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Thursday, 18 May 2017

धरती के स्वर्ग में कश्मीरी लाल मिर्च !

       सबसे पहले कश्मीर के मौजूदा दृश्य पर एक विहंगम नज़र डाल लेते हैं. इसके बाद कश्मीर के निकटवर्ती अतीत में उतरेंगे. धरती का स्वर्ग माने जाने वाले कश्मीर में आज कश्मीरी लाल मिर्च की तीखी गंध आबो-हवा में तैर रही है. आज़ादी के बाद कश्मीर में अस्थिरता का यह सबसे भीषण दौर है. नब्बे के दशक में, जब कश्मीर में आतंकवाद अपने चरम पर था, तब भी कश्मीर को लेकर शेष भारतीयों के मन में ऐसा संशय नहीं था, जैसा आज है. पाकिस्तान की नज़र तब भी कश्मीर पर थी, आज भी है. आज हम ज्यादा बड़ी और ताकतवर सैन्यशक्ति हैं. लेकिन आज हम आश्वस्त नहीं हैं कि कश्मीर को बचा पाएंगे या नहीं.

इन दिनों जब हम कश्मीर की कल्पना करते हैं तो उसमें डल झील, शफ़्फ़ाफ़ चोटियाँ, सेब के बगीचे और दिल में जादू जगाने वाली स्त्रियाँ नहीं दिखतीं. अब सुरक्षाबलों पर पत्थर फेंकते बच्चे, बूढ़े, जवान और लड़कियाँ दिखती हैं. उजाड़ घाटी और गाँव दिखते हैं. सेना के मारे जा रहे अधिकारी और जवान दिखते हैं. धुँआ दिखता है और धुँआ धुँआ ज़िन्दगी दिखती है. महबूबा मुफ्ती र फारुख अब्दुल्ला की कुटिल मुस्कान दिखती है.

केन्द्र में मोदी की सरकार बनने के बाद बहुसंख्यक कश्मीरी जनता किसी अदृश्य-अमूर्त आशंका से भर गई थी. आगे चलकर जब राज्य में महबूबा की पीडीपी और भाजबा की गठबंधन सरकार बनी तो कश्मीरी जनता, राजनीति और शासन में असमंजस और बढ़ गया. महबूबा हमेशा अलगाववादियों के प्रति सहानुभूति रखती रही हैं. और भाजपा अलगाववादियों का मुह तक नहीं देखना चाहती. भाजपा जब सत्ता में नहीं थी तो उसने अक्सर धारा 370 के औचित्य पर सवाल उठाए. जाहिर है, कश्मीर को लेकर दोनों के एजेण्डे अलग हैं. पिछले ग्यारह महीनों में कश्मीर में उपद्रव बहुत अधिक बढ़ गया. सीमापारसे लगातार हमले हो रहे हैं. आतंकवादी बैंक लूट रहे हैं. जवानों को मार रहे हैं. हमें कहा जा रहा है कि अपनी सेना पर भरोसा रखें. हम रखे हुए हैं भरोसा. प्रधानमंत्री जी कश्मीर पर कुछ नहीं बोलते. रक्षामंत्री हर हमले के बाद इसे दुश्मन की कायराना हरकत करार देते हैं. गृहमंत्री कड़ी निन्दा कर देते हैं. इस बीच वो हुआ जो अब तक नहीं हुआ था. अभी तक  विश्व समुदाय यही कहता रहा है कि कश्मीर, भारत-पाकिस्तान का द्विपक्षीय मसला है. हम इसमें दखल नहीं देंगे. लेकिन कुछ दिन पहले अमेरिका ने चेतावनी दी है कि अगर भारत और पाकिस्तान के बीच संघर्ष बढ़ा तो अमेरिका चुप नहीं बैठेगा. इस चेतावनी के बाद मुझे एकाएक ईराक, अफगानिस्तान और सीरिया के मंज़र नज़र आने लगे. आज़ाद भारत की यह सबसे बड़ी कूटनीतिक पराजय है.

मुझे ताज्जुब हुआ यह देखकर कि कश्मीर पर कुछ कहने लिखने में प्रतिष्ठित सेकुलर विचारक और लेखक संकोच कर रहे हैं. जिन्होंने कुछ लिखा भी तो इस पूर्व घोषणा के साथ कि ‘जुर्रत कर रहा हूँ’. यद्यपि उन्होंने लिखा पर ऐसी कोई जुर्रत नहीं की, जो उन्हें असुविधा में डाल दे. कश्मीर पर लिखने से हमारे सेकुलर साथी आमतौर पर बचते रहे हैं. लेकिन इस बार मीडिया के उन्मादी कवरेज और सोशल मीडिया में अपने प्रशंसकों के दबाव में इन लेखकों को कुछ कहने लिखने को मजबूर होना पड़ा.

