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Thursday, 20 December 2012

खोये हुए व्यक्तियों के बारे में

इनके बारे में
जो जानकारियाँ होती हैं
वो विश्वसनीय नहीं होतीं उतनी ।

जिन ज़गहों पर दर्ज होती है इनकी गुमशुदगी
वहाँ कई बातें छुपा ली जाती हैं सचेत होकर ।

कि जब उनके कपड़ों का
रंग दर्ज़ कराया जाता है
नीली कमीज और खाकी पैन्ट
उस वक्त ये नहीं बताया जाता
कि पिछली होली से ही
वह अचानक रंगों से डरने लगा था.
या कि एक वो
जिसके जीवन से लाल के अलावा
सभी रंग ख़ारिज़ हो चुके थे ।

रोज़नामचे में
यह कहीं नहीं लिखा जाता
कि गुम होने के वर्षों पहले से
वो जो भूमिगत था अपने ही भीतर
आखिर वह किस युद्ध की तैयारी कर रहा था ।
या यह कि जीवन की किस लड़ाई का
वह पराजित योद्धा था ।

क्या कभी कोई यह लिखवाता है
कि एक थाली कम परोसते हुए
माँ के हाथ
क्यों पहुँच जाते हैं आँख की कोर तक !
कि उनकी पत्नियां
माँग में भरते हुए सूनापन
ईश्वर से प्रार्थना करती हैं या शिकायत,
यह भी प्रामाणिक रूप से
नहीं बताया जा सकता ।

यूँ तो गुम होने की कोई उम्र नहीं होती
लेकिन कई बार उम्र भर
उनके लौटने का रास्ता देखते हैं लोग ।
किसी भी गुमशुदगी का
यही वह पहलू होता है
जहाँ सबसे अधिक चुप्पी  होती होती है.
यह कभी नहीं पता चल पाता
कि किन किन रुलाइयों में
एक रुलाई
किसी के खो जाने के लिए भी है ।
कि रोने के लिए
नहाने का वक्त चुनने वाले का
क्या रिश्ता तय किया था वक्त ने
उस गुमशुदा से ।

जिन भी अनजानी ज़गहों पर
हवा में घुलती होगी इनके सीने की भाप
और धूल से मिलता होगा
इन गुमशुदा लोगों का पसीना
वहाँ किस प्रजाति के पौधे उगते होंगे !

यद्यपि किसी इतिहास में
दर्ज़ नहीं होती खो जाने वालों की सूचना
लेकिन इनकी जय-पराजयों पर ही
टिके होते हैं
चक्रवर्ती सम्राटों के अभेद्य दुर्ग ।

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