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Sunday, 5 March 2017

ज़िन्दगी लाइव: फंतासी झूठ नहीं, संभावना है !

उपन्यास-कला पर मिलान कुन्देरा ने एक जगह लिखा है-उपन्यास यथार्थ का नहीं, अस्तित्व का परीक्षण करता है। अस्तित्व, घटित का नहीं होता, वह मानवीय संभावनाओं का आभास है। जो मनुष्य हो सकता है, जिसके लिए वह सक्षम है। उपन्यास-लेखक खोज के जरिए मानवीय संभावनाओं के अस्तित्व का नक्शा बनाता है। चरित्र और दुनिया संभावनाओं के द्वारा जाने जाते हैं।

सुप्रसिद्ध कथाकार-पत्रकार प्रियदर्शन का चर्चित उपन्यास ज़िन्दगी लाइव इन दिनों खूब पढ़ा गया। तीन दिन और तीन रातों की किस्सानुमा घटनाओं के इस औपन्यासिक विस्तार में मानवीय संबन्धों के अस्तित्व और संभावनाओं की खोज की ही कोशिश की गई है और उपन्यासकार एक विशिष्ट देशकाल और वातावरण में संबन्धों का एक नक्शा बनाने में असफल नहीं रहे हैं।

एकबारगी अपराधकथा सा दिखने वाला यह उपन्यास दरअसल कुछ निरपराध लोगों की विडंबनात्मक नियति का लाइव वर्जन है। इसमें एडिट करने का अवकाश नहीं है। इसमें बस देखते जाना है और दिखाते जाना है। सवाल हैं, पर तर्क नहीं। तर्क करनें लगें तो एक दूसरा सवाल आ जाएगा। अतार्किकता के इसी ढाँचे में लेखक से एक ऐसी तकनीकी त्रुटि हो जाती है जो पाठक को लगभग आरंभ में ही सचेत कर देती है कि आप एक झूठी कथा को पढ़ने जा रहे हैं। इस खटक जाने वाली त्रुटि का ज़िक्र मैं बाद में करूँगा। किसी औपन्यासिक कृति को रचने के लिए फंतासी का सहारा लेना ही पड़ता है। यथार्थ हमेशा अनगढ़ और खुरदुरा होता है। यथार्थ के ऊबड़-खाबड़ रास्ते पर उपन्यास की यात्रा असंभव तो नहीं, पर बहुत मुश्किल और अरुचिकर होती है। जबकि रुचिकर होना उपन्यास विधा की पहली शर्त है। यथार्थ अक्सर कई जगह फटा-बँटा और अस्पष्ट भी होता है। इसीलिए उसे फंतासी से सिलने-जोड़ने और उभारने की कीमियागीरी उपन्यासकार को करनी पड़ती है। फंतासी झूठ नहीं होती। फंतासी कोरी कल्पना भी नहीं होती। फंतासी वह है जो अभी अघटित है। जिसके घटित होने की संभावना है। उतना ही बड़ा वह लेखक होता है, जितना वह किसी फंतासी के घटित होने की संभावना को प्रबल बना देता है। फंतासी रचना बड़े कौशल का काम है। एक छोटी सी चूक भी उसे झूठ बना देती है। और तब उसके घटित होने की संभावना खत्म हो जाती है। आप यह समझते हैं कि फंतासी रचना लेखक का लक्ष्य नहीं होता। बल्कि फंतासी, लेखक के लक्ष्य का वाहन होती है। इसीलिए अगर किसी चूक से फंतासी झूठ लगने लगे तो जाहिर है लक्ष्य भी अपने गंतव्य तक पहुँचने के प्रति आश्वस्त नहीं हो सकता।

प्रियदर्शन का उपन्यास ज़िन्दगी लाइव भी कुछ यथार्थ और कुछ फंतासी से बना एक रोचक रसायन है। लेखक ने अंत में स्वीकार भी किया है कि एनडीटीवी और दूसरे चैनलों में काम कर रहे मित्रों के अलग-अलग अनुभव कुछ रूप बदलकर इस उपन्यास में दर्ज़ हैं।.....तीन दिन की इस कहानी में बहुत सारी घटनाएं सच्ची हैं।जाहिर है कि बहुत सारी सच्ची घटनाओं के अलावा जो कुछ थोड़ी बची हुई घटनाएँ हैं वो लेखक की फंतासी हैं। इस फंतासी को लेखक ने बहुत कमाल का बुना है, लेकिन एक छोटी सी चूक आखिर हो ही गई।

यह उपन्यास 26 नवंबर 2008 के मुम्बई पर हुए आतंकी हमले की पृष्ठभूमि पर लिखा गया है। लेकिन मुम्बई की घटना पृष्ठभूमि ही है। मंच पर टीवी चैनलों से जुड़े एंकर और पत्रकारों की ज़िन्दगी की त्रासद स्थितियाँ हैं। आमतौर पर जब हम कोई उपन्यास पढ़ते हैं तो हमारी कोशिश होती है कि हम जल्दी से जल्दी उस कथा के नायक-नायिका को चिन्हित कर लें। यह पहचान हो जाने पर हम नायक-नायिका के चरित्र और वैचारिकी से अपना साम्य स्थापित करने लगते हैं। और जैसे जैसे यह साम्य प्रगाढ़ होता जाता है, हम नायक-नायिका से सहमत होते जाते हैं। ज़िन्दगी लाइव उपन्यास में किसी पात्र में नायक-नायिका की पहचान करना कम से कम मेरे लिए बहुत कठिन था। इस कथा के असल नायक इसमें घटित घटनाएं हैं। ये घटनाएँ इतनी अप्रत्याशित, सघन और विच्छेदक हैं कि इनके आगे कहानी के पात्र गौंड़ हो जाते हैं।

