पहली अप्रैल आती है तो मुझे हर साल एक वाकया याद आता है। बात तब की है जब मैं सातवीं या आठवीं में पढ़ता था। उन दिनों हम जैसे मध्यमवर्गीय परिवारों में जन्मदिन मनाने का ऐसा रिवाज़ नहीं था जैसा आज है। बड़े बुजुर्गों का जन्मदिन या तो किसी को पता ही नहीं होता था या फिर याद नहीं रहता था। सो उनका जन्मदिन मनाने का सवाल ही नहीं था। घर के बच्चों में भी जो वयस्क होते थे, सुबह उठकर माता-पिता के पैर छूकर आशीर्वाद ले लिया करते और जन्मदिन का इति-सिद्धम हो जाता था। अलबत्ता छोटे बच्चों के जन्मदिन पर थोड़ी बहुत हलचल जरूर होती थी। अक्सर घरों में यह होता था कि जब सबसे छोटा बच्चा आ जाता था, तो उससे बड़े बच्चों के जन्मदिन समारोह हमेशा के लिए बन्द हो जाते थे। बहुत हुआ तो उन्हें एक जोड़ी नये कपड़े दिला दिए बस। जिस सबसे छोटे वाले का जन्मदिन मनाया जाता वह भी कुछ अधिक ही सादगीपूर्ण होता। बहुत हुआ तो घर में सत्यनारायण की कथा करवा ली और पड़ोस के छोटे बच्चों को बुलाकर खाना खिला दिया। बच्चे पेंसिल, रबर, कटर, टिफिन बॉक्स, प्लास्टिक की गेंद आदि बतौर गिफ्ट दिया करते थे। मज़ा आ जाता था।
यह वाकया उन्हीं दिनों का है। मेरा एक सहपाठी दोस्त अशोक, 1 अप्रैल को लगभग साढ़े ग्यारह बजे सुबह कहें या दोपहर, मेरे घर आया। उसके हाथ में उसकी पिछली कक्षा की मार्कशीट थी। मार्कशीट मुझे दिखाते हुए उसने मुझसे कहा कि आज उसका जन्मदिन है। तुम मेरे घर पार्टी में आना। आज 1 अप्रैल है, इसलिए यह मार्कशीट लेता आया हूँ कि कहीं तुम यह न समझो कि अप्रैल फूल बना रहा हूँ। पार्टी दोपहर में ही है। और फिर थोड़ा सकुचाते हुए अशोक ने कहा—“ सुनो जो गिफ्ट देना हो, उसके बदले पैसे ही दे दो। उससे कुछ खाने का सामान और आ जाएगा।“ मैने अम्मा से मागकर उसे पच्चीस रुपये गिफ्ट के बदले दिए। वह आने का पक्का वादा लेकर चला गया।
बात असल में यह थी कि अशोक के पापा ‘बाप बहादुर’ टाइप के पिता थे। कड़क मिज़ाज़। पेशे से वकील थे। घर में किसी का जन्मदिन मनाने का रिवाज़ नहीं था उनके। उस दिन अशोक और उसकी छोटी बहन मोनू ने मिलकर यह क्रान्तिकारी कदम उठा लिया था कि उनके घर में भी जन्मदिन मनाया जाएगा, लेकिन पिताजी से छुपाकर। माँ को किसी तरह उन्होंने पटा लिया था और थोड़े पैसे भी उनसे लेने में कामयाब हो गए थे। दोनों भाई-बहन ने अपने पास के पैसे मिलाए। पच्चीस रुपए मुझसे भी मिल गए थे एडवांस। पार्टी का टाइम दोपहर का सलिए रखा गया क्योंकि उस वक्त पिताजी कोर्ट में रहते थे। योजना यह थी कि पिताजी के आने के पहले बर्थडे पार्टी खत्म करके उसके सारे नामो-निशान मिटा देने हैं।
