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Thursday, 4 June 2015

बनारस मण्डली : बिहार मण्डली

ऐसा लगता है कि हिन्दी साहित्य की सल्तनत में, 'बनारस-मण्डली' को 'बिहार-मण्डली' प्रतिस्थापित कर रही है। दिल्ली पर भी बिहार मण्डली का प्रभाव ज़्यादा दिखता है।

कई दशकों तक हिन्दी में बनारस मण्डली का दबदबा रहा है। एक से बढ़कर एक तेजस्वी लेखकों ने हिन्दी की विभिन्न धाराओं को काशी की धारा का पर्याय बना दिया। बिहार में भी शूरवीरों की कतई कमी नहीं थी लेकिन न्यायाधीश की गद्दी बनारस मण्डली के पास ही रहती आई है।

यद्यपि प्रखरता और संवेदना में दोनों मंडलियां एक सी हैं। अपनी जातीय अस्मिता, भाषाई गौरव और देशज संवेदनाओं को, दोनों ही साहित्यिक और कलात्मक रूपाकार देते रहे हैं। अपनी बोलियों और लोकरीतियों को वैश्विक पहचान और सम्मान दिलाया। अड़ना और लड़ना, दोनों मण्डलियों का स्वभाव है। इसके साथ ही बनारस मण्डली और बिहार मण्डली(खासतौर से पटना) के बीच एक प्रतिस्पर्धा हमेशा दिखती रही।

बनारस मण्डली के वर्चस्व का कारण भी था। उन्होंने अपने आपको समकाल के साथ ही विपुल भारतीय मनीषा से जोड़ा। संस्कृत और अपभ्रंस साहित्य को अपना प्रस्थान विन्दु बनाया। इसीलिए शास्त्रार्थ में वे अपने प्रतिद्वंद्वियों से आगे निकलते दिखते रहे।

बिहार मण्डली के पास अपने समकाल से संघर्ष के साथ साथ भविष्य के स्वप्न थे। उनके साहित्य में चिंतन की प्राचीन धारा कम ही दिखती है। यद्यपि भाषा और रूप सौष्ठव उनका भी बनारस मण्डली जैसा ही है।

बनारस मण्डली के अधिकाँश योद्धा अब वानप्रस्थ या सन्यास आश्रम की ओर बढ़ चले हैं। नये लोगों में वह तेजस्विता दिखाई भी नहीं पड़ती। पुराने सारे आचार्य दिल्ली में बस कर विगत हो रहे हैं। कोई रहनुमा भी न बचा ।

दूसरी ओर, बिहार मण्डली ने अपने संघर्षों से एक अकाट्य चातुर्य अर्जित कर लिया। उनकी क्षेत्रीयता और एकजुटता अखण्ड है। उनकी दृष्टि दूर तक जाती है। दृष्टिकोण सदैव स्वहित पर अवस्थित रहता है। उन्होंने बाज़ार के आग्रहों को भी बेहतर समझा है। वे हमेशा आक्रमण की मुद्रा में रहते हैं।

इसीलिए हिन्दी की दिल्ली, अब बिहार मण्डली के हाथ में जाने को है।

Monday, 8 December 2014

प्रेम के पहले दिन

उस दिन हमने
एक दूसरे को
सौंप दी थी अपनी दुनिया
अब मैं उसका एकांत था
और वो मेरी।

हमने अपने चेहरे
सपाट कर लिए
और रगड़ रगड़ कर
मिटाते रहे
उस पर लिखी इबारतें।

उसी दिन
हमने एक बाड़ लगाई
अपने चारों ओर
और खुद को
बेदखल कर लिया
धरती और आकाश से।

हमने भुला दिए सभी स्वाद
आँखों से उतार कर
सभी तस्वीरें
फेंक आए समन्दर में।

बस इतना ही किया
प्रेम के पहले दिन !

Monday, 27 October 2014

वो आदमी

वो आदमी
जो उठ कर अँधेरे मुह
चलता रहता है दिन भर
देर रात
ऐसे लौटता है घर
कि कोई गुनाह करके लौटा हो।

जिसके पसीने में
होती है विद्रोह की गंध
और माथे की सलवटों में
असहमति की लिपि।

जो मित्रों के बीच भी
हँसता नहीं
और भीड़ में
हो जाता है भूमिगत।

बसंत जिसके लिए
एक मौसम परिवर्तन से अधिक
कुछ नहीं।

और कविता
एक परदा है
जिसे गिराकर
वह बदलता है कपड़े।

उस आदमी के बारे में
सबसे दयनीय सूचना यह है
कि उसके खिलाफ
कोई रिपोर्ट दर्ज़ नहीं है
किसी थाने में !

