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Saturday, 10 June 2017

किसने बोला राजा नंगा है !

                      


आपको वह कहानी याद होगी जिसमें एक सनकी राजा नंगा होकर नगर की गलियों से गुजरते हुए प्रजा से पूछता है कि उसके कपड़े कैसे है ! लोग जवाब देते हैं- अद्भुत ! तभी कोई बच्चा बोल देता है- राजा नंगा है !  राजा नंगा है !  राजा के सिपाही बच्चे को पकड़ कर कैदखाने में डाल देते हैं. यद्यपि एनडीटीवी कोई बच्चा चैनलनहीं है, लेकिन वो जब भी राजा को नंगा देखता है, बोल देता है. और राजा अतत: उसे कैदखाने पहुँचवा ही देता है. आखिर कब तक सहता रहता !

जिस मीडिया की बदौलत आजकल कोई भी खबर देश भर में आग की तरह फैल जाती है, उसी मीडिया पर हुए हमले की खबर भी आग से भी अधिक तेजी से फैली और देश भर के सोच-समझ वालों को झुलसा दिया. आप सब तक भी यह खबर पहुँच ही गई है कि सीबीआई ने एनडीटीवी के मालिक प्रणब राय के ठिकाने पर छापा मारा है. ऐसा माना जाता है कि एनडीटीवी, संसद के बाहर सत्तापक्ष का विपक्ष है. सीबीआई के छापे की खबर मिलते ही मेरा ध्यान कुछ समय पहले की दो और घटनाओं पर गया. ये दोनों घटनाएं भी इसी खबरिया चैनल से जुड़ी हुई हैं. पहली घटना जब रवीश कुमार ने एम.जे. अकबर को भाजपा में शामिल होने पर पत्र लिखा. दूसरी घटना जब पठानकोट हमले के कवरेज के बहाने एनडीटीवी पर एक दिन का बैन लगाने का आदेश सूचना प्रसारण मंत्रालय ने दिया. इन दोनों घटनाओं पर एक संक्षिप्त बात कर लेने से हमारे सामने राजनीति और मीडिया के बीच के राग-द्वेष खुलेंगे और इनके नागरिक सरोंकारों का पता भी मिलेगा.

रवीश कुमार के आत्मदया से प्लावित पत्र की खूब चर्चा रही मीडिया में. यह पत्र उन्होंने मोदी सरकार के नव-नियुक्त मंत्री और पूर्व पत्रकार एम.जे.अकबर को लिखा था. कल भी अपनी रिपोर्ट में रवीश पर्याप्त भावुक हुए. रवीश कुमार अब पत्रकारों में सेलिब्रिटी बन चुके हैं. रवीश मुझे भी पसन्द हैं. रवीश ऐसे पत्रकार हैं, जिनसे अधिकतर लोग असहमत हो सकते हैं, हमलावर हो सकते हैं, लेकिन उनकी उपेक्षा नहीं कर सकते. उनकी रिपोर्ट्स देखने सुनने वोले लोग जानते हैं कि वे एक बेहद संवेदनशील पत्रकार हैं. उन्होने एक ऐसी ताकतवर भाषा अर्जित कर ली है, जिससे वे अपनी बात को ठीक वैसे ही कह पाते हैं,  जैसे कहना चाहते हैं. उनकी कही गई बातों से मूल घटना कुछ अतिरिक्त असरदार हो जाती है. अब यह बात अलग से सोचने की है कि यह अतिरिक्त असर पत्रकारिता के लिहाज़ से कितना उचित है ! रवीश अपनी भाषा और भंगिमाओं से यह असर पैदा करते हैं. और इतना करते हैं कि अंत में एक रूमानी कवि नज़र आने लगते हैं.

एम.जे.अकबर को लिखे अपने खुले पत्र में रवीश बहुत भावुक हो गए. अपनी आत्मदया को और हमलावर बनाने के लिए उन्हें अपनी माँ को वेश्या कहे जाने का सम्पुट देना पड़ा. इस लम्बे खुले पत्र में रवीश कुमार की समस्त लक्षणा और व्यंजना शक्तियों का उद्देश्य, एम.जे.अकबर को एक नैतिक दुविधा के बिन्दु पर लाकर खड़ा करना था. आप सब जानते हैं कि एम.जे.अकबर एक प्रखर पत्रकार थे. पत्रकारिता से राजनीति में गए. काँग्रेस पार्टी से सांसद बने. फिर पत्रकारिता में लौटे. फिर राजनीति में गए और अब भाजपा सरकार में मंत्री हैं. इसी आवागमन पर रवीश सवाल उठाते हैं. वो यह जानना चाहते हैं कि एक पत्रकार को एक ऐसी सरकार में, जिसका चरित्र राष्ट्रवादी और तानाशाही है, शामिल होते समय क्या तनिक भी नैतिक संकोच नहीं हुआ ? यद्यपि यह सवाल रवीश ने पहले नहीं पूछा जब एम.जे. काँग्रेस में गए या जब भाजपा के प्रवक्ता बने. रवीश ने अरुण शौरी और राजीव शुक्ला को भी कभी ऐसी नैतिक चुनौती नहीं दी. फिर एम.जे. अकबर को इस तरह कठघरे में क्यों खड़ा किया, ये वही जानते होंगे.

