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Tuesday, 18 December 2012

नकली नायकों का देश-काल !




चुनौतियाँ जितनी बडी होती हैं, उन्हें परास्त करने के बाद का सुख उतना ही बड़ा होता है.
हवायें जितनी तेज़ हों, उनके ख़िलाफ चलने का रोमांच उतना ही अद्भुत होता है.  नदी की धार के विपरीत तैरने वाले की छाती कुछ अलग ही होती है.ऐसे कौतुक करने वाले लोगों की एक विशिष्ट छवि दर्ज़ करता है ज़माना. ज़माना ऐसे ही लोगों को नायक बना देता है. जब लड़ाइयाँ बड़ी हों तो लड़ने का कारण छोटा हो जाता है. तब लड़ने वालों का शौर्य केन्द्रीय और महत्वपूर्ण हो जाता है. नायकों के गढ़े जाने का मनोविज्ञान कुछ अलग ही होता है. यह एक द्वन्द्वात्मक पद्धति होती है. एक उभयपक्षीय अभिक्रिया से नायकों का निर्माण होता है. कई बार इसमें एक तीसरा पक्ष भी शामिल हो जाता है.

एक व्यक्ति नायक कब बनता है
? जब वह कुछ ऐसे काम करता है, जो हर कोई नहीं कर सकता. साफ है कि नायकत्व के साथ अद्वितीयता का तत्व प्रधान हो जाता है. जिन छवियों में हम नायक की छवि देखते हैं, उनमें हम उन गुणों को देखते हैं जो हममें नहीं होते हैं. ये सामान्य गुण भी नहीं होते. सबके पास भी नहीं होते. सबके पास होना संभव भी नहीं होता. इसीलिए जिस व्यक्ति में ये गुण दिखते हैं, उसकी एक विशिष्ठ जगह बन जाती है हमारी चेतना में. जितना विरल गुण होता है, उसे धारण करने वाले नायक का आभामंडल उतना ही विराट होता है. और उतना ही बड़ा सम्मोहन होता है हमारे लिए.

नायकत्व का दूसरा पक्ष भी है. अक्सर हमारा हीनताबोध भी किसी को नायक बना देता है. हम जो काम करने में असमर्थ होते हैं, उन्हें किसी और को करते देखना हमें प्रभावित करता है. यह प्रभाव ही उस आकर्षण की प्रवेशिका होता है. जैसे-जैसे यह आकर्षण बढ़ता जाता है, हम उस व्यक्ति में और गुण खोजने लगते हैं. और कई बार तो हम गुणों को उस व्यक्ति में आरोपित भी करने लगते हैं. इसके बाद यह स्थिति भी आती है कि उस व्यक्ति के अवगुण या सामान्य गुण भी हमें विशिष्ट गुण नज़र आने लगते हैं. यही भावदशा नायक के निर्माण की है. तुलसी ने इसी भावदशा में राम को नायक बना दिया था. राम का सामंती और स्त्रीविरोधी चरित्र तुलसी द्वारा गढ़े गए नायकत्व में नदारत हो गया. बाल्मीकि ने जो रामकथा लिखी उसमें दूसरी बात है. बाल्मीकि कई जगह राम को धिक्कारते हैं.

यह वह समय था जब संचार के माध्यम बहुत सीमित और पिछड़े हुए थे. मीडिया जैसे किसी माध्यम का अस्तित्व ही नहीं था. अतः नायक निर्माण की प्रक्रिया द्विपक्षीय ही होती थी. एक तरफ नायक का प्रभामंडल होता था और दूसरी तरफ वो भावक होते थे जिनकी प्रतिक्रियाओँ से उस नायक का प्रभामंडल पुष्ट होता था. लेकिन आधुनिक समय में एक तीसरा पक्ष भी जुड़ गया है. वह है ज़बरदस्त प्रभाव और पहुँच वाला मीडिया. मीडिया के शामिल हो जाने से नायक बनना जितना आसान हो गया है, नायकत्व उतना ही संदिग्ध हो गया है. दरअसल यह ज़माना ही बिचौलियों का है. जीवन के हर प्रदेश में बचौलिये सक्रिय हैं. अब हमारा हमसे ही परिचय बिचौलियों के माध्यम से हो रहा है. वस्तु और व्यक्तियों की छवियां परिष्कृत, परावर्तित और परिवर्तित होकर हमारे पास तक आती हैं. भावक और आराध्य के बीच मीडिया की जबरदस्त उपस्थिति है. आराध्य अपनी छवियों को गढ़ने के लिए मीडिया का उपयोग करते हैं. अब लोग तनख़्वाह देकर छवि-प्रबन्धक ऱखते हैं. दुनिया में जैसे-जैसे धन बढ़ता जा रहा है, नायकों की संख्या भी बढ़ती जा रही है. इनमें ज़्यादा संख्या नकली नायकों की है.

