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Wednesday, 29 January 2014

मैं डरता हूँ/अफ़ज़ाल अहमद

मशहूर पाकिस्तानी शायर अफ़ज़ाल अहमद सैय्यद की एक बेहतरीन कविता ।
कवि चीज़ों को उनके खुरदुरेपन और उनकी पूरी तल्ख़ी में देखना चाहता है । यथार्थ को रूमानियत का परदा ओढ़ा देना उसे मंज़ूर नहीं । वह ख़ुदा को भी ज़मीन पर देखना चाहता है और माशूक को भी । दरअसल वह डर नहीं रहा है
; हकीक़त को खुशनुमा दिखाने की राजनीति का प्रतिरोध कर रहा है ।
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मैं डरता हूँ
अपनी पास की चीज़ों को
छूकर शायरी बना देने से

रोटी को मैने छुआ
और भूख शायरी बन गयी
उंगली चाकू से कट गयी
खून शायरी बन गया
गिलास हाथ से गिर कर टूट गया
और बहुत सी नज़्में बन गयीं

मैं डरता हूँ
अपने से थोड़ी दूर की चीज़ों को
देखकर शायरी बना देने से
दरख्त को मैने देखा
और छाँव शायरी बन गयी
छत से मैने झाँका
और सीढ़ियाँ शायरी बन गयीं

इबादतखाने पर मैने निगाह डाली
और ख़ुदा शायरी बन गया
मैं डरता हूँ 
अपने से दूर की चीज़ों को सोचकर 
शायरी बना देने से


मैं डरता हूँ
तुम्हें सोचकर
देखकर
छूकर शायरी बना देने से ।


Wednesday, 15 January 2014

क्या करें कि न करें !

चार्ल्स डार्विन ने अपनी आत्मकथा में एक ऐसी महत्वपूर्ण बात कही है, जो आज भारत के तथाकथित राजनीतिक बदलाव के संदर्भ में सामयिक ठहरती है । 

डार्विन कहते हैं--" मुझे इसमें संदेह है कि मानवता किसी व्यक्ति की प्राकृतिक अथवा अपनी आंतरिक विशेषता होती है ।"

स्पष्ट तौर पर डार्विन कहना चाहते हैं कि हम मानवता नामक गुण को अपनी ज़रूरत और परिस्थिति के मुताबिक धारण करते हैं । ज़रूरत के मुताबिक ही यह गुण हमारे भीतर स्थायी बन सकता है और इसका विस्तार अपने से आगे परिवार,समाज,देश और दुनिया के लिए हो सकता है।

अब इस अवधारणा की रौशनी में 'आप' की मानवतावादी राजनीति को देखिए । 'आप' की टीम के सदस्यों के बारे में क्या यह दावे के साथ कोई कह सकता है कि अपने 'अंतस' में वे सब इतने ही ईमानदार और मानवतावादी होंगे ? और पार्टी की सदस्यता लेने वाले देश के लाखों लोगों के बारे में तो ऐसा सोचना भी अपनी मूढ़ता सिद्ध करना होगा । अपने आस-पास के 'आप' कार्यकर्ताओं को देखकर हम इसकी पुष्टि कर सकते हैं ।

निश्चित तौर पर देश की राजनीति की आत्मा और शरीर, दोनो को बदलने की ज़रूरत है। और केजरीवाल ने अपनी टीम के साथ इस बड़े काम के लिए 'ईमानदारी' और 'मानवता' को धारण किया है। इस बड़े विज़न को हम नागरिक अगर देख पा रहे हों, तो हमें 'टीम केजरीवाल' के इन अर्जित गुणों को स्वीकृति और सहयोग देना चाहिए। इस समय इनकी निजी और पिछली ज़िन्दगी पर सवाल खड़े करना उसी राजनीति को मजबूत करेगा, जिससे हम छुटकारा पाना चाहते हैं।

Friday, 10 January 2014

पर्यटक

इनके लिए दर्शनीय है वो जगह
उनकी ज़िन्दगी जहाँ जमी जा रही है ।

उनके ठहराव में ही
इनकी गति है
लक्ष्मी चपल हो जाती है इनकी
जब उनकी धमनियों में
खून जमने लगता है
जड़ें पत्तियों तक
नहीं पहुँचा पातीं जीवन
पक्षियों की उड़ान
एक जुम्बिश तक के लिए
हो जाती है मोहताज

