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Tuesday, 15 January 2013

समकालीन कविता का पहला कोण !

हिन्दी कविता को समवेत पढ़ने का मौका अब तक नहीं निकल पाया है मेरे लिए. इसीलिए हिन्दी कविता पर ऐतिहासिक सन्दर्भों में कुछ कहने के खतरे भी मालूम हैं मुझे. अपने कुछ प्रिय कवियों को पढ़ते हुए आज़ादी के बाद की हिन्दी कविता से कुछ खून का रिश्ता जैसा बनता गया. ठीक उसी तरह जैसे आजादी के पहले की कविताओं को पाठ्यक्रम में पढ़ने से एक अनुराग का रिश्ता बना है. समकालीन कविताओं को पढ़ते हुए मुझमें कुछ जिज्ञासाएँ पैदा होती रहीं हैं जिन्हें मैं यहाँ पर अपनी धारणा के शिल्प में कहूँगा. कई बिन्दुओं पर आपको लग सकता है कि यह अधजल गगरी  कुछ ज्यादा ही छलक रही है. ये कुछ छोटे-छोटे नोट्स हैं, इसीलिए कुछ असम्बद्ध भी होंगे. लेकिन मेरी इच्छा है कि मैं आजादी के बाद की कविता में आये गुणात्मक बदलावों को कुछ हद तक रेखांकित कर पाऊँ ।
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जिस हिन्दी कविता को मैं जानता हूँ और दरअसल जिससे मेरा सरोकार है, वह कविता विभिन्न वादों से परे अपनी निबंधता में मुझ तक आती है. यह कविता भारत के प्रथम नागरिक और भारत के अंतिम नागरिक—दोनो के पक्ष में एक साथ खड़ी दिखाई पड़ती है. लेकिन मैं इसे कविता का दो-मुहापन नहीं मानता. कविता भी यह जानती है कि हम चाहे जितना हाथ-पैर मार लें, भारत के अंतिम नागरिक के भाग्य का नियन्ता, भारत का प्रथम नागरिक ही है. अतः प्रथम नागरिक को साक्षर करने का जिम्मा अगर कविता ले रही है तो इसमें, अंतिम नागरिक के पक्ष में कविता की गहरी चाल है.
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आज़ादी के बाद भारत में धार्मिक और जातीय व्यवस्था का पुनर्गठन हुआ. शंकराचार्यों, बुखारियों और कांशीरामों की आत्माओं ने कई जीर्णानि वाशांसि बदले. इस काल में, इन सभी अवतारों के अपने भिन्न-भिन्न स्वार्थ रहे. अपने पक्ष में इन्होंने कांकर-पाथर जोड़कर चुनाए गये मन्दिर-मस्ज़िद तथा गाय और सूअरों तक का इस्तेमाल कर लिया. लेकिन एकदम निरीह समझा जाने वाला कवि और उसकी कविता उनके पक्ष में नहीं गई. मुझे हिन्दी कविता की यह सबसे बड़ी उपलब्धि लगती है.
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कुछ लोगों का कहना है कि इधर कविता का सरलीकरण हुआ है. शब्दों, उनके अर्थों, वस्तुओं और प्रतीकों आदि का सामान्यीकरण हुआ है. लेकिन मुझे इसका उल्टा लगता है. अपने गठन, प्रतीकों और विम्बों में, बाहर से देखने पर  यह कविता सरल दिखाई पड़ सकती है. हालांकि इस कविता को जनमके बाद सनम, करम’, ‘बलम’, ‘न हम’, ‘न गम’, ‘बम बम–जैसी तुकें ढूढ़ने की मशक्कत नहीं करनी पड़ती, ल्किन अपनी भाषा और प्रतीकों के द्वारा इस कविता ने जो गठन प्राप्त कर लिया है, और हमें डिस्टर्ब कर देने की जो ताकत अर्जित कर ली है, वह चमत्कारिक है. इस गठन और इस ताकत को पाने के लिए कवि को जो संघर्ष करना पड़ता है, वह कोई कवि ही महसूस कर सकता है. मुझे लगता है कि आज की कविता में चीज़ों का विशिष्टीकरण हुआ है. इन कविताओं में हमारे हँसने, बोलने, बैठने, उठने, रोने-गाने जैसी नितान्त अलक्षित और सामान्य क्रियाओं ने भी, विशिष्ट काव्यात्मक अर्थ ग्रहण कर लिए हैं. नदी-पहाड़-पेड़-पौधे-पशु-पक्षी, हमारे जीवन की गहनतम संवेदनाओं के प्रतीक बन गये हैं. मुझे लगता है कि आज़ादी के बाद की हिन्दी कविता, चित्रकला के ज़्यादा नज़दीक गई है.