Tuesday, 10 June 2014

जीवन के उत्तरार्ध में

यूँ तो कुछ सीखना

उतना आसान नहीं होता अब

फिर भी मैं
कुछ प्रयत्न करता हूँ
जीवन के उत्तरार्ध में।

असंभव वानप्रस्थ के बीच
मैं एक ऐसा गृहस्थ
बने रहना चाहता हूँ
जो नहीं हुआ किसी हादसे का शिकार
और बचा ले गया पुरखों की पगड़ी।

इसी अवधि में
मैं सीख लेना चाहता हूँ
सीली तीलियों से आग सुलगाना
और राख के ढेर में उसे बचाये रखना
और गठानें खोलने जैसे मामूली काम।

मैं चाहता हूँ
कि निकलूँ जब बाज़ार की तरफ
तो चौंधिआया न करें आँखें
और बचा रहे
दोबारा वहाँ आने का हौसला।

मेरा मन है
कि अब भी सुनाई पड़ें मुझे
चिड़ियों के गीत
और उन्हें मैं
चीखों के अंतराल में
गुनगुना भी लूँ।

लंबी यात्राएँ अब मुमकिन भी नहीं
और ज़रूरी भी
लेकिन कुछ बची रह गई दूरियों को
चल लेने की बेचैनी
खाये जाती है दिन रात।
मैं भटक कर भी
कुछ ऐसे रास्ते खोजना चाहता हूँ
जो इन दूरियों की ओर जाते हैं।

ऐसे तो कोई शौक बचे नहीं अब
और नींद भी
आती नहीं उतने भरोसे की
फिर भी कुछ एक
टूटे फूटे सपनों में
मैं नाव चलाते देखता हूँ खुद को
मेरे साथ एक परछाईं होती है
दोनों जन बैठे हैं
एक एक किनारे पर।

सच पूछिए तो अब
निकालते निकालते चक्रविधि ब्याज
परीकथाएँ लिखने का होता है मन
कि कुछ तो ऐसा छोड़ सकूँ
जिन्हें बच्चे छोड़ सकें
अपने बच्चों के लिए।

जाने कौन यक्ष
रोज़ पूछता है मुझसे प्रश्न
और यह जानते हुए
कि युधिष्ठिर नहीं हूँ मैं
उनके उत्तर खोजना चाहता हूँ
जीवन के उत्तरार्ध में।
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Friday, 6 June 2014

कविता कामिनी के कुटिल कान्त !


हमारे नगर में एक महाकवि हुआ करते हैं।
वयोवृद्ध के अलावा मतिवृद्ध भी हो चुके हैं अब। एक सम्मानित पद पर रहते हुए अब शासकीय सेवा से निवृत्त हो गये हैं

चालीस वर्ष पहले उन्होंने लगभग भीष्म पितामह के टक्कर की एक प्रतिज्ञा कर डाली। देवी सरस्वती को साक्षी मानकर उन्होंने निश्चय किया कि चाहे सूखा पड़े या बूड़ा आये, वे प्रतिदिन तीन कविताओं का प्रसव, आजीवन करते रहेंगे। माता सरस्वती ने अपने इस अद्भुत उपासक पर अपनी कृपा बनाए रखी। महाकवि आज भी बिला नागा कविताओं का उत्पादन किए जा रहे हैं। उनकी प्रतिज्ञा के आधार पर गणना की जाये तो अब तक लगभग 44 हज़ार कविताओं के वे जायज़ जनक बन गये हैं।

महाकवि के कई कविता संग्रह उनकी आलमारी की शोभा बढ़ा रहे हैं। और कई अवतरित होने की कतार मे हैं। सभी संग्रहों का प्रकाशन उनके ही पराक्रम से संभव हुआ। इसके लिए उनके बढ़िया सरकारी पद की उर्वराशक्ति को नकारा नहीं जा सकता। विन्ध्य के एक मध्यकालीन संस्कृत कवि की स्मृति में वे केन्द्रीय मंत्रालय के अनुदान पर एक सालाना कार्यक्रम का आयोजन, सघन जंगल के बीच करते हैं। शरद की यही कमनीय रात्रि उनके नये संग्रहों की सुहागरात होती है।

महाकवि अलंकार-युक्त कविता के पक्षधर नहीं हैं। उनका प्रयास रहा है कि कविता-कामिनी के कलेवर को अलंकारों से मुक्त कर, जीवन और प्रकृति के नजदीक लाया जाय। इसीलिए उनकी कविताओं में ब्रश-मंजन-पाखाने से लेकर संभोग तक के नितान्त सजीव चित्र मिलते हैं। कविता के अलंकारों को एक-एक कर उतारते हुए उन्होंने कामिनी को लगभग निर्वस्त्र कर दिया। अब उनकी कविता प्रकृति के बहुत नजदीक पहुँच चुकी है। उनके कविता-संग्रहों के शीर्षक इस प्रकार हैं---‘अनुभूतियों का सच’, ‘अनुभूतियों का महाज्वार’, ‘अनुभूतियों का अन्तर्जाल’, ‘घास के फूल’ इत्यादि।

अब निरीह पाठकों के बीच एक सवाल हमेशा तनकर खड़ा रहा कि लगभग 44 हज़ार कविताओं के विषय आते कहाँ से हैं !?
हम और आप भले ही स्तंभित हों, लेकिन महाकवि के सामने यह सवाल कभी नहीं खड़ा हो सका।