वादे के मुताबिक मैं दोपहर में अशोक के घर पहुँच गया। अशोक मुझे घर के पीछे के कमरे में ले गया जहाँ पार्टी होनी थी। अशोक की बहन मोनू ने वहाँ एक टेबल पर अनुपम होटल के समोसे, पेस्ट्री, थोड़ी मिठाई, केले आदि सजा रखे थे। बैठक से टेप रिकॉर्डर भी उठा लाई थी जिसमें गाना चल रहा था। मुझे ताज़्ज़ुब तब हुआ जब पता चला कि पार्टी में मेहमान के तौर पर सिर्फ मैं बस हूं। खैर ! पार्टी की रूपरेखा यह थी कि मोनू टेप रिकॉर्डर पर गाना चलाकर दो-तीन डान्स आइटम पेश करेगी और मैं कुछ गाने सुनाऊँगा। उसके बाद हम लोग नाश्ता करेंगे। अशोक को हैप्पी बर्थडे बोलेंगे और मैं अपने घर चला जाऊँगा। और कभी उसके पापा के सामने इस हादसे का ज़िक्र नहीं करूँगा।
तो हम तीन लोगों के साथ पार्टी शुरू हुई। टेप बजा कर मोनू ने डान्स शुरू किया। अशोक और मैं तालियाँ बजा रहे थे। मोनू के नृत्य का एक-दो छन्द ही हुआ था कि अनहोनी घट गई। न जाने कहाँ से धड़धड़ाते हुए उनके पापा कमरे में घुसे। हम सब सन्न। उन्होंने दहाड़ते हुए पूछा कि यह क्या हो रहा है ? उनके पूछने के साथ ही अशोक और मोनू, फुर्ती के साथ कब अदृश्य हो गए, मुझे पता ही नहीं चला। मुझे काटो तो खून नहीं। उनकी मुद्रा देख कर लगा कि अब ये मुझे ही पीटेंगे। लेकिन पिताजी अशोक और मोनू को पकड़ने लपके। मुझे मौका मिल गया तो मैं भी भाग खड़ा हुआ। अपने घर तक वैसे ही भागता आया जैसे कुत्ते ने खदेड़ रखा हो। इस तरह अशोक का जन्मदिन सम्पन्न हुआ। नाश्ते का क्या हुआ पता नहीं चला। बाद में स्कूल में अशोक ने बताया कि उसकी खूब कुटाई हुई। मोनू को बख्श दिया था बाप बहादुर ने। माताजी भी कोप का भाजन बनीं थीं।
Wednesday, 5 April 2017
पहली अप्रैल की अविस्मरणीय जन्मदिन पार्टी
Friday, 24 March 2017
हिन्दी सिनेमा में होली के रंग
सौ साल से अधिक के अपने इतिहास में हिन्दी सिनेमा ने साल-दर-साल होली के पर्व को अपनी जरूरत के हिसाब से उपयोग किया है। वर्जनाओं का अतिक्रमण होली का मूल स्वभाव है। होली के रंगों की ओट में हम अपनी लालसाओं का विरेचन करते हैं। हमारे भारतीय सिनेमा में प्रेम एक स्थायी तत्व है। मूल कहानी चाहे जो भी हो, प्रेम की एक अंतर्धारा उसमें बहती रहती है। भारतीय सिनेमा ने शुरुआत से ही यह स्वभाव अर्जित कर लिया, जो अब तक चलता आ रहा है। असल में जीवन का यही रूप है। तमाम अभावों, संघर्षों, बीमारियों की चट्टानों के नीचे, हम सबके जीवन में प्रेम की एक हरी दूब दबी रहती है। ये चट्टाने जब कभी इधर उधर खिसक जाती हैं तो यह दूब तन जाती है।