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Tuesday, 6 December 2011

संसद में शीर्षासन..!

           
   जैसा कि होना भी चाहिए, देश के लोगों में अपनी संसद के प्रति अत्यधिक सम्मान है. आख़िर यह वह ज़गह है जहाँ सवा अरब जनता की आकांक्षाएँ बसती हैं. यही वह ज़गह है जहां लोकतंत्र के सारे भ्रम भी पलते हैं. इसी संसद में हमारे असली भाग्य-विधाता रहते हैं. यही संसद हमारी अस्मिता भी है, और यहीं से हमारे दुर्भाग्य की अनेक नदियां भी निकलती हैं. इसीलिए जब हमारी संसद पर आतंकी हमला होता है तो पूरा देश उबल जाता है. ऐसे में मुझे याद आती हैं वो स्त्रियां जो खुद भले ही पतियों का जीना हराम कर दें, पर कोई दूसरा एक शब्द भी टेढ़ा बोल दे तो लड़ जाती हैं.
             संसद पर हमारी ग़ज़ब की आस्था है. हालांकि देश की एक बड़ी आबादी यह जानती भी नहीं कि उनके जीवन की अनेक परिस्थितियों के निर्णय इसी संसद में लिए जाते हैं, या यह कि वहां जो निर्णायक बैठे हुए हैं, वो इन्हीं के भेजे हुए है. यह अज्ञानता हमारी राजनीतिक साक्षरता पर सवाल है. लेकिन इस सवाल की ओट लेकर भी संसद में बैठे लोग अपनी गैर-ज़िम्मेदाराना हरकतों की जवाबदेही से बच नहीं सकते. यहां पक्ष और विपक्ष का विभाजन भी उतना ज़रूरी नहीं है.
             आप भी देख रहे हैं कि संसद के पिछले तीन सत्र बिना किसी काम काज के बीत जा रहे हैं. पहले दूरसंचार और राजा, फिर लोकपाल और काला धन, और अब FDI. इन मुद्दों ने संसद के पिछले तीन सत्रों में कोई काम नहीं होने दिया. दुर्भाग्य और बड़ा तब हो जाता है, जब इन मुद्दों का भी कोई हल नहीं निकलता. विपक्ष पहले से ही तय करके आता है कि वह संसद नहीं चलने देगा. उसके पास कोई रचनात्मक मुद्दे नही हैं. उसे लगता है कि संसद को न चलने देना ही सरकार की सबसे बड़ी नाकामी प्रमाणित होगी. ऐसा होता भी अगर सरकार में ही कुछ लाज बची होती. सत्ता पक्ष के लोग भी विपक्ष के इस खेल को समझते हैं. इसीलिए संसद के सत्र के समय सब चिकने घड़े में तब्दील हो जाते हैं. उनके दो सबसे बड़े हथियार हैं. पहला, चुप्पी....और दूसरा, समिति गठित करना. अक्सर तो उनका काम पहले वाले हथियार से ही चल जाता है. अगर कभी यह असफल भी हो जाए तो दूसरा तो ब्रह्मास्त्र है.
               लेकिन यह ब्रह्मास्त्र विपक्ष की ओर नहीं चलता. इसकी दिशा और मारक क्षमता की रेंज में देश की जनता आती है. विपक्ष के भीतर भी एक संतोष होता है कि उसने सत्ता पक्ष को मात दे दी . और सत्तापक्ष भी बच निकलने के आत्म-संतोष से भरा होता है. ऐसा लगता है कि संसद जैसे मारने-बचने का रंगमंच बन गयी है. यहां उस तरह की नौटंतियां देखने को मिलती हैं, जिनमें छः लोग बारह किरदार निभाते हैं. एक ही आदमी कुछ देर के लिए पुलिस बना रहता है और बाद में वह डाकू के किरदार में आ जाता है. संसद में इसी तरह के अन्तःपरिवर्तन करते हैं किरदार.
              हमारी विवशता यह है कि हम संसद की इस नौटंकी के महज़ दर्शक हैं संसद के हर निष्फल सत्र के दौरान मीडिया में ये ब्यौरे आ जाते हैं कि प्रतिदिन धन का कितना नुकसान हो रहा है. लेकिन यह सिर्फ धन हानि का मसला नहीं है. देश और नागरिकों से जुड़े कितने ही मसले बलि चढ़ जाते हैं सत्ता और अहंकार की इस लड़ाई में.संसद और उसके बाहर हम अपने भाग्य विधाताओं के प्रहसन को ज़रा करीब से देखते हैं.