महाकवि बवासीर के मुस्तकिल रोगी हैं। “वियोगी होगा पहला कवि, आह से उपजा होगा गान....”। इस फार्मूले को थोड़ा सामयिक रंग दे दें---“ रोगी होगा पहला...”----तो महाकवि की प्रेरणाओं का पहला अक्षय स्रोत यही मुआ बवासीर ही लगता है। इसी आह से उपजा होगा गान।
इसके अलावा तीन और स्रोत हैं जहाँ से महाकवि अपनी कविताएँ लाते रहे होंगे।

प्रथम, श्रीहरि ने महाकवि को ठीक उसी तरह की शक्ल-सूरत दी थी, जैसी उन्होंने स्वयंवर के समय देवर्षि नारद की कर दी थी। इसीलिए महाकवि की कविताओं में सौन्दर्य के लिए खुली चुनौती आजीवन बनी रही।

द्वितीय, महाकवि पत्नी-पीड़ित भी थे। उनके पास-पड़ोस के लोग रात में चौंककर उठ जाते थे, जब कवि-पत्नी महाकवि को पीटने लगतीं। कई बार तो वे अल्पवस्त्रों में ही आधी रात भड़भड़ा कर बाहर भागते देखे गए। उपरोक्त परिस्थिति भी कविता के लिए बहुत उर्वर भाव-भूमि तैयार करती है।

तृतीय, सेवानिवृत्त होते ही महाकवि अपने से पन्द्रह वर्ष छोटी एक सद्यःविधवा प्राध्यापिका पर मुग्ध हो गए। वे प्रेम में इतने असहाय हो उठे कि दिन-दिन भर प्राध्यापिका के घर बैठे प्रेम की याचना करते रहते। पर महोदया नहीं पिघलीं। बात कवि-पत्नी तक भी पहुचनी ही थी। तभी वियोग-श्रृंगार घटित हुआ। एक अप्रिय संयोग के चलते महाकवि-प्राध्यापिका-कविपत्नी की मुठभेड़ हो गई। भाव-विभाव-अनुभाव-संचारी भावों का उच्चतम प्रस्फोट हुआ। और महाकवि जब बाहर निकले तो उनके माथे से रक्त-धार  बह रही थी।

महाकवि आज भी पूरे वेग से कविता-कामिनी के कलेवर को अलंकार-मुक्त करके उसे प्रकृतिस्थ करने की अपनी महासाधना में तल्लीन हैं। 


Thursday, 5 June 2014

वन्दे मात्र रम !

ये बात कई साल पहले की हुई।
उन दिनों हम सच में जवान थे। न सिर्फ जवान थे बल्कि कवि भी थे। उन दिनों देखा यह गया था कि अगर किसी डरपोक किस्म के भावुक जवान को इश्क मोहब्बत हो जाए तो उसका मोक्ष कवि-योनि में होता था।

हमने भी एक हसीना से प्रेम किया। प्रेम ही नहीं किया, प्रेम-पत्र भी लिखा। कॉलेज का बसन्त था। हमने प्रेम-पत्र बड़े सलीके से हसीना की साइकिल के ब्रेक-लीवर में फँसा दिया ताकि उसकी नज़र से बच न पाए। उसकी नज़र पड़ी भी। दो दिन बाद उसकी माँ का बुलावा आ गया। हम गए। और जब लौटे तो हमारे भीतर कविता का बीज पड़ चुका था। बाद को मेरे एक दोस्त—जो  मुझसे कुछ ही पहले कवि-योनि में प्रवेश कर चुके थे—ने उसी प्रेम-पत्र को फेर-बदल करके कविता की शक्ल दे दी। वही मेरी पहली कविता थी। एक अंश-----

“ मेरी प्रिय तुम
वक्त से एक लम्हा तोड़कर
ऐसे छुपाता हूँ तुम्हें
जैसे बचपन में
अमावट चुराकर
अम्मा से छुपाता था।“
(दूसरी लाइन गुलज़ार से प्रेरित। आखीर में अमावट और अम्मा में अनुप्रास की छटा !!)

खैर !  बात मुझे कुछ दूसरी ही करनी थी।
कवि हो जाने के बाद हम खूब सक्रिय हुआ करते थे। उन्हीं दिनों कमान्डर कमला प्रसाद के नेतृत्व में हमने समीपी पर्यटन स्थल गोविन्दगढ़ में प्रगतिशील लेखक संघ का एक रचना-शिविर लगाया। झील के बीच बने टापू पर प्रदेश के नवोदित कवियों के साथ, भगवत रावत, चन्द्रकान्त देवताले, मलय, ज्ञानरंजन, प्रमोद वर्मा जैसे कवि/कथाकार/आलोचक तीन दिन तक चर्चा करते रहे।

इस शिविर के आयोजन में गोविन्दगढ़ स्थित पुलिस ट्रेनिंग स्कूल के एसपी महोदय का सहयोग लेना पड़ा। बाद में पता चला कि एसपी साहब साहित्य-प्रेमी ही नहीं, कवि भी हैं।