तब ये निकलते हैं पर्यटन पर ।

जमी हुई झील में फँसी नाव
और आँखों में जमी बूँद की
तस्वीर खींचते हुए
अपने आलिंगन को
सार्वजनिक करके
प्रमाणित करते हैं मोहक दाम्पत्य ।

ये धरती पर स्वर्ग खोजने निकलते हैं ।

गठिया वात में जकड़े


माँ बाप को
पड़ोसियों के भरोसे छोड़कर
जाते हुए
फर वाला कोट
और पशमीने की शॉल
लाने का वादा दुहराते हैं
तो बूढ़ी आँखों में आ जाती है
एक उदास चमक
और बेजान पैरों में
अचानक होती है
एक लाचार सी हरकत ।

अपना अपना खयाल रखने की
ताकीद के साथ
चार हथेलियां लहराती हैं
और दो जोड़ी
आँखों के मोतियाबिन्द
इन्हें विदा करते हैं
पर्यटन के लिए
एक और उजाड़ पर ।

Thursday, 2 January 2014

मैं कुछ कम रह जाना चाहता हूँ !

काल के अनिश्चय से
कुछ निश्चित को पा लेने की 
हमारी आदिम ज़िद
अक्सर प्रार्थना की तरह फूटती है
हमारी समूची शौर्यगाथा के
नेपथ्य से ।

अभी अभी जो जन्मा है
एक नया साल
उसकी हँसी में झड़ते हैं
हमारी विजय के फूल
और उसके अयाचित रुदन में
मनुष्य की चूकों के गीत हैं ।

इन चूकों का
मैं एक आत्म-समर्पित मुजरिम
ढूढ़ना चाहता हूँ
उन गौरैय्यों को
जिनको आँगन से विदा लेते
देखा भी नहीं किसी ने ।

अंतरिक्ष के
किसी गोपन अवकाश में
मैं छुपा देना चाहता हूँ
अपने समय के विश्वसनीय शब्दों को ।

मुझे प्रेम करने वाली स्त्री को
मैं उस वक्त देना चाहता हूँ
एक चुम्बन
जब प्रेम-द्रोह की
सज़ा तामील करने से पहले
मेरी अंतिम इच्छा पूछी जायेगी ।

मैं कुछ झूठ सीखना चाहता हूँ
जिन्हें सच की तरह बोल सकूँ
उन लम्हों में
जब एक बच्चा
मुझे लाचार और निरुत्तर छोड़ देता है ।
उस नौजवान दोस्त से
जो तीन बार जान देने की
कोशिश कर चुका है ।
उस आग से
जो तब्दील होती जा रही है राख में ।

देखता हूँ
साल दर साल
समुद्र में बची रहती है थोड़ी प्यास
अनगिन नक्षत्र है
उसके बाद भी
सबके लिए थोड़ा खाली है आकाश 
जिस्म से निकलने के बाद
खून में बची रहती है थोड़ी हरारत
हवा कितना चलती है
फिर भी कम रह जाती है कुछ दूरी ।

नये साल में भी
मैं कुछ कम रह जाना चाहता हूँ ।।

Wednesday, 2 October 2013

गांधी को भूल जाइए !




गांधीजी की सांस्कृतिक उपस्थिति इतनी ज़बरदस्त है हमारे बीच कि एक आम भारतीय भी, जिसने गांधी को व्यवस्थित ढंग से नही भी पढ़ा है, उन पर बोलने का हक रखता है. गांधीजी की व्याप्ति जन-मानस में इतनी वृहद है कि उन्हें जानने के लिए उनके बारे में ज्यादा पढ़ने की ज़रूरत नहीं पड़ती. लेकिन गांधी के इस लोकव्यापीकरण की वजह से ही उन पर सोचने और उनको समझने के कम से कम दो नज़रिए हर वक्त रहे हैं.

लेकिन गांधीजी को समझा नहीं गया. जा मार्क्स को नहीं समझा गया. या यह कहना ज़्यादा सही होगा कि उन्हें गलत समझा गया. दरअसल विकास के क्रम में—चाहे वो गांधी हों या मार्क्स—उनके दर्शन के पूरे स्वरूपों को समझने के लिए हम एक विश्व-समुदाय की तरह विकसित नहीं हुए हैं. गांधीवाद और साम्यवाद के जो स्वरूप हमें बीसवीं सदी में दिखाई दिए थे, वे विकास के क्रम में ऐसा लगता है कि प्री-मेच्योर सामाजिक प्रयोग थे. जो इतिहास में अपनी गलत जगह उपस्थिति के कारण सफल नहीं हो पाये.

