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Wednesday, 19 February 2014

ई पुस्तक-मेला बड़ा इनफीरियारिटी दे रहा है केशव !!

[ धर्मयुद्ध का पांचवाँ दिन । अर्जुन को उरई (बैलों को हाँकने वाली नुकीली छड़ी) से ठेलते-ठालते, श्रीकृष्ण फिर ले आए कुरुक्षेत्र में लड़ाने । दोनों ओर की सेनाएँ पहले ही पहुँच चुकी थी ।
युद्ध आरंभ होने में विलंब होता देख, अधिकांश योद्धा, साथ लाई पुस्तकें उलट-पलट रहे थे । ज्यादातर पुस्तकें, सुहागरात की दुल्हन की तरह अनछुई और लजायी लग रही थीं ।
       
लेकिन अर्जुन खेत (क्षेत्र) में पहुँचते ही, गरियार बरदा (अनाड़ी बैल) की तरह घुटने के बल बैठ गए.]


श्रीकृष्ण उवाच : अब का हुआ पार्थ ?

अर्जुन उवाच : ई पुस्तक-मेला ससुरा बड़ा इनफीरियारिटी दे रहा है माधव । हमरा लड़ने का मनै नहीं कर रहा ।

श्रीकृष्ण : हद करते हो यार ! एतना समझाए लेकिन तुम युद्ध से भागने का कोई न कोई पेंच निकाल ही लाते हो !!

अर्जुन : नहीं भगवन, सच्ची कह रहे हैं....सारे योद्धा पुस्तक-मेला हो आए । कल पितामह, दुर्योधन को लेकर खुद गए थे वहाँ । आज द्रोणाचार्य भी गए हैं। सुना है, एकलव्य की किसी किताब का, हॉल नं-18 में विमोचन होने वाला है !

श्रीकृष्ण : हाँ पार्थ ! आचार्य द्रोण ही विमोचन करने वाले हैं।

अर्जुन : वही तो माधव ! मुझे तो डर लग रहा है कि आचार्य की कुछ सेटिन्ग न हो जाए एकलब्बा से !!

श्रीकृष्ण : अरे बुड़बक ! तुम फिकर नॉट करो ! तुम आचार्य को नहीं जानते। ऐसा दाँव मारेंगे मुख्य-अतिथि की आसन्दी से, कि वो कौवा एक्को ठो मोती न चुगने पाएगा !!

अर्जुन : (आश्चर्य से मुंह फाड़ते हुए)--वो कैसे नटवर नागर ! ?

श्रीकृष्ण : आचार्य कह देंगे कि एकलव्य मेरे बहुत प्रिय और योग्य शिष्य हैं।
और अगले दिन से अखबार और पत्रिकाएँ एकलव्य की मलामत में जुट जाएँगी।

अर्जुन : लेकिन योगेश्वर ! पुस्तक-मेले में न जा पाने के कारण मैं खुद को कहीं मुह दिखाने लायक नहीं पा रहा हूँ। कल रात में दुर्योधन ने बड़े मज़ाक में मुझसे पूछा था, कि अर्जुन तुम कब जा रहे हो मेले में ?

सच माधव ! मेरा खून जल गया उसके हाथ में कहानी-संग्रह देख के ।

श्रीकृष्ण : पार्थ ! सर्वधर्म परित्यज मामेकं शरणं व्रज !! मैं जो कहता हूँ ध्यान से सुनो !

आचार्य द्रोण की लाइब्रेरी से जो किताबें तुम मार के लाए थे, वो तो हैं ही...उन्हें झाड़-पोंछ कर बैठक की टेबल पर रख दो। मेरी गीता भी माया जी ने छाप डाली है। पाँच लेखकीय प्रतियाँ मिली हैं, एक तुम ले लो। और सुनो ! सुभद्रा इधर की उधर करने में बचपन से ही पारंगत है। वो आस-पड़ोस में बता आएगी कि तुम भी गए थे पुस्तक मेला। और वहाँ इतनी खरीददारी की है कि घर का बजट बिगड़ गया !

मैं संजय (महाभारतकालीन जुकरबर्ग ) से कह दूँगा, वो कुछ किताबों की फोटो के साथ फेसबुक पर ये स्टेटस डाल देंगे कि, अर्जुन पुस्तक-मेले में किताबें खरीदते हुए पाए गए !!

[ यह सुनकर अर्जुन ने अपना गांडीव उठाया और ललकारने लगे ]
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