भारतीय सिनेमा और होली का, चोली-दामन का साथ रहा है। हिन्दी फिल्मों ने होली के सीक्वेन्स को बार बार दिखाया है। होली का पर्व सिनेमा में हमेशा गीतों और नृत्य के जरिए आता रहा है। फिल्मों में होली का आगमन 1944 में दिलीप कुमार की पहली फिल्म ‘ज्वार भाटा’ में हुआ। निर्देशक अमिय चक्रवर्ती ने फिल्म में होली का सीक्वेंस फिल्माकर एक इतिहास की नीव रखी। यह श्वेत-श्याम फिल्मों का ज़माना था। यह भी एक संयोग है कि रंगीन फिल्मों में जब होली को उसका असली रंग मिला तब भी दिलीप कुमार ही थे। पहली टेक्नीकलर फिल्म ‘आन’ में दिलीप कुमार और निम्मी होली खेलते नज़र आए। फिर तो यह सिलसिला चल निकला। 1958 में आई मशहूर फिल्म ‘मदर इंडिया’ में शमशाद बेगम का गाया गीत “होली आई रे कन्हाई...” आज भी बेहद लोकप्रिय है और होली के दिन गाया-बजाया जाता है। उसके अगले ही साल वी. शान्ताराम की फिल्म ‘नवरंग’ में भी होली का एक गीत था। “जा रे हट नटखट....”, महिपाल और संध्या पर फिल्माया गया। इस फिल्म में महिपाल, दिवाकर नाम के कवि की भूमिका में हैं। आपको याद होगा कि इस फिल्म में काव्य के नौ रसों की अलग-अलग स्थितियों के माध्यम से अभिव्यक्ति की गई है।
ध्यान देने की बात यह है कि हमारी फिल्मों
में होली के सीक्वेंस सिर्फ त्यौहार को दिखाने के लिए नहीं रखे गए। बल्कि इनका
उपयोग एक प्रविधि के रूप में किया गया है। अक्सर फिल्म की कहानी को किसी जटिल
स्थिति से निकालने अथवा किसी जटिल मनोदशा या परिस्थिति को बोधगम्य दृश्य में
परिणित करने के लिए होली के दृश्यों का इस्तेमाल किया जाता रहा है। इस बात को
समझने के लिए 1981 में आई फिल्म ‘सिलसिला’ के गीत “रंग बरसे भीगे चुनर वाली...” को याद कीजिए। ‘होली का राष्ट्रगान’ का दर्ज़ा पा चुका यह गीत, लोकप्रियता में दूसरे सभी गीतों से बहुत आगे
है। अमिताभ बच्चन का गाया, और अमिताभ-रेखा पर फिल्माया यह गीत, कहानी की एक बहुत
जटिल परिस्थिति को व्यक्त करने के लिए रखा गया। वरना इतनी गंभीर फिल्म में होली
गीत की गुंजाइश कहाँ बनती थी। अमिताभ, रेखा के लिए अपने पुराने प्रेम को दबाए-दबाए
घुट रहे थे। होली ने उन्हें इस घुटन से बाहर आने का मौका दिया। वो रेखा के लिए
अपने प्रेम को होली के रंग में बिखरा रहे हैं और संजीव कुमार और जया इस अनकही
कहानी का एक एक अक्षर बाँचे जा रहे हैं। ये चारों पात्र प्रेम, दाम्पत्य और
अविश्वास की जिस भूल-भुलैया में फँसे थे, यह होली सीक्वेंस उनके सामने इस भूल-भुलैया से निकलने का रास्ता खोल रहा था। यह
गीत तब से अब तक होली उत्सव की जान है।