हम प्राणी जगत के विकास की प्रक्रिया को देखें तो पायेंगे कि बहुत सी प्रजातियां, जो अपने समकालीनों से हर दृष्टि से अधिक विकसित और श्रेष्ठ थीं, वे विकास के कालक्रम में समयपूर्व आ गयीं और नष्ट हो गयीं. उसके बाद जब उपयुक्त काल आया तो वे प्रजातियां सर्वाधिक सफल हुईं जो अपनी पूर्ववर्ती श्रेष्ठ और लुप्त प्रजातियों की नकल सी दिखाई देती थीं और कई बार उनसे हीन भी. इसके अतिरिक्त एक और बात भी किसी चीज़ के सफल या असफल होने की नियंता होती है.

इसे हम Law Of Randomization  से समझ सकते हैं. कई बार बहुत सी कमतर जातियाँ भी सफल हो जाती हैं, और कुछ बेहतर प्रजातियाँ भी असफल रह जाती हैं. इसके पीछे अकारण ही एक संयोग का तत्व काम करता है. विचारों या दर्शन के क्षेत्र में भी ऐसी ताकतें लगातार काम करती रहती हैं. मसलन गांधी या मार्क्स जैसे प्रयोग ही सौ बार हों, तो हो सकता है कि सत्तर बार कामयाब हो जायें और तीस बार नाकामयाब हों. जिन प्रयोगों को हमने देखा, वे हो सकता है पहले प्रयोग थे जो तीस प्रतिशत असफल के खाते में चले गये. ऐसी कारगर वैज्ञानिक ताकतों की हम अनदेखी नहीं कर सकते, जो अधिकांशतः मानव-निरपेक्ष चलती हैं.

किसी महापुरुष का उसके जीवनकाल में मूल्यांकन करना अथवा इतिहास में उसके स्थान का निर्धारण करना आसान काम नहीं होता. गांधीजी ने एक बार कहा था—“ सोलन को किसी व्यक्ति के जीवनकाल में उसके सुख के विषय में निर्णय देने में कठिनाई हुई थी, ऐसी सूरत में मनुष्य की महानता के विषय में निर्णय देना तो और कठिन काम है.” गांधी की मृत्यु पर पूरी दुनिया ने ऐसा शोक मनाया, जैसा मानव इतिहास में किसी अन्य मृत्यु पर नहीं मनाया गया था. जिस तरह से उनकी मृत्यु हुई उससे यह दुख और बढ़ गया था.

गांधीजी के वे कौन से गुण हैं जो उन्हें महान बनाते हैं. इतिहास इस बात को भी दर्ज़ करेगा कि इस छोटे से दिखने वाले आदमी का अपने देशवासियों पर इतना ज़बरदस्त प्रभाव था कि उसकी मिसाल नहीं मिलती. यह आश्चर्य की ही बात है कि इस प्रभाव के पीछे कोई अलौकिक शक्ति या अस्त्र-शस्त्रों का बल नहीं था. गांधीजी की इस गूढ़ पहेली का रहस्य, लार्ड हैलीफेक्स के मतानुसार है-उनका श्रेष्ठ चरित्र और स्वयं को मिसाल के रूप में रखने वाला उनका आचरण था. लार्ड हैलीफेक्स नमक-सत्याग्रह के दिनों में भारत के वायसराय थे और गांधी के काफी नज़दीक आये थे.

लेकिन गांधीजी के अभूतपूर्व उत्कर्ष के पीछे केवल ये ही कारण नहीं थे. रेजिनॉल्ड सोरेनसन का मानना था कि गांधीजी का केवल भारत पर ही नहीं, बल्कि हमारे पूरे आधुनिक युग पर जो व्यापक प्रभाव था उसका कारण यह था कि वे आत्मा की शक्ति के साक्षी थे, और उन्होंने उसका अपने राजनीतिक कार्यक्रमों में इस्तेमाल करने का प्रयास  किया. अहिंसा और सत्य के सिद्धान्तों को गांधीजी ने एक अस्त्र की तरह इस्तेमाल करने की कला विकसित की थी.

