो तो घर में करा लो. लेकिन कोई कुधरम नहीं होना चाहिए ! नहीं तो हम खुद करवा देंगे जाप तुम्हारे नाम से....51,00 रुपये का जाप है....बोलो तो शुरू करवा दें !!”-----------मेरी हलक से कुछ निकल नहीं रहा था. मैने धीरे से कहा—“ पापा से पूछ लें !”
वो कागज़ जिस पर उन्होने कुंडली बनाई थी, मुझे पकड़ाते हुए बाबा बोले—“जैसी मर्ज़ी..”
मैं बाहर निकल आया. उनके चेले मुस्कुरा रहे थे. मैं रुका नहीं, सीधे घर आ गया. पापा से भी कुछ बताया नहीं. जल्दी ही मन संयत हो गया.
एक दिन कइयों के हवन-जाप, रुपया-पैसा, श्रद्धा-विश्वास समेटकर बाबा अन्तर्ध्यान हो गये......चमत्कारी तो वो थे ही इस लिए लोगों को अचंभा नहीं हुआ.....लोग निराश तो तब हुए जब पता चला कि बाबा के स्थानीय चेले भी भूमिगत हो गये हैं.
कई वर्षों बाद, कल, कुछ पुरानी फाइलें ढूढ़ते हुए मुझे वो कागज़ मिला जिस पर बाबा ने मेरी कुंडली बनाई थी और फलादेश लिखा था. मैने पढ़ा तो मज़ेदार लगा. आप भी पढ़िए इसे------------------
भइया दुबेदी की कुंडली
------------------------
....आप का कुंडली बृस्चीक लग्न में तैयार हुआ है....लग्नपती श्वामी मंगल है जो अष्टमघर मे (मृत) गर मे है.....जीससे आप का जो सरीर संबन्धी कमजोरी है । वह मंगल के प्रती है प्रन्तू उसका यहा तक सीमीत रहना ठीक है । कारण मंगल आप का घातक नही है, फीर भी आप मुगां धारण नहीं करना......आपका मागेंश चन्द्रमा स्वगृह है तथा अपने घर में है, इसलिए शिछा आप प्राप्त किये हैं तथा अपने से मेहन्त भी अच्छे करते हैं ।
......तथा आप अभी भी आप अपना पैरो पर खडा होने के प्रयास जारी रखे है, प्रन्तू अभी सफलता नहीं मील रहा है । आप का सरवीस अवश्य होगी तथा गौरमेन्ट सारीवस या उच्च स्थान का प्राइवेट सरवीस का भी योग्य है ।
........जो आप अपन पैर पर खडा होकर अपना नाम ऊचा करेगे प्रन्तू आपको दो तरह का कुंडली से प्रेशानी 31 वर्ष के उम्र तक आ सकता है जो जहा भी अपना सरवीस या परिछा हेतू अभी गये होगे, कोई न कोई अड़चन अवश्य उतपन हुआ होगा ।
.......पहला ग्रह धन स्थान मे गुरु अपने घर मे बैठकर आप के जन्मकाल से बक्री है । जीसे नीर्वल कहते है तथा कुंडली में गुरु वक्र होना (रुष्ट) होना ठीक नही होता है। और धन स्थान मे गुरु है जहा से धन संग्रह कीया जाता है। तथा धन उपारजन का लक्ष्य बनाया जाता है।
......दुसरा आपके पूनवर्सू नक्षत्र मे चौथा वर्ण मे जन्म है जीससे आप गुरु के महादसा में जन्म है जीससे आप गुरु का महादसा मे जन्म लेकर आज वुद्ध के महादसा मे चल रहे है। वुद्ध आपका लामेस पती है, यह लाभ देगा प्रन्तू उसी तरह योगिनी का महादसा होता है जो अभी संकठा का महादसा चल रहा है जो 25 वर्ष के उम्र से सुरू होकर 33 वर्ष के उम्र तक चलेगा । और वुद्ध का महादसा 38 वर्ष तक चलेगा। यह दसा उतम फल देगा प्रन्तू इस वुद्ध के दसा से फल उतम उठाने के लीये आप संकठा को दमन करे तथा गुरु को बलीष्ट करे तो उतम रहेगा। पुत्रन जाप कराने मे खर्च तो पड़ेगा प्रन्तू लाभ तथा शान्ती बनेगी । आप मंगला भी है प्रन्तू हलका है।
.......फीर भी कुंडली मिलाकर सादी का योग्य बनेगा. उतम सादी 28 के उम्र से 30 के उम्र तक होगा. संतान 5 रहेगे. दोनो मीलकर पितामाता अभी जीवित होगे । पिता भी जीवन पहला सरवीस से लेकर चलेगे। भ्राता तीन रहेगे. 1 भाई से प्रबल सुख्य आनन्द रहेगा। आप दयालू है तथा उपकारी भी है ।
आगे के भभीष्य ठीक है। अगर आप अपना उथान मे प्रेशानी से बचना चाहते है। तो संकठा दसा को शान्ती तथा गुरु को प्रवल करने का उपचार करेगे, आप अपना नगर के पंडीत से भी सलाह अपना कंडली दीखाकर लेगे ।
उम्र—77 वर्ष से 82 वर्ष का है ।
***********************
सालों बाद जब इस फलादेश को पढ़ा तो खूब हँसी आयी.
अब जबकि जीवन में अप्रत्याशित होने के लिए सिर्फ दुर्घटनाओं की ही संभावना बचती है......किसी अप्रत्याशित सुख की कल्पना करना अपना ही मज़ाक उड़ाने जैसा ही लगता है. बाबा की अधिकांश भभीष्यवाणियाँ घटित नहीं हुईं.....
जीवन में कई चीजें नहीं मिलीं तो इसलिए कि उन्हें पाना ही नहीं चाहा....कई चीज़ें इसलिए नहीं मिली कि मैं उनके योग्य नहीं था.....कई चीज़ें ऐसी मिल गईं जो किसी काम की नहीं हैं..... लेकिन कुछ छोटी-छोटी ऐसी चीज़ें नहीं मिलीं जिन्हें पाना चाहा और जिनके योग्य भी था......
फिलहाल इन्हीं का दुख भी होता है कभी-कभी.....अहोभाग्यम्.......।
हाँ.....मेरा वो मित्र उस कक्षा में तीसरी बार फेल हो गया था....और फिर आगे पढना ही छोड़ दिया. इस समय एक आयल एजेन्सी का मालिक है.
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