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Friday, 9 September 2011

ज़िन्दगी सस्ती है यहाँ..!


 दिल्ली उच्च न्यायालय के सामने विस्फोट हुआ.अनेक मारे गए और घायल हुए. जांच एजेन्सियाँ जुट गई हैं पता लगाने में कि विस्फोट के पीछे किस संगठन का हाथ है. देर-सबेर पता लग भी जायेगा. हमारी एजेन्सियाँ नाकाम भी हो जायेंगी तो कुछ दिन में कोई न कोई आतंकवादी संगठन विस्फोट की ज़िम्मेदारी ले लेगा. हमारे हुक्मरान विस्फोट की निन्दा करेंगे और आतंकवादियों से कड़ाई से निपटने का झुनझुना हमें पकड़ा देंगे.
   
 दिल्ली हाईकोर्ट का परिसर अतिसंवेदनशील क्षेत्रों में है, जहाँ उच्च सुरक्षा व्यवस्था के मापदण्ड अपनाये जाते हैं. उच्च सुरक्षा वाली तो हमारी संसद भी थी. जब संसद पर आतंकवादियों ने हमला किया, तभी से यह समझ में आ गया था कि अब देश में कोई ज़गह सुरक्षित नहीं है. संसद पर हमले के प्रतीकात्मक अर्थ थे. वह हमला हमारी सदियों की विकास प्रक्रिया, हमारे आत्मसम्मान, एक राष्ट्र के रूप में हमारे पुरुषार्थ और हमारे शासनतंत्र के सुरक्षाबोध पर हमला था.उस हमले के प्रतीकार्थ देश की जनता ने तो समझ लिये, लेकिन हमारे शासक इसे समझ नहीं पाये. अमेरिका में 9
/11 के आतंकवादी हमले के बाद अब तक कोई हमला आतंकवादी नहीं कर पाये. जबकि अमेरिका को इस्लामिक कट्टरपंथी अपना सबसे बड़ा दुश्मन मानते हैं. ब्रिटेन में भी सुरक्षा के चौकस इंतज़ाम के बाद आतंकवादी कोई हमला नहीं कर पाये.
     
लेकिन हमारे यहां आतंकवादी जब और जहां चाहते हैं वहीं धमाके करके ज़िन्दगियां खत्म कर देते हैं. हमारा सुरक्षा तंत्र हर बार आग लगने के बाद कुआं खोदने निकल पड़ता है. कुछ ही दिनों पहले मुम्बई में सीरियल विस्फोट में अनेक लोगों की जानें गईं थीं. दरअसल अब हमें याद भी नहीं रहता कि हमारे देश में कहां-कब हमले हुए और कितनी जानें गयीं. जो मारे गए,वो तो गये ही, जो बचे हैं उनमें न तो कोई दहशत दिखती है,और न कोई आक्रोश. एक या दो दिन के लिए अखबारों और चैनलों को सामग्री मिल जाती है.खुफिया और सुरक्षा-तंत्र की सूची में एक और काम जुड़ जाता है. कुछ नेताओं को सहानभूति जताने का मौका मिल जाता है,तो विपक्षी दल कों, सरकार से इस्तीफा मागकर अपनी लोकतांत्रिक ज़िम्मेदारी पूरी करने का एक और सुअवसर होता है यह. इसके बाद देश फिर जुट जाता है अपनी रोजी-रोटी में, अगले हमले की प्रतीक्षा में.
    
  अगर कुछ दिनों तक आतंकवादियों ने नहीं मारा तो इस बीच दो-चार रेलदुर्घटनाएँ हो जायेंगी और हज़ारों ज़िन्दगियां खत्म. इस देश में बहुत सस्ती है ज़िन्दगी. यहां मरने के इतने विविध और नायाब तरीके हैं, कि बढ़ती हुई जनसंख्या हमारे लिए चिन्ता का कारण नहीं बनती. हम अगर दहशतगर्दों और प्रकृति के हाथ से बच भी गए, तो हमारी ही भूख हमें मार डालती है. विकास के घोड़े पर सवार इसी देश में हज़ारों जानें भूख से चली जाती हैं.
      
