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Friday, 24 March 2017

हिन्दी सिनेमा में होली के रंग

होली और ईद, भारत के दो ऐसे धार्मिक पर्व हैं, जिनमें धार्मिक आग्रह बहुत कम, और उल्लास एवं कुंठाओं के निरसन का भाव ज्यादा होता है। होली के साथ प्रहलाद-होलिका की कथा को अगर हम धर्म-तत्व से जोड़ कर देखें तो भी होली की पहचान इस कथा से नहीं बल्कि उसके रंगों से है। होली अनादि काल से मनुष्य की श्वेत-श्याम ज़िन्दगी में रंग भरती रही है। द्वापर के किशन कन्हैया से लेकर आज के माडर्न गोप-गोपियों तक होली रंग बिखेरती चली आई है। होली के रंगों में छुपा मनोविज्ञान, कला-माध्यमों के लिए एक अनुकूल पृष्ठभूमि देता है। इस देश का कोई भी कला-माध्यम होली के रंग और रंगीनियों से अछूता नहीं रह सका है।

सौ साल से अधिक के अपने इतिहास में हिन्दी सिनेमा ने साल-दर-साल होली के पर्व को अपनी जरूरत के हिसाब से उपयोग किया है। वर्जनाओं का अतिक्रमण होली का मूल स्वभाव है। होली के रंगों की ओट में हम अपनी लालसाओं का विरेचन करते हैं। हमारे भारतीय सिनेमा में प्रेम एक स्थायी तत्व है। मूल कहानी चाहे जो भी हो, प्रेम की एक अंतर्धारा उसमें बहती रहती है। भारतीय सिनेमा ने शुरुआत से ही यह स्वभाव अर्जित कर लिया, जो अब तक चलता आ रहा है। असल में जीवन का यही रूप है। तमाम अभावों, संघर्षों, बीमारियों की चट्टानों के नीचे, हम सबके जीवन में प्रेम की एक हरी दूब दबी रहती है। ये चट्टाने जब कभी इधर उधर खिसक जाती हैं तो यह दूब तन जाती है।


 भारतीय सिनेमा और होली का, चोली-दामन का साथ रहा है। हिन्दी फिल्मों ने होली के सीक्वेन्स को बार बार दिखाया है। होली का पर्व सिनेमा में हमेशा गीतों और नृत्य के जरिए आता रहा है। फिल्मों में होली का आगमन 1944 में दिलीप कुमार की पहली फिल्म ज्वार भाटा में हुआ। निर्देशक अमिय चक्रवर्ती ने फिल्म में होली का सीक्वेंस फिल्माकर एक इतिहास की नीव रखी। यह श्वेत-श्याम फिल्मों का ज़माना था। यह भी एक संयोग है कि रंगीन फिल्मों में जब होली को उसका असली रंग मिला तब भी दिलीप कुमार ही थे। पहली टेक्नीकलर फिल्म आन में दिलीप कुमार और निम्मी होली खेलते नज़र आए। फिर तो यह सिलसिला चल निकला। 1958 में आई मशहूर फिल्म मदर इंडिया में शमशाद बेगम का गाया गीत होली आई रे कन्हाई... आज भी बेहद लोकप्रिय है और होली के दिन गाया-बजाया जाता है। उसके अगले ही साल वी. शान्ताराम की फिल्म नवरंग में भी होली का एक गीत था। जा रे हट नटखट...., महिपाल और संध्या पर फिल्माया गया। इस फिल्म में महिपाल, दिवाकर नाम के कवि की भूमिका में हैं। आपको याद होगा कि इस फिल्म में काव्य के नौ रसों की अलग-अलग स्थितियों के माध्यम से अभिव्यक्ति की गई है।