इस कहानी को लेखक ने ऐसे बुना है जैसे फ्रेम में तने कपड़े पर धागे से महीन कढ़ाई की जाती है। फ्रेम है मुम्बई में हुआ आतंकी हमला। कपड़ा है बच्चे के गुम हो जाने और उसके अपहरण की घटना। इस कपड़े पर लेखक ने स्त्री-पुरुष संबन्धों, नव-आर्थक विकासवाद, अपराध के राजनीतिकरण और राजनीति के अपराधीकरण की कढ़ाई की है। 26 नमंबर को अचानक मुम्बई पर आठ-दस आतंकवादी हमला कर देते हैं। एक खबरिया टीवी चैनल की एंकर सुलभा अपनी नाइट शिफ्ट खत्म ही करने वाली होती है कि हमले की खबर आ जाती है। और फिर उसे रात भर ड्यूटी करनी पड़ती है। उसका दो साल का बेटा ऑफिस के ही एक हिस्से में बने क्रेच में एक आया की देखरेख में रहता है। रात दस बजे आया को अपने घर जाना होता था। उस दिन न्यूज की आपाधापी में सुलभा अपने बच्चे को भूल जाती है। आया कुछ देर परेशान होती है और अंतत: बच्चे को अपने साथ लिए जाती है कि अगले दिन वह बच्चे को उसकी माँ को सौंप देगी। लेकिन बीच रास्ते में वह बच्चा उसी चैनल में काम करने वाली एक दूसरी औरत के पास चला जाता है। अगली सुबह जब न्यूज ड्यूटी शिफ्ट होने पर सुलभा फुरसत होती है तो उसे अपने बच्चे का खयाल आता है। वह भागकर क्रेच पहुँचती है लेकिन बच्चा गायब है। अब एक बदहवास खोज शुरू होती है बच्चे की। आया से जो औरत बच्चे को ले जाती है, वह अगली सुबह सुलभा को इसलिए बच्चा उसके पास होने की जानकारी नहीं देती, क्योंकि सुलभा ने उस दिन उसको किसी बात पर डाँट दिया था। और वह चाहती थी कि  सुलभा कुछ देर परेशान रहे। फिर शाम को वह बच्चे को सुलभा के पास पहुँचा देगी। लेकिन इस बीच एक अपराधी किस्म का बिल्डर फिरौती के लालच में बच्चे का अपहरण कर लेता है। बच्चे समेत उस औरत, आया और उसके पूरे परिवार को बंधक बना लिया जाता है। बच्चे के माँ-बाप, परिवार, चैनल के सहयोगी मित्र, सब बच्चे की तलाश में बदहवास हो रहे हैं। बच्चे का क्या हुआ यह तो अब आप उपन्यास में ही पढ़ेंगे। मैं अब उस तकनीकी त्रुटि का ज़िक्र कर दूँ जो लेखक ने फंतासी रचना के दौरान की है।

जिस समय की यह कहानी है, उस समय तक संचार के सभी आधुनिक साधन आ चुके थे। सबके हाथ में एक मोबाइल फोन था। न्यूज चैनल वाले मोबाइल पर ही घटनाओँ की लाइव कवरेज दे रहे थे। लेखक ने खुद बताया है कि आया शीला, जो बच्चे को अपने साथ ले गई थी, उसके पास मोबाइल रहता था। जाहिर है कि उसके मोबाइल में अपने घरवालों के अलावा ऑफिस के कुछ जरूरी लोगों के नम्बर भी रहे होंगे। ऑफिस से बच्चे को लेकर निकलते समय वह सुलभा से नहीं मिल सकी क्योंकि वह न्यूज डेस्क पर थी। लेकिन वह ऑफिस के किसी दूसरे व्यक्ति को बता सकती थी कि वह बच्चे को अपने साथ ले जा रही है। अगर आपाधापी में नहीं भी बता सकी तो जब उसने ऑफिस की गाड़ी में दूसरी औरत चारु को बच्चा सौंप दिया था, उस वक्त तो उसे अपने मोबाइल से ऑफिस में किसी को यह खबर देनी चाहिए थी। शीला ने अगले 36 घंटों तक सुलभा को या किसी को बच्चे के बारे में फोन नहीं किया। इसके बाद तो वह बिल्डर द्वारा बंधक ही बना ली गई थी। कितनी भी असामान्य स्थिति में यह समझ पाना संभव नहीं है कि कोई औरत, जो बिना किसी दुर्भावना के, विवशता में किसी के दो साल के बच्चे को ले जा रही है, वह उस बच्चे की माँ को इसकी सूचना देने की हर संभव कोशिश न करेगी। असल में उपन्यासकार जिस कपड़े पर कढ़ाई करना चाहते थे उसे जरूरत भर तानना अपरिहार्य था। सृजनात्मक लेखन की नैतिकता के हिसाब से भी यह वैध है। लेकिन इस छोटी सी चूक ने फंतासी को मनगढ़ंत किस्सा बना दिया। इसी बिन्दु से पाठक यह सोच लेगा कि इस किस्से को अब स्वाभाविक परिस्थितियाँ नहीं, लेखक की मेधा आगे बढ़ाएगी। हालांकि ऐसा समझ लेने पर भी उपन्यास में विस्मय-तत्व की चाशनी एकदम गायब नहीं हो जाती, लेकिन कुछ पतली ज़रूर हो जाती है।