शिविर सत्रों में चलता था। सारे काम-धाम छोड़कर एसपी साहब एक दयनीय उत्सुकता और एक खूबसूरत सी डायरी लिए समय से पहले ही हर सत्र में उपस्थित हो जाते। एक दो सत्रों तक तो हम समझ नहीं सके। लेकि बाद में समझ आ गया कि ये अपनी कविताएँ सुनाना चाहते हैं। चर्चाओं के दौरान उनका उत्साह देखते बनता था। वो वक्तव्यों पर भी ऐसी दाद उछालते जैसे किसी मुशायरे में बैठे हों ! वाह वाह ! के साथ उनका वही हाथ उठता जिसमें कविताओं वाली डायरी होती। उनकी दाद में इतना घोष होता कि वक्ता भी अचकचा जाता।

खैर दैव-दुर्योग से एसपी साहब को कविताएँ सुनाने का मौका नहीं मिल पाया तो संयोजक कमला प्रसाद चिन्तित हुए। उन्हें लगा कि आदमी यह काम का है। आगे भी जरूरत पड़ सकती है। उन्होंने एक रास्ता निकाल ही लिया। कविता-पाठ तो अब संभव नहीं था। शिविर के समापन सत्र में उन्हें जबरन मेजबान की भूमिका में बाँध दिया गया और गोविन्दगढ़ की धरती पर पधारे देश के मूर्धन्य विद्वानों के प्रति आभार प्रदर्शन की महती ज़िम्मेदारी देकर माइक पर आमंत्रित किया गया।

आमतौर पर आभार-प्रदर्शन की रवायत में अतिथियों के साथ-साथ पत्रकारों, नेताओं, प्रायोजकों, साउण्ड वाले, भोजन व्यवस्था वालों, और स्थानीय गुण्डों के प्रति आभार जता कर बात खत्म कर दी जाती है। लेनिक एसपी साहब जैसे ताक में थे। उन्होने यहाँ भी गुंजाइश निकाल ही थी। कविता तो नहीं सुनाई, लेकिन नायाब चीज़ हमें दी !!

उन्होंने कहा कि कविता पर आप लोगों ने तीन दिनों तक लॉ एण्ड ऑर्डर को तोड़कर जो बलवा किया, उससे मुझे लगा कि मैं भी कुछ बोलूँ। मैं आपके सामने राष्ट्रगीत-‘ वन्दे मातरम्……’ की एक नई व्याख्या पेश कर रहा हूँ----------

एसपी साहब कह रहे थे---“ बंकिमचन्द्र रसिया आदमी थे। इसीलिए उन्होने लिखा---वन्दे मात्र रम।–मैं केवल रम की वन्दना करता हूँ।
सुजलां सुफलां मलयज शीतलाम्।–साथ में स्वच्छ जल हो, कुछ अच्छे फल आदि हों तथा मन्द शीतल हवा बह रही हो, तब यह और प्रभावी हो जाती है !
सश्य श्यामलां मातरम्। --ध्यान रहे, समय शाम का ही होना चाहिए !
शुभ्र ज्योत्सनाम पुलकित यामिनी
फुल्ल कुसुमित द्रुमदल शोभिनीम्।–धवल चांदनी में बौराई रात हो। घर का उपवन हो। आस-पास फूलों की सुगन्ध आ रही हो और आप बोतल खोलकर बैठे हों।
सुभाषिणीम् सुमधुर भाषिणीम्। सुखदां वरदाम् मातरम्।----और अगर सुमधुर कण्ठों वाली कोई सुन्दरी भी साथ में हो तब, अहा !  यह रम आपको अलौकिक सुख का वरदान प्रदान कर देती है !!

एसपी साहब के चेहरे की आभा में मूर्धन्य विद्वत-जन स्तब्ध थे। इसी के साथ शिविर का समापन हो गया।

Friday, 11 April 2014

कामिनी काय कांतारे / महेश कटारे

 

जीवन तो वही वरेण्य हे जो कथा बन सके। 
****
भोगों को हमने नहीं भोगा, भोगों ने हमें ही भोग लिया। हमने तप नहीं किया, त्रितापों ने तपा दिया हमें। समय नहीं बीता, हम स्वयं बीत गए....तृष्णा न बुढ़ाई, बूढ़े हुए हम ही।
****
स्त्री प्रथमतः और अंततः जननी होती है। वेश्या या ब्राह्मणी के आरोप तो काल और स्थितिगत अवस्थाएँ हैं।
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दुर्लभ पुरुष के प्रति प्रेम है। मन में भारी लज्जा है। और शरीर दूसरे के अर्थात पति के अधीन है। प्रिय सखि ! ऐसी स्थिति में प्रेम बहुत संकट भरा है।
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संन्यास से संसार नहीं चलता। भूख,प्यास,प्रेम,क्रोध,राग,भय आदि प्रकृति प्रदत्त हैं। योगी इन पर विजय पा सकता है, इन्हें मिटा नहीं सकता।