इस गीत के पीछे जो मनोविज्ञान है, कमोबेश यही
मनोविज्ञान कुछ रूप बदलकर हम सबका भी होली में होता है। हम अपने भीतर के दमित
प्रेम और कामेच्छा को थोड़े अनायास से लगने वाले सचेत स्पर्श, कुछ बतरस के अवसरों
और कुछ नशे की सामग्रियों के मेल से तुष्ट कर कुछ राहत पाने की कोशिश करते हैं।
इसका एक बढ़िया दृष्टांत यश चोपडा की फिल्म ‘डर’ के होली दृश्य में देख सकते हैं। यश चोपड़ा ने प्रेम के जितने रंगों को फिल्मों
के जरिए परदे पर उतारा है, उतना किसी और भारतीय फिल्मकार नें नहीं। इस फिल्म में
शाहरुख खान खलनायक की भूमिका में हैं। वे नायिका के जुनूनी प्रेमी हैं और किसी भी
कीमत पर उसे पाना चाहते हैं। प्रेम और भय के बेहद सघन तनावों के बीच, यह होली
सीक्वेंस शाहरुख को, जूही चावला को स्पर्श करने का अवसर देता है, तो दूसरी तरफ,
निर्देशक को अपनी कहानी को अंजाम तक पहुचाने का स्पेस भी देता है। निर्देशक कहानी
को आगे बढ़ाने के लिए अक्सर होली दृश्य का इस्तेमाल करते रहे हैं। ‘आखिर क्यों’ का गीत “सात रंग में खेल रही है दिलवालों की टोली रे..” और ‘कामचोर’ के गीत “मल दे गुलाल मोहे...”के जरिए कहानी को आगे बढ़ाया गया है। कभी-कभी निर्देशक
कहानी में टर्निंग प्वाइंट दिखाने के लिए भी होली सीक्वेंस का प्रयोग करते हैं।
जैसे राजकुमार संतोषी ने फिल्म ‘दामिनी’ में किया।
अस्सी और नब्बे के दशक के गीत फिल्मी होली के
प्रतिनिधि गीत बन गए। ‘रंग बरसे....’ के अलावा जिस गीत ने होली गीतों के बीच अपनी खास जगह बनाई, वह है फिल्म ‘शोले’ का गीत। 1975 में आई इस कालजयी लोकप्रिय फिल्म में धर्मेन्द्र और हेमा
मालिनी के ऊपर “होली के दिन दिल खिल जाते हैं...” गीत फिल्माया गया। यह गीत भी फिल्म में एक युक्ति की
तरह डाला गया। लगातार भय और आतंक के बीच चली जा रही फिल्म में कुछ तनावमुक्ति के
पल खोजने थे। साथ ही दर्शकों के लिए एक चौंकाने वाला तत्व भी डालना था। आपको याद
होगा, होली के उल्लास में झूमते बेखबर गाँव वालों और सिनेमा हाल के दर्शकों के बीच
अचानक डाकुओं का हमला हो जाता है और सबकी सांसें अटकी रह जाती हैं। अस्सी के दशक
की धर्मेन्द्र-हेमा की यह जोड़ी, नब्बे के दशक के एक और होली गीत में नज़र आयी।
1982 में बनी फिल्म ‘राजपूत’ में “भागी रे भागी बृज की बाला...” गीत में धर्मेन्द्र-हेमा फिर होली के रंग में दिखे। इसी
तरह अमिताभ ने ‘सिलसिला’ के गीत की लोकप्रियता को 2003 में फिल्म ‘बागबां’ के गीत “होली खेलैं रघुबीरा....” में दोहराया।Sunday, 5 March 2017
ज़िन्दगी लाइव: फंतासी झूठ नहीं, संभावना है !