कश्मीर पर कुछ बोलने में संकोच क्यों हो जाता है ? क्या इसलिए कि कश्मीर पर कुछ बोलते हुए एक ऐसी इमानदारी की दरकार है जो आपकी वैचारिक छवि पर एक खरोंच लगा सकती है ? कश्मीर पर बात करते हुए पहले आपको कश्मीरी हिन्दुओं और बौद्धों की बात करनी पड़ेगी, उसके बाद मुसलमानों की. कश्मीर पर बात करते हुए आपको पहले कश्मीरी पंडितों की दुखती रग पर हाथ रखना पड़ेगा. कश्मीर पर बात करते हुए आपको कहना होगा कि वहाँ मुसलमान आक्रान्ता हैं. लेकिन इतनी हिम्मत हममें नहीं है. इसीलिए हम कुछ रटे हुए जुमलों के सहारे कश्मीर की झीलों में अपनी नैया खेते रहते हैं. हम पाकिस्तान, आई.एस.आई., और भारतीय सेना को मिलाकर एक ऐसा रसायन तैयार करते हैं जो कश्मीर की रगों में उन्माद पैदा कर देता है.

हमें यह मानने में संकोच क्यों होता है कि कश्मीर पहले हिन्दुओं का है, उसके बाद मुसलमानों का. कश्मीर की स्वायत्तता की माग, कश्मीरी हिन्दुओं का हक है, अलगाववादी मुसतमानों का नहीं. हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि महर्षि कश्यप के नाम पर स्थापित कश्मीर प्राचीनकाल में हिन्दुओं का राज्य था. जब यहाँ सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म का प्रचार किया तो बौद्धों की अच्छी खासी आबादी यहाँ निर्मित हो गई. हिन्दू और बौद्ध, दोनों धरती के इस स्वर्ग पर बिना किसी तकरार के रह रहे थे. मध्यकालीन संस्कृत कवि कल्हड़ ने अपनी कृति ‘राजतरंगिणी’ में कश्मीर राज्य के सौन्दर्य, वैभव और सहअस्तित्व का उदात्त वर्णन किया है. कश्मीर पर अशोक और उज्जैयिनी के शासक विक्रमादित्य द्वितीय का भी शासन रहा. आधुनिक काल में रणजीत सिंह ने कश्मीर पर आक्रमण करके वहाँ सिखों का शासन स्थापित किया लेकिन बाद में कश्मीर के राजा गुलाब सिंह से उनकी सन्धि हो गई और कश्मीर, कश्मीरियों को वापस मिल गया.

इस बीच मुसलमान कश्मीर में आ चुके थे. 12 वीं शताब्दी के अन्त तक फारस से सूफी इस्लाम कश्मीर में आया. सूफी इस्लाम प्रेम और भक्ति का प्रचारक था, इसलिए कश्मीर में वह बड़ी सहजता से स्थापित हो गया. धीरे धीरे कश्मीर में इस्लाम बढ़ता गया और चौदहवीं शताब्दी में कश्मीर पर मुस्लिम शासन शुरू हो गया. इसके बाद कश्मीर में कभी हिन्दू तो कभी मुस्लिम शासन रहा. आप जानते हैं कि भारत की आजादी के समय कश्मीर के राजा हरि सिंह थे और कश्मीर एक स्वायत्त रियासत थी. भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम की एक अहम शर्त के मुताबिक देशी रियासतों को यह फैसला करने की आजादी दी गई कि वो भारत अथवा पाकिस्तान राज्य में अपना विलय कर लें या स्वतंत्र बने रहें. हरि सिंह कश्मीर को स्वतंत्र रखना चाहते थे. यहीं से कश्मीर की कभी न खत्म होने वाली समस्या शुरू होती है.