----कामिनी काय कांतारे


एक हफ्ते से मैं इसी उपन्यास के प्रेम में हूँ। ऊपर उद्धरण भी उसी से हैं। महेश कटारे के इस उपन्यास में राजा भर्तृहरि की जीवनकथा है।
यह कथा राग और वैराग के बीच करवटें बदलते जीवन की कथा है। यह राजा भर्तृहरि, भोगी भर्तृहरि, योगी भर्तृहरि, कवि भर्तृहरि, वैयाकरण भर्तृहरि की कथा है। यह कथा ऐसी भाषा में रची गई है, जो हमें चमत्कृत करते हुए सम्मोहित कर लेती है। कथा बुनने की ऐसी तकनीकी जो जासूसी कथाओं जैसी व्यग्रता पैदा करती है। और समापन ऐसा जो हमें मूर्तिवत कर दे।

अब आपको याद आ गया होगा कि भर्तृहरि अवन्ति के राजा हुए थे, जिसे अब उज्जैयिनी कहा जाता है। कहते तो यह भी हैं कि भर्तृहरि ने सात बार वैराग्य धारण किया और लौटकर फिर से गृहस्थ बन जाते। अंत में गोरखनाथ के शिष्य बनकर गृह त्याग दिया। उनके गृहत्याग का दृश्य इतना करुण था कि यह कथा लोकजीवन में आज भी हृदय विदारक रुदन के साथ सुनी और मंचित की जाती है।

अब आपको उस जोगी का स्मरण भी हो आया होगा, जो साल में एक या दो बार सारंगी बजाते कुछ अस्पष्ट सी करुण धुन गाते हुए आपके दरवाजे पर आ जाता था। इस जोगी को भरथरी कहते हैं। भरथरीयानी भर्तृहरि। यह नाम इसलिए इन्हें मिला क्योंकि ये भर्तृहरि के जोगी बनने और पत्नी पिंगला से गृहत्याग की भिक्षा मागने की कथा गाते हैं।

इसी कथा को महेश कटारे ने दो खण्डों और लगभग छः सौ पृष्ठों में अद्भुत कथा-कौशल से रचा है। कुछ इतिहास से, कुछ मिथकों से और कुछ कल्पना से। बिना प्रवाह को बाधित किए लेखक ने प्रेम, काम, वैराग्य, नीति, जैन आचार, नाथ संप्रदाय, ज्योतिष, राजनीति, कूटनीति, आयुर्वेद, स्त्री जीवन, दास जीवन और जन जीवन का प्रमाणिक विवेचन किया है।


सन् 2012 में यह उपन्यास प्रकाशित हुआ था। मुझे संदेह है कि यह कितने पाठकों तक पहुँचा होगा। इसके दो खण्डों की कीमत 830/- रु. है, जो हिन्दी पाठकों को दूर रखने के लिए पर्याप्त है। मैं अंतिका प्रकाशन और श्री गौरीनाथ जी से आग्रह करता हूँ कि इस पुस्तक को जनसुलभ पेपरबैक संस्करण में छापें तो यह और पाठकों तक पहुँच सके।

मध्यकालीन परिवेश में होते हुए भी यह उपन्यास हमें समकालीन जीवन से अप्रत्याशित रूप से जोड़ता है।

Saturday, 29 March 2014

ऐसे तो, समय रुकता नहीं कभी !


ऐसे तो
समय रुकता नहीं कभी
पर उसकी धार के किनारे
हमारा कोई क्षण
ठिठका रह जाता है सालों साल।

दीवार और कलाइयों पर
निशान छोड़ती
घड़ी की सूइयाँ घूमती रहती हैं
और हमारा
छः बजकर तीस मिनट
वहीं खड़ा रहता है अवाक्
ठंड की शाम में भी
माथे पर उभर आये
पसीने की एक परत लिए।

कैलेण्डर बदलता रहता है शताब्दियाँ
लेकिन
अक्टूबर, सत्तान्नवे की
सत्रह तारीख पर
लगाए गए गोले को
नहीं मिटा पाया वह किसी जतन।

सूर्य घूमा
पृथ्वी ने लगाए चक्कर
चन्द्रमा ने बदलीं कलाएँ
हवाएँ, ऋतुएँ बदलती रहीं
और हमारा कोई एक क्षण
हो गया इन सबसे बैरागी।

सूर्य पृथ्वी और चन्द्रमा से
छुपी रह जाती हैं
क्षणों में घटने वाली
खगोलीय घटनाएँ
स्थिर में आने वाले भूकम्प
चरखा चलाने वाली बुढ़िया का रहस्य
और दो खरगोशों की कहानी।

ऋतुओं की खुर्दबीन से
ओझल ही रहता है
हमारे उस क्षण का मौसम विज्ञान।

यह गति में
स्थिरता का सौन्दर्य है
ध्वनि में मौन का नाद
और जीवन के नृत्य में
मृत्यु का स्थायी।

Monday, 10 March 2014

मैं सोशल मीडिया पर, प्रिन्ट मीडिया का कवि हूँ !