सत्तर के दशक में भी कुछ अच्छे होली दृश्य हिन्दी फिल्मों में देखने को मिले। खासतौर पर 1970 में आई राजेश खन्ना की फिल्म कटी पतंग का गीत आज न छोड़ेंगे हम हमजोली... अविस्मरणीय गीत बन गया। राजेश खन्ना उस समय सुपर स्टार थे। इस फिल्म में वो कमल की भूमिका में थे और आशा पारेख विधवा माधवी के किरदार में। इस फिल्म में यह गीत निर्देशक ने उस सामाजिक वर्जना को तोड़ने के लिए रखा, जिसमें एक विधवा स्त्री को जबरन जीवन के सभी रंगों से बेदखल कर दिया जाता है। माधवी के संकोच और सामाजिक प्रतिबंध को कमल सार्वजनिक रूप से तोड़ देता है और विधवा माधवी को रंगों से सराबोर कर देता है। इसके पहले सत्तर के दशक में कुछ और फिल्मों में सुन्दर होली गीत फिल्माए गए। कोहिनूर का गीत तन रंग लो जी आज मन रंग लो... बहुत लोकप्रिय हुआ। गोदान में भी एक होली गीत फिल्माया गया।

ध्यान देने की बात यह है कि हमारी फिल्मों में होली के सीक्वेंस सिर्फ त्यौहार को दिखाने के लिए नहीं रखे गए। बल्कि इनका उपयोग एक प्रविधि के रूप में किया गया है। अक्सर फिल्म की कहानी को किसी जटिल स्थिति से निकालने अथवा किसी जटिल मनोदशा या परिस्थिति को बोधगम्य दृश्य में परिणित करने के लिए होली के दृश्यों का इस्तेमाल किया जाता रहा है। इस बात को समझने के लिए 1981 में आई फिल्म सिलसिला के गीत रंग बरसे भीगे चुनर वाली... को याद कीजिए। होली का राष्ट्रगान का दर्ज़ा पा चुका यह गीत, लोकप्रियता में दूसरे सभी गीतों से बहुत आगे है। अमिताभ बच्चन का गाया, और अमिताभ-रेखा पर फिल्माया यह गीत, कहानी की एक बहुत जटिल परिस्थिति को व्यक्त करने के लिए रखा गया। वरना इतनी गंभीर फिल्म में होली गीत की गुंजाइश कहाँ बनती थी। अमिताभ, रेखा के लिए अपने पुराने प्रेम को दबाए-दबाए घुट रहे थे। होली ने उन्हें इस घुटन से बाहर आने का मौका दिया। वो रेखा के लिए अपने प्रेम को होली के रंग में बिखरा रहे हैं और संजीव कुमार और जया इस अनकही कहानी का एक एक अक्षर बाँचे जा रहे हैं। ये चारों पात्र प्रेम, दाम्पत्य और अविश्वास की जिस भूल-भुलैया में फँसे थे, यह होली सीक्वेंस उनके सामने इस  भूल-भुलैया से निकलने का रास्ता खोल रहा था। यह गीत तब से अब तक होली उत्सव की जान है।

इस गीत के पीछे जो मनोविज्ञान है, कमोबेश यही मनोविज्ञान कुछ रूप बदलकर हम सबका भी होली में होता है। हम अपने भीतर के दमित प्रेम और कामेच्छा को थोड़े अनायास से लगने वाले सचेत स्पर्श, कुछ बतरस के अवसरों और कुछ नशे की सामग्रियों के मेल से तुष्ट कर कुछ राहत पाने की कोशिश करते हैं। इसका एक बढ़िया दृष्टांत यश चोपडा की फिल्म डर के होली दृश्य में देख सकते हैं। यश चोपड़ा ने प्रेम के जितने रंगों को फिल्मों के जरिए परदे पर उतारा है, उतना किसी और भारतीय फिल्मकार नें नहीं। इस फिल्म में शाहरुख खान खलनायक की भूमिका में हैं। वे नायिका के जुनूनी प्रेमी हैं और किसी भी कीमत पर उसे पाना चाहते हैं। प्रेम और भय के बेहद सघन तनावों के बीच, यह होली सीक्वेंस शाहरुख को, जूही चावला को स्पर्श करने का अवसर देता है, तो दूसरी तरफ, निर्देशक को अपनी कहानी को अंजाम तक पहुचाने का स्पेस भी देता है। निर्देशक कहानी को आगे बढ़ाने के लिए अक्सर होली दृश्य का इस्तेमाल करते रहे हैं। आखिर क्यों का गीत सात रंग में खेल रही है दिलवालों की टोली रे.. और कामचोर के गीत मल दे गुलाल मोहे...के जरिए कहानी को आगे बढ़ाया गया है। कभी-कभी निर्देशक कहानी में टर्निंग प्वाइंट दिखाने के लिए भी होली सीक्वेंस का प्रयोग करते हैं। जैसे राजकुमार संतोषी ने फिल्म दामिनी में किया।