दूसरी घटना मे देश के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने एनडीटीवी इंडिया पर चौबीस घंटे का प्रतिबन्ध लगा दिया था. एनडीटीवी पर यह प्रतिबन्ध उसके एक कवरेज को बहाना बनाकर लगाया गया है. 4 जनवरी 2016 को पठानकोट एयरबेस पर पाकिस्तानी आतंकवादियों ने हमला किया था. यह सेना का अत्यधिक महत्वपूर्ण एयरबेस है. न जाने सुरक्षा व्यवस्था में कहाँ और कैसी चूक हुई कि आतंकवादी इस एयरबेस में घुस गए और काफी नुकसान पहुँचाया. दूसरे चैनलों की तरह एनडीटीवी ने भी इस बड़ी घटना को कवर किया. फर्क बस इतना था, कि दूसरे चैनल 56 इंची सीने की गीदड़ भपकियों, गृहमंत्री की गर्वोक्तियों और रक्षामंत्री की मूढ़ताओं को महिमामंडित कर रहे थे और एनडीटीवी इस बड़ी घटना में सुरक्षा-व्यवस्था में हुई चूकों और दोषियों को खोज रहा था. बस यही उसका अपराध बन गया. घटना के दस महीने बाद सरकार ने एनडीटीवी पर प्रतिबन्ध लगाने की सज़ा दी. सरकार की तरफ से कहा गया है कि चैनल की रिपोर्ट से सामरिक महत्व की अतिसंवेदनशील जानकारियाँ सार्वजनिक हो गई हैं. बाद में व्यापक विरोध के चलते इस आदेश को स्थगित कर दिया गया.

अब कौन कहे कि राजा नंगा है. कौन पूछे कि जब आपने पाकिस्तानी जाँच दल को पठानकोट एयरबेस में जाने की इज़ाज़त दी थी, तब क्या उसकी सामरिक संवेदनशीलता खत्म हो गई थी ? उस जाँच दल में कथित तौर पर पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आई.एस.आई. का एक अधिकारी भी था. वह न भी होता तो पाकिस्तानी सेना के अधिकारी तो थे ही. पाकिस्तानी सेना और खुफिया एजेंसी का खतरनाक गठजोड़ जग जाहिर है. आखिर जिसका डर था बेदर्दी वही बात हो गई. पाकिस्तानी जाँच दल जब लौट कर गया तो उसने इस आतंकी हमले में पाकिस्तान का कोई हाथ होने से साफ इंकार कर दिया. इस प्रकरण में भारत सरकार की मज़बूरी भी दिखी और दिशाहीन विदेशनीति भी. वहीं पाकिस्तान ने ज़बरदस्त दाँव खेला. उसने पठानकोट में अपना जाँच दल भेज कर भारत सरकार को उभयतोपाश में डाल दिया. भारत सरकार अगर मना करती तो पूरी दुनिया को संदेश जाता कि भारत सरकार झूठ बोलकर नाहक पाकिस्तान को बदनाम कर रही है.

रवीश कुमार का वह पत्र बूमरेंग की तरह लौट कर मीडिया पर ही लगता है. रवीश ने बार बार ज़ोर देकर कहा है कि लोग मुझे दलाल कहते हैं. जाहिर है ये भाजपा और संघ के लोग हैं. दूसरे आम लोग यह समझते हैं कि यह पत्र भले ही एम.जे.अकबर को संबोधित है, लेकिन निशाना उन तमाम मीडियाकर्मियों और बौद्धिकों पर है जो सत्ता के लोभ में पथभ्रष्ट हो रहे हैं. इस वक्त मुझे वह उक्ति याद आती है, जिसमें कहा गया है कि जब आप किसी पर उँगली उठाते हैं, तो तीन उँगलियाँ आपकी तरफ होती हैं. इस वक्त मुझे चार साल पहले जस्टिस मार्कण्डेय काटजू के उठाए गए सवाल भी याद आते हैं, जो साफ बताते हैं कि मीडिया की चलनी में भी बहत्तर छेद हैं. रवीश के पत्र के बाद जो तीन उँगलियाँ रवीश की तरफ उठी हैं, वो सिर्फ रवीश कुमार की तरफ नहीं, वर्तमान मीडिया की तरफ हैं. इन उठी हुई उँगलियों का इशारा हम काटजू के उन्हीं सवालों के प्रकाश में देखने की कोशिश करते हैं.

जब जस्टिस मार्कण्डेय काटजू ने मीडिया के धरम-करम पर सवाल उठाये तो स्वयंभू मीडिया की सहिष्णुता सबके सामने आ गयी. प्रतिक्रिया में मीडिया, न्यायपालिका के साथ-साथ देश के सभी चिन्तनशील लोगों के सामने चुनौती की तरह आ खड़ा हुआ. संभवतः यह पहली बार हुआ था कि किसी ने इतनी महत्वपूर्ण ज़गह से मीडिया पर सवाल उठाये थे. उनके वक्तव्य के उस अंश को देखते हैं जिस पर मीडियाकर्मी और संस्थान भड़क उठे है. वो कहते हैं---मेरी राय में भारतीय मीडिया का एक बड़ा हिस्सा(खासतौर से इलेक्ट्रानिक मीडिया) जनता के हितों को पूरा नहीं करता, वास्तव में इनमें से कुछ यकीनन (सकारात्मक तौर पर) जन-विरोधी हैं. भारतीय मीडिया में तीन प्रमुख दोष हैं जिन्हें मैं रेखांकित करना चाहता हूं----पहला, मीडिया अक्सर लोगों का ध्यान वास्तविक मुद्दों से अवास्तविक मुद्दों की ओर भटकाता है....दूसरा, मीडिया अक्सर ही लोगों को विभाजित करता है.....तीसरा, मीडिया हमें दिखा क्या  रहा है.

