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Wednesday, 15 August 2012

पुरानी आज़ादी के नये दुख !


पहले महात्मा गांधी का यह कथन देखिए—स्वाभिमानी व्यक्ति के लिए सोने की ज़ंजीरें भी उतनी ही क्लेशकारी होती हैं जितनी कि लोहे की ज़ंजीरें. दंश ज़ंजीर मे निहित है, उस धातु में नहीं जिससे ज़ंजीर बनाई जाती है......मेरी दृष्टि में सोने की ज़ंजीरें लोहे की ज़ंजीरों की तुलना में कहीं ज़्यादा बुरी हैं, क्योंकि लोहे की ज़ंजीर की क्लेशकारी प्रकृति मनुष्य आसानी से समझ पाता है, जबकि सोने की ज़ंजीर का दुख प्रायः भूल जाता है. इसलिए अगर भारत को ज़जीरों में बंधे रहना है तो मैं चाहूँगा कि ये सोने या किसी अन्य बहुमूल्य धातु की अपेक्षा लोहे की ही हो.
         
65 साल की आज़ादी को जवान तो नहीं कहा जा सकता. किसी भी देश की काया परिवर्तन में इतने साल पर्याप्त होते हैं. इसे हम जापान के उदाहरण से समझ सकते हैं. दूसरे विश्व-युद्ध के परमाणु हमले में तवाह हो चुके जापान ने लगभग 30-40 सालों में ही अपने देश को दुनिया का सिरमौर बना दिया, और वह भी लोकतांत्रिक प्रक्रिया से गुजरकर. एक समय था जब जापान में प्रतिव्यक्ति आय, दुनिया में सबसे अधिक थी. इन सबके बीच जापान में आने वाले भूकम्पों और उनसे होने वाली तबाही को भुलाया नहीं जा सकता. जापान ने यह चमत्कार किसी विदेशी या दैवीय मदद से नहीं किया. यह जापानियों की दृढ़ इच्छाशक्ति, स्वाभिमान और अनुशासन का सुफल था.
        
दूसरी ओर भारत में हमने पैंसठ सालों में अलग तस्वीर देखी. गरीबी और बेरोजगारी के मोर्चे पर हम लगभग जहाँ के तहाँ हैं. सरकार भी मानती है कि 26 रुपये प्रतिदिन खर्च करने वाला गरीब नहीं है. स्पष्ट है कि सरकार जानती है कि वह अपने नागरिकों को कितना दे पा रही है. एक गैर सरकारी सर्वेक्षण के मुताबिक देश की 70 प्रतिशत आबादी की औसत कमायी 20 रुपये प्रतिदिन है. इस  बात पर यकीन करना किसी के लिए भी तब मुश्किल हो जाता है, जब वह मुकेश अंबानी के अरबों रुपयों के महल को देखता है. जब वो देखता है कि अफसरों और मंत्रियों के यहाँ छापे में टनों सोना निकल रहा है, और राजा, कलमाड़ी, सुखराम जैसों को चुराने के लिए अकूत रुपया इसी देश में है. विदेशों में जमा धन की तो बात ही मत कीजिए. हमारे देश के साहूकार, विदेशी कम्पनियों को धड़ाधड़ खरीद रहे हैं. अब ऐसे मोहक रंगमंच पर किस गरीब की हिम्मत है कि वह कहे कि मैं गरीब हूँ !!
                 
ऐसा नहीं कि देश आगे नहीं बढ़ा. औद्योगिक और आर्थिक क्षेत्र में विकास की ऐसी गति रही है पिछले 20 वर्षों में कि भारत के महाशक्ति बनने की कूटनीतिक घोषणाएँ भी होने लगी हैं. लेकिन आप भी देखते होंगे कि भारत ने विकास का शीर्षासन किया है. सरकार ने जड़ों को नहीं पत्तियों को पानी दिया है. नब्बे के दशक मेंजब यह मान लिया गया कि उदारीकरण के अलावा अब कोई और रास्ता नहीं बचा है देश को दिवालिएपन से बचाने का, तब जो भी नीतियां बनाई गयीं वो सब देश के पूँजीपतियों और विदेशी कंपनियों के हक में बनाई गयीं. उनके लिए लायसेंस प्रणाली को लचीला करना, ब्याज दरों में कमी करना, भूमि-अधिग्रहण को सरल करना और पर्यावरणीय दुष्प्रभाव की अनदेखी करना......साफ ज़ाहिर कर रहा था कि सरकार औद्योगिक घरानों के साथ. हमारी आँखों के सामने ही देशी और सार्वजनिक उद्योग मरते गये और सरकार देखती रही. खेती-बाड़ी और छोटे उद्योग-धंधे भगवान भरोसे दम तोड़ गये. देश का निम्न-मध्यवर्ग गरीबी रेखा से नीचे चला गया. औद्योगिक घरानों के मालिक दुनिया के कुबेर बनते गये.
        
