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Wednesday, 9 November 2016

मीडिया और नंगा राजा


आपको वह कहानी याद होगी जिसमें एक सनकी राजा नंगा होकर नगर की गलियों से गुजरते हुए प्रजा से पूछता है कि उसके कपड़े कैसे है ! लोग जवाब देते हैं- अद्भुत ! तभी कोई बच्चा बोल देता है- राजा नंगा है !  राजा नंगा है !  राजा के सिपाही बच्चे को पकड़ कर कैदखाने में डाल देते हैं. यद्यपि एनडीटीवी कोई बच्चा चैनलनहीं है, लेकिन वो जब भी राजा को नंगा देखता है, बोल देता है. और राजा अतत: उसे कैदखाने पहुँचवा ही देता है. आखिर कब तक सहता रहता !

जिस मीडिया की बदौलत आजकल कोई भी खबर देश भर में आग की तरह फैल जाती है, उसी मीडिया पर हुए हमले की खबर भी आग से भी अधिक तेजी से फैली और देश भर के सोच-समझ वालों को झुलसा दिया. आप सब तक भी यह खबर पहुँच ही गई होगी कि देश के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने हिन्दी खबरिया चैनल एनडीटीवी इंडिया पर चौबीस घंटे का प्रतिबन्ध लगा दिया है. 9 नवंबर की आधी रात से 10 नवंबर की आधी रात तक, देश के किसी भी हिस्से में एनडीटीवी का प्रसारण नहीं होगा. सरकार ने सभी प्रसारणकर्ताओं को ताकीद कर दिया है कि इस आदेश का गंभीरता से पालन हो अन्यथा गंभीर सज़ा भुगतनी होगी. एनडीटीवी पर यह प्रतिबन्ध उसके एक कवरेज को बहाना बनाकर लगाया गया है. 4 जनवरी 2016 को पठानकोट एयरबेस पर पाकिस्तानी आतंकवादियों ने हमला किया था. यह सेना का अत्यधिक महत्वपूर्ण एयरबेस है. न जाने सुरक्षा व्यवस्था में कहाँ और कैसी चूक हुई कि आतंकवादी इस एयरबेस में घुस गए और काफी नुकसान पहुँचाया. दूसरे चैनलों की तरह एनडीटीवी ने भी इस बड़ी घटना को कवर किया. फर्क बस इतना था, कि दूसरे चैनल 56 इंची सीने की गीदड़ भपकियों, गृहमंत्री की गर्वोक्तियों और रक्षामंत्री की मूढ़ताओं को महिमामंडित कर रहे थे और एनडीटीवी इस बड़ी घटना में सुरक्षा-व्यवस्था में हुई चूकों और दोषियों को खोज रहा था. बस यही उसका अपराध बन गया. घटना के दस महीने बाद सरकार ने एनडीटीवी पर प्रतिबन्ध लगाने की सज़ा दी. सरकार की तरफ से कहा गया है कि चैनल की रिपोर्ट से सामरिक महत्व की अतिसंवेदनशील जानकारियाँ सार्वजनिक हो गई हैं.