आज़ादी के बाद की पीढ़ी का जो द्वंद्व है, वह भी गांधीजी ने दिया. गांधी न हों तो यह द्वंद्व न हो. गांधी इस द्वंद्व के मूल कारण हैं, न कि मार्क्स !  द्वंद्व देने वाले गांधी हैं, वरना अब तक यह सदी अमेरिका की हो गयी होती. अमेरिका के सामने भी गांधीजी द्वंद्व खड़ा करते हैं. इस बात पर हो सकता है मार्क्सवादियों को एतराज़ हो. पर ज़रा ध्यान से देखिए कि द्वंद्वाद के सबसे बड़े सिद्धान्तकार मार्क्स इसे ज़मीनी हकीकत में नहीं बदल सके. यह सिद्धान्त खूब पढ़ा और समझा गया, लेकिन दुर्भाग्य से बौद्धिक विमर्श तक ही सीमित रह गया. गांधी ने सिद्धान्त नहीं दृष्टान्त दिए. उन्होंने विश्व के सामने पूँजी-श्रम, हिंसा-अहिंसा, गोरे-काले, प्रकृति-मशीन, आत्म-अनात्म का द्वंद्व रखा और विश्वभर के मानव समुदाय का ध्रुवीकरण करने में सफल रहे. गांधी की इस सफलता ने ही संभवतः मार्क्सवादियों में उनके प्रति ईर्ष्या-भाव पैदा किया होगा. तत्कालीन हिन्दुस्तानी कम्युनिस्टों ने गांधी को एक चालाक नेता कहा, जो युवकों की ऊर्जा को ऐसी दिशा में मोड़ देता था ताकि ब्रिटिश साम्राज्यवादियों और भारतीय पूँजीपतियों के हितों पर आँच न आये.

अलबत्ता उनकी नीतियों की उपादेयता और प्रासंगिकता पर बहस हो सकती है. गांधी की तरह के लोग विरले होते हैं. गांधीजी जितने सरल दिखाई देते हैं, उतने वो हैं नहीं. उनका व्यक्तित्व बहुत पेचीदा है. मसलन उन्होने वर्णवाद को तो बनाये रखने में रुचि दिखाई, मगर दूसरी ओर उन्होंने चाहा कि हिन्दू समाज से ऊँच-नीच खत्म हो. उन्होंने समतामूलक-समाज की कल्पना की और ट्रस्टीशिप की बात कही, मगर बिड़ला जैसे पूँजीपतियों को गले लगाये रखा. यह द्वंद्व बहुत पेचीदा और संश्लिष्ट व्यक्तित्व में हो सकता है.

मुझे लगता है कि गांधीजी की अचानक मृत्यु ने उनके बहुत सारे प्रश्नों को अनुत्तरित छोड़ दिया. सन् 62 के समय गांधीजी अगर जीवित होते तो दार्शनिक स्तर पर बहुत अजीब स्थितियों में फंस जाते. उनकी अहिंसा पर बहस शुरू हो जाती. गांधी का मानना है कि अहिंसा किसी भी सामाजिक अभियंता के लिए एक बहुत कारगर औजार है—जनचेतना का भी और परिवर्तन का भी. लेकिन हिंस्र पशुओं के बीच अहिंसा बेकार हो जाती है. बीसवीं सदी के उत्तरार्ध और इस सदी की शुरुआत में, जब मानव समाज में ही कई बड़े-बड़े रिश्ते हिंस्र पशुओं जैसा आचरण करने लगें, और  विचार कोई मुद्दा न रह जाये तो अहिंसा बेमानी सी लगती है. अहिंसा विकसित समाजों में ही संभव है.

गांधीजी ने हमारे समय की तीन प्रमुख क्रांतियों को चाहे आरंभ न किया हो, लेकिन उन्हें उद्दीप्त अवश्य किया. ये क्रांतियां हैं—नस्लवाद के विरुद्ध क्रांति, उपनिवेशवाद के विरुद्ध क्रांति और हिंसा के विरुद्ध क्रांति. वे इतना जिए कि पहली दो क्रांतियों में अपने प्रयासों की सफलता को देख सके. लेकिन हिंसा के विरुद्ध क्रांति अभी चल ही रही थी कि एक हत्यारे ने उन्हें मंच से हटा दिया.