इतिहास की बात फिलहाल यहीं तक. अब बात वर्तमान की. कश्मीर का वर्तमान शुरू होता है ठीक भारत की आजादी के समय से. कश्मीर का वर्तमान शुरू होता है जवाहर लाल नेहरू की उस ऐतिहासिक भूल से जब उन्होंने कश्मीर के मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र संघ में पहुँचा दिया. यह बात 1947-48 के कबाइली हमलों के बाद की है. कबाइलियों के साथ मिलकर पाकिस्तानी सेना ने जब कश्मीर पर आक्रमण किया तो हरि सिंह को भारत की मदद लेने के लिए मजबूर होना ही था. और मदद भी कश्मीर के भारत राज्य में विलय की शर्त पर ही मिलनी थी. इसे स्वीकार किया जाना चाहिए कि यह एक भौगोलिक और राजनीतिक विलय था. कश्मीरी मुसलमान आधे अधूरे मन से ही भारतीय राष्ट्र के नागरिक बने थे. कबाइली हमले में कश्मीर का एक बड़ा हिस्सा पाकिस्तान के कब्जे में चला गया, तो नेहरू इसकी गुहार लेकर संयुक्त राष्ट्र संघ की चौखट पर चले गए. संयुक्त राष्ट्र संघ ने जो समाधान दिया. वही भारत के गले की फाँस बन गया. उसने कहा कि पाकिस्तान कब्जे वाले इलाके से कबाइलियों को हटाए, और भारत कश्मीर में जनमत संग्रह कराए. लेकिन न तो पाकिस्तान ने कबाइलियों को हटाया और न भारत ने जनमत संग्रह कराया.

1957 में जब कश्मीर की विधानसभा ने भारत में कश्मीर के विलय को वैधानिक स्वीकृति दी, तभी यह तय हो गया था कि कश्मीर बरसों बरस भारत का सिरदर्द बना रहेगा. कश्मीरियों के जनमत संग्रह को टालने के लिए जो शर्तें भारत राष्ट्र ने मानीं, उनसे हमेशा के लिए भारत और कश्मीर के बीच एक परायापन पैदा हो गया. कश्मीर में आपातकाल नहीं लागू हो सकता. कश्मीर का राज्यपाल, वहाँ के मुख्यमंत्री की सलाह पर नियुक्त होगा. कश्मीर की दण्ड संहिता अलग है. संविधान अपना है. विदेशी मामलों, सुरक्षा और मुद्रा चलन को छोड़कर, बाकी हर मामले में कश्मीर स्वायत्त हो गया.

इसी स्वायत्तता को स्वतंत्रता में बदल देने की महत्वाकांक्षा में कश्मीरी मुसलमानों नें कश्मीर के मूल निवासियों को धीरे धीरे वहाँ से खदेड़ना शुरू कर दिया. लाखों कश्मीरी हिन्दू अपनी ज़मीन से विस्थापित होकर दर दर भटकने को मजबूर हुए. हिन्दुओं को विस्थापित करने के लिए कश्मीरी मुसलमानों ने आतंकवाद का सहारा लिया. पाकिस्तान के लिए यह सुनहरा मौका था. पहले पाकिस्तान से फंडिंग शुरू हुई. फिर नब्बे का दशक आते आते पाकिस्तान कश्मीर में आतंकवाद का प्रायोजक बन गया. विदेशी जमीन से चलाए जा रहे आतंकवाद से निपटना भारत सरकार के लिए कठिन जरूर था लेकिन असंभव नहीं. भारतीय फौज की जाँबाजी और शहादत के दम पर भारत ने 21 वीं सदी के आते आते, कश्मीर के आतंकवाद पर काफी हद तक काबू पा लिया. पिछले तीन आम चुनावों में कश्मीरी जनता के उत्साह और भागीदारी को देखकर यह लगने लगा था कि कश्मीरी मुसलमान अपली अलगाववादी मानसिकता को छोड़ रहे हैं. भारत की असली जीत यही होती कि कश्मीरी मुसलमान भारत को अपना देश मानने लगते.

कश्मीर के मुसलमानों और देश के बाकी हिस्से के मुसलमानों की मानसिकता में एक बड़ा फर्क है. देश के दूसरे हिस्सों के कुछ मुसलमानों के भीतर हिन्दुओं के प्रति साम्प्रदायिक द्वेष भले हो, लेकिन देश के तौर पर भारत से उनका कोई नकार नहीं है. उग्र हिन्दुत्व के तमाम प्रयासों के बाद भी वो यह मानने को तैयार नहीं हुए कि उनका कोई और मुल्क हो सकता है. लेकिन कश्मीरी मुसलमानों का एक बड़ा वर्ग, पाकिस्तान में अपना संभावित मुल्क देखता है. उनकी इस आकांक्षा को कश्मीर के राजनेता कभी खुलकर तो कभी छुपकर हवा देते रहे. बुरहान वानी की मौत पर जब फारुक अब्दुल्ला यह कहते हैं कि वह मरने वाला आखिरी नौजवान नहीं है, तो वे कश्मीर में भड़क रही आग और उसकी लपट को बढ़ाने वाली हवा की ओर संकेत कर रहे है.

