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Thursday, 9 June 2011

राजनीति का अनुलोम-विलोम



कुछ दिनों से देश की राजनीति बेहद सक्रिय अवस्था में है. जैसे कोई सुप्त ज्वालामुखी फिर से सक्रिय हो गया हो.पहलवानों ने अपने मुगदर,डंडे निकाल लिए हैं.जो इधर-उधर कहीं थे,उन्होंने अपने दीगर काम फिलहाल मउल्तवी कर दिए हैं.पूरी एकाग्रता के साथ सब अखाड़े में आकर जम गये हैं.

यूँ तो हमारे देश में नेताओं के पास ज़्यादा काम होता नहीं, क्योंकि जो असल चुनौतियाँ हैं उनसे कोई मुठभेड़ नहीं करना चाहता.इसलिए ज़्यादातर समय नेतागण खाली बैठे रहते हैं.अपने इसी खालीपन को भरने के लिए ये लोग अपने जन्मदिन इत्यादि के बहाने कभी-कभी सुर्खियों में आने की कोशिश करते रहते हैं.चूँकि हमारे देश में, किसी और देश की तुलना में महापुरुष ज़्यादा पैदा होते हैं,अतः किसी न किसी का जन्मदिन या पुण्यतिथि पड़ती ही रहती है.यही वह सुअवसर होते हैं जब हमारे राजनीतिज्ञों को अपनी प्रतिभा दिखाने का मौका मिलता है.

लेकिन पिछले कुछ समय से एक के बाद एक ऐसी घटनाएँ होती गयीं कि सारे राजयोगी जीवित हो उठे.पक्ष हो या विपक्ष, सबके पास काम आ गया.पहले 2जी घोटाले पर सुप्रीम कोर्ट ने सरकार की मुश्कें कसीं, फिर पांच राज्यों में विधानसभा के चुनाव हुए,34 साल पुरानी वाम दलों की सरकार ढहाकर ममता दी नें अपनी सरकार बनाई,अन्ना हजारे अचानक भ्रष्टाचार के खिलाफ धरने पर बैठ गये तो पक्ष-विपक्ष दोनो हड़बड़ा गए.और फिर कुछ दिनों से काले धन के मसले पर सरकार को खुजली करने वाले योग गुरु बाबा रामदेव का धरनाहुआ,लाठीचार्ज,जूतमपैजार,चीरहरण इत्यादि,भारतीय राजनीति की सभी लीलाएँ देखने को मिलीं.इन सब अवसरों में ये स्पष्ट हुआ कि हमारी राजनीति दोमुही नहीं कई मुह वाली है.ऐसे एसे पैंतरे देखने को मिल रहे हैं कि जनता अपना दुख-दर्द भूलकर इन करतबबाज़ों की तमाशबीन बन गई है.उसे कुछ वैसा ही रस मिल रहा है जैसे सांप और नेवले का खेल देखते हुए मिलता है. यही हमारे नेताओं की खूबी भी है कि जब भी जनता कराहती है ये उसे कोई न कोई तमाशा दिखाने लगते है.

बात शुरू करते हैं बाबा रामदेव के आन्दोलन(?) से. पिछले चार-पांच सालों में देश में योग-क्रान्ति कर चुके बाबा रामदेव को न जाने किस महत्वाकांक्षा ने इतना प्रेरित किया कि उन्होंने भ्रष्टाचार मिटाने का बीड़ा उठा लिया.फिर जो कुछ हुआ और हो रहा है,वह सब तो आप भी देख रहे हैं.इस पूरे घटनाक्रम में जो राजनीतिक पैंतरेबाज़ी है वह बड़ी दिलचस्प है.