अब कौन कहे कि राजा नंगा है. कौन पूछे कि जब आपने पाकिस्तानी जाँच दल को पठानकोट एयरबेस में जाने की इज़ाज़त दी थी, तब क्या उसकी सामरिक संवेदनशीलता खत्म हो गई थी ? उस जाँच दल में कथित तौर पर पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आई.एस.आई. का एक अधिकारी भी था. वह न भी होता तो पाकिस्तानी सेना के अधिकारी तो थे ही. पाकिस्तानी सेना और खुफिया एजेंसी का खतरनाक गठजोड़ जग जाहिर है. आखिर जिसका डर था बेदर्दी वही बात हो गई. पाकिस्तानी जाँच दल जब लौट कर गया तो उसने इस आतंकी हमले में पाकिस्तान का कोई हाथ होने से साफ इंकार कर दिया. इस प्रकरण में भारत सरकार की मज़बूरी भी दिखी और दिशाहीन विदेशनीति भी. वहीं पाकिस्तान ने ज़बरदस्त दाँव खेला. उसने पठानकोट में अपना जाँच दल भेज कर भारत सरकार को उभयतोपाश में डाल दिया. भारत सरकार अगर मना करती तो पूरी दुनिया को संदेश जाता कि भारत सरकार झूठ बोलकर नाहक पाकिस्तान को बदनाम कर रही है. जाँच दल को स्वीकृति देने पर यह तो तय था कि वो इस हमले का कोई पाकिस्तानी कनेक्शन स्वीकार नहीं करेंगे, लेकिन हमारे एक बेहद महत्वपूर्ण सामरिक ठिकाने की अन्दरूनी जानकारी उन्हें हो जाएगी. गनीमत यह है कि हमारी सेना इतनी अहमक नहीं है. जो चीजें छुपाने की हैं, उन्हें पाकिस्तानी जाँच दल से भी सेना ने छुपाया ही होगा. लेकिन यह पाकिस्तान की एक प्रतीकात्मक विजय थी कि वह हमारे सैन्य ठिकाने का मेहमान हुआ. हमारे जाँच दल तो उनके यहाँ कभी तन्दूरी मुर्गा खाने तक नहीं जा पाते. पाकिस्तान विश्व बिरादरी को भी भारत से बेहतर संदेश दे गया. भारत सरकार की विवशता साफ समझ आ रही थी.

पठानकोट कोई पेटीकोट नहीं है. अब अगर पठानकोट एयरबेस में कुछ संवेदनशील है, तो उसे मीडिया से भी छुपाया ही जाता रहा होगा. कम से कम देशद्रोही चैनल एनडीटीवी को तो कतई अनुमति न दी गई होगी कि वह सेना की गुप्त-गोदावरी तक पहुँचे. अगर बात ज़ीटीवी की होती तो एक बार सोचा भी जा सकता था. ज़ीटीवी पर सेना से जुड़ी विशेष रिपोर्ट्स आती रहती हैं, जिनमें संवेदनशीलता और गोपनीयता के मानकों में थोड़ी ढील दे दी जाती है. आप सबकी तरह मैं भी यही मानता हूँ कि देश की सुरक्षा से जुड़ी कोई भी जानकारी सार्वजनिक नहीं होनी चाहिए. मीडिया का तो सारा कारोबार ही सनसनी फैलाने से चलता है. अपनी टी.आर.पी के चक्कर में यह असंभव नहीं है कि मीडिया नाजुक मसलों में भी फिसल जाए. यहाँ सोचने वाली बात यह है कि अगर एनडीटीवी ने ऐसी कोई जानकारी सार्वजनिक की थी, जो नहीं की जानी चाहिए, तो ऐसी जानकारी उसे दी ही क्यों गई ? जिन जगहों को रिपोर्ट में दिखाने के लिए उसे प्रतिबन्ध की सज़ा दी गई है, उन जगहों तक मीडिया को पहुँचने ही क्यों दिया गया ? अगर मीडिया अपने लाव-लश्कर के साथ ऐसी संवेदनशील जगहों तक पहुँच सकता है, तो फिर दुश्मन के गुप्तचर तो और भी आसानी से खुफिया जानकारी जुटा सकते हैं.

लेकिन, जितना हम अपनी सेना को जानते हैं, उससे यह उम्मीद कतई नहीं की जा सकती कि वह अपने सुरक्षा इन्तज़ामों को लेकर इतनी लापरवाह होगी. उसने अगर मीडिया को कवरेज करने की अनुमति दी थी, तो निश्चित ही लक्ष्मण-रेखा के बाहर ही दी होगी. फिर एनडीटीवी पर प्रतिबन्ध लगाने का क्या औचित्य है ! दूसरी बात यह कि प्रतिबन्ध सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने लगाया है. कायदे से होना यह चाहिए कि अगर एनडीटीवी ने सेना के बैरिकेट्स का अतिक्रमण किया था तो सैन्य मुख्यालय से सरकार के पास चैनल पर दण्डात्मक कार्यवाही का निवेदन भेजा जाना चाहिए था. सरकार को किसी सक्षम समिति से जाँच करवानी चाहिए थी और उसके बाद ही दण्ड निर्धारित किया जाना चाहिए था. लोकतांत्रिक शासन का यही तकाज़ा है.