जस्टिस काटजू ने मीडिया पर तीन महत्वपूर्ण सवाल उठाये थे. इन पर बात करने से पहले हम यह जान लें कि वो कौन सी बात है जिससे मीडिया बिफर गया था. क्योंकि इन सवालों से मीडिया की सेहत ज़्यादा बिगड़ने वाली नहीं है. गाहे-बगाहे, दबी ज़बान से ही सही, मीडिया से ऐसे सवाल पूछे जाते रहे हैं. बवाल इस बात से मचा है कि प्रेस कौंसिल के अध्यक्ष जस्टिस काटजू चाहते थे कि कौंसिल के दायरे में इलेक्ट्रानिक मीडिया को भी लाया जाये, मीडिया की निगरानी की जाये, और न सिर्फ निगरानी की जाये बल्कि उसे दण्डित करने का भी अधिकार हो.

इस जायज़ माग पर चौथे खम्भे को तो थर्राना ही था. मीडिया में यह खुशफहमी सदियों पुरानी है कि लोकतंत्र के बाकी के तीन पाये किसी काम के नहीं हैं. कि लोकतंत्र उसी पर टिका है. वैसे हिन्दुस्तान में जिस तरह का लोकतंत्र है, उसमें मीडिया और लोकतंत्र के घटकों के बीच के सम्बन्ध हमेशा वैध नहीं रहे हैं. चौथे स्तम्भ की अवधारणा मूल रूप से हमारे यहां की नहीं है. इसका जन्म यूरोप में उन दिनों हुआ था जब यूरोप के देशों में लोकतांत्रिक प्रकृया अपने शैशवकाल में थी. तब सिर्फ प्रिंट मीडिया था और उसे एक सजग प्रहरी की भूमिका में स्वीकार कर लिया गया था. हमारे देश में तब तक राजशाही ही चल रही थी. और मीडिया के किसी भी रूप का कहीं दूर-दूर तक अता-पता पता नहीं था. तो एक तरह से यह मान लेने में कोई हर्ज़ नहीं है कि लोकतंत्र, मीडिया और चौथा-स्तम्भ जैसी अवधारणाए आयातित हैं.
हिन्दुस्तान की जिस सवावेशी प्रकृति  के गुण हमेशा गाये जाते हैं, उसी नें लोकतंत्र और मीडिया को भी अपनी आबो-हवा में मिला लिया है....अब इनका चरित्र विशुद्ध रूप से भारतीय हो चुका है. मुझे लगभग बीस साल मीडिया में काम करते हुए जो तजुर्बा हुआ है, उसके आधार पर मैं कह सकता हूं कि जस्टिस काटजू की जो भावना है, वह आम लोगों की भावना भी है. आम लोग ऑफ द रिकॉर्ड यह खुलेआम कहते देखे जा सकते हैं कि मीडिया बिकता भी है और झुकता भी है. छोटे स्तरों पर, रोज़मर्रा के जीवन में मीडिया की ब्लैकमेलिंग के अनेक उदाहरण देखने को आसानी से मिल जायेंगे.

हमारा शहर एक छोटा सा शहर है. लेकिन यहां दो सौ से अधिक दैनिक और साप्ताहिक अखबार पंजीकृत हैं. इनमें से आठ-दस को छोड़ कर बाकियों की शक्ल सब नही देख सकते. इन अदृश्य अखबारों के दो मुख्य धंधे हैं. पहला, ये राज्यशासन से अपने कोटे का अख़बारी कागज़ लेते हैं और कुछ दाम बढ़ाकर उसे बड़े अखबारों को बेच देते हैं. दूसरा, ये बीच-बीच में किसी अफसर, नेता या ठेकेदार के तथाकथित भ्रष्ट आचरण पर रिपोर्ट तैयार करते हैं. अखबार की प्रति लेकर संबन्धित व्यक्ति के पास पहुंचते हैं. उस दिन की सारी प्रतियों के दाम वह व्यक्ति चुका देता है. अखबार को जनता के बीच तक जाने की जहमत नहीं उठानी पड़ती. केबल नेटवर्क के समाचारों में आमतौर पर वही समाचार होते हैं जो या तो इरादतन बनाये जाते हैं या जिनका किसी के हित-अहित से कोई लेना देना नहीं होता.

पर यह तो हांडी के चावल का एक दाना भर है. आप राष्ट्रीय परिदृश्य पर नज़र डालिए. अखबारों और चैनलों की भीड़ है. आप भी चकित होते होंगे जब एक ही नेता या पार्टी या सेलिब्रिटी को एक ही समय में कुछ अखबार/चैनल महान बता रहे होते हैं और कुछ अधम और पापी. चुनावों के दौरान मीडिया जिन लोगों का नकली जनाधार बनाता है, उनसे उसके रिश्तों को किस आधार पर नकारा जा सकता है. मीडिया नकली लोगों को असली की तरह पेश करता है. जिन व्यक्तित्वों के पीछे देश की जनता पागल की तरह जाती है, उनकी छवियों के निर्माण का काम मीडिया ही करता है, और यह काम वह धर्मार्थ नहीं करता.

इसी अंधकार से जस्टिस काटजू की चिन्ताएँ उपजती हैं. जब हमारा मीडिया फैशन शो, क्रिकेट और फार्मूला वन पर अपनी रोशनी डाल रहा हो और उसके गहन अंधकार वाले हिस्से में कर्ज में डूबे किसान, भूख से बिलखते बच्चे मौत की आगोश में जा रहे हों, तो उनका चिन्तित होना चौंकाता नहीं है. एक आंकड़े का हवाला देते हुए वो कहते हैं कि पिछले पन्द्रह सालों में ढाई लाख से ज़्यादा किसान आत्महत्या कर चुके हैं. बेशक इसमें मीडिया का हाथ नहीं है. पर बताइए, जिनका इन आत्महत्याओं में सीधा हाथ है, उनकी कलाई कभी पकड़ी मीडिया ने ? जिस चमक और समृद्धि के पीछे मीडिया भागता है, वह कितने लोगों की समृद्धि है ?? आप इक्कीसवीं सदी के इस वैज्ञानिक समय में अगर शनि-राहु-केतु की महादशाओं पर चर्चा करेंगे तो आपकी समझ और सरोकार पर सवाल तो पैदा होंगे ही. मीडिया को यह तय करना ही होगा कि उसे किन सवालों से टकराना है और किन्हें छोड़ देना है. जस्टिस काटजू अगर चिन्तित होते हैं कि मीडिया देश और समाज को विभाजित करता है, तो इस बात का सम्बन्ध मीडिया के इरादे से नहीं है. बल्कि यह उसके चयन-विवेक पर प्रश्न-चिन्ह है. आतंकी घटनाओं, साम्प्रदायिक विद्वेष, जातीय संघर्षों के समय मीडिया का यह अविवेक बहुत साफ तौर पर सामने आ जाता है.

