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Thursday, 5 June 2014

वन्दे मात्र रम !

ये बात कई साल पहले की हुई।
उन दिनों हम सच में जवान थे। न सिर्फ जवान थे बल्कि कवि भी थे। उन दिनों देखा यह गया था कि अगर किसी डरपोक किस्म के भावुक जवान को इश्क मोहब्बत हो जाए तो उसका मोक्ष कवि-योनि में होता था।

हमने भी एक हसीना से प्रेम किया। प्रेम ही नहीं किया, प्रेम-पत्र भी लिखा। कॉलेज का बसन्त था। हमने प्रेम-पत्र बड़े सलीके से हसीना की साइकिल के ब्रेक-लीवर में फँसा दिया ताकि उसकी नज़र से बच न पाए। उसकी नज़र पड़ी भी। दो दिन बाद उसकी माँ का बुलावा आ गया। हम गए। और जब लौटे तो हमारे भीतर कविता का बीज पड़ चुका था। बाद को मेरे एक दोस्त—जो  मुझसे कुछ ही पहले कवि-योनि में प्रवेश कर चुके थे—ने उसी प्रेम-पत्र को फेर-बदल करके कविता की शक्ल दे दी। वही मेरी पहली कविता थी। एक अंश-----

“ मेरी प्रिय तुम
वक्त से एक लम्हा तोड़कर
ऐसे छुपाता हूँ तुम्हें
जैसे बचपन में
अमावट चुराकर
अम्मा से छुपाता था।“
(दूसरी लाइन गुलज़ार से प्रेरित। आखीर में अमावट और अम्मा में अनुप्रास की छटा !!)

खैर !  बात मुझे कुछ दूसरी ही करनी थी।
कवि हो जाने के बाद हम खूब सक्रिय हुआ करते थे। उन्हीं दिनों कमान्डर कमला प्रसाद के नेतृत्व में हमने समीपी पर्यटन स्थल गोविन्दगढ़ में प्रगतिशील लेखक संघ का एक रचना-शिविर लगाया। झील के बीच बने टापू पर प्रदेश के नवोदित कवियों के साथ, भगवत रावत, चन्द्रकान्त देवताले, मलय, ज्ञानरंजन, प्रमोद वर्मा जैसे कवि/कथाकार/आलोचक तीन दिन तक चर्चा करते रहे।

इस शिविर के आयोजन में गोविन्दगढ़ स्थित पुलिस ट्रेनिंग स्कूल के एसपी महोदय का सहयोग लेना पड़ा। बाद में पता चला कि एसपी साहब साहित्य-प्रेमी ही नहीं, कवि भी हैं।

शिविर सत्रों में चलता था। सारे काम-धाम छोड़कर एसपी साहब एक दयनीय उत्सुकता और एक खूबसूरत सी डायरी लिए समय से पहले ही हर सत्र में उपस्थित हो जाते। एक दो सत्रों तक तो हम समझ नहीं सके। लेकि बाद में समझ आ गया कि ये अपनी कविताएँ सुनाना चाहते हैं। चर्चाओं के दौरान उनका उत्साह देखते बनता था। वो वक्तव्यों पर भी ऐसी दाद उछालते जैसे किसी मुशायरे में बैठे हों ! वाह वाह ! के साथ उनका वही हाथ उठता जिसमें कविताओं वाली डायरी होती। उनकी दाद में इतना घोष होता कि वक्ता भी अचकचा जाता।

खैर दैव-दुर्योग से एसपी साहब को कविताएँ सुनाने का मौका नहीं मिल पाया तो संयोजक कमला प्रसाद चिन्तित हुए। उन्हें लगा कि आदमी यह काम का है। आगे भी जरूरत पड़ सकती है। उन्होंने एक रास्ता निकाल ही लिया। कविता-पाठ तो अब संभव नहीं था। शिविर के समापन सत्र में उन्हें जबरन मेजबान की भूमिका में बाँध दिया गया और गोविन्दगढ़ की धरती पर पधारे देश के मूर्धन्य विद्वानों के प्रति आभार प्रदर्शन की महती ज़िम्मेदारी देकर माइक पर आमंत्रित किया गया।

आमतौर पर आभार-प्रदर्शन की रवायत में अतिथियों के साथ-साथ पत्रकारों, नेताओं, प्रायोजकों, साउण्ड वाले, भोजन व्यवस्था वालों, और स्थानीय गुण्डों के प्रति आभार जता कर बात खत्म कर दी जाती है। लेनिक एसपी साहब जैसे ताक में थे। उन्होने यहाँ भी गुंजाइश निकाल ही थी। कविता तो नहीं सुनाई, लेकिन नायाब चीज़ हमें दी !!

उन्होंने कहा कि कविता पर आप लोगों ने तीन दिनों तक लॉ एण्ड ऑर्डर को तोड़कर जो बलवा किया, उससे मुझे लगा कि मैं भी कुछ बोलूँ। मैं आपके सामने राष्ट्रगीत-‘ वन्दे मातरम्……’ की एक नई व्याख्या पेश कर रहा हूँ----------

एसपी साहब कह रहे थे---“ बंकिमचन्द्र रसिया आदमी थे। इसीलिए उन्होने लिखा---वन्दे मात्र रम।–मैं केवल रम की वन्दना करता हूँ।
सुजलां सुफलां मलयज शीतलाम्।–साथ में स्वच्छ जल हो, कुछ अच्छे फल आदि हों तथा मन्द शीतल हवा बह रही हो, तब यह और प्रभावी हो जाती है !
सश्य श्यामलां मातरम्। --ध्यान रहे, समय शाम का ही होना चाहिए !
शुभ्र ज्योत्सनाम पुलकित यामिनी
फुल्ल कुसुमित द्रुमदल शोभिनीम्।–धवल चांदनी में बौराई रात हो। घर का उपवन हो। आस-पास फूलों की सुगन्ध आ रही हो और आप बोतल खोलकर बैठे हों।
सुभाषिणीम् सुमधुर भाषिणीम्। सुखदां वरदाम् मातरम्।----और अगर सुमधुर कण्ठों वाली कोई सुन्दरी भी साथ में हो तब, अहा !  यह रम आपको अलौकिक सुख का वरदान प्रदान कर देती है !!

एसपी साहब के चेहरे की आभा में मूर्धन्य विद्वत-जन स्तब्ध थे। इसी के साथ शिविर का समापन हो गया।

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