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Monday, 18 March 2013

सोलह बरस की बाली उमर के सवाल !

स्त्रियों की उम्र को लेकर ऐसी देशव्यापी चर्चा पहले कभी नहीं चली होगी. हाल ही में स्त्रियों के साथ होने वाले दुष्कर्म से पूरे देश में जो जन-जागृति दिखाई पड़ रही रही है, उसमें कुछ चौकाने वाली प्रपत्तियाँ सामने आ रही हैं. दिल्ली गैंगरेप के बाद भारतीय मीडिया इस तरह से दुष्कर्म पर एकाग्र हुआ कि ऐसा लगने लगा है कि इस देश में दुष्कर्म के अलावा कुछ होता ही नहीं, और इस देश के पुरुषों के पास बलात्कार करने के अलावा कोई काम ही नहीं है. अखबारों और खबरिया चैनलों मे ऐसी ही खबरें हैं. बलात्कार की मनोवृत्ति और उसके समाधान को लेकर लम्बी-लम्बी बहसें आयोजित की गईं, जिनमें गृहस्थ, नेता, पुलिस अधिकारी, समाजशास्त्रियों से लेकर, चोर-लबार-संत-मुनि-ज्ञानी, सब शामिल हुए.

देशव्यापी आंदोलन और बहसों का सरकार और न्यायपालिका पर ऐसा दबाव बना कि न्यायलों ने दूसरे काम छोड़कर दुष्कर्म क मामलों को धड़ाधड़ निपटाना शुरू कर दिया. हफ्ते भर में फैसले आने शुरू हो गए और कठोरतम सज़ा सुनाई गई. थानों में दुष्कर्म की रिपोर्ट दर्ज होने लगी. अखबारों में छेड़खानी की खबर भी दुष्कर्म के शीर्षक से छपने लगी. गाँव, शहर और कस्बों में, कुएँ और हैंडपंपों पर होने वाले झगड़े पुलिस तक पहुँचते पहुँचते दुष्कर्म में तब्दील होने लगे. पहले ऐसी किसी घटना पर टीवी रिपोर्टर के सामने आपबीती सुनाते हुए पीड़िता दुपट्टे या साड़ी से चेहरा ढँक लेती थी. लेकिन अब वह निस्संकोच होकर कैमरे के सामने बयान देने लगी है. साफ है कि देश भर में जिस तरह से लोगों ने आवाज उठाई है, उससे पीड़ितों का आत्मविश्वास बढ़ा है. यह भी लगा कि देश भर के महिला संगठनों को मानो जीवनदान मिल गया हो, तो वहीं महिला लेखकों का विषय का अकाल खत्म हुआ.

यह जनाक्रोश का ही दबाव था कि महिला सुरक्षा को लेकर सरकार को अतिरिक्त सक्रिय होना पड़ा. सरकार ने मंत्रियों का समूह बनाकर महिलाओं की सुरक्षा को और अधिक पुख्ता बनाने के लिए सुझाव देने को कहा. मंत्रियों ने अपना काम किया. जाहिर है उन्होने दुष्कर्म के लिए जिम्मेदार प्रत्यक्ष और परोक्ष सामाजिक, मनोवैज्ञानिक और जैविक कारणों पर गहन विचार किया होगा. इस मंथन के बाद महिलाओं से जुड़े कुछ अधिनियमों में संशोधन की ज़रूरत महसूस की गई और इन संशोधनों को संसद से पास कराने की कसरत शुरू हुई. हम अपनी संसद का चरित्र तो जानते ही हैं. यहाँ चर्चा कम होती है, बहिर्गमन ज्यादा होता है. बिना चर्चा के ही प्रस्ताव पास होते हैं, इसीलिए अधिकतर जनहित के नहीं बल्कि सरकारहित के होते हैं. विपक्षी दल पहले हो-हल्ला करते हैं, लेकिन प्रस्ताव पास हो जाने के बाद चुप हो जाते हैं. वो जानते हैं कि जब उनकी सरकार बनेगी तो यही उन्हें भी करना है. खैर !!

सरकार की तरफ से मंत्री समूह नें एक विचित्र संशोधन की सिफारिश की है. यह यौन-सम्बन्धों की वैधता से जुड़ी  सिफारिश है. आप जानते हैं कि अभी जो कानून है उसके मुताबिक 18 वर्ष की उम्र पूरी कर चुकी लड़की से यदि कोई पुरुष उसकी सहमति से यौन-सम्बन्ध बनाता है तो वह कानून की नज़र में दणडनीय नहीं है. मंत्री-समूह ने सिफारिश की है कि अब इस तरह के सहमति के यौन सम्बन्धों में लड़की की उम्र 18 से घटाकर 16 कर दी जाये.