लेकिन यह चूक बहुत भारी नहीं पड़ती। उपन्यास का कोई अनर्थ इस चूक से नहीं होता। क्योंकि लेखक जो बातें इस उपन्यास के जरिए कहना चाहते हैं, उन्हें बहुत ताकत और विश्वसनीयता से कहते हैं। मुम्बई का आतंकी हमला भले ही कृति के पृष्ठभूमि में है, लेकिन लेखक आतंकवाद की विभीषिका नहीं दिखाना चाहते। आतंकी हमला एक ऐसी घटना के रूप में आया है जो कुछ ऐसे सवाल उठा देता है जिनका संबन्ध आतंकवाद से दूर तक नहीं  है। हमले के तीन दिन बाद तक, जब तक सेना ने अपना ऑपरेशन पूरा नहीं कर लिया, घटनास्थल से हजारों मील दूर कुछ लोगों के जीवन में ऐसी उथल-पुथल मची हुई थी, जो रिश्तों के पारंपरिक छन्द को छिन्न भिन्न किए दे रही थी। ऐसे सवाल पूछे जा रहे थे, जो बार बार पूछे जाने के बाद भी पुराने नहीं पड़े थे और उनका हर उत्तर अनंतिम था। सबसे अधिक संतोष की बात यह है कि उपन्यास में आये सभी सवालों और उनके जवाबों का नियमन लेखक नहीं करता।  लेखक ने सभी सवाल पात्रों और स्थितियों के जरिए उठाकर, सभी संभावित उत्तरों के लिए रास्ता खोल रखा है। लेखक ने एक अनायास सी दिखने वाली सावधानी और बरती है कि कहानी को किसी एक सवाल पर केन्द्रित नहीं किया है।

उपन्यास के पात्र और घटनाएँ जिस आधुनिक भारतीय मीडिया से जुड़े हुए हैं, पहला सवाल उसी मीडिया पर है। सुलभा के पिता जगमोहन सिन्हा कहते हैं कि हमारा मीडिया अपरिपक्व लोगों के हाथों में है। सुलभा भी यह महसूस करती है कि वह आँख में पट्टी बांधकर दौड़ती है और दुनिया की आँख में पट्टी बांध देती है। और कभी दुनिया आँख में पट्टी बांधकर उसकी तरफ आती है और उसकी आँख में पट्टी बांध देती है। यानी झूठ और छद्म का खेल दोनों तरफ से चल रहा है। उपन्यास के पात्र कभी-कभी ये सवाल खुद से करते हैं कि क्या हर घटना खबर होनी चाहिए ? कहानी में एक्स्ट्रा मैरिटल और प्री-मैरिटल प्रेम संबन्धों पर भी प्रश्नचिन्ह लगाए गए हैं और इसका जस्टीफिकेशन भी इस युक्ति के साथ दिया गया है कि अगर एक रिश्ते से आपका काम नहीं चलता तो कोई बात नहीं, दूसरे अगर तैयार हों तो आप जितनें चाहें उतने रिश्ते बनाएँ। लेकिन सबको बताकर- यह नहीं कि हर किसी को अँधेरे में रख कर उसे भरोसा दिलाए जा रहे हैं कि यह प्रेम सिर्फ उसी से है। ऐसा इसलिए क्योंकि दो लोगों के बीच के रिश्ते सिर्फ दो लोंगों के नहीं होते, नहीं हो सकते। उनमें तीसरे का भी एक कन्टेक्स्ट होता है। यह तीसरा कोई इन्डिविजुअल भी हो सकता है और पूरी सोसाइटी भी। और यह प्रेम भी कोई साहित्य और सिनेमा वाला नहीं है, बल्कि बस लड़की हासिल करने की लड़कों की बेताबी है।


उपन्यास राजनीति और अपराध के नेक्सस की भी बात करता है। और विकास के नाम पर किसानों की ज़मीन छल से हड़पे जाने की समस्या की ओर भी इशारा करता है। एक संक्षिप्त पैरा में जातिगत आरक्षण की वैधता पर भी प्रश्न उठाता है। कुल मिलाकर लेखक ने अपने कौशल से एक नितान्त भिन्न पृष्ठभूमि पर बिल्कुल अनपेक्षित सवाल खड़े कर दिए हैं, जो उपन्यास-कला के विकास का एक नया आयाम है। लेकिन किताब में प्रूफ की गलतियों ने लेखक को भी बहुत विचलित किया होगा। आशा है कि इन गलतियों को अगले संस्करण में सुधार लिया जाएगा।

Sunday, 5 February 2017

सिनेमाई यथार्थ और पद्मावती का लोक आख्यान

         बाज़ारवाद के स्वर्णकाल में, जब सारे कला-माध्यम अपना असर लगभग खो चुके हैं, सिनेमा ने कुछ हद तक अपना असर बचाए रखा है. सिनेमा प्रत्यक्षत: किसी परिवर्तन का निमित्त भले ही न बन पा रहा हो लेकिन इतनी ताकत उसमे अभी भी दिखती है कि वह समय समय पर किसी विवाद को जन्म दे देता है. सिनेमा में इतना असर अभी भी है कि वह बीच-बीच में ऐसी बहसों का कारण बन जाता है, जिनसे इतिहास-भूगोल से कटे हुए लोग भी इतिहास-भूगोल की यात्रा पर निकल पड़ते हैं. अब यह अलग बात है कि अक्सर ये यात्राएँ छोटी और अल्पप्राण ही होती हैं. सिनेमा के बरक्स अगर दूसरे कला-माध्यमों को देखा जाए तो लगभग सभी का जनमानस से सीधा संवाद और रिश्ता बहुत कम बचा है. ये कला-माध्यम कोई सांस्कृतिक हलचल पैदा करने की हैसियत खो चुके हैं.