[योगेश्वर बोले ही चले जा रहे थे----
मैं प्रकाशों में सूर्य हूँ। वेदों में सामवेद, देवों में इन्द्र, रुद्रों में शिव हूँ। पर्वतों में मेरु, पुरोहितों में बृहस्पति, वाणी में ओंकार, वृक्षों में अश्वत्थ, देवर्षियों में नारद, घोडों में उच्चैःश्रवा, हाथियों में एरावत और सांपों में वासुकि हूँ।
मैं प्रजनकों में कामदेव, अक्षरों में अकार, समासों में द्वन्द्व समास हूँ।

मैं ऋतुओं में वसन्त, छलियों में जुआ, विचारकों में उशना, और रहस्यों में मौन हूँ।

मैं सोशल मीडिया में, प्रिन्ट मीडिया का कवि हूँ ! ] 


--हाँ, मैं कवि-लेखक हूँ. अपने को विशिष्ट, ऊपर और सुरक्षित बनाने के लिए हम क्या-क्या नहीं करते !

--मैं आपकी अच्छी कविता को भूलकर भी like नहीं करता, लेकिन आपकी ऊल-जलूल और बेमतलब पोस्ट पर वाह-वाह कर देता हूँ--ताकि आप धन्यभाग मानकर मेरी प्रशंसा में कभी कमी न रखें।

--मैं अक्सर ऐसी पोस्ट लगाता हूँ जो किसी को समझ न आए !
 और आप एहसासे-कमतरी के मुस्तकिल मरीज़ बने रहें।

--मैं अक्सर महान व्यक्तियों और महान विचारों का धत्-करम करता हूँ !
ताकि छोटे-मोटे जीवधारी तो बम् के धमाके से ही खेत रहें।

--मैं अपनी रचनाएं अपने मित्रों से शेयर करवाता हूँ, और उनकी मैं करता हूँ !
इससे मेरा बडप्पन, भाईचारा और सहिष्णुता असंदिग्ध बनी रहती है।

--मैं बिला नागा, नामालूम कौन सी दुनिया की, कौन सी पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित अपनी रचना की,
अस्पष्ट तस्वीरें व़़ॉल पर लगाते हुए सकुचाता हूँ।

--मैं आए दिन सभा-गोष्ठियों में सदारत करने जाता हूँ !
और यह जानते हुए भी कि आप चार सौ कोस दूर रहते हैं, आपको आमंत्रित करना नहीं भूलता हूँ।

--अब यह कहने की ज़रूरत नहीं है, कि मुझे कवियत्रियों में ज्यादा प्रतिभा और संभावना दिखायी पड़ती है !
आरम्भ में मैं उन्हें छन्द और बहर जैसी, व्याकरण-सम्मत, नितान्त गैर-रूमानी सलाहें दिया करता हूँ।

--मैं अपनी प्रशंसिकाओं से inbox में चैट तभी करता हूँ, जब वो बहुत इसरार करती हैं !
और वहाँ मैं बहुत विषय-निष्ठ रहता हूँ।

--मैं इन अबलाओं को बहुधा, अपने समकालीन दुष्ट कवि-लेखकों से कैसे बचा जाये, के उपाय बताता हूँ।

--मुझे इन सुमुखि ललनाओं की निष्फल जाती प्रतिभा, उकसाने की हद तक प्रेरित कर रही है !
अब मैने निश्चय किया है कि मैं कुछ ही दिनों में संपादक-प्रकाशक बन जाऊँगा।

--लेकिन आप मायूस न हों। मैं इन अबलाओं को उनके मुकाम तक पहुँचा कर फिर लौट आऊँगा साहित्य-सेवा के लिए फेसबुक पर।

Wednesday, 19 February 2014

ई पुस्तक-मेला बड़ा इनफीरियारिटी दे रहा है केशव !!

[ धर्मयुद्ध का पांचवाँ दिन । अर्जुन को उरई (बैलों को हाँकने वाली नुकीली छड़ी) से ठेलते-ठालते, श्रीकृष्ण फिर ले आए कुरुक्षेत्र में लड़ाने । दोनों ओर की सेनाएँ पहले ही पहुँच चुकी थी ।
युद्ध आरंभ होने में विलंब होता देख, अधिकांश योद्धा, साथ लाई पुस्तकें उलट-पलट रहे थे । ज्यादातर पुस्तकें, सुहागरात की दुल्हन की तरह अनछुई और लजायी लग रही थीं ।
       
लेकिन अर्जुन खेत (क्षेत्र) में पहुँचते ही, गरियार बरदा (अनाड़ी बैल) की तरह घुटने के बल बैठ गए.]


श्रीकृष्ण उवाच : अब का हुआ पार्थ ?

अर्जुन उवाच : ई पुस्तक-मेला ससुरा बड़ा इनफीरियारिटी दे रहा है माधव । हमरा लड़ने का मनै नहीं कर रहा ।

श्रीकृष्ण : हद करते हो यार ! एतना समझाए लेकिन तुम युद्ध से भागने का कोई न कोई पेंच निकाल ही लाते हो !!

अर्जुन : नहीं भगवन, सच्ची कह रहे हैं....सारे योद्धा पुस्तक-मेला हो आए । कल पितामह, दुर्योधन को लेकर खुद गए थे वहाँ । आज द्रोणाचार्य भी गए हैं। सुना है, एकलव्य की किसी किताब का, हॉल नं-18 में विमोचन होने वाला है !