नकली नायक अपने संसाधनों के प्रभाव से असली नायकों को विस्थापित कर देते हैं. अब तो असली नायक बन ही नहीं पाते. यह खेल जीवन में हर जगह चल रहा है. इसके सर्वाधिक उदाहरण हमें सिनेमा और राजनीति में मिलेंगे. धन और छवि की तानाशाही सबसे ज़्यादा इन्ही क्षेत्रों में दिखती है. आधुनिक समाज को, राजनीति और सिनेमा ने जितना प्रभावित किया है, उतना किसी और विचार या कला माध्यम ने नहीं. इसीलिए सर्वाधिक संख्या में इन्ही जगहों से नायक प्रकट हो रहे हैं. नायक चाहे राजनीति के हों या सिनेमा के, अब दोनों ही अपने प्रशंसकों को गुमराह करते हैं.वो लोगों को जीवन की कड़वी सच्चाइयों से दूर ही करते हैं. सिनेमा का तो खैर काम ही है नकली नायक गढ़ना.

सिनेमा अस्थाई तौर पर नायक-नायिकाओं का निर्माण करता है. लेकिन इस माध्यम का प्रभाव जनता के मानस पर इतनी ज़बरदस्त पड़ता है कि धीरे-धीरे यही अस्थाई नायक उनके नायक बन जाते हैं. अब चूँकि सिनेमा मूलरूप से एक व्यवसाय है और उसका पहला लक्ष्य है धन को गुणित अनुपात में बढ़ाना, इसलिए सिनेमाई नायकों की छवि इस तरह तैयार की जाती है जो दर्शकों को यथार्थ से स्वप्न की दुनिया में ले जा सके. हर मनुष्य के भीतर कुछ ऐसे शाश्वत स्वप्न होते हैं, जिन्हें पाने के लिए वह अपना कुछ भी लुटा सकता है. सिनेमा और उसके नायक हमारी इसी स्वप्न-प्रियता को अपने लिए धन में तब्दील कर लेते हैं. हम इस कदर उनके मोहपाश में बंधे होते हैं, कि यह जानते हुए भी इन नायकों के सारे करतब, सारे गुण एक बड़ी टीम और तकनीक के द्वारा महीनों के परिश्रम से उत्पादित किए गए हैं, उनकी इस कृत्रिम छवि पर अविश्वास नहीं कर पाते. इसकी वजह यही है कि सिनेमा द्वारा दिखाई गई कृत्रिम छवि, हमें हमारे द्वारा रची गई हमारी ही काल्पनिक छवि के नज़दीक पहुँचा देती है.

राजनीति और सिनेमा के नायकों में मौलिक अंतर भी है. यद्यपि अभिनय दोनों ही जगह है. सिनेमा घोषित रूप से कल्पना के सहारे चलता है. वह सच होने का दावा कभी नहीं करता. वह छद्म ज़रूर है, पर छल नहीं. लेकिन राजनीति के नायकत्व में छद्म भी है और छल भी. राजनीति के नायक यह दावा करते हैं कि वो जैसे दिख रहे हैं वही सच है. नाट्यशास्त्र से लेकर कामशास्त्र तक, नायकों के जितने गुण बताए गए हैं, उनमें एक प्रमुख गुण नेतृत्व की क्षमता भी है. वह ऐसा व्यक्ति होता है जिसमें समूह को रास्ता दिखाने और आगे ले जाने की क्षमता होती है.

साहित्य और कलाओं के नायक जनता का वैचारिक नेतृत्व करते हैं. वे अपने समय और समाज को कुछ अभिनव विचार भी देते हैं, साथ ही समाज की मनीषा को दिशा भी देते हैं. लेकिन विडंबना है कि अब साहित्य और कला क्षेत्रों से हमारे नायक नहीं बनते. दुनिया के किस लेखक-वादक-नर्तक-चित्रकार को वो रुतबा हासिल है जो सिनेमा के टॉम क्रूज, अमिताभ बच्चन, शाहरुख-सलमान जैसों को मिला हुआ है. यहाँ यह सच्चाई भी नज़रअंदाज कर दी जाती है कि सिनेमा के इन नायकों को रचने वाले कोई लेखक-संगीतकार-नर्तक ही होते हैं. यहीं पर यह सवाल भी विचारणीय है कि सिनेमा के नायक मनुष्य और समाज को कौन सी दिशा देते हैं और कहाँ ले जाते हैं ?  कुछ और सवाल है, पर वो बहुत छोटे हैं और उनके जवाब भी आसान हैं. मसलन, कि सिनेमाई नायकों का बौद्धिक स्तर क्या होता है ? उनकी संवेदनाएँ कितनी विश्वसनीय होती हैं ? अपने समाज के साथ उनके रिश्ते कितने असली होते हैं ? अपने देश और समाज के प्रति उनकी ज़िम्मेदारियाँ क्या होती हैं ? और वो इन ज़िम्मेदारियों को कितना निभाते हैं ??