फिल्मों से विवाद पैदा होना कोई नई बात नहीं है. सिनेमा के इतिहास पर जिनकी नज़र है, वो जानते हैं कि कई फिल्मों ने विवादों और बहसों को जन्म दिया है. अक्सर ये विवाद फायदेमंद भी रहे हैं. फिल्मकारों के लिए अक्सर ये विवाद संजीवनी साबित हुए हैं. लेकिन कुछ वर्षों से फिल्मों से जुड़े सारे विवाद धार्मिक आपत्तियों पर केन्द्रित होते जा रहे हैं. वही फिल्में विवादित हो रही हैं जिन्होने किसी धार्मिक विषय को छुआ है या कोई टिप्पणी की है. इस रुझान की उग्र शुरुआत तब हुई थी जब मशहूर चित्रकार मकबूल फ़िदा हुसैन ने अपनी कुछ फिल्में बनायीं. हुसैन साहब अपनी पेन्टिंग्स को लेकर पहले से ही सांप्रदायिक उपद्रवियों के निशाने पर थे. अंतत:  उन्होंने देश ही छोड़ दिया था. आपको याद होगा कमल हासन की फिल्म ‘विश्वरूपम’ में भी कथित कथित धार्मिक टिप्पणियों के खिलाफ बहुत हंगामा हुआ था. तब कमल हासन ने भी देश छोड़ देने की धमकी दी थी. आमिर खान की एक-दो फिल्मों पर विवाद हुए. अभिनेता-निर्देशक चन्द्रप्रकाश द्विवेदी, कथाकार काशीनाथ सिंह के उपन्यास ‘काशी का अस्सी’ पर ‘मोहल्ला अस्सी’ नाम से फिल्म बना रहे थे. कई अड़चनों के बाद फिल्म बनकर तैयार भी हो गयी. लेकिन दुर्योग ने इस फिल्म का साथ नहीं छोड़ा. फिल्म का ट्रेलर रिलीज हुआ तो हंगामा मच गया. कुछ हिन्दू संगठनों की धार्मिक आस्था फिर आहत हो गई. आज तक फिल्म रिलीज नहीं हो पायी. ताज़ा विवाद संजय लीला भंसाली की फिल्म ‘पद्मावती’ को लेकर उठा, जिसे फिल्मकार ने थोड़ी शर्मिन्दगी उठाते हुए सुलझा लिया. इस विवाद पर आगे थोड़ा विस्तार से बात करेंगे.

पहले एक सवाल सिने-प्रेमियों और समाज शास्त्रियों से. क्या भारतीय सिनेमा अब धर्म-निरपेक्ष नहीं रहा ? या हम दर्शक ही धर्म-निरपेक्ष नहीं रहे ?  बालीवुड हमेशा धर्मनिरपेक्षता की मिसाल के रूप में देखा जाता रहा है. हमने देखा है कि नाजुक सांप्रदायिक मौकों पर फिल्म उद्योग से जुड़े लोगों ने एक स्वर में लोगों को जोड़ने वाली आवाज़ उठाई. फिल्म निर्माण का पेशा और संस्कृति अपने स्वभाव में ही ऐसी है. बहाँ सांप्रदायिक विभाजन की गुंजाइश बहुत कम बनती है. बावजूद इसके, इधर एक दो वर्षों में बालीवुड को धार्मिक-सांप्रदायिक विवादों में घसीटा जाने लगा है. फिल्मकारों कलाकारों पर कट्टरपंथियों ने हमले किए. अक्सर हिन्दू कट्टरपंथी, फिल्मकारों पर आरोप लगाते हैं कि वे सिर्फ हिन्दुओं की धार्मिक भावनाओं पर चोट करते हैं. कभी इस्लाम या दूसरे धर्मों पर टिप्पणी करने की हिम्मत नहीं दिखाते. यह आरोप लगाते हुए, सन 2007 में रिलीज हुई पाकिस्तानी फिल्म ‘खुदा के लिए’ को भूल जाते हैं. यह फिल्म युवा फिल्मकार शोयब मंसूर ने बनाई थी. पाकिस्तानी और भारतीय कलाकारों/टेकनीशियंस के मेल से बनी यह फिल्म इस्लामिक कट्टरवाद पर ज़बरदस्त प्रहार करती है. भारत में यह फिल्म 2008 में रिलीज हुई थी. फिल्मकार को कट्टर मुल्लाओं और आतंकियों की ओर से खूब परेशान किया गया.

ऐसे लोगों से मेरा प्रतिप्रश्न यह है कि क्या आपका धर्म इतना कमज़ोर है कि किसी की प्रतिकूल टिप्पणी से वह खण्डित हो जाएगा या उसका असर  खत्म हो जाएगा ? और इतना ही कमज़ोर है आपका धर्म तो उसे ढोते रहने का क्या हासिल ? क्या आपको ऐसा नहीं लगता कि भारत समेत पूरी दुनिया के समाजों में धार्मिक कट्टरता और ध्रुवीकरण बढ़ा है. धर्म अब धारण करने की नहीं, उपयोग करने की चीज हो गया है. धर्म का उपयोग व्यक्ति के रूप में श्रेष्ठ होने के लिए नहीं, बल्कि समुदाय के रूप में श्रेष्ठता आरोपित करने के लिए हो रहा है. असहिष्णुता कोई जुमला नहीं है, यह दो तिहाई दुनिया का सामाजिक सच है. लेखकों, फिल्मकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं पर हो रहे हमलों का कोई और अर्थ है क्या ?

ताज़ा विवाद संजय लीला भंसाली की निर्माणाधीन फिल्म ‘पद्मावती’ को लेकर हुआ. राजस्थान में फिल्म की शूटिंग के दौरान राजपूतों के संगठन श्री करणी सेना ने फिल्म यूनिट पर हमला कर दिया. उनका आरोप था कि पद्मावती और अलाउद्दीन खिलजी के बीच प्रणय संबन्धों के दृश्य फिल्माकर भंसाली इतिहास के साथ छेड़छाड़ कर रहे हैं और राजपूतों की गरिमा को आहत कर रहे हैं. उनका कहना है कि रानी पद्मावती को अलाउद्दीन छू भी नहीं सका था. रानी ने महल में मौजूद अन्य स्त्रियों के साथ जौहर कर लिया था. यद्यपि करणी सेना की आपत्ति और हमला, इतिहास से छेड़छाड़ को आधार बना कर दिखती है, लेकिन असल बात धार्मिक असहिष्णुता ही है. एक मुगल शासक के साथ एक हिन्दू रानी को प्रणय, कट्टरपंथियों को कैसे स्वीकार हो सकता था !