सोनिया गांधी को चारों ओर से गालियाँ दी गईं.लोगों ने मज़े ले-लेकर कहा कि सोनिया की सरकार ने बड़ी मूर्खता कर दी बाबा को पिटवाकर,अब सरकार का बचना मुश्किल है.पर आप गौर से देखेंगे तो आपको लगेगा कि सोनिया गांधी वर्तमान भारतीय राजनीति की चाणक्य हैं. कुछ समय से काले धन और भ्रष्टाचार के मसले पर सुप्रीम कोर्ट से लेकर अन्ना, बाबा और देश की जनता ने यूपीए सरकार का जीना हराम कर रखा था.सरकार के पास इनके सवालों के कोई ज़वाब नहीं थे.सरकार इसलिए भी ज़्यादा परेशान थी कि ये सवाल विपक्षी दलों की ओर से नहीं बल्कि आम युवा और न्यायपालिका की ओर से आ रहे थे.विपक्ष से निपटना तो उनको आता है क्योंकि उसकी सीमाएँ वो जानते हैं.

सत्ताधारी यूपीए सरकार बहुत समय से इस प्रयास में थी कि किसी तरह से भ्रष्टाचार की जनता की लड़ाई, सत्तापक्ष और विपक्ष की लड़ाई में तब्दील हो जाये. ऐसा होने पर उसे कई फायदे थे. मुख्य मुद्दे से जनता का ध्यान हट जाता, कार्यकर्ता ऐसे ही समय में एकजुट होते हैं.अगले चुनाव की तैयारी के लिहाज से यह काफी सुखद माहौल होता. दूसरे वो ये भी जानते हैं कि काले धन और भ्रष्टाचार पर विपक्ष खुलकर कभी भी सामने नहीं आ सकता क्योंकि उसके दामन पर कम दाग नहीं हैं.
राजनीति में कच्चे बाबा रामदेव की अदूरदर्शिता ने कांग्रेस को वह अवसर दे दिया जिसकी तलाश में वे थे.लाठीचार्ज से पैदा हुई भावुकता में भाजपा, आरएसएस और दूसरे विपक्षी दलों के शामिल हो जाने से मुख्य मुद्दा नेपथ्य में जाता हुआ दिख रहा है और लड़ाई पक्ष-विपक्ष की बनती जा रही है.सबसे मज़े कि बात ये है कि इस लड़ाई में कोई सूत है न कपास, बस जुलाहों में लट्ठमलट्ठ मची हुई है.

कुछ समय पहले लिखी गई मेरी यह कविता पढ़िये और देखिए कि यह अब भी प्रासंगिक है या नहीं---- राजयोगी क्षमा करें किन्तु..

यह समय
एकता का नहीं, गठबंधन का है
जैसे लाल मिर्च का
काली मिर्च से गठबंधन
चील का बाज़ से,
जैसे करांयत का गठबंधन अजगर से.

सरकारें
एक जादूमेडली की तरह
आती हैं मंच पर
एक पुरुष जादूगर
अपनी छातियों से
एक बच्चे को
दूध पिलाने का भ्रम उत्पन्न करता है
दर्शकगण ताली बजाते हैं
भूखा बच्चा लौटकर
माँ की छाती से लिपट जाता है.

पलक झपकते ही हमारा श्वेत आराध्य
श्यामवर्णी हो जाता है
अपनी स्वाभाविक बेशर्मी
और नायाब तरीकों के साथ.

विज्ञान और कला
दोनो से इनका सीधा जुड़ाव है
जातिगत जनमत का
विज्ञान विकसित करने वाले,
पीठ पर पर वार कर सकने को
अनिवार्य कला मानते है.

सारे दल मिलकर
न्यूनतम साझा कार्यक्रम भर बना सकने की
अधिकतम योग्यता में सिमटते जा रहे है.

इस समय जो पक्ष में नहीं है
वह निरापद है
जिन्हें होना चाहिए था विपक्ष में
वे एक आत्मघाती ठंडेपन
और मुर्दा हँसी के साथ
लोकतंत्र की आखिरी हिचकी की प्रतीक्षा में हैं.

ठीक इसी समय
एक कविता
गठबंधन में शामिल होने से इनकार करती है.
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