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Saturday, 9 February 2013

जिसका कोई इन्तज़ार न कर रहा हो/ अफ़ज़ाल अहमद

पाकिस्तान के समकालीन शायरों में सर्वाधिक चर्चित अफ़ज़ाल अहमद की पैदाइश गाज़ीपुर,  उ.प्र. की है. 1946, सितंबर की कोई तारीख । नज़्मों का पहला संग्रह  'छीनी हुई तारीख' 1984 में प्रकाशित हुआ था । ग़ज़लों का एक संग्रह भी  'खेमए सियाह' के नाम से प्रकाशित है । 1990 में नज़्मों का दूसरा संग्रह  ' दो ज़ुबानों में सज़ाए मौत' प्रकाशित हुआ । यहाँ उनकी दो नज़्में हम पढ़ते हैं.......

1.

जिसका कोई इन्तज़ार न कर रहा हो

जिसका कोई इंतज़ार न कर रहा हो
उसे नहीं जाना चाहिए वापस
आख़िरी दरवाज़ा बन्द होने से पहले ।

जिसका कोई इन्तज़ार नकर रहा हो
उसे नहीं फिरना चाहिए बेकरार
एक खूबसूरत राहदारी में
जब तक वो वीरान न हो जाए ।

जिसका कोई इन्तज़ार न कर रहा हो
उसे नहीं जुदा करना चाहिए
खून आलूद पांव से
एक पूरा सफर ।

जिसका कोई इन्तज़ार न कर रहा हो
उसे नहीं मालूम करनी चाहिए
फूलों के एक दस्ते की कीमत
या दिन, तारीख और वक्त ।

2.

जिससे मुहब्बत हो

जिससे मुहब्बत हो
उसे निकाल ले जाना चाहिए
आखिरी कश्ती पर
एक मादूम होते हुए शहर से
बाहर ।

उसके साथ
पार करनी चाहिए
गिराये जाने की सज़ा पाया हुआ एक पुल ।

उसे हमेशा मुख़्तसर नाम से पुकारना चाहिए ।

उसे ले जाना चाहिए
ज़िन्दा आतिश फसानों से भरे
एक जज़ीरे पर ।

उसका पहला बोसा लेना चाहिए
नमक की कान मे बनी
एक अज़ीयत देने की कोठरी के
अंदर ।

जिससे मुहब्बत हो
उसके साथ टाइप करनी चाहिए
दुनिया की तमाम नाइंसाफियों के ख़िलाफ़
एक अर्ज़दाश्त
जिसके सफ़हात
उड़ा देने चाहिए
सुबह
होटल के कमरे की खिड़की से
स्वीमिंग पूल की तरफ ।

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मादूम--नष्ट,  आतिशफसान--ज्वालामुखी,  जज़ीरा--द्वीप,  कान--खदान,  अज़ीयत--यातना,  अर्ज़दाश्त--प्रर्थनापत्र,  सफ़हात--पन्ने ।

( लिप्यंतरण--विजय कुमार )
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