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Friday, 11 April 2014

कामिनी काय कांतारे / महेश कटारे

 

जीवन तो वही वरेण्य हे जो कथा बन सके। 
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भोगों को हमने नहीं भोगा, भोगों ने हमें ही भोग लिया। हमने तप नहीं किया, त्रितापों ने तपा दिया हमें। समय नहीं बीता, हम स्वयं बीत गए....तृष्णा न बुढ़ाई, बूढ़े हुए हम ही।
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स्त्री प्रथमतः और अंततः जननी होती है। वेश्या या ब्राह्मणी के आरोप तो काल और स्थितिगत अवस्थाएँ हैं।
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दुर्लभ पुरुष के प्रति प्रेम है। मन में भारी लज्जा है। और शरीर दूसरे के अर्थात पति के अधीन है। प्रिय सखि ! ऐसी स्थिति में प्रेम बहुत संकट भरा है।
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संन्यास से संसार नहीं चलता। भूख,प्यास,प्रेम,क्रोध,राग,भय आदि प्रकृति प्रदत्त हैं। योगी इन पर विजय पा सकता है, इन्हें मिटा नहीं सकता।

----कामिनी काय कांतारे


एक हफ्ते से मैं इसी उपन्यास के प्रेम में हूँ। ऊपर उद्धरण भी उसी से हैं। महेश कटारे के इस उपन्यास में राजा भर्तृहरि की जीवनकथा है।
यह कथा राग और वैराग के बीच करवटें बदलते जीवन की कथा है। यह राजा भर्तृहरि, भोगी भर्तृहरि, योगी भर्तृहरि, कवि भर्तृहरि, वैयाकरण भर्तृहरि की कथा है। यह कथा ऐसी भाषा में रची गई है, जो हमें चमत्कृत करते हुए सम्मोहित कर लेती है। कथा बुनने की ऐसी तकनीकी जो जासूसी कथाओं जैसी व्यग्रता पैदा करती है। और समापन ऐसा जो हमें मूर्तिवत कर दे।

अब आपको याद आ गया होगा कि भर्तृहरि अवन्ति के राजा हुए थे, जिसे अब उज्जैयिनी कहा जाता है। कहते तो यह भी हैं कि भर्तृहरि ने सात बार वैराग्य धारण किया और लौटकर फिर से गृहस्थ बन जाते। अंत में गोरखनाथ के शिष्य बनकर गृह त्याग दिया। उनके गृहत्याग का दृश्य इतना करुण था कि यह कथा लोकजीवन में आज भी हृदय विदारक रुदन के साथ सुनी और मंचित की जाती है।

अब आपको उस जोगी का स्मरण भी हो आया होगा, जो साल में एक या दो बार सारंगी बजाते कुछ अस्पष्ट सी करुण धुन गाते हुए आपके दरवाजे पर आ जाता था। इस जोगी को भरथरी कहते हैं। भरथरीयानी भर्तृहरि। यह नाम इसलिए इन्हें मिला क्योंकि ये भर्तृहरि के जोगी बनने और पत्नी पिंगला से गृहत्याग की भिक्षा मागने की कथा गाते हैं।

इसी कथा को महेश कटारे ने दो खण्डों और लगभग छः सौ पृष्ठों में अद्भुत कथा-कौशल से रचा है। कुछ इतिहास से, कुछ मिथकों से और कुछ कल्पना से। बिना प्रवाह को बाधित किए लेखक ने प्रेम, काम, वैराग्य, नीति, जैन आचार, नाथ संप्रदाय, ज्योतिष, राजनीति, कूटनीति, आयुर्वेद, स्त्री जीवन, दास जीवन और जन जीवन का प्रमाणिक विवेचन किया है।


सन् 2012 में यह उपन्यास प्रकाशित हुआ था। मुझे संदेह है कि यह कितने पाठकों तक पहुँचा होगा। इसके दो खण्डों की कीमत 830/- रु. है, जो हिन्दी पाठकों को दूर रखने के लिए पर्याप्त है। मैं अंतिका प्रकाशन और श्री गौरीनाथ जी से आग्रह करता हूँ कि इस पुस्तक को जनसुलभ पेपरबैक संस्करण में छापें तो यह और पाठकों तक पहुँच सके।

मध्यकालीन परिवेश में होते हुए भी यह उपन्यास हमें समकालीन जीवन से अप्रत्याशित रूप से जोड़ता है।
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