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Sunday, 6 March 2016

अज्ञेय के सौ बरस

यह वर्ष बहुआयामी रचनाकार अज्ञेय का जन्म शताब्दी वर्ष है.अपने समय से आगे चलने वाले, अबूझ,अद्वितीय और सर्वाधिक विवादित लेखक सच्चिदानन्द हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय हिन्दी साहित्य में अपने सजग, अन्वेषी सृजनधर्मिता के कारण आधुनिक भावबोध के अग्रदूत के रूप में स्थापित हैं. अज्ञेय ने अपनी तात्विक दृष्टि से विभिन्न साहित्यिक विधाओं के सृजन और अन्वेषण को नए आयाम दिया. वास्तव में अज्ञेय को समझे बिना बीसवीं शताब्दी के हिंदी साहित्य के बुनियादी मर्म,उसके आत्मसंघर्ष, उसकी जातीय जीवनदृष्टि और उसके आधुनिक पुनराविष्कार को समझ पाना कठिन है.
हिंदी के वैचारिक,सृजनात्मक आधुनिक साहित्य पर अज्ञेय की गहरी और अमिट छाप है.             

परम्परा,प्रयोग और आधुनिकता ऐसे विषय हैं, जिन्होंने हिंदी जगत में कुछ बुनियादी परिवर्तन किये, अज्ञेय ने इन विषयों पर हिंदी में जितना सार्थक, सजग और रचनात्मक लेखन और चिंतन किया, उतना किसी अन्य ने नहीं. वस्तुतः हिंदी में परम्परा और आधुनिकता को सदैव अलग-अलग वैचारिक आयामों से मापा जाता रहा, लेकिन अज्ञेय ने इस धारणा को स्पष्ट रूप से खंडित किया, उनका मानना है परम्परा बदलती हुई परिस्थितियों के अनुरूप परिवर्तित होकर निरंतर जब नवीन होती जायेगी ,तभी उसकी प्रासंगिकता है. परम्परा और प्रयोग दोनों एक दूसरे से संपृक्त हैं. इन दोनों का संबंध ही जहा परम्परा को उसकी रुढिवादिता से आगे ले जाकर उसका पुनर्संस्कार करता है, वहीँ प्रयोगों की अनिवार्यता भी सिद्ध करता है.इस तरह कवि के लिए सिर्फ परम्परा नहीं, उसका अपने युग के अनुरूप परिष्कार भी जरुरी है. परम्परा एक व्यापक अनुभव के रूप में समकालीन लेखक और साहित्य के लिए सार्थक महत्व रखती है, इसीलिए साहित्य में नए आयामों का प्रस्तुतीकरण और निर्वैक्तिकता बिना परम्परा के  विशद ज्ञान के प्राप्त नहीं हो सकता और इस परम्परा का आगे के सार्थक उपयोग के लिए नए प्रयोगों की आवश्यकता होती है.                                                                                                                                                      
वास्तव में नई अनुभूतियों का स्वीकार और पुराने भाव – संयोजनो की रुढिवादिता  का त्याग अथवा उनके प्रति विद्रोह का भाव ही प्रयोग की आवश्यकता  को जन्म देता है. इसे ऐसे भी कहा जा सकता है कि जब रागबोध का स्वरुप जटिल हो जाता है तो उसके सहज सम्प्रेषण के लिए नए प्रयोगों की जरुरत होती है, यदि अज्ञेय की इस बात पर ध्यान दिया जाये ‘हमारे मूल राग-विराग नहीं बदले,उनको व्यक्त करने की प्रणाली बदल गयी है’ तो यह स्पष्ट होगा कि कलाकार की संवेदनाएं तभी जटिल रूप धारण करती हैं जब परवर्ती युगीन वास्तविकताओं से हमारे  मूल राग-विराग टकराते हैं. जैसे-जैसे ये वास्तविकताएं परिवर्तित होती जाती हैं, वैसे-वैसे रागात्मक संबंधो के व्यक्त करने की प्रणालियाँ भी बदलती जाती हैं,न बदले तो वास्तविकता से उनका संबंध टूट जाता है. प्रयोग एक सामाजिक आवश्यकता है और विकास का रास्ता भी वहीँ से गुजरता है. साहित्य की सार्थकता के लिए भी ऐसे परिवर्तनों की जरुरत होती है,                                                                           

जिसे तथाकथित प्रयोगवाद कहा जाता हैऔर अज्ञेय दूसरा  सप्तक की भूमिका में जिसका जोरदार रूप  से खंडन कर चुके थे उसमे आरम्भ से ही परम्परा के प्रति विद्रोह और प्रयोग पर बल देने का भाव देखा जा सकता है, अज्ञेय स्वंय लेखकों को परम्परा से हट कर सृजन के लिए एक नया मार्ग तलाशने पर जोर देते. अपने लिए भी वो यही कहते हैं -