रही बात इतिहास बदलने की. तो आइए देखते हैं कि इतिहास कहता क्या है. सच तो यह है कि किसी भी लिखित इतिहास में रानी पद्मावती का उल्लेख है ही नहीं. पद्मावती या पद्मिनी का चरित्र, साहित्य और राजस्थान की लोकगाथाओं में मिलता है. सूफी कवि-फकीर मलिक मुहम्मद जायसी ने सन 1540 के आसपास अवधी भाषा में महाकाव्य ‘पद्मावत’ की रचना की. महाकाव्य की नायिका रानी पद्मावती हैं. यह महाकाव्य प्रेम और विरह का अद्भुत आख्यान है. पद्मावती, सिंहल द्वीप की राजकुमारी पद्मिनी थीं इनके पिता गन्धर्वसेन और माता चंपावती थीं. स्वयंवर में विजय हासिल कर चित्तौड़ के राजा रतन सिंह ने इन्हें अपनी रानी बनाया. ऐतिहासिक दृष्टि से उस समय दिल्ली सल्तनत पर खिलजी वंश का शासन था और अलाउद्दीन खिलजी सुल्तान था. अलाउद्दीन सन 1296 से 1316, मृत्यु तक दिल्ली का सुल्तान रहा. उसकी राज्य विस्तार की नीति के कारण उसे सिकन्दर-ए-सनी (दूसरा सिकन्दर) की उपाधि मिली हुई थी. 1303 में उसने चित्तौड़ पर आक्रमण किया था. उसी आक्रमण के समय रानी पद्मावती के कथित जौहर की गाथा राजस्थान के लोकमानस में प्रचलित है. जायसी की रचना इस समय से लगभग 237 वर्ष बाद लिखी गई. जाहिर है कि उन्होने अपनी रचना का आधार राजस्थान की लोकगाथाओं को ही बनाया होगा. अत: ‘पद्मावत’ की कथा को इतिहास मानना बुद्धिमानी नहीं होगी. लोकगाथाएँ न तो कोरा झूठ होती हैं, और न पूरा इतिहास. ये गाथाएँ वाचिक परंपरा में चलती हुई, समय, संघर्ष और शिक्षण के आग्रहों से बदलती रहती हैं.

इतिहास के विवरणों में अलाउद्दीन के चित्तौड़ पर आक्रमण और रतन सिंह के विवरण तो मिलते हैं, लेकिन रानी पद्मावती और उनके जौहर का कोई ज़िक्र नहीं है. यहाँ तक कि अलाउद्दीन के समकालीन कवि-इतिहासकार अमीर खुसरो ने भी पद्मावती का कोई उल्लेख नहीं किया है. अलबत्ता लोकगाथाओं से यह जरूर पता चलता है कि राणा रतन सिंह की पत्नी पद्मावती का सौन्दर्य अप्रतिम था. रतन सिंह के दरबारी संगीतकार राघव चैतन्य थे, जिनका बड़ा मान था. वो एक तांत्रिक भी थे. कहा जाता है कि वो अक्सर महल में बुरी आत्माओं को बुलाते थे. रतन सिंह को जब इसका पता चला तो उन्होंने राघव चैतन्य को अपमानित कर राज्य से निर्वासित कर दिया. अपमानित राघव दिल्ली, अलाउद्दीन के पास पहुच गए. हृदय में रतन सिंह से बदले की आग थी. अलाउद्दीन के सामने उन्होंने रानी पद्मावती के रूप का ऐसा वर्णन किया कि सुल्तान पद्मावती को पाने के लिए उद्धत हो उठा. उसने चित्तौड़ की घेराबन्दी कर दी और राजा रतन सिंह को बन्दी बना लिया. राजा की रिहाई के बदले पद्मावती को पाने की शर्त रखी. चित्तौड़ के सेनापति गोरा और बादल ने कूट रचना की और अलाउद्दीन को संदेश भेजा कि रानी पद्मावती को उसके पास भेजा जा रहा है. सात सौ पालकियों में रानी का काफिला अलाउद्दीन के शिविर पर पहुँचा. लेकिन रानी उसमें नहीं थीं. उन पालकियों में सशस्त्र सैनिक थे. काफी संघर्ष के बाद गोरा-बादल ने रतन सिंह को अलाउद्दीन के चंगुल से छुड़ा लिया. गोरा युद्ध में मारा गया, लेकिन बादल, रतन सिंह को सुरक्षित महल तक पहुँचाने में सफल रहा. इस पराजय से आहत अलाउद्दीन ने दोबारा चित्तौड़ पर आक्रमण किया और रतन सिंह सहित सारे सैनिकों को मार डाला. महल के अन्दर पद्मावती समेंत दूसरी रानियों और स्त्रियों ने जब यह समझ लिया कि अब उनकी इज्जत सुरक्षित नहीं है तो उन्होंने महल के आँगन में आग जला कर सामूहिक जौहर कर लिया. अलाउद्दीन के सैनिक जब भीतर पहुँचे तो उन्हें राख और हड्डियों के अलावा कुछ नहीं मिला.