गांधीजी उस दिन के लिए काम कर रहे थे जब अन्तर्राज्यीय झगड़ों मे भी हिंसा को उसी तरह अबैध घोषित कर दिया जायेगा, जैसे राष्ट्र/राज्यों की सीमाओं के भीतर उसे गैरकानूनी कर दिया गया है. यह विरोधाभास ही है कि साम्राज्यवाद के विरुद्ध राष्ट्रवाद का एक उग्रतम पक्षधर, एक उत्साही अंतर्राष्ट्रीयतावादी भी था. बहुत पहले 1924 में उन्होंने घोषणा की थी—“ संसार का बेहतर मस्तिष्क आज ऐसे पूर्ण स्वायत्त राज्य नहीं चाहता जो आपस में लड़ रहे हों, बल्कि मैत्रीपूर्ण, परस्पर निर्भर राज्यों का एक संघ चाहता है.”

मशीनीकरण की जिन विकृतियों पर हम आज हाय-तौबा मचा  रहे हैं, गांधी ने उनकी तरफ 1909 में ही इशारा कर दिया था. वे कहते थे—“ ऐसा नहीं होना चाहिए कि मशीनें मनुष्य के हाथ-पैरों को ही बेजान बना दें.......मुझे आपत्ति मशीनों से नहीं, बल्कि मशीनों के पीछे दीवाना हो जाने से है. यह दीवानगी तथाकथित श्रम-बचाऊ मशीनों के लिए है. लोग तब तक श्रम बचाते जाते हैं जब तक कि हज़ारों लोग बेरोज़गार होकर भूखों मरने की स्थिति में सड़कों पर नहीं आ जाते..........मैं ऐसी मशीनों का कतई हिमायती नहीं हूँ जो या तो बहुत से लोगों को गरीब बनाकर मुट्ठीभर लोगों को अमीर बनाती हैं, या अनेक लोगों के उपयोगी श्रम को अकारण विस्थापित कर देती हैं.”

गांधीजी भारत को समझते थे. उनकी परिकल्पना विकेन्द्रीकरण की ओर उन्मुख थी जहाँ संसाधनों पर और राज्यसत्ता पर एकाधिकार न हो. यह एक स्वप्नशीलता थी. गांधीजी ने नैतिकता का जो यूटोपिया बनाया, वह महत्वपूर्ण था. गांधीजी एक तरह से राजनीतिक व्यवहारिकता का प्रतिवाद भी कर रहे थे. गांधीजी मानते थे कि राजनीतिक सत्ता के जो तमाम अंगोपांग होते हैं, उनसे आक्रान्त होने के बावजूद नैतिक बने रहना संभव है. यह उनकी सबसे बड़ी ताकत थी और वह पिछली सदी के सबसे सहिष्णु व्यक्ति थे.

गांधीजी ने अतार्किकता का जो ढांचा बनाया था, वह एक तरह से आधुनिकता के तर्कवाद का बहुत सक्षम प्रतिवाद था. जिस सादगी और हिम्मत, निबंधता और स्वतंत्रता की उन्होंने परिकल्पना की, वह दरअसल आधुनिकता और उसमें छुपी हुई युयुत्सा और युद्धवाद का प्रतिपक्ष थी. मुझे लगता है कि जो आदिमयुगीनता गांधीजी के दर्शन में है, वह बहुत सारे अत्याचारों के विरुद्ध हमारा विकल्प बन सकती है.

बुद्ध के बाद गांधी ने ही समाज को एक बहुत बड़े परिप्रेक्ष्य में देखा. उन्होंने सिर्फ समाज के साथ मनुष्य के रिश्ते की ही चिन्ता नहीं की, बल्कि अपनी चिन्ता के दायरे में पर्यावरण को शामिल किया, मनुष्येत्तर प्राणियों को भी शामिल किया. समाज की सारी चिन्ताओं से अपने को जोड़ने की गांजीजी की क्षमता अप्रतिम थी. वह इस मायने में वाकई राष्ट्र के पिता की तरह लगते हैं जो पूरे परिवार का ध्यान रखता है.

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Saturday, 28 September 2013

84 बरस की लता और सदियों का सम्मोहन !

अपने करोड़ों प्रशंसकों के दिलों पर राज करते हुए, संकोची, भाग्यवादी, ईश्वरपरायण, पित़ृहीन, दृढ़ संकल्पी लता मंगेशकर आज चौरासी बरस की हो गईं. लता का जीवन यह बताता है कि भारत जैसे देश के, मुम्बई फिल्म उद्योग जैसे वातावरण में भी एक लड़की किन शिखरों को छू सकती है. दरअसल लता कोई दैवीय चमत्कार नहीं थीं, बल्कि वो मानवीय प्रयत्नों की पराकाष्ठा हैं. ये लता ही थीं जिन्होंने फिल्म संगीत को उसका वाज़िब हक दिलवाते हुए वैश्विक पहचान और स्वीकृति दिलवायी. भारत, पाकिस्तान, नेपाल, श्रीलंका, बंगलादेश पर तो वो आज भी राज कर रही हैं. साथ ही दुनिया भर में बसे अप्रवासी भारतीयों में उनके गीत एक नास्टैल्जिया पैदा करते हैं. ये अप्रवासी लता की आवाज़ के सहारे ही अपने देश की हवा, पानी, मिट्टी, जवानी और बचपन से जुड़े हुए हैं.
        