श्रीकृष्ण : हाँ पार्थ ! आचार्य द्रोण ही विमोचन करने वाले हैं।

अर्जुन : वही तो माधव ! मुझे तो डर लग रहा है कि आचार्य की कुछ सेटिन्ग न हो जाए एकलब्बा से !!

श्रीकृष्ण : अरे बुड़बक ! तुम फिकर नॉट करो ! तुम आचार्य को नहीं जानते। ऐसा दाँव मारेंगे मुख्य-अतिथि की आसन्दी से, कि वो कौवा एक्को ठो मोती न चुगने पाएगा !!

अर्जुन : (आश्चर्य से मुंह फाड़ते हुए)--वो कैसे नटवर नागर ! ?

श्रीकृष्ण : आचार्य कह देंगे कि एकलव्य मेरे बहुत प्रिय और योग्य शिष्य हैं।
और अगले दिन से अखबार और पत्रिकाएँ एकलव्य की मलामत में जुट जाएँगी।

अर्जुन : लेकिन योगेश्वर ! पुस्तक-मेले में न जा पाने के कारण मैं खुद को कहीं मुह दिखाने लायक नहीं पा रहा हूँ। कल रात में दुर्योधन ने बड़े मज़ाक में मुझसे पूछा था, कि अर्जुन तुम कब जा रहे हो मेले में ?

सच माधव ! मेरा खून जल गया उसके हाथ में कहानी-संग्रह देख के ।

श्रीकृष्ण : पार्थ ! सर्वधर्म परित्यज मामेकं शरणं व्रज !! मैं जो कहता हूँ ध्यान से सुनो !

आचार्य द्रोण की लाइब्रेरी से जो किताबें तुम मार के लाए थे, वो तो हैं ही...उन्हें झाड़-पोंछ कर बैठक की टेबल पर रख दो। मेरी गीता भी माया जी ने छाप डाली है। पाँच लेखकीय प्रतियाँ मिली हैं, एक तुम ले लो। और सुनो ! सुभद्रा इधर की उधर करने में बचपन से ही पारंगत है। वो आस-पड़ोस में बता आएगी कि तुम भी गए थे पुस्तक मेला। और वहाँ इतनी खरीददारी की है कि घर का बजट बिगड़ गया !

मैं संजय (महाभारतकालीन जुकरबर्ग ) से कह दूँगा, वो कुछ किताबों की फोटो के साथ फेसबुक पर ये स्टेटस डाल देंगे कि, अर्जुन पुस्तक-मेले में किताबें खरीदते हुए पाए गए !!

[ यह सुनकर अर्जुन ने अपना गांडीव उठाया और ललकारने लगे ]

Wednesday, 29 January 2014

मैं डरता हूँ/अफ़ज़ाल अहमद

मशहूर पाकिस्तानी शायर अफ़ज़ाल अहमद सैय्यद की एक बेहतरीन कविता ।
कवि चीज़ों को उनके खुरदुरेपन और उनकी पूरी तल्ख़ी में देखना चाहता है । यथार्थ को रूमानियत का परदा ओढ़ा देना उसे मंज़ूर नहीं । वह ख़ुदा को भी ज़मीन पर देखना चाहता है और माशूक को भी । दरअसल वह डर नहीं रहा है
; हकीक़त को खुशनुमा दिखाने की राजनीति का प्रतिरोध कर रहा है ।
******

मैं डरता हूँ
अपनी पास की चीज़ों को
छूकर शायरी बना देने से

रोटी को मैने छुआ
और भूख शायरी बन गयी
उंगली चाकू से कट गयी
खून शायरी बन गया
गिलास हाथ से गिर कर टूट गया
और बहुत सी नज़्में बन गयीं

मैं डरता हूँ
अपने से थोड़ी दूर की चीज़ों को
देखकर शायरी बना देने से
दरख्त को मैने देखा
और छाँव शायरी बन गयी
छत से मैने झाँका
और सीढ़ियाँ शायरी बन गयीं

इबादतखाने पर मैने निगाह डाली
और ख़ुदा शायरी बन गया
मैं डरता हूँ 
अपने से दूर की चीज़ों को सोचकर 
शायरी बना देने से


मैं डरता हूँ
तुम्हें सोचकर
देखकर
छूकर शायरी बना देने से ।


Wednesday, 15 January 2014

क्या करें कि न करें !