उपन्यास-कला पर मिलान कुन्देरा
ने एक जगह लिखा है-“ उपन्यास यथार्थ का नहीं, अस्तित्व का परीक्षण करता है। अस्तित्व, घटित का
नहीं होता, वह मानवीय संभावनाओं का आभास है। जो मनुष्य हो सकता है, जिसके लिए वह
सक्षम है। उपन्यास-लेखक खोज के जरिए मानवीय संभावनाओं के अस्तित्व का नक्शा बनाता
है। चरित्र और दुनिया संभावनाओं के द्वारा जाने जाते हैं।“Sunday, 5 February 2017
सिनेमाई यथार्थ और पद्मावती का लोक आख्यान
बाज़ारवाद के स्वर्णकाल में, जब सारे कला-माध्यम अपना असर लगभग खो चुके हैं, सिनेमा ने कुछ हद तक अपना असर बचाए रखा है. सिनेमा प्रत्यक्षत: किसी परिवर्तन का निमित्त भले ही न बन पा रहा हो लेकिन इतनी ताकत उसमे अभी भी दिखती है कि वह समय समय पर किसी विवाद को जन्म दे देता है. सिनेमा में इतना असर अभी भी है कि वह बीच-बीच में ऐसी बहसों का कारण बन जाता है, जिनसे इतिहास-भूगोल से कटे हुए लोग भी इतिहास-भूगोल की यात्रा पर निकल पड़ते हैं. अब यह अलग बात है कि अक्सर ये यात्राएँ छोटी और अल्पप्राण ही होती हैं. सिनेमा के बरक्स अगर दूसरे कला-माध्यमों को देखा जाए तो लगभग सभी का जनमानस से सीधा संवाद और रिश्ता बहुत कम बचा है. ये कला-माध्यम कोई सांस्कृतिक हलचल पैदा करने की हैसियत खो चुके हैं.
फिल्मों से विवाद पैदा होना कोई नई बात नहीं है. सिनेमा के इतिहास पर जिनकी नज़र है, वो जानते हैं कि कई फिल्मों ने विवादों और बहसों को जन्म दिया है. अक्सर ये विवाद फायदेमंद भी रहे हैं. फिल्मकारों के लिए अक्सर ये विवाद संजीवनी साबित हुए हैं. लेकिन कुछ वर्षों से फिल्मों से जुड़े सारे विवाद धार्मिक आपत्तियों पर केन्द्रित होते जा रहे हैं. वही फिल्में विवादित हो रही हैं जिन्होने किसी धार्मिक विषय को छुआ है या कोई टिप्पणी की है. इस रुझान की उग्र शुरुआत तब हुई थी जब मशहूर चित्रकार मकबूल फ़िदा हुसैन ने अपनी कुछ फिल्में बनायीं. हुसैन साहब अपनी पेन्टिंग्स को लेकर पहले से ही सांप्रदायिक उपद्रवियों के निशाने पर थे. अंतत: उन्होंने देश ही छोड़ दिया था. आपको याद होगा कमल हासन की फिल्म ‘विश्वरूपम’ में भी कथित कथित धार्मिक टिप्पणियों के खिलाफ बहुत हंगामा हुआ था. तब कमल हासन ने भी देश छोड़ देने की धमकी दी थी. आमिर खान की एक-दो फिल्मों पर विवाद हुए. अभिनेता-निर्देशक चन्द्रप्रकाश द्विवेदी, कथाकार काशीनाथ सिंह के उपन्यास ‘काशी का अस्सी’ पर ‘मोहल्ला अस्सी’ नाम से फिल्म बना रहे थे. कई अड़चनों के बाद फिल्म बनकर तैयार भी हो गयी. लेकिन दुर्योग ने इस फिल्म का साथ नहीं छोड़ा. फिल्म का ट्रेलर रिलीज हुआ तो हंगामा मच गया. कुछ हिन्दू संगठनों की धार्मिक आस्था फिर आहत हो गई. आज तक फिल्म रिलीज नहीं हो पायी. ताज़ा विवाद संजय लीला भंसाली की फिल्म ‘पद्मावती’ को लेकर उठा, जिसे फिल्मकार ने थोड़ी शर्मिन्दगी उठाते हुए सुलझा लिया. इस विवाद पर आगे थोड़ा विस्तार से बात करेंगे.