इस प्रस्ताव में कुछ बातें गौर करने की हैं. पहली यह कि यह संशोधन महिलाओं से होने वाले दुष्कर्म को कम करने के लिए किया जा रहा है. दूसरी यह कि इसमें पुरुषों की उम्र का कोई उल्लेख नहीं है. तीसरी यह कि सहमति से बनने वाले यौन-संबन्धों में आपत्ति करने वाले कौन हैं ? चौथी यह कि जिस तर्क से विवाह के लिए लड़की की न्यूनतम आयू 18 वर्ष रखी गई है, उस तर्क को यहाँ क्यों प्रासंगिक नहीं माना गया ? पाचवीं यह कि क्या इस देश की यौन-आकांक्षाओं में बदलाव हुआ है ?

यद्यपि सरकार ने अपने प्रस्ताव पर ऐसा कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया है, जिससे उपरोक्त जिज्ञासाएँ शान्त हो सकें. सरकार का पूरा ध्यान अभी इस संशोधन को संसद की मंजूरी दिलाने में है. यह प्रस्ताव दिखता ही कुछ इतना विचित्र है कि पहला मन इसके विरोध में जाने का होता है. इसीलिए विपक्षी दलों के साथ साथ सरकार के कई सहयी दल भी धीरे-धीरे इसके विरोध में होते जा रहे हैं. मजे की बात तो ये है कि मंत्री-समूह में शामिल कुछ सदस्य भी अब ये कहने लगे हैं कि वो इससे सहमत नहीं थे. इसमें सबसे मुखर स्वर कृष्णा तीरथ का है.

आइए पहले यह देखने की कोशिश करते हैं कि इस संशोधन पर सरकार का संभावित स्पष्टीकरण क्या हो सकता है ! शायद सरकार यह मानती होगी कि 16 वर्ष की आयु तक लड़कियों का शरीर यौन संबन्ध बनाने के लिए पूर्णतः तैयार हो जाता है. चूँकि दुष्कर्म के अधिकांश मामले कम उम्र की लड़कियों के साथ होते हैं, अतः अगर इसे कानूनी वैधता दे दी जाये तो लड़कियां सहमति से यौन संबन्ध बना लेंगी और बलात्कार की नौबत ही नहीं बनेगी. साथ ही यह भी कि कई बार सहमति के संबन्धों का खुलासा होने पर उनकी शिकायत बलात्कार के रूप में दर्ज कराई जाती है. आयु सीमा घटा कर 16 कर देने पर सरकार के दुष्कर्म के राष्ट्रीय आंकड़ों में तेजी से गिरावट प्रत्याशित है.

सरकार ने पुरुष के लिए कोई आयु सीमा नहीं रखी है. शायद वह मानती है कि पुरुष स्वाभाविक यौनाचारी है, और यौनक्रिया सम्पन्न करने के लिए उसके शारीरिक विकास की कोई भूमिका नहीं है. वह यह भी मानती होगी कि यौन क्रिया में पुरुष आक्रान्ता है और स्त्री दयनीय.

सरकार यह दलील भी दे सकती है कि विवाह और यौन क्रिया में पर्याप्त अंतर है. विवाह के बाद लड़की पर पारिवारिक, आर्थिक और मातृत्व संबन्धी जटिल प्रक्रियाओं का दबाव होता है. इसीलिए उसका शारीरिक और मानसिक रूप से अधिक परिपक्व होना आवश्यक है. इसीलिए विवाह की उम्र 18 वर्ष रखी गई है. लेकिन यौन क्रियाओं के लिए लड़की का शरीर पहले ही तैयार हो जाता है, और उसकी यौन-जिज्ञासाएँ भी कम उम्र में ही बढ़ जाती हैं. साथ ही समाज समाज में आये खुलेपन और लड़कियों के बाहरी दुनिया से बढ़े सम्पर्क के कारण यौन संबन्धों को रोक पाना मुश्किल काम है. इसीलिए 16 की उम्र में ही इसे कानूनी वैधता दे देनी चाहिए.