सबसे दुखद पतन देश की राजनीति में हुआ. आज़ादी के आन्दोलन में जो पीढ़ी सक्रिय थी, उसके अवसान के बाद भारत की राजनीति अपराधियों और निकम्में लोगों की भी शरणस्थली बनती गई. किसी भी देश की राजनीतिक दृढ़ता, उस देश के नागरिकों के मनोबल का भी प्रतिनिधित्व करती है. अपराधियों के बढ़ते वर्चस्व और क्षेत्रवाद के उभार नें भारत के संघीय ढाँचे को भी कमज़ोर बनाया है. अलग-अलग राज्यों के केन्द्र के साथ और आपस में हो रहे टकरावों को गौर से देखिए, तो पता चलेगा कि इस माला को पिरोने वाला कितना कमज़ोर हो चुका है.
         
आज आज़ादी की वर्षगांठ है. इस मौके पर गांधी का यह कथन याद आ रहा है तो यह बेसबब नहीं है, पर इस पर बात थोड़ा आगे चलकर करूँगा...पहले मेरे ज़हन में वे दृश्य आ रहे हैं, जहां एक गली के स्कूल में बस्ती का एक लुच्चा और दिल्ली के लाल किले पर प्रधानमंत्री हमें आज़ादी का मतलब समझा रहे हैं. हम हाथ में एक रुपये की झंडियां लिए यह दिखाने की कोशिश में हैं कि हम एक आज़ाद देश के नागरिक हैं, और हमें आज़ादी की समझ भी है.
         
स्वतंत्रता दिवस  पर हर सरकारी-गैर सरकारी संस्थान में ध्वजारोहण और भाषण देने की परंपरा है. यह हमारा फ़र्ज़ भी है. इस मौके पर हर वर्ष यह याद किया जाता है कि आज़ादी कितने संघर्ष के बाद मिली है. अंग्रेजों के अत्याचार और भगत सिंह, आज़ाद, बिस्मिल वगैरह की कुर्बानी भी याद की जाती है. लता के गाये कालजयी गीत—ऐ मेरे वतन के लोगों...---को हर लाउडस्पीकर अपने ही अंदाज़ में सुबह से शाम तक बजाता है.
         
प्रायः विद्यालयों में आयोजित होने वाले समारोह ज़्यादा रोचक होते हैं. इन समारोहों में, विद्यालय-प्रमुख की यह मज़बूरी होती है कि वह उस इलाके के कुछ सर्वाधिक बदनाम लोगों को बतौर अतिथि आमंत्रित करे. विद्यालय  के निरीह शिक्षक उनका माल्यार्पण करें और प्रसाद की प्रतीक्षा में बैठे छात्र, इन महानुभावों के महान उद्गारों पर ताली बजाएँ—जिसकी उन्हें बराबर ताकीद की जाती है. वक्तागण एक मंजे हुए देशभक्त की मुद्रा मे झंडे को सलाम करते हैं, गांधी की जय बोलते हैं, और सीधे विद्यालय के शिक्षकों को उनके कर्तव्य याद दिलाते हुए यह भी चेता देते हैं कि उनके जैसे देशभक्तों के रहते किसी भी शिक्षक को इस देश के भविष्य के साथ खिलवाड़ नहीं करने दिया जायेगा.
         