मेरा आग्रह भी नहीं रहा
कि मैं चलूँ उसी पर
सदा पथ कहा गया, जो
इतने पैरों द्वारा रौंदा जाता रहा कि उस पर
कोई छाप नहीं पहचानी जा सकती थी
                                            (अरी ओ करुणा प्रभामय) 
अज्ञेय परम्परा को उसके समूचे रूप में ग्रहण करने के विरोधी हैं, क्योंकि परम्परा में न तो सब मूल्यवान है और न ही सारा कुछ व्यर्थ. यह रचनाकार के उपर निर्भर करता है कि वह उसमे से अपनी रचना के लिए क्या लेता है, क्या आत्मसात करता है. आत्मनेपद में वह कहते हैं – ऐतिहासिक परम्परा कोई पोटली बाँध कर रखा हुआ पाथेय नहीं है जिसे उठा कर हम चल निकले.वह रस है, जिसे बूँद-बूँद अपने में हम संचय करते हैं – या नहीं करते, कोरे रह जाते हैं.  इस टिप्पणी से स्पष्ट है कि अज्ञेय जहाँ एक तरफ परिस्थिति निरपेक्ष परम्परा  को स्वीकार नहीं करते, वहीँ दूसरी तरफ परिस्थिति के सम्मुख समर्पण कर देने के बजाय  परम्परा का सामर्थ्य इसमें मानते हैं कि वह नई परिस्थितयों का किस हद तक सामना कर सकती है, सामना करने और टकराने की यह स्थिति ही परम्परा का विकास या उसका नवीकरण है.
                                     
परम्परा को आत्मसात करना, उसको समय सापेक्ष बनाने के लिए प्रयोग की आवश्यकता और इन दोनों के समायोजन से आधुनिक रचना-दृष्टि की उत्पति; अज्ञेय के समूचे साहित्य की बुनियाद और प्रस्थान-बिंदु है..उनके लिए आधुनिकता का अर्थ परिस्थितियों के परिवर्तन के साथ नई प्रक्रियाओं का हिस्सा बन जाना है. इस प्रकार एक संवाद जो निरंतर परम्परा और वर्तमान के बीच चलता रहता है, वहीँ आधुनिकता को जन्म देता है. 

आधुनिकता का अर्थ अज्ञेय के लिए सिर्फ सामाजिक रूप से मूल्यनिरपेक्ष  हो जाना नहीं है, बल्कि उनका मानना है कि उन मूल्यों के प्रति सजग होने की हमारी ज़िम्मेदारी बढ़ जाती है, लगातार उनका परीक्षण करते रहना हमारा कर्तव्य हो जाता है.  वस्तुतः जैसे-जैसे कालबोध परिवर्तित होता है, वैसे ही बहुत सी चीजों के साथ हमारे संबंध भी अनिवार्य रूप से बदल जाते हैं जैसे इतिहास के साथ, सामाजिक परिवेश के साथ, तंत्र-श्रम और पूँजी के साथ, शासन-सत्ता एवं कला-साहित्य के साथ.

                                                         
इस तरह से देखा जा सकता है अज्ञेय के लिए परम्परा, प्रयोग और आधुनिकता तीनों एक दूसरे से संपृक्त होकर ही अपनी सार्थकता सिद्ध करते हैं,जो परिवर्तन  और नयेपन के लिए अनिवार्य है. नए संवेदना बोध के साथ सम्प्रेषण की पद्धतिया भी बदले, साहित्य और रचनाकार की प्रासंगिकता इसी से बची रह सकती है. आधुनिकता सम्बन्धी चिंतन अज्ञेय के लिए महज पश्चिमी नक़ल नहीं है, बल्कि वह स्वस्थ परिवर्तनों के अनुकूल रह कर उसे आत्मसात करने की प्रक्रिया है.वह आधुनिकता के संस्कार के लिए परम्परा की जड़ो तक लौट कर जाते हैं .अज्ञेय अपनी रचनाधर्मिता, अपने चिंतन से साहित्य को नई दिशा और दशा देते हैं और इस तरह से अपनी प्रासिंगकता को सिद्ध करते हैं.वास्तव में इस शती में जिन लोगो ने हिंदी साहित्य की स्थिति और नियति का निर्धारण किया है, उसमे अज्ञेय सर्वोपरि हैं.
विमलेन्दु                        
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