कश्मीर इन दिनों अलगाववाद के उभार के एक ऩये दौर में है. यह उभार अहमद शाह गिलानी, मीर वाइज़ र यासीन मलिक के दौर से कुछ अलग चरित्र लिए हुए है. कश्मीर में अब असल समस्या आतंकवाद नहीं है. यहाँ आतंकवाद अब एक व्यवसाय बन गया है. अलगाववादी नौजवानों को विदेशी आतंकी संगठनों से पैसा मिलता है. केन्द्र राज्य सरकार मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए अनाप शनाप पैसे कश्मीर में देती हैं. साथ ही कश्मीर में सक्रिय एन.जी.ओ., धार्मिक संगठनों से भी कश्मीरी मुसलमान पैसे ऐंठते हैं.

केन्द्र में मोदी सरकार बनने के बाद कश्मीर में एक नये तरह की हलचल पैदा हुई. कश्मीरी यह जानते थे कि संघ और भाजपा कश्मीर में धारा 370 के पक्ष में नहीं रहे हैं. मोदी सरकार के आते ही उन्हें कश्मीर की स्वायत्तता खतरे में दिखने लगी. कहना न होगा कि कश्मीर में स्वायत्तता की आड़ में ही अलगाववाद पलता रहा है. महबूबा मुफ्ती के साथ भाजपा के गठबंधन ने कश्मीरियों के संदेह को और मजबूत किया. सब जानते हैं कि महबूबा की पार्टी हमेशा अलगाववादी मुसलमानों का समर्थन करती रही है. कश्मीरियों को लगने लगा है कि भाजपा और महबूबा के बीच कोई ऐसा गुपचुप एजेण्डा है जो उनके हितों को कोई अप्रत्याशित क्षति पहुँचा सकता है.

अब तक जितनी सरकारें केन्द्र में रहीं, उनकी प्राथमिक कोशिश रही है कि कश्मीर अंतर्राष्ट्रीय मुद्दा न बने. कोई भी सरकार नेहरू की गलती दोहराना नहीं चाहती थी.इसलिए कश्मीर में पाकिस्तान-प्रायोजित आतंकवाद को बढ़ा चढ़ा कर दिखाया जाता रहा और उसे समस्या के केन्द्र में बताया गया. जबकि असल समस्या कश्मीर का कुशासन, बढ़ती बेरोजगारी, और कश्मीरी हिन्दुओं का विस्थापन था. कश्मीर को अपने साथ रखने के लिए सबसे जरूरी है कि कश्मीरी हिन्दुओं का पुनर्वास कराया जाये, ताकि कश्मीरी मुसलमानों के भीतर से एकाधिकार का भाव खत्म हो. कश्मीर के शासन में हिन्दुओं की भागीदारी सुनिश्चित की जाये. युवाओं को वैध रोजगार मुहैया कराये जाने चाहिए. कश्मीर में अवैध तरीके से आ रहे धन को रोकने के पुख्ता इंतज़ाम भी होने चाहिए. यह सब तभी हो सकता है जब केन्द्र और राज्य सरकार के बीच बेहतर समझ और तालमेल हो.

बुरहान वानी की मौत के बाद उमड़ी कश्मीरियों की भावना से बहुतों को लगा कि यह सेना की ज्यादती के खिलाफ प्रतिक्रिया है. सेना को आततायी की तरह पेश किया गया. लेकिन यह एक भ्रम है. सेना पर हो रहे उग्र हमले, असल में राष्ट्र के विरुद्ध आक्रोश है. सेना तो राष्ट्र का एक टूल है. कश्मीरियों को याद होगा, जब पिछले साल बाढ़ से कश्मीर तबाह हो रहा था तो सेना ने ही उनका जीवन बचाया था. कश्मीरियों नें खुले दिल से सेना का एहसान माना था. ऐसा नहीं हो सकता कि साल भर में सेना उन्हें दुश्मन नज़र आने लगे. कश्मीरियों का यह उग्र व्यवहार, अपनी स्वायत्तता खोने और मुफ्त के पैसों से हाथ धोने के डर से पैदा हुआ है.