इसी उच्च न्यायालय के गेट पर तीन महीने पहले भी आतंकियों ने विस्फोट किया था. दैवयोग से तब कोई जान नहीं गई थी. यद्यपि यह ज़गह देश के सबसे मज़बूत सुरक्षा वाले शहर दिल्ली के वीवीआईपी क्षेत्र में शुमार है, लेकिन हमारी सुरक्षा एजेन्सियों ने इस हमले से कोई सबक नहीं सीखा.आतंकवादियों ने तीन महीने में ही दोबारा हमला करके बता दिया कि यह उनके लिए कितना साधारण काम है, और हमारे देश का सुरक्षातंत्र कितना सजग और कारगर है. खबरों के मुताबिक दिल्ली हाईकोर्ट के गेटों पर लगे मेटल डिटेक्टर काम नहीं कर रहे थे और परिसर में कहीं भी क्लोज़ सर्किट कैमरे नहीं लगे थे. यह उस इलाके की सुरक्षा व्यवस्था का आलम है जहां से बस दो किलोमीटर की दूरी पर देश की संसद है और बिल्कुल ही नज़दीक सुप्रीम कोर्ट.
     
हर हमले के बाद ये सवाल उठाये जाते हैं कि आखिर चूक कहां हुई, और किसने की चूक ? इस सवाल का कभी भी जवाब नहीं मिला..क्या कभी आपने सुना कि किसी हमले के बाद चूक करने वालों को कोई सज़ा मिली हो ! सज़ा तो दूर की बात है, कभी किसी को ज़िम्मेदार तक नहीं ठहराया गया. हमारे यहां आतंकवादी घटनाओं को प्राकृतिक आपदा मान लिया जाता है. जबकि साफ दिखता है कि ये घटनाएँ हमारे तंत्र के नाकारेपन, राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी और सामाजिक विषमता का परिणाम है. पाकिस्तान को छोड़ दें, तो दुनिया के दूसरे सभ्य देशों में जहां इस तरह की घटनाएं हुई हैं, उन्होने अपनी ग़लतियाँ सुधारीं और इस तरह के अमानवीय हमलों से अपने देश की जनता को महफूज़ किया. लेकिन एक राष्ट्र के तौर पर हम अपने नागरिकों को ऐसा आश्वासन नहीं दे पाये.
     
आतंकवाद एक वैश्विक चुनौती है लेकिन अफसोस की बात है कि इस पर एक वैश्विक ढकोसले के सिवाय और कुछ नहीं हो रहा है. पाकिस्तान घोषित तौर पर आतंकवाद की सबसे बड़ी मंडी है, और अमेरिका घोषित तौर पर आतंकवाद के खिलाफ लड़ने वाला सबसे मुखर योद्धा. लेकिन अमेरिका-पाकिस्तान के प्रणय-सम्बन्ध अक्सर दुनिया को संशय और भ्रम की स्थिति में डाल देते हैं. पाकिस्तान में आतंकवादी प्रशिक्षित होते हैं. वहां उन्हे धार्मिक कट्टरपंथियों का खुला समर्थन मिलता है. 26/11 के मुम्बई हमलों के गुनहगार वहां खुलेआम घूमते हैं और जलसे करते हैं. सैकड़ों संगठन हैं जो आतंकवादियों का निर्यात पूरी दुनिया को करते हैं. अमेरिका यह सब जानता है. अमेरिका आतंकवाद से लड़ने के लिए पाकिस्तान को पैसा और हथियार देता है. पाकिस्तान की आम जनता खुद आतंकवाद की सबसे बड़ी शिकार है. पिछले दस सालों में वहां एक लाख से ज़यादा लोग आतंकवादी घटनाओं में मारे जा चुके हैं.
      
