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Monday, 21 May 2012

दरअसल की ज़गह पर

तुम्हारे होने की ज़गह पर
जब तुम्हारा न होना होता है
उस वक़्त मैं
कुछ भी हो जाने की ज़गह पर होता हूँ ।

जैसे ये लाल रंग की शर्ट
जो मैने पहनी है
दरअसल यह बैगनी रंग की ज़गह है ।

यह जो ज़गह
तुम्हारे समुद्र होने की थी
ठीक वहीं पर
मेरे रेगिस्तान होने की रेत है
जिस पर
अज़नबी देशों को जाने वाले
ऊँटों के खुरों के निशान हैं ।

मेरे घर के सामने
जो कटहल का पेड़ है
वो दरअसल
आम के पेड़ की ज़गह है ।

ठीक इसी तरह
मेरे तकिए पर जो गीला सा धब्बा है
वो मेरी बेलौस हँसी की ज़गह पर
कब आ गया
क्या पता चला किसी को !

जिस ज़गह मेरी यह कविता है
वहाँ एक ऋषि
एक राजा को
संतान सुख दे रहा था ।

मेरा जीना
अब एक विस्थापित जीवन है
जिसे मैं
दरअसल की ज़गह पर जी रहा हूँ ।

-------------------------विमलेन्दु
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