लता अगर भारत में न होकर किसी यूरोपीय देश, खासतौर से फ्रांस या जर्मनी में होतीं तो अब तक उन पर अनेक शोध हो चुके होते, जीवनियां लिखी जा चुकी होतीं. एक जमाने में यह खबर उड़ी थी कि अमेरिका ने भारत सरकार से यह पेशकश की थी कि मरणोपरान्त लता का गला उन्हें शोध के लिए दे दिया जाय, कि आखिर यह मिठास पैदा कैसे होती है ! खैर ! लेकिन भारतीय प्रशंसक लता को लेकर कभी भावुकता में गुम नहीं हुए. यद्यपि लता की आवाज़ हमें बहुत रचनात्मक रूप से भावुक करती है. दूसरी तरफ लता के कुछ गीत ऐसे हैं जिन्हें आधी रात के समय सुनकर पागल होने या यह दुनिया छोड़ देने की इच्छाएँ पैदा होने लगती हैं. लता के इस असर की स्वीकारोक्ति फिल्म ‘गेटवे ऑफ इंडिया’ के एक गीत में है. इसमें संगीत पर मुग्ध ओम प्रकाश ‘सपने में सजन से दो बातें, इक याद रही इक भूल गए’ गीत को ग्रामोफोन पर बार-बार सुनता है और विक्षिप्त होने लगता है. यह गीत, संगीतकार मदन मोहन की संभावनाओं का शिखर था, लेकिन लता के बिना इस शिखर को छुआ नहीं जा सकता था.
        
भारतीय उपमहाद्वीप में लता की लोकप्रियता इतनी चमत्कारिक है कि बच्चा-बच्चा उनके जीवन के बारे में जानता है. आप किसी से भी पूछिए वो बता देगा कि लता का जन्म इन्दौर के मराठी परिवार में 28 सितंबर 1929 को हुआ था. लता की माँ दीनानाथ मंगेशकर की दूसरी पत्नी थीं. जन्म के समय लता का नाम ‘हेमा’ रखा गया था. बाद में पिता दीनानाथ ने अपने एक नाटक ‘भाव बन्धन’ की पात्र ‘लतिका’ से प्रभावित होकर उनका नाम लता रख दिया. वस्तुतः इनका उपनाम ‘हार्डीकर’ था. पिता दीनानाथ ने ही अपने मूल स्थान(मंगेशी, गोवा) की पहचान को जीवित रखने के लिए ‘मंगेशकर’ उपनाम रख लिया था. लता की संगीत की आरंभिक शिक्षा स्वाभाविक रूप से पिता से ही शुरू हुई. फिर कच्ची उम्र में ही लता ने अमानत अली खान से संगीत सीखना शुरू कर दिया. आगे चलकर अमानत खान देवासवाले, पं. तुलसीदास शर्मा और बड़े गुलाम अली खाँ से भी सीखती रहीं. लता ने गाने के साथ ही 70 के दशक में कुछ मराठी फिल्मों के लिए संगीत भी तैयार किया. पिता दीनानाथ मंगेशकर अपनी संगीत-नाटक मंडली चलाते थे. लेकिन उनकी मंडली, सिनेमा में आवाज़ और संगीत के आगमन के कारण बर्बाद हो गई.
         