दरअसल हमारे वर्तमान अर्थकेन्द्रित समाज में मीडिया एक उद्योग बन चुका है. इसके सारे घटक पूंजीपतियों की मिल्कियत हैं. पूंजी की अपनी आकांक्षाएँ होती हैं. वह अपनी नैतिकता और सामाजिकता खुद गढ़ती है. पूंजी को कुरूपता-दरिद्रता पसन्द नहीं आती क्योंकि वहां उसका प्रवाह बाधित होता है. इसीलिए हमारा मीडिया उस मायालोक को रचता है, जिसकी तेज़ रोशनी आपकी आँखों को चौंधिया दे. उसके पास तकनीक है. इस तकनीक से वह प्रकाश के वृत्त को मनचाहे ढंग से घुमाता रहता है. इसके पास यह कौशल है कि वह जिन चीज़ों को चाहे उन्हें गहरे अंधकार में डुबा दे.जिस चमक और समृद्धि के पीछे मीडिया भागता है, वह कितने लोगों की समृद्धि है ?? आप इक्कीसवीं सदी के इस वैज्ञानिक समय में अगर शनि-राहु-केतु की महादशाओं पर चर्चा करेंगे तो आपकी समझ और सरोकार पर सवाल तो पैदा होंगे ही.        

लेकिन इस सिक्के का एक दूसरा पहलू भी है, जिस पर शायद पहले बात की जानी चाहिए थी. मीडिया की सशक्त उपस्थिति ने ही यह संभव किया है कि आज कई राजा, रानियां, चोर-उचक्के अपने असल ठिकाने तक पहुंच चुके है. इससे भी बड़ी बात यह है कि आज देश का हर बेसहारा आम आदमी मीडिया पर भरोसा करता है और उसे अपनी शक्ति की तरह मानता है. यह समय टकराव का नहीं है. मीडिया एक बहुत ताकतवर माध्यम है. इसकी ताकत आम जन के भरोसे बनती है. ज़रूरत है कि वह अपने सर्वोच्चताबोध को छोड़कर, अपने सामाजिक दायित्वों को समझे. उसकी भूमिका प्रहरी की है, और इसी में उसकी सार्थकता है. उसे मालिक की भूमिका में कभी नहीं स्वीकारा जा सकता. मीडिया सत्तायें बदल सकता है, समाज बदल सकता है, लेकिन शासक नहीं बन सकता. .

लेकिन संकट तो दिख रहा है इन दिनों. लोकतांत्रिक प्रविधियों के भीतर, घोर अलोकतांत्रिक शक्तियाँ अप्रकट हैं.. इमरजेन्सी के बाद पहली बार मीडिया पर ऐसी कार्यवाही की गई है. राष्ट्रवाद की भावना को आतंकवाद की हद तक बढ़ाने के प्रयास किए जा रहे हैं. असहमति को राष्ट्रद्रोह सिद्ध किया जा रहा है. अभी कुछ ही दिनों पहले अरुण जेटली ने फरमान जारी किया है कि सरकारी कर्मचारियों को सरकार की आलोचना करने का अधिकार नहीं है. ऐसा करने पर उनके खिलाफ कार्यवाही की जाएगी. म.प्र. के एक आई.ए.एस. अफसर ने जवाहरलाल नेहरू की तारीफ कर दी तो भाजपा सरकार ने सज़ा दे दी. जे.एन.यू. के प्रकरण से तो आप सब वाकिफ़ ही हैँ. एनडीटीवी का प्रकरण सरकार की इसी प्रवृत्ति का अगला कदम है.


Thursday, 18 May 2017

धरती के स्वर्ग में कश्मीरी लाल मिर्च !

       सबसे पहले कश्मीर के मौजूदा दृश्य पर एक विहंगम नज़र डाल लेते हैं. इसके बाद कश्मीर के निकटवर्ती अतीत में उतरेंगे. धरती का स्वर्ग माने जाने वाले कश्मीर में आज कश्मीरी लाल मिर्च की तीखी गंध आबो-हवा में तैर रही है. आज़ादी के बाद कश्मीर में अस्थिरता का यह सबसे भीषण दौर है. नब्बे के दशक में, जब कश्मीर में आतंकवाद अपने चरम पर था, तब भी कश्मीर को लेकर शेष भारतीयों के मन में ऐसा संशय नहीं था, जैसा आज है. पाकिस्तान की नज़र तब भी कश्मीर पर थी, आज भी है. आज हम ज्यादा बड़ी और ताकतवर सैन्यशक्ति हैं. लेकिन आज हम आश्वस्त नहीं हैं कि कश्मीर को बचा पाएंगे या नहीं.