पहले एक सवाल सिने-प्रेमियों और समाज शास्त्रियों से. क्या भारतीय सिनेमा अब धर्म-निरपेक्ष नहीं रहा ? या हम दर्शक ही धर्म-निरपेक्ष नहीं रहे ? बालीवुड हमेशा धर्मनिरपेक्षता की मिसाल के रूप में देखा जाता रहा है. हमने देखा है कि नाजुक सांप्रदायिक मौकों पर फिल्म उद्योग से जुड़े लोगों ने एक स्वर में लोगों को जोड़ने वाली आवाज़ उठाई. फिल्म निर्माण का पेशा और संस्कृति अपने स्वभाव में ही ऐसी है. बहाँ सांप्रदायिक विभाजन की गुंजाइश बहुत कम बनती है. बावजूद इसके, इधर एक दो वर्षों में बालीवुड को धार्मिक-सांप्रदायिक विवादों में घसीटा जाने लगा है. फिल्मकारों कलाकारों पर कट्टरपंथियों ने हमले किए. अक्सर हिन्दू कट्टरपंथी, फिल्मकारों पर आरोप लगाते हैं कि वे सिर्फ हिन्दुओं की धार्मिक भावनाओं पर चोट करते हैं. कभी इस्लाम या दूसरे धर्मों पर टिप्पणी करने की हिम्मत नहीं दिखाते. यह आरोप लगाते हुए, सन 2007 में रिलीज हुई पाकिस्तानी फिल्म ‘खुदा के लिए’ को भूल जाते हैं. यह फिल्म युवा फिल्मकार शोयब मंसूर ने बनाई थी. पाकिस्तानी और भारतीय कलाकारों/टेकनीशियंस के मेल से बनी यह फिल्म इस्लामिक कट्टरवाद पर ज़बरदस्त प्रहार करती है. भारत में यह फिल्म 2008 में रिलीज हुई थी. फिल्मकार को कट्टर मुल्लाओं और आतंकियों की ओर से खूब परेशान किया गया.
ऐसे लोगों से मेरा प्रतिप्रश्न यह है कि क्या आपका धर्म इतना कमज़ोर है कि किसी की प्रतिकूल टिप्पणी से वह खण्डित हो जाएगा या उसका असर खत्म हो जाएगा ? और इतना ही कमज़ोर है आपका धर्म तो उसे ढोते रहने का क्या हासिल ? क्या आपको ऐसा नहीं लगता कि भारत समेत पूरी दुनिया के समाजों में धार्मिक कट्टरता और ध्रुवीकरण बढ़ा है. धर्म अब धारण करने की नहीं, उपयोग करने की चीज हो गया है. धर्म का उपयोग व्यक्ति के रूप में श्रेष्ठ होने के लिए नहीं, बल्कि समुदाय के रूप में श्रेष्ठता आरोपित करने के लिए हो रहा है. असहिष्णुता कोई जुमला नहीं है, यह दो तिहाई दुनिया का सामाजिक सच है. लेखकों, फिल्मकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं पर हो रहे हमलों का कोई और अर्थ है क्या ?
ताज़ा विवाद संजय लीला भंसाली की निर्माणाधीन फिल्म ‘पद्मावती’ को लेकर हुआ. राजस्थान में फिल्म की शूटिंग के दौरान राजपूतों के संगठन श्री करणी सेना ने फिल्म यूनिट पर हमला कर दिया. उनका आरोप था कि पद्मावती और अलाउद्दीन खिलजी के बीच प्रणय संबन्धों के दृश्य फिल्माकर भंसाली इतिहास के साथ छेड़छाड़ कर रहे हैं और राजपूतों की गरिमा को आहत कर रहे हैं. उनका कहना है कि रानी पद्मावती को अलाउद्दीन छू भी नहीं सका था. रानी ने महल में मौजूद अन्य स्त्रियों के साथ जौहर कर लिया था. यद्यपि करणी सेना की आपत्ति और हमला, इतिहास से छेड़छाड़ को आधार बना कर दिखती है, लेकिन असल बात धार्मिक असहिष्णुता ही है. एक मुगल शासक के साथ एक हिन्दू रानी को प्रणय, कट्टरपंथियों को कैसे स्वीकार हो सकता था !