अस्सी और नब्बे के दशक के गीत फिल्मी होली के प्रतिनिधि गीत बन गए। रंग बरसे.... के अलावा जिस गीत ने होली गीतों के बीच अपनी खास जगह बनाई, वह है फिल्म शोले का गीत। 1975 में आई इस कालजयी लोकप्रिय फिल्म में धर्मेन्द्र और हेमा मालिनी के ऊपर होली के दिन दिल खिल जाते हैं... गीत फिल्माया गया। यह गीत भी फिल्म में एक युक्ति की तरह डाला गया। लगातार भय और आतंक के बीच चली जा रही फिल्म में कुछ तनावमुक्ति के पल खोजने थे। साथ ही दर्शकों के लिए एक चौंकाने वाला तत्व भी डालना था। आपको याद होगा, होली के उल्लास में झूमते बेखबर गाँव वालों और सिनेमा हाल के दर्शकों के बीच अचानक डाकुओं का हमला हो जाता है और सबकी सांसें अटकी रह जाती हैं। अस्सी के दशक की धर्मेन्द्र-हेमा की यह जोड़ी, नब्बे के दशक के एक और होली गीत में नज़र आयी। 1982 में बनी फिल्म राजपूत में भागी रे भागी बृज की बाला... गीत में धर्मेन्द्र-हेमा फिर होली के रंग में दिखे। इसी तरह अमिताभ ने सिलसिला के गीत की लोकप्रियता को 2003 में फिल्म बागबां के गीत होली खेलैं रघुबीरा.... में दोहराया।


होली गीतों का यह सिलसिला अब कुछ ठहरा हुआ सा है। यद्यपि 2005 में बनी अक्षय कुमार-प्रियंका चोपड़ा की फिल्म वक्त-द रेस अगेन्स्ट टाइम में डू मी ए फेवर लेट्स प्ले होली...गीत और 2013 की फिल्म ये जवानी है दीवानी का गीत बलम पिचकारी जो तूने मुझे मारी... खूब लोकप्रिय हुए, लेकिन इन्हें विशुद्ध होली गीत नहीं कहा जा सकता। एक और बात आश्चर्य में डालती है कि होली का त्यौहार फिल्मों में गीतों तक  ही सीमित रह गया, कभी कहानी का हिस्सा नहीं बन सका। जबकि रक्षाबंधन, दीवाली, ईद आदि त्यौहारों पर फिल्में बनी हैं। हाँ, अब तक होली नाम से दो फिल्में, होली आई रे नाम से एक फिल्म, और फागुन नाम से दो फिल्में जरूर बनी हैं। 1967 में भक्त प्रहलाद नाम से एक हिन्दी फिल्म बनी थी। सिने जगत और होली का रिश्ता सिर्फ फिल्मों तक ही महदूद नहीं रहा है। आर. के. स्टूडियो की स्थापना के समय से ही राजकपूर स्टूडियो में होली खेलने का आयोजन करते थे। यह परंपरा आज भी जारी है। इसी तरह मेगास्टार अमिताभ बच्चन भी अपने बंगले पर होली का आयोजन करते थे। कुल मिलाकर सिनेमा और होली की संगत ने होली के रंगों थोडा और रंगीन और अमिट ही बनाया है।
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