इन दिनों जब हम कश्मीर की कल्पना करते हैं तो उसमें डल झील, शफ़्फ़ाफ़ चोटियाँ, सेब के बगीचे और दिल में जादू जगाने वाली स्त्रियाँ नहीं दिखतीं. अब सुरक्षाबलों पर पत्थर फेंकते बच्चे, बूढ़े, जवान और लड़कियाँ दिखती हैं. उजाड़ घाटी और गाँव दिखते हैं. सेना के मारे जा रहे अधिकारी और जवान दिखते हैं. धुँआ दिखता है और धुँआ धुँआ ज़िन्दगी दिखती है. महबूबा मुफ्ती र फारुख अब्दुल्ला की कुटिल मुस्कान दिखती है.

केन्द्र में मोदी की सरकार बनने के बाद बहुसंख्यक कश्मीरी जनता किसी अदृश्य-अमूर्त आशंका से भर गई थी. आगे चलकर जब राज्य में महबूबा की पीडीपी और भाजबा की गठबंधन सरकार बनी तो कश्मीरी जनता, राजनीति और शासन में असमंजस और बढ़ गया. महबूबा हमेशा अलगाववादियों के प्रति सहानुभूति रखती रही हैं. और भाजपा अलगाववादियों का मुह तक नहीं देखना चाहती. भाजपा जब सत्ता में नहीं थी तो उसने अक्सर धारा 370 के औचित्य पर सवाल उठाए. जाहिर है, कश्मीर को लेकर दोनों के एजेण्डे अलग हैं. पिछले ग्यारह महीनों में कश्मीर में उपद्रव बहुत अधिक बढ़ गया. सीमापारसे लगातार हमले हो रहे हैं. आतंकवादी बैंक लूट रहे हैं. जवानों को मार रहे हैं. हमें कहा जा रहा है कि अपनी सेना पर भरोसा रखें. हम रखे हुए हैं भरोसा. प्रधानमंत्री जी कश्मीर पर कुछ नहीं बोलते. रक्षामंत्री हर हमले के बाद इसे दुश्मन की कायराना हरकत करार देते हैं. गृहमंत्री कड़ी निन्दा कर देते हैं. इस बीच वो हुआ जो अब तक नहीं हुआ था. अभी तक  विश्व समुदाय यही कहता रहा है कि कश्मीर, भारत-पाकिस्तान का द्विपक्षीय मसला है. हम इसमें दखल नहीं देंगे. लेकिन कुछ दिन पहले अमेरिका ने चेतावनी दी है कि अगर भारत और पाकिस्तान के बीच संघर्ष बढ़ा तो अमेरिका चुप नहीं बैठेगा. इस चेतावनी के बाद मुझे एकाएक ईराक, अफगानिस्तान और सीरिया के मंज़र नज़र आने लगे. आज़ाद भारत की यह सबसे बड़ी कूटनीतिक पराजय है.

मुझे ताज्जुब हुआ यह देखकर कि कश्मीर पर कुछ कहने लिखने में प्रतिष्ठित सेकुलर विचारक और लेखक संकोच कर रहे हैं. जिन्होंने कुछ लिखा भी तो इस पूर्व घोषणा के साथ कि ‘जुर्रत कर रहा हूँ’. यद्यपि उन्होंने लिखा पर ऐसी कोई जुर्रत नहीं की, जो उन्हें असुविधा में डाल दे. कश्मीर पर लिखने से हमारे सेकुलर साथी आमतौर पर बचते रहे हैं. लेकिन इस बार मीडिया के उन्मादी कवरेज और सोशल मीडिया में अपने प्रशंसकों के दबाव में इन लेखकों को कुछ कहने लिखने को मजबूर होना पड़ा.

कश्मीर पर कुछ बोलने में संकोच क्यों हो जाता है ? क्या इसलिए कि कश्मीर पर कुछ बोलते हुए एक ऐसी इमानदारी की दरकार है जो आपकी वैचारिक छवि पर एक खरोंच लगा सकती है ? कश्मीर पर बात करते हुए पहले आपको कश्मीरी हिन्दुओं और बौद्धों की बात करनी पड़ेगी, उसके बाद मुसलमानों की. कश्मीर पर बात करते हुए आपको पहले कश्मीरी पंडितों की दुखती रग पर हाथ रखना पड़ेगा. कश्मीर पर बात करते हुए आपको कहना होगा कि वहाँ मुसलमान आक्रान्ता हैं. लेकिन इतनी हिम्मत हममें नहीं है. इसीलिए हम कुछ रटे हुए जुमलों के सहारे कश्मीर की झीलों में अपनी नैया खेते रहते हैं. हम पाकिस्तान, आई.एस.आई., और भारतीय सेना को मिलाकर एक ऐसा रसायन तैयार करते हैं जो कश्मीर की रगों में उन्माद पैदा कर देता है.

हमें यह मानने में संकोच क्यों होता है कि कश्मीर पहले हिन्दुओं का है, उसके बाद मुसलमानों का. कश्मीर की स्वायत्तता की माग, कश्मीरी हिन्दुओं का हक है, अलगाववादी मुसतमानों का नहीं. हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि महर्षि कश्यप के नाम पर स्थापित कश्मीर प्राचीनकाल में हिन्दुओं का राज्य था. जब यहाँ सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म का प्रचार किया तो बौद्धों की अच्छी खासी आबादी यहाँ निर्मित हो गई. हिन्दू और बौद्ध, दोनों धरती के इस स्वर्ग पर बिना किसी तकरार के रह रहे थे. मध्यकालीन संस्कृत कवि कल्हड़ ने अपनी कृति ‘राजतरंगिणी’ में कश्मीर राज्य के सौन्दर्य, वैभव और सहअस्तित्व का उदात्त वर्णन किया है. कश्मीर पर अशोक और उज्जैयिनी के शासक विक्रमादित्य द्वितीय का भी शासन रहा. आधुनिक काल में रणजीत सिंह ने कश्मीर पर आक्रमण करके वहाँ सिखों का शासन स्थापित किया लेकिन बाद में कश्मीर के राजा गुलाब सिंह से उनकी सन्धि हो गई और कश्मीर, कश्मीरियों को वापस मिल गया.

