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Saturday, 3 September 2011

गिरते हैं शहसवार ही..!

अन्ना के आन्दोलन से किसी और को चाहे फायदा न हुआ हो, भारतीय क्रिकेट टीम और कप्तान महेन्द्र सिंह धोनी को बहुत फायदा हुआ. जिन दिनों देश का सारा मीडिया और जनता धरना-प्रदर्शन में व्यस्त था, उन्हीं दिनों हमारी टीम परदेस में चुपचाप पराजित हो गयी. भारत के टेस्ट-क्रिकेट इतिहास की सबसे करारी शिकस्त. कोई और दिन होते तो हमारा मीडिया चौबीस घंटे, एक-एक खिलाड़ी की बखिया बड़े करीने से उखाड़ रहा होता. अब तक कई खिलाड़ी देश-द्रोही करार दिए जा चुके होते. हमारे खिलाड़ियों की कुण्डलियाँ टीवी और अखबार पर ज्योतिषी बाँच रहे होते,और राहु-केतु-शनि से निपटने के नुस्खे बताए जा रहे होते. अब तक यह तो सिद्ध ही किया जा चुका होता कि अमुक खिलाड़ी, फलां हिरोइन या माडल के चक्कर में खेल पर ध्यान नहीं लगा पा रहा है, तो कुछ खिलाड़ियों के बुरे प्रदर्शन के पीछे पड़ोसी देश की साजिश की तरफ भी इशारे किए जा रहे होते. हमारे भावुक क्रिकेट प्रेमियों ने अब तक धोनी, तेन्दुलकर,सहवाग,ज़हीर आदि के घर पर तोड़-फोड़ और पथराव कर दिया होता.

हम भारत के लोग क्रिकेट को ऐसे ही देखते हैं. हम मूर्ख होने की हद तक भावुक हो जाते हैं. लेकिन इस बार ऐसा कुछ नहीं हुआ, क्योंकि इस बार मीडिया की भेड़ें एक सीध में दूसरी तरफ जा रही थीं. इस बार का ठंडापन देख कर डर भी लगा कि कहीं इस खूबसूरत खेल से हमें विरक्ति तो नहीं हो रही है ! क्या हो गया इस देश की उन्मादी जनता के संवेदी तन्तुओं को ? जिस देश में किसी मैच को देखने की तैयारी महीने भर पहले से शुरू हो जाती थी, जहाँ मैच के समय सारा सरकारी काम-काज और व्यवसाय ठप्प हो जाता हो, जिस देश में क्रिकेटरों की मूर्तियाँ बनाकर पूजी जाती हों और जहाँ रामलीला-नौटंकी में भी सचिन-धोनी-सहवाग के किरदार बना दिए जाते हों—उसी देश की टीम परदेस में जाकर ऐसे दिलशिकन अंदाज़ में हार रही हो और किसी के मुंह से आह तक न निकले !

 यह गंभीर चिंता की बात है. देश के करोड़ों क्रिकेट के दीवानों के लिए भी और BCCI के लिए भी. भले ही भारतीय क्रिकेट बोर्ड दुनिया का सबसे मालदार बोर्ड हो, भले ही उसमें सरकार की कैबिनेट को भी बेअसर कर देने की कुव्वत हो, लेकिन उसे यह नहींभूलना चाहिए कि उसकी इस बादशाहत के पीछे इन करोड़ों क्रिकेट प्रेमियों की दीवानगी ही है. प्रेम का अतिरेक, मोहभंग की गली में ही समाप्त होता है. BCCI का चरित्र और कार्यप्रणाली धीरे-धीरे तानाशाही का होता जा रहा है. उसकी यह इच्छा अब साफ दिखने लगी है कि वह सोने के अण्डे देने वाली मुर्गी को हलाल करके सारे अण्डे एक साथ निकाल लेना चाहता है. इसे आप भले ही मूर्खता कहें लेकिन BCCI की सेहत पर इसका कोई असर नहीं पड़ता.

 असर पड़ता है तो हमारे खिलाड़ियों की सेहत पर और उनके प्रदर्शन पर. अभी कुछ दिनों पहले ही विश्वकप जीतने के बाद,जब ढाई महीने का IPL चल रहा था, तभी लगने लगा था कि कुछ अनिष्ट होने वाला है. 45-46 डिग्री ताममान पर जब हमारे खिलाड़ी जूझ रहे थे, घायल हो रहे थे, तभी यह अनुमान लगाया जाना चाहिए था कि आगे हमारी क्रिकेट का क्या हश्र होने वाला है...IPL के बाद कुछ नौजवान खिलाड़ियों को लेकर हम वेस्टइंडीज गये. वहां हमने अपने से भी कमज़ोर और कुव्यवस्थित टीम के साथ बराबरी की श्रृंखला खेली. इंग्लैण्ड जाने वाली टीम में हमारे दिग्गज लौट तो आए पर आधे से अधिक घायल थे जिनका इलाज चल रहा था.

