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Monday, 12 August 2013

न होने की भाषा

इन दिनों
मैं किस भाषा में बात करूँ
कि ज़ाहिर न हो मेरा पराजित होना
और उदासी रौशन न हो उठे
शब्दों के अँधेरे में भक्क् से ।

सपनों के स्थापत्य को
छुपा लेने के लिए
किन शब्द शक्तियों का उपयोग
सबसे कारगर होगा इन दिनों !

माथे पर उभरती
बेचैन लकीरों की लिपि को
अपाठ्य बना देने की कला
मुझे किस काल के उत्खनन में मिलेगी ।

मुझमें राजमार्गों पर
चलने का शऊर नहीं था
मैं दिन रात
अपनी पगडंडियाँ बनाता रहा ।
अपनी प्यास के लिए
नदियाँ बनायीं
धरती के एक बंजर टुकड़े पर
मैं रोपता रहा अपनी ज़िद ।

इसी रास्ते पर चलते हुए
मैं अपने होने की
सरहद तक पहुँच गया ।

अपने होने के
आखिरी जिस छोर पर हूँ मैं
वहाँ तक नहीं चलीं पगडंडियाँ
नदी नहीं आयी साथ
पेड़ भी ओझल हैं नजरों से ।

यहाँ से आगे
एक ऐसी अभिव्यक्त दुनिया है
जिसमें मुझे सीखनी है
अव्यक्त रह जाने की भाषा ।

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