Wednesday, 5 April 2017

पहली अप्रैल की अविस्मरणीय जन्मदिन पार्टी

पहली अप्रैल आती है तो मुझे हर साल एक वाकया याद आता है। बात तब की है जब मैं सातवीं या आठवीं में पढ़ता था। उन दिनों हम जैसे मध्यमवर्गीय परिवारों में जन्मदिन मनाने का ऐसा रिवाज़ नहीं था जैसा आज है। बड़े बुजुर्गों का जन्मदिन या तो किसी को पता ही नहीं होता था या फिर याद नहीं रहता था। सो उनका जन्मदिन मनाने का सवाल ही नहीं था। घर के बच्चों में भी जो वयस्क होते थे, सुबह उठकर माता-पिता के पैर छूकर आशीर्वाद ले लिया करते और जन्मदिन का इति-सिद्धम हो जाता था। अलबत्ता छोटे बच्चों के जन्मदिन पर थोड़ी बहुत हलचल जरूर होती थी। अक्सर घरों में यह होता था कि जब सबसे छोटा बच्चा आ जाता था, तो उससे बड़े बच्चों के जन्मदिन समारोह हमेशा के लिए बन्द हो जाते थे। बहुत हुआ तो उन्हें एक जोड़ी नये कपड़े दिला दिए बस। जिस सबसे छोटे वाले का जन्मदिन मनाया जाता वह भी कुछ अधिक ही सादगीपूर्ण होता। बहुत हुआ तो घर में सत्यनारायण की कथा करवा ली और पड़ोस के छोटे बच्चों को बुलाकर खाना खिला दिया। बच्चे पेंसिल, रबर, कटर, टिफिन बॉक्स, प्लास्टिक की गेंद आदि बतौर गिफ्ट दिया करते थे। मज़ा आ जाता था।

यह वाकया उन्हीं दिनों का है। मेरा एक सहपाठी दोस्त अशोक, 1 अप्रैल को लगभग साढ़े ग्यारह बजे सुबह कहें या दोपहर, मेरे घर आया। उसके हाथ में उसकी पिछली कक्षा की मार्कशीट थी। मार्कशीट मुझे दिखाते हुए उसने मुझसे कहा कि आज उसका जन्मदिन है। तुम मेरे घर पार्टी में आना। आज 1 अप्रैल है, इसलिए यह मार्कशीट लेता आया हूँ कि कहीं तुम यह न समझो कि अप्रैल फूल बना रहा हूँ। पार्टी दोपहर में ही है। और फिर थोड़ा सकुचाते हुए अशोक ने कहा—“ सुनो जो गिफ्ट देना हो, उसके बदले पैसे ही दे दो। उससे कुछ खाने का सामान और आ जाएगा।“  मैने अम्मा से मागकर उसे पच्चीस रुपये गिफ्ट के बदले दिए। वह आने का पक्का वादा लेकर चला गया।

बात असल में यह थी कि अशोक के पापा ‘बाप बहादुर’ टाइप के पिता थे। कड़क मिज़ाज़। पेशे से वकील थे। घर में किसी का जन्मदिन मनाने का रिवाज़ नहीं था उनके। उस दिन अशोक और उसकी छोटी बहन मोनू ने मिलकर यह क्रान्तिकारी कदम उठा लिया था कि उनके घर में भी जन्मदिन मनाया जाएगा, लेकिन पिताजी से छुपाकर। माँ को किसी तरह उन्होंने पटा लिया था और थोड़े पैसे भी उनसे लेने में कामयाब हो गए थे। दोनों भाई-बहन ने अपने पास के पैसे मिलाए। पच्चीस रुपए मुझसे भी मिल गए थे एडवांस। पार्टी का टाइम दोपहर का सलिए रखा गया क्योंकि उस वक्त पिताजी कोर्ट में रहते थे। योजना यह थी कि पिताजी के आने के पहले बर्थडे पार्टी खत्म करके उसके सारे नामो-निशान मिटा देने हैं।

वादे के मुताबिक मैं दोपहर में अशोक के घर पहुँच गया। अशोक मुझे घर के पीछे के कमरे में ले गया जहाँ पार्टी होनी थी। अशोक की बहन मोनू ने वहाँ एक टेबल पर अनुपम होटल के समोसे, पेस्ट्री, थोड़ी मिठाई, केले आदि सजा रखे थे। बैठक से टेप रिकॉर्डर भी उठा लाई थी जिसमें गाना चल रहा था। मुझे ताज़्ज़ुब तब हुआ जब पता चला कि पार्टी में मेहमान के तौर पर सिर्फ मैं बस हूं। खैर !  पार्टी की रूपरेखा यह थी कि मोनू टेप रिकॉर्डर पर गाना चलाकर दो-तीन डान्स आइटम पेश करेगी और मैं कुछ गाने सुनाऊँगा। उसके बाद हम लोग नाश्ता करेंगे। अशोक को हैप्पी बर्थडे बोलेंगे और मैं अपने घर चला जाऊँगा। और कभी उसके पापा के सामने इस हादसे का ज़िक्र नहीं करूँगा।