इस बीच मुसलमान कश्मीर में आ चुके थे. 12 वीं शताब्दी के अन्त तक फारस से सूफी इस्लाम कश्मीर में आया. सूफी इस्लाम प्रेम और भक्ति का प्रचारक था, इसलिए कश्मीर में वह बड़ी सहजता से स्थापित हो गया. धीरे धीरे कश्मीर में इस्लाम बढ़ता गया और चौदहवीं शताब्दी में कश्मीर पर मुस्लिम शासन शुरू हो गया. इसके बाद कश्मीर में कभी हिन्दू तो कभी मुस्लिम शासन रहा. आप जानते हैं कि भारत की आजादी के समय कश्मीर के राजा हरि सिंह थे और कश्मीर एक स्वायत्त रियासत थी. भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम की एक अहम शर्त के मुताबिक देशी रियासतों को यह फैसला करने की आजादी दी गई कि वो भारत अथवा पाकिस्तान राज्य में अपना विलय कर लें या स्वतंत्र बने रहें. हरि सिंह कश्मीर को स्वतंत्र रखना चाहते थे. यहीं से कश्मीर की कभी न खत्म होने वाली समस्या शुरू होती है.

इतिहास की बात फिलहाल यहीं तक. अब बात वर्तमान की. कश्मीर का वर्तमान शुरू होता है ठीक भारत की आजादी के समय से. कश्मीर का वर्तमान शुरू होता है जवाहर लाल नेहरू की उस ऐतिहासिक भूल से जब उन्होंने कश्मीर के मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र संघ में पहुँचा दिया. यह बात 1947-48 के कबाइली हमलों के बाद की है. कबाइलियों के साथ मिलकर पाकिस्तानी सेना ने जब कश्मीर पर आक्रमण किया तो हरि सिंह को भारत की मदद लेने के लिए मजबूर होना ही था. और मदद भी कश्मीर के भारत राज्य में विलय की शर्त पर ही मिलनी थी. इसे स्वीकार किया जाना चाहिए कि यह एक भौगोलिक और राजनीतिक विलय था. कश्मीरी मुसलमान आधे अधूरे मन से ही भारतीय राष्ट्र के नागरिक बने थे. कबाइली हमले में कश्मीर का एक बड़ा हिस्सा पाकिस्तान के कब्जे में चला गया, तो नेहरू इसकी गुहार लेकर संयुक्त राष्ट्र संघ की चौखट पर चले गए. संयुक्त राष्ट्र संघ ने जो समाधान दिया. वही भारत के गले की फाँस बन गया. उसने कहा कि पाकिस्तान कब्जे वाले इलाके से कबाइलियों को हटाए, और भारत कश्मीर में जनमत संग्रह कराए. लेकिन न तो पाकिस्तान ने कबाइलियों को हटाया और न भारत ने जनमत संग्रह कराया.

1957 में जब कश्मीर की विधानसभा ने भारत में कश्मीर के विलय को वैधानिक स्वीकृति दी, तभी यह तय हो गया था कि कश्मीर बरसों बरस भारत का सिरदर्द बना रहेगा. कश्मीरियों के जनमत संग्रह को टालने के लिए जो शर्तें भारत राष्ट्र ने मानीं, उनसे हमेशा के लिए भारत और कश्मीर के बीच एक परायापन पैदा हो गया. कश्मीर में आपातकाल नहीं लागू हो सकता. कश्मीर का राज्यपाल, वहाँ के मुख्यमंत्री की सलाह पर नियुक्त होगा. कश्मीर की दण्ड संहिता अलग है. संविधान अपना है. विदेशी मामलों, सुरक्षा और मुद्रा चलन को छोड़कर, बाकी हर मामले में कश्मीर स्वायत्त हो गया.

इसी स्वायत्तता को स्वतंत्रता में बदल देने की महत्वाकांक्षा में कश्मीरी मुसलमानों नें कश्मीर के मूल निवासियों को धीरे धीरे वहाँ से खदेड़ना शुरू कर दिया. लाखों कश्मीरी हिन्दू अपनी ज़मीन से विस्थापित होकर दर दर भटकने को मजबूर हुए. हिन्दुओं को विस्थापित करने के लिए कश्मीरी मुसलमानों ने आतंकवाद का सहारा लिया. पाकिस्तान के लिए यह सुनहरा मौका था. पहले पाकिस्तान से फंडिंग शुरू हुई. फिर नब्बे का दशक आते आते पाकिस्तान कश्मीर में आतंकवाद का प्रायोजक बन गया. विदेशी जमीन से चलाए जा रहे आतंकवाद से निपटना भारत सरकार के लिए कठिन जरूर था लेकिन असंभव नहीं. भारतीय फौज की जाँबाजी और शहादत के दम पर भारत ने 21 वीं सदी के आते आते, कश्मीर के आतंकवाद पर काफी हद तक काबू पा लिया. पिछले तीन आम चुनावों में कश्मीरी जनता के उत्साह और भागीदारी को देखकर यह लगने लगा था कि कश्मीरी मुसलमान अपली अलगाववादी मानसिकता को छोड़ रहे हैं. भारत की असली जीत यही होती कि कश्मीरी मुसलमान भारत को अपना देश मानने लगते.