दीनानाथ शराब के आदी हो गए और चले गए. सिनेमा ने पारसी और अन्य थियेटर शैलियों को भी खत्म सा कर दिया. जिस सिनेमा ने दीनानाथ को बर्बाद किया, उन्हीं की बेटी फिल्म संगीत की साम्राज्ञी बन गई. लता जीवन भर जी जान से अपने पिता को भारतीय संगीत में प्रतिष्ठित करने में लगी रहीं, और अपने प्रचार के प्रति हद से ज्यादा उदासीन रहीं. लेकिन तब भी, जिसे बड़े गुलाम अली खान ने ‘तीन मिनट की जादूगरनी’ कहा था, वो लगभग 66 बरसों से हमारे दिल, दिमाग, गले, होंठ, कान में बसी हुई हैं. वो अपने पिता का बकाया पिछले साठ सालों से फिल्म संगीत से वसूल रही हैं. लता के प्रभाव का अंदाज़ा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि अगर किसी धुन को सुनने के बाद उनकी त्यौरियों पर एक भी बल पड़ जाता था तो नामी से नामी संगीतकार भी शर्मिन्दा हो जाते थे. दोयम दर्जे के संगीतकारों की तो पूछिए मत.
       
लता का चौरासी बरस का हो जाना हमें विचलित नहीं करता. क्योंकि आज भी किसी संगीतकार को जब कोई कठिन धुन गवानी होती है या कोई अविस्मरणीय गीत रचना होता है तो वह लता की शरण में जाता है. यद्यपि अब लता जब ऊँचे सुरों में जाती हैं तो उनकी आवाज में कुछ रेशे निकल आते हैं, लेकिन कोई सर्वनाश नहीं हो जाता. चौरासी बरसों ने लता की आवाज़ के साथ वह नहीं किया जो उसने सुरैय्या, शमशाद बेगम, नूरजहाँ या इकबाल बानों के साथ कर दिया था.
        
फिल्म संगीत को आदर दिलवाने का काम सहगल ने शुरू किया था. बाद में मुकेश, मन्ना डे, किशोर और सबसे अधिक रफी ने इस काम को आगे बढ़ाया. लेकिन भारतीय फिल्म संगीत को वैश्विक पहचान और हमारे सुख-दुख-राग-विराग-जनम-मरण का अनिवार्य साथी बनाया लता मंगेशकर ने. लता की साधना और उपलब्धियों से उनके समय के साथी गायक भी प्रेरित होते थे. संसार में भारतीय संगीत अगर अपनी पूरी ताकत से प्रतिष्ठित है तो वह शास्त्रीय गायकों की वजह से नहीं. हमें ईमानदारी से यह स्वीकार कर लेना चाहिए कि यदि हमारा लोकप्रिय फिल्म संगीत न होता तो पाश्चात्य पॉप के तूफान में हमारे शास्त्रीय संगीत के उस्ताद अपने तानपूरे और तबलों के साथ उड़ गए होते. जब पूरी दुनिया में मैडोना और माइकल जैक्शन का दिग्विजयी आभियान चल रहा था, उस समय उपमहाद्वीप में भारतीय फिल्म संगीत अपनी पूरी ताकत से उसके मुकाबिल था. इसी का नतीज़ा है कि नाचने-गाने और मस्ती के लिए भले ही पॉप संगीत बजा लिया जाय, लेकिन दुखों का पहाड़ पिघलाने और खुशियों में उबाल लाने के लिए हमें अपने फिल्म संगीत की ही आँच चाहिए होती है. और यह आँच पैदा करती है एक लाल किनारे वाली सफेद साड़ी पहने हुए शर्मीली औरत. यह औरत पिछले 66 सालों से गाती जा रही है. और उसके साथ संसार के कोने-कोने में न जाने कौन-कौन गा रहा है !
             
लता पर मुग्ध रहते हुए हमें गुलाम हैदर के एहसान को भी नहीं भूलना चाहिए. भले ही लता ने तेरह की उम्र में मराठी फिल्म ‘पाहिली मंगला गौर’ में गा लिया था, लेकिन इस साँवली और मरियल सी लड़की में लता को गुलाम हैदर ने ही खोजा था. उस लता को जो करोड़ों लोगों को न सोने देती है न जागने देती है. गुलाम हैदर तो लगभग भुला दिए गए, लेकिन लता को भुलाना रहती दुनिया तक संभव नहीं होगा.
        
यह अमरत्व लता को आसानी से नहीं मिला. इसके लिए उन्हें मीरा बनना पड़ा. पिता की मृत्यु के बाद पूरे परिवार की परवरिश का जिम्मा तो उठा ही लिया था. उन्होने अपनी निजी लालसाओं और सुखों को भी होम कर दिया. लता उन अर्थों में सुन्दर नहीं थीं जिनसे हम किसी स्त्री को देखते हैं, लेकिन लता के करोड़ों प्रेमी आज भी हैं. 1950-55 के बीच जब राजसिंह डूँगरपुर उनके जीवन में नहीं थे, तब भी सी. रामचन्द्र, नौशाद, अनिल विश्वास, मदन मोहन, चितलकर, शंकर-जयकिशन जैसे कई पुरुष उन पर मोहित रहे हैं. लेकिन लता ने अपना जीवन संगीत और पिता की स्मृतियों को संजोने में समर्पित कर दिया था. उन्होने राग-द्वेष के जीवन से पारगमन करके, संगीत में समाधि लगा ली. उनकी साधना का फल यह निकला कि उनकी पूरी देह ही उनकी आवाज़ बन गई.
       