रही बात इतिहास बदलने की. तो आइए देखते हैं कि इतिहास कहता क्या है. सच तो यह है कि किसी भी लिखित इतिहास में रानी पद्मावती का उल्लेख है ही नहीं. पद्मावती या पद्मिनी का चरित्र, साहित्य और राजस्थान की लोकगाथाओं में मिलता है. सूफी कवि-फकीर मलिक मुहम्मद जायसी ने सन 1540 के आसपास अवधी भाषा में महाकाव्य ‘पद्मावत’ की रचना की. महाकाव्य की नायिका रानी पद्मावती हैं. यह महाकाव्य प्रेम और विरह का अद्भुत आख्यान है. पद्मावती, सिंहल द्वीप की राजकुमारी पद्मिनी थीं इनके पिता गन्धर्वसेन और माता चंपावती थीं. स्वयंवर में विजय हासिल कर चित्तौड़ के राजा रतन सिंह ने इन्हें अपनी रानी बनाया. ऐतिहासिक दृष्टि से उस समय दिल्ली सल्तनत पर खिलजी वंश का शासन था और अलाउद्दीन खिलजी सुल्तान था. अलाउद्दीन सन 1296 से 1316, मृत्यु तक दिल्ली का सुल्तान रहा. उसकी राज्य विस्तार की नीति के कारण उसे सिकन्दर-ए-सनी (दूसरा सिकन्दर) की उपाधि मिली हुई थी. 1303 में उसने चित्तौड़ पर आक्रमण किया था. उसी आक्रमण के समय रानी पद्मावती के कथित जौहर की गाथा राजस्थान के लोकमानस में प्रचलित है. जायसी की रचना इस समय से लगभग 237 वर्ष बाद लिखी गई. जाहिर है कि उन्होने अपनी रचना का आधार राजस्थान की लोकगाथाओं को ही बनाया होगा. अत: ‘पद्मावत’ की कथा को इतिहास मानना बुद्धिमानी नहीं होगी. लोकगाथाएँ न तो कोरा झूठ होती हैं, और न पूरा इतिहास. ये गाथाएँ वाचिक परंपरा में चलती हुई, समय, संघर्ष और शिक्षण के आग्रहों से बदलती रहती हैं.
इतिहास के विवरणों में अलाउद्दीन के चित्तौड़ पर आक्रमण और रतन सिंह के विवरण तो मिलते हैं, लेकिन रानी पद्मावती और उनके जौहर का कोई ज़िक्र नहीं है. यहाँ तक कि अलाउद्दीन के समकालीन कवि-इतिहासकार अमीर खुसरो ने भी पद्मावती का कोई उल्लेख नहीं किया है. अलबत्ता लोकगाथाओं से यह जरूर पता चलता है कि राणा रतन सिंह की पत्नी पद्मावती का सौन्दर्य अप्रतिम था. रतन सिंह के दरबारी संगीतकार राघव चैतन्य थे, जिनका बड़ा मान था. वो एक तांत्रिक भी थे. कहा जाता है कि वो अक्सर महल में बुरी आत्माओं को बुलाते थे. रतन सिंह को जब इसका पता चला तो उन्होंने राघव चैतन्य को अपमानित कर राज्य से निर्वासित कर दिया. अपमानित राघव दिल्ली, अलाउद्दीन के पास पहुच गए. हृदय में रतन सिंह से बदले की आग थी. अलाउद्दीन के सामने उन्होंने रानी पद्मावती के रूप का ऐसा वर्णन किया कि सुल्तान पद्मावती को पाने के लिए उद्धत हो उठा. उसने चित्तौड़ की घेराबन्दी कर दी और राजा रतन सिंह को बन्दी बना लिया. राजा की रिहाई के बदले पद्मावती को पाने की शर्त रखी. चित्तौड़ के सेनापति गोरा और बादल ने कूट रचना की