यह कहानी है जो पद्मावत और लोक आख्यानों में मिलती है. संजय लीला भंसाली पद्मावती की कौन सी कहानी रच रहे हैं, अभी इसका पता नहीं है. लेकिन इतना तय है कि भंसाली, सिनेमा के अपरिहार्य तत्व ‘मनोरंजन’ और बॉक्स ऑफिस का खयाल जरूर रखेंगे. यद्यपि विवाद के बाद भंसाली ने श्री राजपूत महासभा के अध्यक्ष के साथ मिलकर यह सफाई दी कि फिल्म में अलाउद्दीन और पद्मावती के बीच कोई रोमैन्टिक दृश्य नहीं रहेंगे. यह बेशक एक समझौता है. अगर लोकगाथाओं को भी आधार बना कर फिल्म बनाई जाए, तो क्या यह संभव है कि जो अलाउद्दीन, पद्मावती को पाने के लिए इस तरह व्याकुल हो, उसके सपनों और कल्पना में पद्मावती से प्रणय के चित्र न रहे होंगे ! और कौन ऐसा फिल्मकार होगा जो अपनी फिल्म में ऐसा ड्रीम सीक्वेन्स न डालेगा ! भंसाली मँजे हुए फिल्मकार हैं. उन्होंने यह समझौता किया है तो नफा-नुकसान सोच कर ही किया होगा. फिल्म में काट-छाँट के बाद भी इस विवाद ने फिल्म की व्यावसायिक सफलता की गारण्टी तो दे ही दी है.

लेकिन यदि संजय लीला भंसाली, फिल्म में अलाउद्दीन और पद्मावती के बीच प्रणय दृश्य दिखाते तो क्या गलत होता ? समाज में सिनेमा की ऐसी व्यापक लोकप्रियता और स्वीकृति क्या सिनेमा के यथार्थवाद की वजह से है ? सिनेमा एक ऐसा कला-माध्यम है जो हमारे सपनों और अवचेतन की ग्रंथियों को परदे पर रूपायित करता है. सिनेमा, यथार्थ का एक ऐसा काल्पनिक विस्तार है जो हमारी आकांक्षाओं को तुष्ट करता है. इसीलिए सिनेमा को शुरुआत से ही यह छूट मिली हुई है कि वह इतिहास-भूगोल के साथ आवश्यक कलात्मक छेड़छाड़ कर ले. मनुष्य का मनोविज्ञान यही बताता है कि उसके भीतर इतिहास-भूगोल का अतिक्रमण करने की एक अदम्य लालसा हमेंशा बनी रहती है.

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Monday, 21 November 2016

पैसा ख़ुदा नहीं, पर ख़ुदा से कम भी नहीं !

                  
न जाने क्यों पिछले दस-ग्यारह दिनों से, सरकार की नोटबंदी की प्रक्रिया पर लिखने से मैं खुद को बचा रहा था. आप समझ सकते हैं कि साप्ताहिक स्तंभ लिखने के लिए अपने वर्तमान से एक सजग संबन्ध बनाए रखना कितना ज़रूरी होता है. पिछले हफ्ते तो बाल-दिवस ने बचा लिया. नौनिहालों की चिन्ता हमेशा मेरे चिन्तन के केन्द्र में रही है. इसलिए बाल-दिवस पर उसे व्यक्त कर  देना अप्रासंगिक नहीं रहा. लेकिन मैं यह भी देख रहा था कि नोटबंदी के बाद मचे हाहाकार के बीच बाल-दिवस का उल्लास कहीं गुम होकर रह गया. 9 नवंबर से नोटबंदी हुई. तब से लेकर आज तक लोगों की चर्चा में सिर्फ एक ही बात है-पैसा. पैसे को लेकर जितने भी संभव कोण हो सकते हैं, उन सभी कोणों पर बातें जारी हैं. ऐसा मंज़र है कि हर नागरिक अर्थशास्त्री है. वित्त-मंत्रालय और रिजर्व बैंक से रोज जारी होने वाले आदेश विद्युत गति से एक ज़ुबान से दूसरी ज़ुबान तक पहुँच रहे हैं. मोबाइल फोन पर सूचनाएँ आ-जा रही हैं कि फलाँ बैंक पैसा दे रहा है, फलाँ बैंक में पैसा खत्म हो गया. अमुक चौराहे के ए.टी.एम. से पैसा निकल रहा है.

सच पूछिए तो पहले दो दिन तो मुझे समझ ही नहीं आया कि नोटबंदी पर हसूँ या रोऊँ. जो छुट्टे पैसे जेब में थे उनसे दो दिन का काम चल गया. बंधे पैसे भी ज्यादा नहीं थे. तीसरे दिन 500 के तीन नोट लेकर बैंक की ओर चला कि इस काले धन को बैंक में जमा कर के अपने खाते से दस हजार निकाल लूँगा तो गृहस्ती का कारोबार चलता रहेगा. ठेल-ठाल के जब बैंक के काउन्टर पर पहुँचा तो बताया गया कि अभी सिर्फ पैसे जमा हो रहे हैं, दिए नहीं जा रहे. हमने अपना कालाधन जमा किया और लौट आए. जो था वो भी चला गया. जेब में पचास-साठ रुपए बचे थे. अगले दिन फिर बैंक गया. मैनेजर साहब ने कहा कि पैसा चेक से मिलेगा, वो भी सिर्फ दो हज़ार. मैं चेकबुक लेकर गया नहीं था लिहाज़ा घर भागना पड़ा. खैर चेक से एक चमचमाता हुआ दो हज़ार का नोट मिला. मैने सोचा पहले स्कूटर में पेट्रोल भराया जाए ताकि नौकरी और घूमने फिरने में कोई बाधा न आए. पेट्रोल पंप पर पहुँचे तो कहा गया कि कम से कम सत्रह-अठारह सौ का पेट्रोल डलवाइए तभी दो हज़ार का नोट लिया जाएगा. अब बताइए चार लीटर की टंकी में अठारह सौ का पेट्रोल कैसे डलवाते ! सो मायूस होकर लौटना पड़ा. वो तो भला हो उस किराना दुकान वाले का जिसके भीतर अचानक संवेदना का स्रोत कहीं से फूट पड़ा और उसने दो हज़ार का छुट्टा बिना कोई सामान खरीदे दे दिया. मेरी आत्मा अदृश्य तरीके से उसकी ऋणी हो गई, और मेरी गाड़ी चल निकली.