तो हम तीन लोगों के साथ पार्टी शुरू हुई। टेप बजा कर मोनू ने डान्स शुरू किया। अशोक और मैं तालियाँ बजा रहे थे। मोनू के नृत्य का एक-दो छन्द ही हुआ था कि अनहोनी घट गई। न जाने कहाँ से धड़धड़ाते हुए उनके पापा कमरे में घुसे। हम सब सन्न। उन्होंने दहाड़ते हुए पूछा कि यह क्या हो रहा है ? उनके पूछने के साथ ही अशोक और मोनू, फुर्ती के साथ कब अदृश्य हो गए, मुझे पता ही नहीं चला। मुझे काटो तो खून नहीं। उनकी मुद्रा देख कर लगा कि अब ये मुझे ही पीटेंगे। लेकिन पिताजी अशोक और मोनू को पकड़ने लपके। मुझे मौका मिल गया तो मैं भी भाग खड़ा हुआ। अपने घर तक वैसे ही भागता आया जैसे कुत्ते ने खदेड़ रखा हो। इस तरह अशोक का जन्मदिन सम्पन्न हुआ। नाश्ते का क्या हुआ पता नहीं चला। बाद में स्कूल में अशोक ने बताया कि उसकी खूब कुटाई हुई। मोनू को बख्श दिया था बाप बहादुर ने। माताजी भी कोप का भाजन बनीं थीं।

Friday, 24 March 2017

हिन्दी सिनेमा में होली के रंग

होली और ईद, भारत के दो ऐसे धार्मिक पर्व हैं, जिनमें धार्मिक आग्रह बहुत कम, और उल्लास एवं कुंठाओं के निरसन का भाव ज्यादा होता है। होली के साथ प्रहलाद-होलिका की कथा को अगर हम धर्म-तत्व से जोड़ कर देखें तो भी होली की पहचान इस कथा से नहीं बल्कि उसके रंगों से है। होली अनादि काल से मनुष्य की श्वेत-श्याम ज़िन्दगी में रंग भरती रही है। द्वापर के किशन कन्हैया से लेकर आज के माडर्न गोप-गोपियों तक होली रंग बिखेरती चली आई है। होली के रंगों में छुपा मनोविज्ञान, कला-माध्यमों के लिए एक अनुकूल पृष्ठभूमि देता है। इस देश का कोई भी कला-माध्यम होली के रंग और रंगीनियों से अछूता नहीं रह सका है।

सौ साल से अधिक के अपने इतिहास में हिन्दी सिनेमा ने साल-दर-साल होली के पर्व को अपनी जरूरत के हिसाब से उपयोग किया है। वर्जनाओं का अतिक्रमण होली का मूल स्वभाव है। होली के रंगों की ओट में हम अपनी लालसाओं का विरेचन करते हैं। हमारे भारतीय सिनेमा में प्रेम एक स्थायी तत्व है। मूल कहानी चाहे जो भी हो, प्रेम की एक अंतर्धारा उसमें बहती रहती है। भारतीय सिनेमा ने शुरुआत से ही यह स्वभाव अर्जित कर लिया, जो अब तक चलता आ रहा है। असल में जीवन का यही रूप है। तमाम अभावों, संघर्षों, बीमारियों की चट्टानों के नीचे, हम सबके जीवन में प्रेम की एक हरी दूब दबी रहती है। ये चट्टाने जब कभी इधर उधर खिसक जाती हैं तो यह दूब तन जाती है।