               कुछ दिनों से देश की राजनीति बेहद सक्रिय अवस्था में है. जैसे कोई सुप्त ज्वालामुखी फिर से सक्रिय हो गया हो.पहलवानों ने अपने मुगदर,डंडे निकाल लिए हैं.जो इधर-उधर कहीं थे,उन्होंने अपने दीगर काम फिलहाल मुल्तवी कर दिए हैं.पूरी एकाग्रता के साथ सब अखाड़े में आकर जम गये हैं.
              यूँ तो हमारे देश में नेताओं के पास ज़्यादा काम होता नहीं, क्योंकि जो असल चुनौतियाँ हैं उनसे कोई मुठभेड़ नहीं करना चाहता.इसलिए ज़्यादातर समय नेतागण खाली बैठे रहते हैं.अपने इसी खालीपन को भरने के लिए ये लोग अपने जन्मदिन इत्यादि के बहाने कभी-कभी सुर्खियों में आने की कोशिश करते रहते हैं.चूँकि हमारे देश में, किसी और देश की तुलना में महापुरुष ज़्यादा पैदा होते हैं,अतः किसी न किसी का जन्मदिन या पुण्यतिथि पड़ती ही रहती है.यही वह सुअवसर होते हैं जब हमारे राजनीतिज्ञों को अपनी प्रतिभा दिखाने का मौका मिलता है.
             लेकिन पिछले कुछ समय से एक के बाद एक ऐसी घटनाएँ होती गयीं कि सारे राजयोगी जीवित हो उठे.पक्ष हो या विपक्ष, सबके पास काम आ गया.पहले 2जी घोटाले पर सुप्रीम कोर्ट ने सरकार की मुश्कें कसीं, फिर पांच राज्यों में विधानसभा के चुनाव हुए,34 साल पुरानी वाम दलों की सरकार ढहाकर ममता दी नें अपनी सरकार बनाई,अन्ना हजारे अचानक भ्रष्टाचार के खिलाफ धरने पर बैठ गये तो पक्ष-विपक्ष दोनो हड़बड़ा गए.और फिर कुछ दिनों से काले धन के मसले पर सरकार को खुजली करने वाले योग गुरु बाबा रामदेव का धरनाहुआ,लाठीचार्ज,जूतमपैजार,चीरहरण इत्यादि,भारतीय राजनीति की सभी लीलाएँ देखने को मिलीं.इन सब अवसरों में ये स्पष्ट हुआ कि हमारी राजनीति दोमुही नहीं कई मुह वाली है.ऐसे एसे पैंतरे देखने को मिल रहे हैं कि जनता अपना दुख-दर्द भूलकर इन करतबबाज़ों की तमाशबीन बन गई है.उसे कुछ वैसा ही रस मिल रहा है जैसे सांप और नेवले का खेल देखते हुए मिलता है. यही हमारे नेताओं की खूबी भी है कि जब भी जनता कराहती है ये उसे कोई न कोई तमाशा दिखाने लगते है.
              बात शुरू करते हैं बाबा रामदेव के आन्दोलन(?) से. पिछले चार-पांच सालों में देश में योग-क्रान्ति कर चुके बाबा रामदेव को न जाने किस महत्वाकांक्षा ने इतना प्रेरित किया कि उन्होंने भ्रष्टाचार मिटाने का बीड़ा उठा लिया.फिर जो कुछ हुआ और हो रहा है,वह सब तो आप भी देख रहे हैं.इस पूरे घटनाक्रम में जो राजनीतिक पैंतरेबाज़ी है वह बड़ी दिलचस्प है.
              सोनिया गांधी को चारों ओर से गालियाँ दी गईं.लोगों ने मज़े ले-लेकर कहा कि सोनिया की सरकार ने बड़ी मूर्खता कर दी बाबा को पिटवाकर,अब सरकार का बचना मुश्किल है.पर आप गौर से देखेंगे तो आपको लगेगा कि सोनिया गांधी वर्तमान भारतीय राजनीति की चाणक्य हैं. कुछ समय से काले धन और भ्रष्टाचार के मसले पर सुप्रीम कोर्ट से लेकर अन्ना, बाबा और देश की जनता ने यूपीए सरकार का जीना हराम कर रखा था.सरकार के पास इनके सवालों के कोई ज़वाब नहीं थे.सरकार इसलिए भी ज़्यादा परेशान थी कि ये सवाल विपक्षी दलों की ओर से नहीं बल्कि आम युवा और न्यायपालिका की ओर से आ रहे थे.विपक्ष से निपटना तो उनको आता है क्योंकि उसकी सीमाएँ वो जानते हैं.
              सत्ताधारी यूपीए सरकार बहुत समय से इस प्रयास में थी कि किसी तरह से भ्रष्टाचार की जनता की लड़ाई, सत्तापक्ष और विपक्ष की लड़ाई में तब्दील हो जाये. ऐसा होने पर उसे कई फायदे थे. मुख्य मुद्दे से जनता का ध्यान हट जाता, कार्यकर्ता ऐसे ही समय में एकजुट होते हैं.अगले चुनाव की तैयारी के लिहाज से यह काफी सुखद माहौल होता. दूसरे वो ये भी जानते हैं कि काले धन और भ्रष्टाचार पर विपक्ष खुलकर कभी भी सामने नहीं आ सकता क्योंकि उसके दामन पर कम दाग नहीं हैं.
              राजनीति में कच्चे बाबा रामदेव की अदूरदर्शिता ने कांग्रेस को वह अवसर दे दिया जिसकी तलाश में वे थे.लाठीचार्ज से पैदा हुई भावुकता में भाजपा, आरएसएस और दूसरे विपक्षी दलों के शामिल हो जाने से मुख्य मुद्दा नेपथ्य में जाता हुआ दिख रहा है और लड़ाई पक्ष-विपक्ष की बनती जा रही है.सबसे मज़े कि बात ये है कि इस लड़ाई में कोई सूत है न कपास, बस जुलाहों में लट्ठमलट्ठ मची हुई है.
             ठीक इसी तरह से अन्ना के जोश को भूल-भुलैया में डाला जा चुका है.इन सबके लिए जो पैंतरे अपनाए गये वो नये नहीं थे और भारतीय राजनीति में मान्य भी हैं.संसद अब अपनी पुरानी चाल पर लौट आयी है. वहां अभी भी गतिरोध कायम है.

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