देश के करोड़ों लोगों की तरह मुझे भी अर्थशास्त्र की ज्यादा समझ नहीं है. मैं भी रुपए के मूल्य को अपने सुख-दुख के समानुपाती समझता हूँ. मुझे यह कभी नहीं समझ आता कि कौन सी मर्दाना कमजोरी की वजह से शेयर बाजार का शीघ्रपतन हो जाता है, और कौन सी वियाग्रा खाने से सेंसेक्स की उत्तेजना बढ़ जाती है. शेयर मार्केट के ‘साँड़’ और ‘भालू’ कौन सी अफीम खाकर अँगड़ाई लेते हैं, इसका मुझे सचमुच कोई इल्म नहीं. मुझे तो इन दिनों छत्तीसगढ़ के उस भाजपा नेता का डायलॉग याद आ रहा है, जब उसने घूस लेते हुए कहा था-“ख़ुदा कसम ! पैसा ख़ुदा नहीं, पर ख़ुदा से कम भी नहीं !” ये नेता जी एक स्टिंग ऑपरेशन में यह बात कह रहे थे. इस घटना से उनका राजनीतिक कैरियर बर्बाद भी हो गया. उनका यह डायलॉग उस दिन से मुझे याद आ रहा है जब मैं चौथी बार बैंक गया. दिन का दूसरा पहर था. बैंक में दो ऐसे व्यक्ति बैठे थे जिनके घर में किसी की मृत्यु हो गई थी. अगले दिन उनके यहाँ तेरहवीं थी और उन्हें पैसों की ज़रूरत थी. बैंक वालों ने कह दिया कि पैसे खत्म हो गए हैं. आप जानते ही हैं कि हिन्दू समुदाय में मृतक की तेरहवीं के आयोजन में कितना खर्चा होता है. उसी समय दो सुदर्शन महिलाएँ भी पैसे लेने पहुँचीं. मैनेजर साहब ने उन्हें इशारे से समझाया कि वे दोनों व्यक्ति यहाँ से हट जाएँ तो पैसे निकाल देंगे. मेरे लिए यह दृश्य संवेदना का एक नया रूप था.

अर्थशास्त्र की मेरी समझ भले ही कमज़ोर है पर पिछले कुछ समय से मन कहता है कि कहीं कुछ छल किया जा रहा है हमारे साथ. काफी समय से यह बताया जा रहा है कि मुद्रास्फीति घट रही है, लेकिन मंहगाई कम होने की बजाय बढ़ती ही गई. आर्थिक विकास दर के सरकारी आँकड़ों में अचानक उछाल आ गया लेकिन उसका कोई फायदा जनता को मिलता नहीं दिख रहा. उल्टा, सातवें वेतनमान का निर्धारण करते हुए सरकार ने पिछले वेतनमानों की परंपरा को भी तोड़ दिया और अपने कर्मचारियों को बहुत मामूली लाभ दिया. सरकार का यह भी दावा है कि पिछले दो सालों में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश बढ़ गया है, लेकिन हम देख रहे हैं कि इसी अवधि में नौकरियों का अकाल हो गया है. सरकारी दावों और परिणाम के ये विरोधाभास क्या किसी छल की ओर इशारा नहीं करते ? छोटी सफलताओं के बड़े जश्न, क्या बड़ी असफलताओं को छुपाने के प्रयास नहीं हैं ? सर्जिकल स्ट्राइक का विश्वव्यापी प्रचार, क्या चीन और पाकिस्तान से मिली कूटनीतिक पराजय की प्रतिक्रिया नहीं थी ?

प्रधानमंत्री ने जब नोटबंदी की घोषणा की तो एकबारगी सबकी तरह मुझे भी यह एक बढ़िया कदम लगा. यह सोचकर खुशी हुई कि देश से कालाबाज़ारी खत्म हो जाएगी और लोगों के पास दबा गैरकानूनी धन सरकार के खजाने में पहुँच जाएगा. आतंकियों और नक्सलियों की कमर टूट जाएगी. लेकिन जैसे जैसे दिन बीत रहे हैं, मुंगेरीलाल के हसीन सपनों की हकीकत सामने आती जा रही है. जनता को हो रही परेशानियाँ तो आप सब देख ही रहे हैं. उसकी बात करना अब उतना जरूरी नहीं है. मैं यह देखना चाह रहा हूँ कि क्या सरकार अपने मकसद में सफल होती दिख रही है ? ऐसा नहीं है कि दुनिया में पहली बार किसी देश ने अपनी मुद्रा के साथ छेड़छाड़ की है. इसके पहले भी कई देशों ने विमुद्रीकरण की प्रक्रिया अपनायी है. लेकिन अब तक असफलता का आँकड़ा, सफलता से अधिक ही रहा है.

अपने आखिरी दिनों में सोवियत संघ ने जनवरी 1991 में विमुद्रीकरण की प्रक्रिया शुरू की. तत्कालीन राष्ट्रपति गोर्वाचोव रूसी मुद्रा रूबल की कालाबाज़ारी से परेशान थे. वो रूबल को बाहर करना चाहते थे. उन्होने 50 और 100 रूबल को प्रतिबन्धित कर दिया. यह करेंसी सोवियत संघ की अर्थव्यवस्था का एक तिहाई हिस्सा थी. उन्होने उदारीकरण और राजनीतिक आर्थिक सुधार के इन कार्यक्रमों को ‘पेरेस्त्रोइका’ और ‘ग्लासनोस्त’ नाम दिया. लेकिन सोवियत संघ को इसका कोई फायदा नहीं हुआ, उल्टे अगस्त का महीना आते आते सोवियत संघ का विघटन हो गया.