चार्ल्स डार्विन ने अपनी आत्मकथा में एक ऐसी महत्वपूर्ण बात कही है, जो आज भारत के तथाकथित राजनीतिक बदलाव के संदर्भ में सामयिक ठहरती है । 

डार्विन कहते हैं--" मुझे इसमें संदेह है कि मानवता किसी व्यक्ति की प्राकृतिक अथवा अपनी आंतरिक विशेषता होती है ।"

स्पष्ट तौर पर डार्विन कहना चाहते हैं कि हम मानवता नामक गुण को अपनी ज़रूरत और परिस्थिति के मुताबिक धारण करते हैं । ज़रूरत के मुताबिक ही यह गुण हमारे भीतर स्थायी बन सकता है और इसका विस्तार अपने से आगे परिवार,समाज,देश और दुनिया के लिए हो सकता है।

अब इस अवधारणा की रौशनी में 'आप' की मानवतावादी राजनीति को देखिए । 'आप' की टीम के सदस्यों के बारे में क्या यह दावे के साथ कोई कह सकता है कि अपने 'अंतस' में वे सब इतने ही ईमानदार और मानवतावादी होंगे ? और पार्टी की सदस्यता लेने वाले देश के लाखों लोगों के बारे में तो ऐसा सोचना भी अपनी मूढ़ता सिद्ध करना होगा । अपने आस-पास के 'आप' कार्यकर्ताओं को देखकर हम इसकी पुष्टि कर सकते हैं ।

निश्चित तौर पर देश की राजनीति की आत्मा और शरीर, दोनो को बदलने की ज़रूरत है। और केजरीवाल ने अपनी टीम के साथ इस बड़े काम के लिए 'ईमानदारी' और 'मानवता' को धारण किया है। इस बड़े विज़न को हम नागरिक अगर देख पा रहे हों, तो हमें 'टीम केजरीवाल' के इन अर्जित गुणों को स्वीकृति और सहयोग देना चाहिए। इस समय इनकी निजी और पिछली ज़िन्दगी पर सवाल खड़े करना उसी राजनीति को मजबूत करेगा, जिससे हम छुटकारा पाना चाहते हैं।

Friday, 10 January 2014

पर्यटक

इनके लिए दर्शनीय है वो जगह
उनकी ज़िन्दगी जहाँ जमी जा रही है ।

उनके ठहराव में ही
इनकी गति है
लक्ष्मी चपल हो जाती है इनकी
जब उनकी धमनियों में
खून जमने लगता है
जड़ें पत्तियों तक
नहीं पहुँचा पातीं जीवन
पक्षियों की उड़ान
एक जुम्बिश तक के लिए
हो जाती है मोहताज

तब ये निकलते हैं पर्यटन पर ।

जमी हुई झील में फँसी नाव
और आँखों में जमी बूँद की
तस्वीर खींचते हुए
अपने आलिंगन को
सार्वजनिक करके
प्रमाणित करते हैं मोहक दाम्पत्य ।

ये धरती पर स्वर्ग खोजने निकलते हैं ।

गठिया वात में जकड़े


माँ बाप को
पड़ोसियों के भरोसे छोड़कर
जाते हुए
फर वाला कोट
और पशमीने की शॉल
लाने का वादा दुहराते हैं
तो बूढ़ी आँखों में आ जाती है
एक उदास चमक
और बेजान पैरों में
अचानक होती है
एक लाचार सी हरकत ।

अपना अपना खयाल रखने की
ताकीद के साथ
चार हथेलियां लहराती हैं
और दो जोड़ी
आँखों के मोतियाबिन्द
इन्हें विदा करते हैं
पर्यटन के लिए
एक और उजाड़ पर ।

Thursday, 2 January 2014

मैं कुछ कम रह जाना चाहता हूँ !

काल के अनिश्चय से
कुछ निश्चित को पा लेने की 
हमारी आदिम ज़िद
अक्सर प्रार्थना की तरह फूटती है
हमारी समूची शौर्यगाथा के
नेपथ्य से ।

अभी अभी जो जन्मा है
एक नया साल
उसकी हँसी में झड़ते हैं
हमारी विजय के फूल
और उसके अयाचित रुदन में
मनुष्य की चूकों के गीत हैं ।

इन चूकों का
मैं एक आत्म-समर्पित मुजरिम
ढूढ़ना चाहता हूँ
उन गौरैय्यों को
जिनको आँगन से विदा लेते
देखा भी नहीं किसी ने ।

अंतरिक्ष के
किसी गोपन अवकाश में
मैं छुपा देना चाहता हूँ
अपने समय के विश्वसनीय शब्दों को ।

मुझे प्रेम करने वाली स्त्री को
मैं उस वक्त देना चाहता हूँ
एक चुम्बन
जब प्रेम-द्रोह की
सज़ा तामील करने से पहले
मेरी अंतिम इच्छा पूछी जायेगी ।

मैं कुछ झूठ सीखना चाहता हूँ
जिन्हें सच की तरह बोल सकूँ
उन लम्हों में
जब एक बच्चा
मुझे लाचार और निरुत्तर छोड़ देता है ।
उस नौजवान दोस्त से
जो तीन बार जान देने की
कोशिश कर चुका है ।
उस आग से
जो तब्दील होती जा रही है राख में ।

देखता हूँ
साल दर साल
समुद्र में बची रहती है थोड़ी प्यास
अनगिन नक्षत्र है
उसके बाद भी
सबके लिए थोड़ा खाली है आकाश 
जिस्म से निकलने के बाद
खून में बची रहती है थोड़ी हरारत
हवा कितना चलती है
फिर भी कम रह जाती है कुछ दूरी ।

नये साल में भी
मैं कुछ कम रह जाना चाहता हूँ ।।