घायलों को टीम में चुनना केवल खिलाड़ियों की बदमाशी भर नहीं होती, इसमें क्रिकेट बोर्डों के व्यावसायिक और राजनीतिक हित भी साधे जाते हैं. फुटबाल, हाकी,एथलेटिक्स से इतर, क्रिकेट के खेल में इतनी गुंजाइश भी होती है कि एक-दो कम फिट खिलाड़ी भी चल जाते हैं. लेकिन इतना अवकाश तो यह खेल भी नहीं देता कि आपके आधे से अधिक प्रमुख खिलाड़ी पूरी तरह से फिट न हों. सहवाग,ज़हीर,गंभीर, हरभजन,प्रवीण कुमार,युवराज सिंह पूरी तरह स्वस्थ्य नहीं थे, फिर भी टीम में थे. ये टीम के आधार खिलाड़ी हैं. सहवाग तो घोषित तौर पर कंधे की चोट से जूझ रहे थे. उनका चयन तीसरे टेस्ट से किया गया था. ऐसा पहली बार देखने में आया कि किसी खिलाड़ी को स्वस्थ हो जाने की प्रत्याशा में टीम में चुन लिया गया हो. 

घायल खिलाड़ियों की इस सेना की एक दिक्कत यह भीथी कि पिछले तीन-चार सालों में इस टीम ने जिन ज़गहों पर क्रिकेट खेली उनका मिजाज़ इंग्लैण्ड के इन स्थानों से बिल्कुल अलग था. इंग्लैण्ड में इस समय कड़ाके की ठंड होती है और हवा में इतनी नमी होती है कि गेंद अकल्पनीय ढंग से स्विंग करती है. वहाँ की पिचों का उछाल, किसी भी दूसरे देश की पिचों से ज़्यादा होता है. इंग्लिश टीम के खिलाड़ी इन पिचों के अभ्यस्त हैं. साथ ही उनके घरेलू क्रिकेट का स्तर और फार्मेट भी शानदार है. उनके क्रिकेट प्रशासक अपने यहाँ होने वाली क्रिकेट श्रृखलाओं के कार्यक्रम बनाते समय बहुत सजग रहते हैं. वो यह सुनिश्चित करते हैं कि उनके खिलाड़ी अंतर्राष्ट्रीय श्रृंखला खेलने से पहले घरेलू मैचों और पिचों पर पर्याप्त अभ्यास कर लें. यही वज़ह थी कि इंग्लैण्ड ने IPL में अपने प्रमुख खिलाड़ियों को खेलने के लिए नहीं भेजा. वो पिछले दो साल से इस श्रृंखला की तैयारी कर रहे थे.

 वो मैचों का क्रम निर्धारित करते समय भी यह ध्यान रखते हैं कि पहले ही मैच में प्रतिद्वन्द्वी को हराने के लिए कौन सा मैदान सबसे उपयुक्त रहेगा. इसके लिए वो अपने और विपक्षी टीम के रिकार्ड का बारीकी से अध्ययन करते हैं.पहले मैच में ही विपक्षी को चित कर देने के बाद आगे का काम आसान हो जाता है.यही वज़ह है कि उन्होने श्रृंखला का पहला मैच लार्ड्स में रखा, जहाँ दिलीप वेंगसरकर और सौरव गांगुली के अलावा किसी भी भारतीय खिलाड़ी का प्रदर्शन ठीक नहीं रहा है. दुर्योग से ये दोनो ही खिलाड़ी हमारी टीम में नहीं हो सकते थे. हम अपना पहला मैच हारे और हारते चले गये. क्रिकेट में जिस ‘माइण्ड गेम’ की बहुत अहमियत होती है, वह उनका मीडिया खेलता है. महीनों पहले से वहां के मीडिया ने भारतीय टीम पर दबाव बनाना शुरू कर दिया था. वहां का मीडिया श्रृंखला के बीच में ही सम्मान या उपाधि के बहाने आयोजन भी करता है, जिनमें अप्रत्यक्ष रूप से खिलाड़ियों पर दबाव बनाने के हथकंडे आजमाये जाते हैं.

 बहरहाल, इंग्लैण्ड में हम टेस्ट श्रृंखला अप्रत्याशित रूप से हार चुके हैं,और आगे एक दिवसीय श्रृंखला है. हमारी टीम की मौजूदा मनोदशा को देखते हुए, ज़यादा आशावादी होना हमें घनघोर निराशा दे सकता है. फिर भी इस प्यारे खेल के लिए हमें अपनी दीवानगी बनाए रखनी होगी. हमें सचिन के स्ट्रेट ड्राइव, सहवाग के स्क्वेयर कट और द्रविड़ के आन ड्राइव से बजता हुआ संगीत कहीं और मिलता भी तो नहीं !!
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