अमेरिका यह भी जानता है कि उसके दिए गये पैसों से पाकिस्तान के हुक्मरान अपनी तिजोरियां भरते हैं. पाकिस्तान का औद्योगिक और आर्थिक विकास ठप्प पड़ा है. वहां की अधिकांश आबादी आज भी क़बाब,सुरमा और दरी-चादर बनाकर अपना पेट पालती है. अमेरिका यह भी जानता है कि उसके दिए गये पैसों और हथियारों का प्रयोग पाकिस्तान कभी-कभी उसी के खिलाफ़ कर लेता है. फिर भी वह पाकिस्तान को अपने सीने से लगाये हुए है. रणनीतिकार समझते हैं कि पाकिस्तान को अपने साथ रखकर अमेरिका अपने बड़े हित साधता है. पाकिस्तान को साथ रखने के जो नुकसान अमेरिका उठाता है, फायदे उससे कहीं ज़्यादा हैं.
       
यही वज़ह है कि आतंकवाद के ख़िलाफ़ अमेरिका की लड़ाई हमेशा संदिग्ध रही है.इस बात को हमारे देश के शासक समझते तो ज़रूर होंगे. पिर भी देखा यह जा रहा है कि अपने ही देश और नागरिकों की सुरक्षा के लिए अमेरिका से उम्मीद लगाये बैठे हैं कि वह पाकिस्तान पर दबाव बनाए. हर बार हमलों के बाद कुछ आतंकियों की सूची अमेरिका और पाकिस्तान के पास भेज दी जाती है. यही हमारी कूटनीति की अंतिम सीमा होती है. भारत को सबसे पहले तो यह तय करना होगा कि आतंकवाद के ख़िलाफ़ पूरी लड़ाई उसे अपने बूते पर लड़नी होगी. जिन सामरिक परिस्थितियों में भारत फंसा है, उनमें कोई दूसरा देश उसकी मदद नहीं करेगा. चीन-अमेरिका के आपसी रिश्ते चाहे जैसे भी हों, लकिन भारत के मसले पर दोनो ही पाकिस्तान के साथ खड़े दिखते हैं. भारत को रूस और इज़राइल जैसे देशों के साथ कूटनीतिक सम्बन्धों को और मजबूत करना चाहिये. ये दोनो ही देश लंबे समय से इस्लामिक आतंकवाद से लड़ते आ रहे हैं. इज़राइल ने अपने दम पर अपनी सुरक्षा को लगभग अभेद्य बना लिया है. रूस ने भी अपने यहां एक हद तक नियंत्रण पा लिया है. एक दशक पहले और आज के रूस में आप फर्क देक सकते हैं.
     
फिलहाल बड़ा सवाल यह है कि हमारे देश में ऐसा जागरण कब होगा ? देश के नागरिकों के आत्मबल और इच्छाशक्ति का सीधा और गहरा सम्बन्ध राष्ट्र के राजनीतिक नेतृत्व की क्षमताओं से होता है. हम आतंकवाद से लड़ने में कमज़ोर साबित हो रहे हैं. खबरें ऐसी हैं कि दिल्ली हाईकोर्ट का यह हमला अफज़ल को फांसी दिये जाने के निर्णय के बदले में किया गया है.यह निर्णय बहुत देर से आया. मुम्बई हमलों का हमलावर कसाब अभी भी जेल में है. आतंकवाद के मसलों पर हमें एक त्वरित न्यायिक प्रक्रिया की भी दरकार है. जब इतने दिनों तक मुकदमें चलते हैं तो अपराधियों के प्रति जनभावनाओं में बदलाव भी आता है. अफज़ल की फांसी के विरोध के स्वर अपने ही देश से भी उठने लगे हैं
       
हमारे विकास और महाशक्ति बनने के सारे दावे बेमानी हो जायेंगे अगर हम अपने देश के नागरिकों को एक सुरक्षित जीवन नहीं दे सकते. किसी भी राष्ट्र के हुक्मरानों का यह पहला धर्म होना चाहिए.निर्दोष ज़िन्दगियों का यह सामूहिक कत्ल, हमारे पौरुष पर सबसे बड़ा कलंक है.
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