लेकिन भारत में लोकतंत्र पर गंभीर संकट दिख रहा है इन दिनों. लोकतांत्रिक प्रविधियों के भीतर, घोर अलोकतांत्रिक शक्तियाँ अप्रकट हैं. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को कुचला जा रहा है. इमरजेन्सी के बाद पहली बार मीडिया पर ऐसी कार्यवाही की गई है. राष्ट्रवाद की भावना को आतंकवाद की हद तक बढ़ाने के प्रयास किए जा रहे हैं. असहमति को राष्ट्रद्रोह सिद्ध किया जा रहा है. अभी कुछ ही दिनों पहले अरुण जेटली ने फरमान जारी किया है कि सरकारी कर्मचारियों को सरकार की आलोचना करने का अधिकार नहीं है. ऐसा करने पर उनके खिलाफ कार्यवाही की जाएगी. म.प्र. के एक आई.ए.एस. अफसर ने जवाहरलाल नेहरू की तारीफ कर दी तो भाजपा सरकार ने सज़ा दे दी. जे.एन.यू. के प्रकरण से तो आप सब वाकिफ़ ही हैँ. एनडीटीवी का प्रकरण सरकार की इसी प्रवृत्ति का अगला कदम है.

असल में आधुनिक समय में अभिव्यक्ति की आज़ादी का सबसे बड़ा संवाहक मीडिया  ही है. मीडिया को अगर लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा गया है, तो यह सिर्फ एक अलंकारिक उक्ति भर नहीं थी. इसमें एक गहरा दायित्वबोध भी है. मीडिया के व्यापक प्रसार ने हर देश में सरकारों को चुनौती दी है. जो सरकारें तानाशाही प्रवृत्ति की होती हैं वो मीडिया की आवाज़ को दबाने की कोशिश करती हैं. जिन सरकारों को जनता से सरोकार होता है, वो मीडिया को सचेतक के रूप में अपना प्रतिद्वन्द्वी मानती हैं. तानाशाही शासन के प्राथमिक लक्षणों में ही यह है कि जनता की अभिव्यक्ति पर नियंत्रण किया जाय. उसके बाद दूसरी तरह की स्वतंत्रताओं को खत्म करना अपेक्षाकृत सरल हो जाता है. तानाशाह शासक परंपराओं को नकारता है. सामूहिकता का विरोध करता है. पूर्ववर्तियों को अक्षम बताता है. सुनहरे भविष्य के सपने दिखाता है. और यह भी कहता है कि इन सपनों को साकार करने की जादुई छड़ी सिर्फ उसी के पास है. इस उपक्रम में वह जनता को उनके मानवाधिकारों से वंचित करने का त्याग करने का आह्वान करता है.


उपरोक्त लक्षणों से अगर आप सहमत हों तो आप साफ देख सकेंगे कि हमारे देश में प्रछन्न तानाशाही की शुरुआत हो चुकी है. विपक्ष के खिलाफ भ्रामक प्रचार करना, विपक्षी शासन वाली राज्य सरकारों को षणयंत्रपूर्वक बर्खास्त करना, कांग्रेसमुक्त भारत की कल्पना करना, जन आन्दोलनों का बर्वरतापूर्वक दमन करना, मीडिया को अपना चारण बना लेना, यह सब तानाशाही शासन के  स्पष्ट लक्षण हैं. तानाशाह आवाज़ों से डरता है. इसीलिए वह सबसे पहले आवाज़ों को ही कुचलता है. एनडीटीवी देश के उन लोगों की आवाज़ है जिन्हें लोकतांत्रिक मूल्यों में आस्था है. जो इस देश में समरसता और सह-अस्तित्व के हिमायती हैं. जो यह कहने का दम रखते हैं कि राजा नंगा है !
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