ठीक यही सवाल हमारी राजनीति के नायकों से भी किए जा सकते हैं. सिनेमा के नायकों को एक बार हम छोड़ भी दें, लेकिन राजनीति के नायकों से ये सवाल ज़रूर किए जाने चाहिए. राजनीति के नायकों का समाज में सीधा हस्तक्षेप होता है. समाज के निर्माण और विकास के जितने भी उपादान हैं, उन सबकी नियंत्रक राजनीति ही होती है. इसीलिए राजनीति के नायकों की भूमिका और महत्व भी उतना ही बड़ा होता है. लेकिन जैसे-जैसे राजनीति, सेवा से व्यवसाय बनती गई, नायक-निर्माण की वही प्रविधि अपनायी जाने लगी, जिसका प्रयोग सिनेमा करता है. राजनीतिक व्यक्ति मीडिया और छवि-प्रबंधकों की मदद से जनता के मनोविज्ञान के अनुकूल अपनी छवि को प्रक्षेपित करता है.

इसे एक बडे सामयिक उदाहरण से समझा जा सकता है. मीडिया में आज जिस राजनेता की देश के अगले प्रधानमंत्री के रूप में सबसे अधिक चर्चा है, उनके नायकत्व का निर्माण कैसे हुआ इसे देखते हैं. पिछले पंद्रह-बीस वर्षों में भारत एक विशेष सम्प्रदाय द्वारा उत्पादित आतंकवाद से त्रस्त है. यह भी जगजाहिर है कि कौन सा देश इसे प्रायोजित करता है. वैश्विक स्तर पर भारत की राजनीतिक उपस्थित भी कुछ उल्लेखनीय नहीं है. इधर पिछले पाँच वर्षों में आर्थिक विकास की दर भी गिर रही है. राष्ट्रीय स्तर की राजनीति में कोई प्रभावशाली नेतृत्व दिखाई नहीं पड़ रहा है.

इसी परिदृश्य में देश के एक ऐसे प्रदेश से, जिसकी पहचान कच्छ के मरुस्थल, महमूद गजनवी के आक्रमण और लूटपाट, सूखा, जल-संकट, विदेशी तस्करी और गरीबी से थी—वहीं से उस राजनेता का उदय होता है, जिसे आज देश के प्रधानमंत्री पद का सबसे उपयुक्त दावेदार कहा जा रहा है. इस नेता ने जब अपने प्रदेश की सत्ता संभाली तो वहाँ से उस सम्प्रदाय का सुनियोजित तरीके से सफाया कर दिया, जो सम्प्रदाय वैश्विक आतंकवाद का पर्याय बन चुका है. गरीबी से उबरकर यह प्रदेश आज देश का सबसे विकसित राज्य बन गया है. पिछले वित्तीय वर्ष में इस राज्य ने आर्थिक विकास की वह दर हासिल कर ली, जो दुनिया के सर्वाधिक विकसित देशों की है. अंतर्राष्ट्रीय कम्पनियाँ उस प्रदेश में कारोबार करने के लिए दौड़ पड़ीं. गुजरात की यह विकास-गाथा देश की बहुसंख्य जनता का स्वप्न बन गई, और नरेन्द्र मोदी उसके नायक.

मीडिया में यह विकास-गाथा इस तरह से पेश की गई कि नरेन्द्र मोदी का साम्प्रदायिक चरित्र लोगों ने भुला दिया. जो भुला नहीं पाये, उन्होंने उसे स्वीकृति देकर उसके पक्ष में तर्क गढ़ लिए. कुछ इसी तरह के नायक बाल ठाकरे भी थे, जिनका नायकत्व एक सम्प्रदाय विशेष के विरोध से बना था. अब उनके भतीजे राज ठाकरे एक क्षेत्र-विशेष का विरोध करके नायक बनने की कोशिश कर रहे हैं. मायावती दलित-अस्मिता को आधार बना कर नायिका बनी हुई हैं तो राहुल गाँधी को कलावती के सहारे नायक बनाने की कोशिश की जा रही है.

लेकिन हमारी भी मजबूरी है. इस चकाचौंध से भरी दुनिया में असली और नकली की पहचान करना बड़ा मुश्किल हो गया है. और फिर अपनी भी सीमाएं हैं. कौन राम है और कौन रावण, यह पहचान करना कठिन हो गया है. अगर रावण पहचान लिया जाये तो यह पता नहीं चलता कि कहाँ पर तीर मार कर इसे मारा जा सकता है. फिर भी हमें सचेत तो रहना ही होगा. हमें उन नायकों को खोजना होगा जो हमारे जीवन को सही दिशा में आगे ले जा सकें. जो हमारी जड़ता को खत्म करने के लिए प्रेरित कर सकें. हमें ऐसे नायक खोजने चाहिए जो कुछ तो अंधेरा कम कर सकें हमारे भीतर का. बेहतर तो यह होगा कि हमें खुद नायक बनने के बारे में सोचना चाहिए.

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