 भारतीय सिनेमा और होली का, चोली-दामन का साथ रहा है। हिन्दी फिल्मों ने होली के सीक्वेन्स को बार बार दिखाया है। होली का पर्व सिनेमा में हमेशा गीतों और नृत्य के जरिए आता रहा है। फिल्मों में होली का आगमन 1944 में दिलीप कुमार की पहली फिल्म ज्वार भाटा में हुआ। निर्देशक अमिय चक्रवर्ती ने फिल्म में होली का सीक्वेंस फिल्माकर एक इतिहास की नीव रखी। यह श्वेत-श्याम फिल्मों का ज़माना था। यह भी एक संयोग है कि रंगीन फिल्मों में जब होली को उसका असली रंग मिला तब भी दिलीप कुमार ही थे। पहली टेक्नीकलर फिल्म आन में दिलीप कुमार और निम्मी होली खेलते नज़र आए। फिर तो यह सिलसिला चल निकला। 1958 में आई मशहूर फिल्म मदर इंडिया में शमशाद बेगम का गाया गीत होली आई रे कन्हाई... आज भी बेहद लोकप्रिय है और होली के दिन गाया-बजाया जाता है। उसके अगले ही साल वी. शान्ताराम की फिल्म नवरंग में भी होली का एक गीत था। जा रे हट नटखट...., महिपाल और संध्या पर फिल्माया गया। इस फिल्म में महिपाल, दिवाकर नाम के कवि की भूमिका में हैं। आपको याद होगा कि इस फिल्म में काव्य के नौ रसों की अलग-अलग स्थितियों के माध्यम से अभिव्यक्ति की गई है।


सत्तर के दशक में भी कुछ अच्छे होली दृश्य हिन्दी फिल्मों में देखने को मिले। खासतौर पर 1970 में आई राजेश खन्ना की फिल्म कटी पतंग का गीत आज न छोड़ेंगे हम हमजोली... अविस्मरणीय गीत बन गया। राजेश खन्ना उस समय सुपर स्टार थे। इस फिल्म में वो कमल की भूमिका में थे और आशा पारेख विधवा माधवी के किरदार में। इस फिल्म में यह गीत निर्देशक ने उस सामाजिक वर्जना को तोड़ने के लिए रखा, जिसमें एक विधवा स्त्री को जबरन जीवन के सभी रंगों से बेदखल कर दिया जाता है। माधवी के संकोच और सामाजिक प्रतिबंध को कमल सार्वजनिक रूप से तोड़ देता है और विधवा माधवी को रंगों से सराबोर कर देता है। इसके पहले सत्तर के दशक में कुछ और फिल्मों में सुन्दर होली गीत फिल्माए गए। कोहिनूर का गीत तन रंग लो जी आज मन रंग लो... बहुत लोकप्रिय हुआ। गोदान में भी एक होली गीत फिल्माया गया।

ध्यान देने की बात यह है कि हमारी फिल्मों में होली के सीक्वेंस सिर्फ त्यौहार को दिखाने के लिए नहीं रखे गए। बल्कि इनका उपयोग एक प्रविधि के रूप में किया गया है। अक्सर फिल्म की कहानी को किसी जटिल स्थिति से निकालने अथवा किसी जटिल मनोदशा या परिस्थिति को बोधगम्य दृश्य में परिणित करने के लिए होली के दृश्यों का इस्तेमाल किया जाता रहा है। इस बात को समझने के लिए 1981 में आई फिल्म सिलसिला के गीत रंग बरसे भीगे चुनर वाली... को याद कीजिए। होली का राष्ट्रगान का दर्ज़ा पा चुका यह गीत, लोकप्रियता में दूसरे सभी गीतों से बहुत आगे है। अमिताभ बच्चन का गाया, और अमिताभ-रेखा पर फिल्माया यह गीत, कहानी की एक बहुत जटिल परिस्थिति को व्यक्त करने के लिए रखा गया। वरना इतनी गंभीर फिल्म में होली गीत की गुंजाइश कहाँ बनती थी। अमिताभ, रेखा के लिए अपने पुराने प्रेम को दबाए-दबाए घुट रहे थे। होली ने उन्हें इस घुटन से बाहर आने का मौका दिया। वो रेखा के लिए अपने प्रेम को होली के रंग में बिखरा रहे हैं और संजीव कुमार और जया इस अनकही कहानी का एक एक अक्षर बाँचे जा रहे हैं। ये चारों पात्र प्रेम, दाम्पत्य और अविश्वास की जिस भूल-भुलैया में फँसे थे, यह होली सीक्वेंस उनके सामने इस  भूल-भुलैया से निकलने का रास्ता खोल रहा था। यह गीत तब से अब तक होली उत्सव की जान है।