पचास के दशक के मध्य में भारतीय फिल्म संगीत और फिल्मों में संवेदना के स्तर पर एक शालीन परिवर्तन हो रहा था. सहगल, पंकज मलिक, पहाड़ी सान्याल, सुरेन्द्र दुर्रानी, के.सी. डे, जगमोहन, काननबाला, जोहराबाई, जूथिका राय, अमीरबाई कर्नाटकी जैसे गायक-गायिकाएँ अचानक पुराने लगने लगे. इनकी आवाजें अटपटी और करुणा में भी हास्य पैदा करने वाली लगीं. 1945-46 के आसपास हिन्दी फिल्मों में चकाचौंध पैदा करने वाले परिवर्तन रहे थे. संवेदना, सोच, तकनीक और आस्वाद—सब कुछ बदल रहा था. भारतीय फिल्म-कला वयस्क और अंतर्राष्ट्रीय हो रही थी. इसी समय लता, रफी, मन्ना डे, हेमन्त कुमार, नौशाद, मदन मोहन आदि भारतीय संगीत-रसिकों के संस्कार बदल रहे थे.
        
इस सुदीर्घ और प्रदीप्त संगीत साधना में लता किन किन रुपों में आयीं हमारे सामने. बच्ची के रूप में, किशोरी की तरह, नायिका की तरह......यानी एक स्त्री जिन जिन रूपों में घटित हो सकती है, सब में. लता की आवाज़ ने ब्याहता, परित्यक्ता, साध्वी, विधवा, विरहिणी, नौकरानी, पटरानी, कोठेवाली, पतिव्रता आदि नारियों की भावनाओं को समय समय पर जिया. स्त्री की सम्पूर्णता को लेकर वो करोड़ों पुरुषों की आकांक्षाओं में बस गयीं, तो न जाने कितनी अवसादग्रस्त स्त्रियों को जीवनदान देती रहीं. लता की आवाज़ में ऐन्द्रिकता और मांसलता नहीं है. उनकी आवाज़ में एक पवित्र समर्पण है. वहीं उनकी बहन आशा की आवाज़ में मांसलता और अधिकार भाव है. याद कीजिए ‘बुड्ढा मिल गया’ गीत में लता की आवाज़ कितनी अटपटी लगती है. आशा के गीत ‘मोरे अंग लग जा बालमा....’  वाला असर क्या लता की आवाज़ में आ सकता था !
               
ऐसा नहीं था कि शुरू से ही लता में ऐसा चमत्कार था. ‘मजबूर’ से लेकर ‘लाडली’ तक लता की आवाज में साफ तौर पर एक कच्चापन था. लेकिन इसके बाद सी. रामचन्द्र और नौशाद ने उनकी आवाज़ को इस कदर सँवारा कि पाँच सालों के भीतर ही दूसरी गायिकाएं दृश्य से गायब हो गयीं. लता को लेकर यह बहस भी चली कि उन्होने किसी दूसरी गायिका को पनपने नहीं दिया. यह इमानदारी से सोचने की बात है कि लगभग 21 साल की उम्र में क्या उनके पास संगीत की दुनिया की इतनी ताकत आ गई होगी कि वो अपने से वरिष्ठ गायिकाओं को चुप करवा सकतीं ?

                



लता उस भारतीय स्त्री की आवाज़ हैं जो हर पुरुष के भीतर कस्तूरी की तरह छुपी रहती है. जिसे पुरुष जन्म लेने के साथ ही खोजने लगता है. लता न सिर्फ हमारा अभिमान हैं, बल्कि हमारी जीवनीशक्ति भी हैं. आधी रात को हमारे अस्तित्व पर उग आये प्रश्नचिन्ह का जवाब हैं लता के गीत. हमारे बचपन, यौवन, बुढ़ापे की सदाबहार साथी लता की आवाज़ तब तक रहेगी जब तक इस धरती पर मनुष्य है.