सरकार यह भी महसूस करती होगी कि देश की यौन-आकांक्षाओं में तेजी से बदलाव हुआ है. वह इस बदलाव की गुणात्मकता का अंदाज़ा भले न लगा पाए, लेकिन इतना तो जानती होगी कि लोगों की यौन-इच्छाओं के जो आत्मबन्ध थे वो ज्यादातर टूट रहे हैं. उपभोक्तावाद सिर्फ बाज़ार को ही नहीं प्रभावित करता, वह हमारे चरित्र को भी बदल देता है. नैतिकता के बंधन कब टूट जाते हैं, हमें पता ही नहीं चलता. हम उथले और स्वेच्छाचारी होते जाते हैं. कुछ ही समय में यह उथलापन और स्वेच्छाचारिता हमारी आदत बन जाती है. और बड़ी ठसक के साथ यही हमारे जीवन में नैतिक मूल्य की तरह विराज जाती है.

उदारीकरण से जो व्यापारिक प्रतिस्पर्धा पैदा हुई, उसने विज्ञापन की पूरी संस्कृति को ही बदल दिया. अब ऐसा कोई उत्पाद नहीं है, जिसे बेंचने के लिए अर्धनग्न लड़कियों का इस्तेमाल न किया जाता हो. मनुष्य के यौन-जीवन की गोपन बातें बच्चों को चॉकलेट और चिप्स के साथ मिलने लगी हैं. इंटरनेट निर्बाध पोर्न सामग्री उपलब्ध करा रहा है. एकल परिवारों के छोटे घरों में परदे उड़ रहे हैं और बच्चे वह सब देख लेते हैं जो उन्हें नहीं देखना चाहिए. नशाखोरी की बढ़ती सामाजिक मान्यता सबको उश्रृंखल बना रही है. ऐसे में देश का यौन-आचरण तो बदलना ही था. अब अधिकांश लोग प्रेमिका/प्रेमी नहीं, शिकार ढूढ़ते हैं.

अब मूल बात पर लौटना चाहिए. कि सहमति से यौन संबन्धों की आयु सीमा घटा देने से क्या लड़कियां सुरक्षित हो जायेंगी ?  क्या आपको लगता है कि दुष्कर्म का आयु से कोई गंभीर संबन्ध है. जिस मानसिकता में बलात्कार किए जाते हैं क्या उस समय इस बात से फर्क पड़ेगा कि लड़की की उम्र 16 है या 18. और अगर सहमति से यौन संबन्ध बनाया गया है तो वह दुष्कर्म कहाँ हुआ ! चाहे यह संबन्ध सोलह में बने या साठ में. और क्या आप यह मानने की ज़िद भी करेंगे कि अभी तक 18 से कम उम्र की लड़कियां सहमति से यौन संबन्ध बनाती ही नहीं थीं !! या यह मान लेंगे कि नया अधिनियम बन जाने के बाद लड़कियां धडल्ले से यौन संबन्ध बनाने लगेंगी !!!

दरअसल यह कानूनी समस्या है ही नहीं. यह हमारी सामाजिक समस्या है. हमारा समाज पति के अलावा किसी भी यौन संबन्ध को बर्दाश्त नहीं कर सकता, चाहे वो किसी भी उम्र में सहमति से ही क्यों न बनाए जायें. अगर स्त्री-पुरुष में परस्पर सहमति भी हो तो दूसरे लोग उसे नहीं होने देंगे. इस देश में अभी भी हमारी अपनी ही देह और मन पर हमारा अधिकार नहीं है. यौन संबन्धों में कानून की इतनी ही भूमिका रही है अब तक कि 90 प्रतिशत बलात्कार के मुकदमें झूठे रहे हैं. इसमें लड़की-लड़के के परिवार वालों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है. यौन संबन्ध चौराहों पर तो बनाए नहीं जाते. पहले तो इन्हें भरसक छुपाए रखने की कोशिश की जाती है. और दुर्भाग्य से अगर यह खुल गया और लड़की नाबालिग(18 से कम) हुई तो लड़के पर बलात्कार का केस बनवा दिया जाता है. ऐसे मामलों में पुलिस बहुत जल्दी असलियत भाँप लेती है. और वह दोनों पक्षों से अपना हित साधती है.

उम्र सीमा 18 से 16 करने का भले ही स्त्रियों की सुरक्षा पर खास असर न पड़े लेकिन एक डर है. 16 की उम्र की लड़कियों में उत्साह ज्यादा होता है और समझ कम. उनकी यौन-जिज्ञासाओं का फायदा कोई भी कुशल शिकारी उठा सकता है. विवाह पूर्व के यौन संबन्ध कई बार लड़कियों के लिए बहुत बड़ी मानसिक समस्या बन जाते हैं. शारीरिक और सामाजिक समस्या तो वो होते ही हैं. इसीलिए सरकार का उम्र घटाने का यह निर्णय स्वागत करने लायक तो नहीं ही है, विशेषकर तब जबकि इसका स्त्री-सुरक्षा से कोई लेना-देना नहीं है.

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