इस गीत के पीछे जो मनोविज्ञान है, कमोबेश यही मनोविज्ञान कुछ रूप बदलकर हम सबका भी होली में होता है। हम अपने भीतर के दमित प्रेम और कामेच्छा को थोड़े अनायास से लगने वाले सचेत स्पर्श, कुछ बतरस के अवसरों और कुछ नशे की सामग्रियों के मेल से तुष्ट कर कुछ राहत पाने की कोशिश करते हैं। इसका एक बढ़िया दृष्टांत यश चोपडा की फिल्म डर के होली दृश्य में देख सकते हैं। यश चोपड़ा ने प्रेम के जितने रंगों को फिल्मों के जरिए परदे पर उतारा है, उतना किसी और भारतीय फिल्मकार नें नहीं। इस फिल्म में शाहरुख खान खलनायक की भूमिका में हैं। वे नायिका के जुनूनी प्रेमी हैं और किसी भी कीमत पर उसे पाना चाहते हैं। प्रेम और भय के बेहद सघन तनावों के बीच, यह होली सीक्वेंस शाहरुख को, जूही चावला को स्पर्श करने का अवसर देता है, तो दूसरी तरफ, निर्देशक को अपनी कहानी को अंजाम तक पहुचाने का स्पेस भी देता है। निर्देशक कहानी को आगे बढ़ाने के लिए अक्सर होली दृश्य का इस्तेमाल करते रहे हैं। आखिर क्यों का गीत सात रंग में खेल रही है दिलवालों की टोली रे.. और कामचोर के गीत मल दे गुलाल मोहे...के जरिए कहानी को आगे बढ़ाया गया है। कभी-कभी निर्देशक कहानी में टर्निंग प्वाइंट दिखाने के लिए भी होली सीक्वेंस का प्रयोग करते हैं। जैसे राजकुमार संतोषी ने फिल्म दामिनी में किया।

अस्सी और नब्बे के दशक के गीत फिल्मी होली के प्रतिनिधि गीत बन गए। रंग बरसे.... के अलावा जिस गीत ने होली गीतों के बीच अपनी खास जगह बनाई, वह है फिल्म शोले का गीत। 1975 में आई इस कालजयी लोकप्रिय फिल्म में धर्मेन्द्र और हेमा मालिनी के ऊपर होली के दिन दिल खिल जाते हैं... गीत फिल्माया गया। यह गीत भी फिल्म में एक युक्ति की तरह डाला गया। लगातार भय और आतंक के बीच चली जा रही फिल्म में कुछ तनावमुक्ति के पल खोजने थे। साथ ही दर्शकों के लिए एक चौंकाने वाला तत्व भी डालना था। आपको याद होगा, होली के उल्लास में झूमते बेखबर गाँव वालों और सिनेमा हाल के दर्शकों के बीच अचानक डाकुओं का हमला हो जाता है और सबकी सांसें अटकी रह जाती हैं। अस्सी के दशक की धर्मेन्द्र-हेमा की यह जोड़ी, नब्बे के दशक के एक और होली गीत में नज़र आयी। 1982 में बनी फिल्म राजपूत में भागी रे भागी बृज की बाला... गीत में धर्मेन्द्र-हेमा फिर होली के रंग में दिखे। इसी तरह अमिताभ ने सिलसिला के गीत की लोकप्रियता को 2003 में फिल्म बागबां के गीत होली खेलैं रघुबीरा.... में दोहराया।


होली गीतों का यह सिलसिला अब कुछ ठहरा हुआ सा है। यद्यपि 2005 में बनी अक्षय कुमार-प्रियंका चोपड़ा की फिल्म वक्त-द रेस अगेन्स्ट टाइम में डू मी ए फेवर लेट्स प्ले होली...गीत और 2013 की फिल्म ये जवानी है दीवानी का गीत बलम पिचकारी जो तूने मुझे मारी... खूब लोकप्रिय हुए, लेकिन इन्हें विशुद्ध होली गीत नहीं कहा जा सकता। एक और बात आश्चर्य में डालती है कि होली का त्यौहार फिल्मों में गीतों तक  ही सीमित रह गया, कभी कहानी का हिस्सा नहीं बन सका। जबकि रक्षाबंधन, दीवाली, ईद आदि त्यौहारों पर फिल्में बनी हैं। हाँ, अब तक होली नाम से दो फिल्में, होली आई रे नाम से एक फिल्म, और फागुन नाम से दो फिल्में जरूर बनी हैं। 1967 में भक्त प्रहलाद नाम से एक हिन्दी फिल्म बनी थी। सिने जगत और होली का रिश्ता सिर्फ फिल्मों तक ही महदूद नहीं रहा है। आर. के. स्टूडियो की स्थापना के समय से ही राजकपूर स्टूडियो में होली खेलने का आयोजन करते थे। यह परंपरा आज भी जारी है। इसी तरह मेगास्टार अमिताभ बच्चन भी अपने बंगले पर होली का आयोजन करते थे। कुल मिलाकर सिनेमा और होली की संगत ने होली के रंगों थोडा और रंगीन और अमिट ही बनाया है।