आज प्रधानमंत्री भी लाल किले पर चढ़े. वो बड़े आदमी हैं, इसलिए उन्हें बड़ा देशभक्त माना जाना चाहिए. उनकी चिन्ता को बड़ी चिन्ता मानना चाहिए. प्रधानमंत्री हर साल चिंतित होते हैं. जब वो चिन्तित होते हैं तो देश की जनता का आह्वान करते हैं. आह्वान करना प्रधानमंत्री का विशिष्ट धर्म होता है, तो कतरा कर निकल जाना उनका अद्भुत कौतुक. हो सकता है. प्रधानमंत्री कह रहे हैं कि हमारे पड़ोसी, हमारे ऊपर बुरी नज़र लगाये हुए हैं...पर इस देश की जनता इतनी बहादुर है कि वह उनके मंसूबों पर पानी फेर देगी. इस देश की जनता अपने घर के दुश्मनों का तो कुछ कर नहीं पाती, बाहर वालों से कैसे निपटेगी, यह प्रधानमंत्री ही जानते होंगे. सेना के प्रमुख बार-बार प्रस्ताव भेजते हैं कि सेना के लिए बुनियादी ढाँचा तैयार करने की ज़रूरत है. चीन की सीमा पर जहां चीन अपनी सेनाओं को महज़ दो-तीन घंटे में भेज सकता है, वहां हमारे सैनिकों को पहुंचने में 15 दिन लगते हैं. सेना के प्रस्ताव रक्षा-मंत्रालय में दबे रहते हैं, उन्हे मंजूरी नही मिलती. बांग्लादेश और नेपाल परोक्ष रूप से पाक-चीन की मदद करते हैं. ऐसे में प्रधानमंत्री का आशावाद काबिले तारीफ है.
         
आज़ादी के पर्व पर यह भी याद दिलाया गया कि भारत कभी सोने की चिड़िया  था, जिसे अंग्रेजों ने कैद कर लिया था. फिर उसे इंगलैण्ड ले गये....इमानदारी तो इतनी थी कि घरों में लोग ताले नहीं लगाते थे. आज सरकार की नीतियों और उद्यमशीलता के चलते यह देश फिर से सोने की चिड़िया में बदलने लगा हैं. लगभग 75 प्रतिशत बदल चुका है. 2025 तक यह चिड़िया सौ-फीसदी सोने की हो जायेगी. यह उत्साहवर्धक विचार, एक ही साथ सत्य भी है और भ्रामक भी. इसे आप तर्कशास्त्र में अपवाद की तरह भी देख सकते हैं. जिस काल में भारत को सोने की चिड़िया होना बताया जाता है, तब भी सम्पत्ति के सारे भंडार शासकों और व्यापारियों के ही पास थे.उसी की चकाचौंध विदेशियों को खींच लाती थी. आम जनता के घर में कुछ था ही नहीं तो ताले किसके लिए लगाते ? तत्कालीन इतिहास के जितने स्रोत हैं, वे शासकों के नियंत्रण में थे. राजा खुद अपनी निगरानी में इतिहास लिखवाते और स्तम्भ गड़वाते थे. इसलिए उनके विवरण पर भरोसा करना ठीक नहीं. कोई मीडिया तो तब था नहीं. तो यह मानने में कोई हर्ज़ नहीं कि सोने की चिड़िया का चित्र राजा के भाड़े के चित्रकारों ने बनाया था.
          
अब गांधी जी के उस कथन पर लौटते हैं जिसका जिक्र शुरुआत में किया था. यह कथन उन दिनों का है, जब भारत की आज़ादी लगभग तय हो गयी थी, और शीर्ष स्तर पर आज़ादी का खून चूसने की तैयारियां चल रही थीं. गांधीजी की केन्द्रीय भूमिका अब मात्र एक आवरण थी. संभवतः उन्हें यह आभास था कि अँग्रेजों से मुक्त होकर यह देश किन लोगों के हाथ में जाने वाला है. वो बार-बार कह रहे थे कि स्वराज का अर्थ है कि देश के कमज़ोर से कमज़ोर व्यक्ति को भी उन्नति का अवसर मिले...पर तब तक उनकी बातों को सुनना भावी शासकों ने कम कर दिया था. जब उन्होने यह कहा कि सोने की ज़ंजीर में बंधने से बेहतर है कि हम लोहे की ज़ंजीर में ही जकड़े रहें---तो यह उनकी दूरदृष्टि और गहन हताशा को दिखाता है.
          



आज 65 साल बाद इस देश के लोग ऐसे पूंजीपतियों के गुलाम हैं जिनकी कोई नागरिकता नहीं है. ये विश्व-नागरिक कहलाते हैं. 15 अगस्त को स्वतंत्रता का जश्न मनाते हुए हमारे पास कोई स्वप्न नहीं हैं. हम कुछ घिसे-पिटे जुमलों और बीस रुपए प्रतिदिन की औसत कमाई में अमर हैं.
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