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हम जिस कविता को पढ़ते हैं,उसके रचयिता का सौन्दर्यबोध बदला है. इस कवि को सौन्दर्य-अनुभूति और अभिव्यक्ति के लिए कूलन में केलिन में बगरो बसन्तनहीं चाहिए. इसकी आँखें उन्नत वक्ष, पुष्ट नितम्ब और गम्भीर-नाभि में नहीं टिकती. इस कवि को आटा माड़ते हुए स्त्री का चुपके से नाक पोंछ लेना सुन्दर लगता है. हमारे केदारनाथ सिंह जी उसका हाथ/ अपने हाथों में लेते हुए/ सोचते हैं/ कि दुनिया को/ हाथ की तरह गर्म और सुन्दर होना चाहिए.”  कुमार अंबुज एक सुन्दर सी शाम को/ पत्नी के हाथ की सिकी रोटी की तरह फूली हुईदेखते हैं. वे चाहते हैं कि इस शाम की सारी भाप निकाल कर/ घी चुपड़ कर/ इसे आधा-आधा खायें दोनों.
इस बदले हुए सौन्दर्यबोध की एक विशिष्टता यह है कि इसका काव्यात्मक प्रक्षेपण आध्यात्म पर नहीं होता. यह हमारे वस्तुजगत की गतिविधियों से सीधे जाकर जुड़ता है.
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यानी हम उस कविता की बात कर रहे हैं जो व्यक्तित्वों का निर्माण नहीं करती. इस कविता ने कवि के विशिष्ट रंग-रूप, वेश-भूसा, कुल-गोत्र के सारे छन्द तोड़े हैं. इस चाहे आप काव्य-विनोद ही मानें, लेकिन समकालीन कविता ने इस अर्थ में भी छन्द से मुक्ति पाई है. कविता में जनतंत्रीकरण की प्रक्रिया तेज़ हुई है. कविता के नायक गायब होते गये हैं. एक अर्थ में समकालीन कविता नायक के निष्कासन की कविता है. यह कवि राजा के साथ उसके रथ में बैठ कर नहीं निकलता. वह सड़क पर सब्जी खरीदते हुए मिल जाता है. यह कवि चकाचौंध वाले बाज़ार में सहमा सहमा चलता हुआ, किसी भी दूकान पर एक रुपये डिस्काउण्ट के लिए, अपनी पूरी प्रतिभा से बहस करता हुआ मिल जायेगा. इस कवि का, इस जीव-जगत से बहुत करीब का रिश्ता है. इसलिए इसकी संवेदनाएँ अधिक सच्ची हैं. हमारे कविता-समय का कवि अधिक सहिष्णु, उदार और स्वीकार-भाव से भरा हुआ है.
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अक्सर यह गलतफहमी पैदा करने की कोशिश की जाती है कि समकालीन कविता का छन्द से विरोध है. दरअसल यह विरोध छन्द से नहीं रूढ़िबद्धता से है. छन्द में विश्व की महान कविताएं संभव हुई हैं. कई समकालीन कवि भी गाहे बगाहे छन्द में लिखते हैं. मुझे लगता है कि छन्द और मुक्त छन्द के बीच एक रिश्ता कायम होना चाहिए, जैसा निराला के यहाँ है. यह कविता में प्रजातंत्र को और मजबूत करेगा. न सिर्फ छन्द और बे-छन्द के बीच रिश्ता कायम होना चाहिए, बल्कि हिन्दी कविता को अपनी क्षेत्रीय बोलियों से भी और अधिक जीवन्त रिश्ता बनाना चाहिए. तभी यह कविता भूमण्डलीकरण के इस आक्रामक दौर में अपनी पहचान बचा पायेगी.
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आज की हिन्दी कविता एक बहुत बड़े भू-भाग की कविता है. इसी भूखण्ड में दुनिया की समस्त भाषाओं के कुल निरक्षरों में से आधे निरक्षर हिन्दी भाषी हैं. हिन्दी कविता का अधिकांश लेखन हिन्दी राजभाषा में हुआ है. अतः यही कारण है कि समकालीन हिन्दी कविता एक बहुत बड़े वर्ग की कविता नहीं बन पाई. वैसे कविता के पाठक न तो पहले अधिक थे और न आज हैं. हिन्दी कविता ने वृहत्तर समुदाय के बीच जाकर विषयवस्तु के स्तर पर जोखिम उठाया है. अब उसे भाषा के स्तर पर कुछ जोखिम ज़रूर लेने होंगे.
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आजादी के बाद की कविता कई क्षेत्रों में गई. आजादी के पहले की कविता के पास उपनिवेशवाद से मुक्ति का ही एक प्रश्न था. इसलिए कविता की सभी धाराएँ अंततः एक बिन्दु पर आकर मिल जाती थीं. आजादी के बाद की कविता के सामने ज्यादा चुनौतियां थीं. यही कारण है कि आजादी के बाद हिन्दी कविता में कई आन्दोलन जल्दी-जल्दी घटित हुए. दरअसल किसी भी समय की कविता को वह करना होता है जो उसके पहले की कविता ने न किया हो. इस मायने में समकालीन कवियों का संघर्ष कम हुआ है. दुनिया अब अनेक चेहरों वाली हो गई है. व्यक्तियों का मनोविज्ञान भी विभाजित हुआ है. अबके कवि को अपने ही स्थान से अपने समय में प्रवेश करने की सुविधा है. यही वजह है कि आज के कवि जीवन के अंतर्विरोधों को नई-नई दृष्टियों से देख रहे हैं. 
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