कश्मीर के मुसलमानों और देश के बाकी हिस्से के मुसलमानों की मानसिकता में एक बड़ा फर्क है. देश के दूसरे हिस्सों के कुछ मुसलमानों के भीतर हिन्दुओं के प्रति साम्प्रदायिक द्वेष भले हो, लेकिन देश के तौर पर भारत से उनका कोई नकार नहीं है. उग्र हिन्दुत्व के तमाम प्रयासों के बाद भी वो यह मानने को तैयार नहीं हुए कि उनका कोई और मुल्क हो सकता है. लेकिन कश्मीरी मुसलमानों का एक बड़ा वर्ग, पाकिस्तान में अपना संभावित मुल्क देखता है. उनकी इस आकांक्षा को कश्मीर के राजनेता कभी खुलकर तो कभी छुपकर हवा देते रहे. बुरहान वानी की मौत पर जब फारुक अब्दुल्ला यह कहते हैं कि वह मरने वाला आखिरी नौजवान नहीं है, तो वे कश्मीर में भड़क रही आग और उसकी लपट को बढ़ाने वाली हवा की ओर संकेत कर रहे है.

कश्मीर इन दिनों अलगाववाद के उभार के एक ऩये दौर में है. यह उभार अहमद शाह गिलानी, मीर वाइज़ र यासीन मलिक के दौर से कुछ अलग चरित्र लिए हुए है. कश्मीर में अब असल समस्या आतंकवाद नहीं है. यहाँ आतंकवाद अब एक व्यवसाय बन गया है. अलगाववादी नौजवानों को विदेशी आतंकी संगठनों से पैसा मिलता है. केन्द्र राज्य सरकार मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए अनाप शनाप पैसे कश्मीर में देती हैं. साथ ही कश्मीर में सक्रिय एन.जी.ओ., धार्मिक संगठनों से भी कश्मीरी मुसलमान पैसे ऐंठते हैं.

केन्द्र में मोदी सरकार बनने के बाद कश्मीर में एक नये तरह की हलचल पैदा हुई. कश्मीरी यह जानते थे कि संघ और भाजपा कश्मीर में धारा 370 के पक्ष में नहीं रहे हैं. मोदी सरकार के आते ही उन्हें कश्मीर की स्वायत्तता खतरे में दिखने लगी. कहना न होगा कि कश्मीर में स्वायत्तता की आड़ में ही अलगाववाद पलता रहा है. महबूबा मुफ्ती के साथ भाजपा के गठबंधन ने कश्मीरियों के संदेह को और मजबूत किया. सब जानते हैं कि महबूबा की पार्टी हमेशा अलगाववादी मुसलमानों का समर्थन करती रही है. कश्मीरियों को लगने लगा है कि भाजपा और महबूबा के बीच कोई ऐसा गुपचुप एजेण्डा है जो उनके हितों को कोई अप्रत्याशित क्षति पहुँचा सकता है.

अब तक जितनी सरकारें केन्द्र में रहीं, उनकी प्राथमिक कोशिश रही है कि कश्मीर अंतर्राष्ट्रीय मुद्दा न बने. कोई भी सरकार नेहरू की गलती दोहराना नहीं चाहती थी.इसलिए कश्मीर में पाकिस्तान-प्रायोजित आतंकवाद को बढ़ा चढ़ा कर दिखाया जाता रहा और उसे समस्या के केन्द्र में बताया गया. जबकि असल समस्या कश्मीर का कुशासन, बढ़ती बेरोजगारी, और कश्मीरी हिन्दुओं का विस्थापन था. कश्मीर को अपने साथ रखने के लिए सबसे जरूरी है कि कश्मीरी हिन्दुओं का पुनर्वास कराया जाये, ताकि कश्मीरी मुसलमानों के भीतर से एकाधिकार का भाव खत्म हो. कश्मीर के शासन में हिन्दुओं की भागीदारी सुनिश्चित की जाये. युवाओं को वैध रोजगार मुहैया कराये जाने चाहिए. कश्मीर में अवैध तरीके से आ रहे धन को रोकने के पुख्ता इंतज़ाम भी होने चाहिए. यह सब तभी हो सकता है जब केन्द्र और राज्य सरकार के बीच बेहतर समझ और तालमेल हो.

बुरहान वानी की मौत के बाद उमड़ी कश्मीरियों की भावना से बहुतों को लगा कि यह सेना की ज्यादती के खिलाफ प्रतिक्रिया है. सेना को आततायी की तरह पेश किया गया. लेकिन यह एक भ्रम है. सेना पर हो रहे उग्र हमले, असल में राष्ट्र के विरुद्ध आक्रोश है. सेना तो राष्ट्र का एक टूल है. कश्मीरियों को याद होगा, जब पिछले साल बाढ़ से कश्मीर तबाह हो रहा था तो सेना ने ही उनका जीवन बचाया था. कश्मीरियों नें खुले दिल से सेना का एहसान माना था. ऐसा नहीं हो सकता कि साल भर में सेना उन्हें दुश्मन नज़र आने लगे. कश्मीरियों का यह उग्र व्यवहार, अपनी स्वायत्तता खोने और मुफ्त के पैसों से हाथ धोने के डर से पैदा हुआ है.