ब्लैकमनी और कालाबाज़ारी पर रोक लगाने के लिए उत्तर कोरिया के तानाशाह किम जोन्ग ने 2010 में विमुद्रीकरण किया.  उन्होने सभी करेंसी वैल्यू से दो शून्य हटा दिए. यानि 1000 का नोट 10 का रह गया और 5000 का नोट 50 की कीमत का हो गया. उत्तर कोरिया में इस फैसले का बहुत बुरा असर हुआ. महगाई आसमान छूने लगी. खाद्यान्न की कीमतें इतनी अधिक हो गईं कि लोग भूखों मरने लगे. अंतत: तानाशाह को माफी मागनी पड़ी और उसने अपने वित्तमंत्री को फांसी पर लटका दिया. इसी तरह म्यामार में 1987 में मिलिट्रीशासन नें लगभग 80 प्रतिशत करेंसी को अवैध घोषित कर दिया. म्यामार के इतिहास में पहली बार छात्रों ने विमुद्रीकरण के विरोध में आन्दोलन शुरू किया. यह आन्दोलन साल भर चला. सरकार ने भरपूर दमन किया. नतीजा यही रहा कि हज़ारों नागरिक मारे गए.

मुद्रा के साथ छेड़खानी यानि विमुद्रीकरण की प्रक्रिया हर बार असफल रही हो, ऐसा भी नहीं है. लेकिन यह सफलता विकसित देशों को ही मिली. 1971 में इंग्लैण्ड ने रोमन काल से चले आ रहे सिक्कों को हटाने के लिए अपनी मुद्रा पाउण्ड में दशमलव पद्धति लागू की. अर्थशास्त्र में इसे ‘डेसिमलाइजेशन’ कहा जाता है. पूरे देश में चार दिन बैंक बन्द कर दिए गए. और पर्याप्त मात्रा में नई करेंसी पहुँचा दी गई. इतने कम समय और जनता को परेशान किए बगैर इंग्लैण्ड ने सफलता के साथ पुराने सिक्कों को बाहर कर दिया. इसी तरह जनवरी 2002 में यूरोपीय संघ के 11 देशों ने नयी करेंसी ‘यूरो’ अपनायी. यूरो का जन्म 1999 में ही हो गया था. तीन साल की तैयारी के बाद इसे सदस्य देशों ने अपनाया और इसका उनकी अर्थव्यवस्था पर सकारात्मक असर हुआ.

इन असफलताओं और सफलताओं के बरक्स भारत के विमुद्रीकरण या नोटबंदी को देखिए. यह साफ है कि प्रक्रिया जल्दबाजी में शुरू की गई. अगर कोई कार्ययोजना बनी भी है तो हद से हद उसे एक महीने का ही समय मिला. रिजर्व बैंक पूर्व गवर्नर रघुराम राजन को पद छोड़े एक महीने से कुछ ही दिन अधिक हुए थे जब यह घोषणा हुई. रघुराम राजन ने अपने बयान में कहा भी है कि नोटबंदी से कालाधन वापस नहीं आएगा. साफ है कि उनके समय में ऐसी कोई योजना न बनी होगी. यह निर्णय नये गवर्नर उर्जित पटेल के आने पर ही लिया गया. यह इससे भी स्पष्ट है कि जो नई करेंसी आ रही है उस पर उर्जित पटेल के ही हस्ताक्षर हैं. रही बात कालेधन की तो जिनके पास करोड़ों में पैसा था उन्होंने उसे घर पर नहीं रखा है. उनका पैसा व्यापारियों, बिल्डरों, शेयर मार्केट में लगा हुआ है. जो धीमी गति से ही सही, अंतत: सफेद हो ही जाएगा. जिनके पास थोड़ी छोटी रकमें थीं वो इन दिनों सोना खरीद कर रख रहे हैं. अनधिकृत रूप से सोने की कीमत 55000 रुपये प्रति 10 ग्राम तक पहुँच गई है. सोने के व्यापारी बिना पैन कार्ड लिए सोना बेच रहे हैं. हवाला कारोबारी भी कमीशन लेकर कालेधन को सफेद कर रहे हैं. वैट से छूट प्राप्त कारोबारी 40 प्रतिशत पर बन्द हो चुके नोट ले रहे हैं. ये कारोबारी इन नोटों को 30 प्रतिशत टैक्स देकर जमा कर देते हैं तब भी इन्हें 30 प्रतिशत का मुनाफा हो रहा है. जिनके पास ज्यादा पैसे नहीं हैं वो और भी आसान तरीकों से कालेधन को सफेद कर ले रहे हैं. इसमें बैंक के कर्मचारियों की बड़ी भूमिका है. कुल मिलाकर नोटबंदी से एक नए तरह का कालाबाज़ार पैदा हो गया है.

मुझे प्रधानमंत्री की मंशा पर कोई संदेह नहीं है. लेकिन उनकी समझ और महत्वाकांक्षाओं को लेकर हमेशा सवाल रहे हैं मेरे मन में. प्रधानमंत्री का  स्वभाव बहुत उतावलेपन का है. वो भारत ही नहीं पूरी दुनिया को अकेले ही बदल डालने की महत्वाकांक्षा लेकर चल रहे हैं. कदाचित चुनाव में मिले प्रचण्ड बहुमत ने उनके भीतर ये महत्वाकांक्षाएँ जगायी हों. भारत का प्रधानमंत्री बनते ही नरेन्द्र मोदी की कोशिशों से यह साफ दिखता है दुनिया में उनकी धाक अमेरिका, रूस, ब्रिटेन, जर्मनी, चीन के राष्ट्रप्रमुखों से कुछ अधिक नहीं तो कम से कम उनके बराबर तो मानी ही जाए. नोटबंदी का चौंकाने वाला फैसला उनकी इसी मनोवृत्ति का परिणाम है. इस कदम से देश को कितना फायदा होगा, यह तो वक्त ही बताएगा, फिलहाल आलम यह है कि अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों में 50 से 70 प्रतिशत की गिरावट दर्ज़ की जा रही है.

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