और अलाउद्दीन को संदेश भेजा कि रानी पद्मावती को उसके पास भेजा जा रहा है. सात सौ पालकियों में रानी का काफिला अलाउद्दीन के शिविर पर पहुँचा. लेकिन रानी उसमें नहीं थीं. उन पालकियों में सशस्त्र सैनिक थे. काफी संघर्ष के बाद गोरा-बादल ने रतन सिंह को अलाउद्दीन के चंगुल से छुड़ा लिया. गोरा युद्ध में मारा गया, लेकिन बादल, रतन सिंह को सुरक्षित महल तक पहुँचाने में सफल रहा. इस पराजय से आहत अलाउद्दीन ने दोबारा चित्तौड़ पर आक्रमण किया और रतन सिंह सहित सारे सैनिकों को मार डाला. महल के अन्दर पद्मावती समेंत दूसरी रानियों और स्त्रियों ने जब यह समझ लिया कि अब उनकी इज्जत सुरक्षित नहीं है तो उन्होंने महल के आँगन में आग जला कर सामूहिक जौहर कर लिया. अलाउद्दीन के सैनिक जब भीतर पहुँचे तो उन्हें राख और हड्डियों के अलावा कुछ नहीं मिला.
यह कहानी है जो पद्मावत और लोक आख्यानों में मिलती है. संजय लीला भंसाली पद्मावती की कौन सी कहानी रच रहे हैं, अभी इसका पता नहीं है. लेकिन इतना तय है कि भंसाली, सिनेमा के अपरिहार्य तत्व ‘मनोरंजन’ और बॉक्स ऑफिस का खयाल जरूर रखेंगे. यद्यपि विवाद के बाद भंसाली ने श्री राजपूत महासभा के अध्यक्ष के साथ मिलकर यह सफाई दी कि फिल्म में अलाउद्दीन और पद्मावती के बीच कोई रोमैन्टिक दृश्य नहीं रहेंगे. यह बेशक एक समझौता है. अगर लोकगाथाओं को भी आधार बना कर फिल्म बनाई जाए, तो क्या यह संभव है कि जो अलाउद्दीन, पद्मावती को पाने के लिए इस तरह व्याकुल हो, उसके सपनों और कल्पना में पद्मावती से प्रणय के चित्र न रहे होंगे ! और कौन ऐसा फिल्मकार होगा जो अपनी फिल्म में ऐसा ड्रीम सीक्वेन्स न डालेगा ! भंसाली मँजे हुए फिल्मकार हैं. उन्होंने यह समझौता किया है तो नफा-नुकसान सोच कर ही किया होगा. फिल्म में काट-छाँट के बाद भी इस विवाद ने फिल्म की व्यावसायिक सफलता की गारण्टी तो दे ही दी है.
लेकिन यदि संजय लीला भंसाली, फिल्म में अलाउद्दीन और पद्मावती के बीच प्रणय दृश्य दिखाते तो क्या गलत होता ? समाज में सिनेमा की ऐसी व्यापक लोकप्रियता और स्वीकृति क्या सिनेमा के यथार्थवाद की वजह से है ? सिनेमा एक ऐसा कला-माध्यम है जो हमारे सपनों और अवचेतन की ग्रंथियों को परदे पर रूपायित करता है. सिनेमा, यथार्थ का एक ऐसा काल्पनिक विस्तार है जो हमारी आकांक्षाओं को तुष्ट करता है. इसीलिए सिनेमा को शुरुआत से ही यह छूट मिली हुई है कि वह इतिहास-भूगोल के साथ आवश्यक कलात्मक छेड़छाड़ कर ले. मनुष्य का मनोविज्ञान यही बताता है कि उसके भीतर इतिहास-भूगोल का अतिक्रमण करने की एक अदम्य लालसा हमेंशा बनी रहती है.
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