Wednesday, 5 April 2017

पहली अप्रैल की अविस्मरणीय जन्मदिन पार्टी

पहली अप्रैल आती है तो मुझे हर साल एक वाकया याद आता है। बात तब की है जब मैं सातवीं या आठवीं में पढ़ता था। उन दिनों हम जैसे मध्यमवर्गीय परिवारों में जन्मदिन मनाने का ऐसा रिवाज़ नहीं था जैसा आज है। बड़े बुजुर्गों का जन्मदिन या तो किसी को पता ही नहीं होता था या फिर याद नहीं रहता था। सो उनका जन्मदिन मनाने का सवाल ही नहीं था। घर के बच्चों में भी जो वयस्क होते थे, सुबह उठकर माता-पिता के पैर छूकर आशीर्वाद ले लिया करते और जन्मदिन का इति-सिद्धम हो जाता था। अलबत्ता छोटे बच्चों के जन्मदिन पर थोड़ी बहुत हलचल जरूर होती थी। अक्सर घरों में यह होता था कि जब सबसे छोटा बच्चा आ जाता था, तो उससे बड़े बच्चों के जन्मदिन समारोह हमेशा के लिए बन्द हो जाते थे। बहुत हुआ तो उन्हें एक जोड़ी नये कपड़े दिला दिए बस। जिस सबसे छोटे वाले का जन्मदिन मनाया जाता वह भी कुछ अधिक ही सादगीपूर्ण होता। बहुत हुआ तो घर में सत्यनारायण की कथा करवा ली और पड़ोस के छोटे बच्चों को बुलाकर खाना खिला दिया। बच्चे पेंसिल, रबर, कटर, टिफिन बॉक्स, प्लास्टिक की गेंद आदि बतौर गिफ्ट दिया करते थे। मज़ा आ जाता था।

यह वाकया उन्हीं दिनों का है। मेरा एक सहपाठी दोस्त अशोक, 1 अप्रैल को लगभग साढ़े ग्यारह बजे सुबह कहें या दोपहर, मेरे घर आया। उसके हाथ में उसकी पिछली कक्षा की मार्कशीट थी। मार्कशीट मुझे दिखाते हुए उसने मुझसे कहा कि आज उसका जन्मदिन है। तुम मेरे घर पार्टी में आना। आज 1 अप्रैल है, इसलिए यह मार्कशीट लेता आया हूँ कि कहीं तुम यह न समझो कि अप्रैल फूल बना रहा हूँ। पार्टी दोपहर में ही है। और फिर थोड़ा सकुचाते हुए अशोक ने कहा—“ सुनो जो गिफ्ट देना हो, उसके बदले पैसे ही दे दो। उससे कुछ खाने का सामान और आ जाएगा।“  मैने अम्मा से मागकर उसे पच्चीस रुपये गिफ्ट के बदले दिए। वह आने का पक्का वादा लेकर चला गया।

बात असल में यह थी कि अशोक के पापा ‘बाप बहादुर’ टाइप के पिता थे। कड़क मिज़ाज़। पेशे से वकील थे। घर में किसी का जन्मदिन मनाने का रिवाज़ नहीं था उनके। उस दिन अशोक और उसकी छोटी बहन मोनू ने मिलकर यह क्रान्तिकारी कदम उठा लिया था कि उनके घर में भी जन्मदिन मनाया जाएगा, लेकिन पिताजी से छुपाकर। माँ को किसी तरह उन्होंने पटा लिया था और थोड़े पैसे भी उनसे लेने में कामयाब हो गए थे। दोनों भाई-बहन ने अपने पास के पैसे मिलाए। पच्चीस रुपए मुझसे भी मिल गए थे एडवांस। पार्टी का टाइम दोपहर का सलिए रखा गया क्योंकि उस वक्त पिताजी कोर्ट में रहते थे। योजना यह थी कि पिताजी के आने के पहले बर्थडे पार्टी खत्म करके उसके सारे नामो-निशान मिटा देने हैं।

वादे के मुताबिक मैं दोपहर में अशोक के घर पहुँच गया। अशोक मुझे घर के पीछे के कमरे में ले गया जहाँ पार्टी होनी थी। अशोक की बहन मोनू ने वहाँ एक टेबल पर अनुपम होटल के समोसे, पेस्ट्री, थोड़ी मिठाई, केले आदि सजा रखे थे। बैठक से टेप रिकॉर्डर भी उठा लाई थी जिसमें गाना चल रहा था। मुझे ताज़्ज़ुब तब हुआ जब पता चला कि पार्टी में मेहमान के तौर पर सिर्फ मैं बस हूं। खैर !  पार्टी की रूपरेखा यह थी कि मोनू टेप रिकॉर्डर पर गाना चलाकर दो-तीन डान्स आइटम पेश करेगी और मैं कुछ गाने सुनाऊँगा। उसके बाद हम लोग नाश्ता करेंगे। अशोक को हैप्पी बर्थडे बोलेंगे और मैं अपने घर चला जाऊँगा। और कभी उसके पापा के सामने इस हादसे का ज़िक्र नहीं करूँगा।

तो हम तीन लोगों के साथ पार्टी शुरू हुई। टेप बजा कर मोनू ने डान्स शुरू किया। अशोक और मैं तालियाँ बजा रहे थे। मोनू के नृत्य का एक-दो छन्द ही हुआ था कि अनहोनी घट गई। न जाने कहाँ से धड़धड़ाते हुए उनके पापा कमरे में घुसे। हम सब सन्न। उन्होंने दहाड़ते हुए पूछा कि यह क्या हो रहा है ? उनके पूछने के साथ ही अशोक और मोनू, फुर्ती के साथ कब अदृश्य हो गए, मुझे पता ही नहीं चला। मुझे काटो तो खून नहीं। उनकी मुद्रा देख कर लगा कि अब ये मुझे ही पीटेंगे। लेकिन पिताजी अशोक और मोनू को पकड़ने लपके। मुझे मौका मिल गया तो मैं भी भाग खड़ा हुआ। अपने घर तक वैसे ही भागता आया जैसे कुत्ते ने खदेड़ रखा हो। इस तरह अशोक का जन्मदिन सम्पन्न हुआ। नाश्ते का क्या हुआ पता नहीं चला। बाद में स्कूल में अशोक ने बताया कि उसकी खूब कुटाई हुई। मोनू को बख्श दिया था बाप बहादुर ने। माताजी भी कोप का भाजन बनीं थीं।