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Saturday, 24 September 2011

हम जो हिन्दू हैं...!



 पिछले दिनों जब गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बिना वज़ह उपवास शुरू कर दिया, हमारे मीडिया-खासतौर से इलेक्ट्रानिक मीडिया ने मोदी की महानता के क़सीदे पढ़ना शुरू किया, और देश की जनता ने अपने भावी प्रधानमंत्री के चित्र बनाना शुरू किया, उसी समय फेसबुक में मैने मीडिया पर थोड़ा खीझते हुए, गुजरात में 2002 में हुए साम्प्रदायिक दंगों के दौरान, अल्पसंख्यक समुदाय की स्त्रियों के साथ हुई एक बर्बर और शर्मनाक घटना का उल्लेख किया. इस ज़िक्र के मार्फ़त मैं ये कहना चाह रहा था कि हमारे मीडिया के पास गुजरात दंगों के दौरान मोदी सरकार की भूमिका के अनगिनत साक्ष्य हैं. जलते हुए घरों की तस्वीरें हैं, बिलखते हुए लोगों के बयान हैं—फिर वह मोदी के गुणगान पर क्यों उतर आया है ?

फेसबुक पर इस ज़िक्र के बाद जो प्रतिक्रियायें आयीं उनसे मैं आश्चर्यचकित हो गया. अधिकांश लोगों ने मुझसे ऐसी बर्बर घटनाओं के प्रमाण मागे,जो मैं नहीं दे सकता था. लगभग सबका ये मानना था कि मैं और मेरे जैसे वो लोग जो अल्पसंख्यकों पर हुए अत्याचार की निन्दा करते हैं, वो इसी बहाने मशहूर होने और अपने आप को धर्मनिरपेक्ष साबित करने के किसी अभियान में शामिल हैं. लोगों ने यहां तक कह दिया कि अगर बहुत दर्द हो रहा है उनके लिए तो तुम भी मुसलमान बन जाओ...! मित्रों ने पूछा कि जब मुसलमान हिन्दुओं को मारते हैं तब आप कुछ नहीं कहते, लेकिन जब हिन्दू मुसलमानों को मार देता है तो छाती कूटने लगते हैं.....आप जैसे तथाकथित बुद्धिजीवियों को सिर्फ बहुसंख्यकों के दोष दिखायी पड़ते हैं...कुछ जागरूक पाठकों ने यह भी बताने की कोशिश की कि जो मीडिया चैनल उग्र हिन्दुत्व का समर्थन नहीं करते, उनको विदेशों से फंड और निर्देश मिलते हैं ताकि वो अल्पसंख्यक समुदायों के पक्ष में बोलें. और इन्हीं सब दलीलों के बीच मेरे हिन्दू होने पर भी सवाल उठाये गये....

मैं हिन्दू हूँ, क्योंकि मेरे माता-पिता हिन्दू हैं. मेरे पूर्वज हिन्दू थे. मैं जन्मना हिन्दू हूँ. मैं बहुत राहत और गर्व महसूस करता हूँ कि मेरा जन्म हिन्दू धर्म में हुआ. जितनी व्यक्तिगत स्वतंत्रता, खुलापन और सहिष्णुता हिन्दू धर्म में है, क्या दुनिया के किसी धर्म में है ? यह हिन्दू धर्म में ही संभव है कि हम उसकी रीतियों-परंपराओं को नकारते हुए भी  हिन्दू बने रह सकते हैं. हमें धर्मच्युत करने या हमारा परिष्कार करने का कोई फतवा जारी नहीं होगा. यह हिन्दू धर्म में ही संभव है कि हम नास्तिक हो जायें और अपने ईश्वर पर ही सवाल उठाते रहें और हमें मौत की सज़ा न सुनाई जाये....यह हिन्दू धर्म ही है जिसने बौद्ध और जैन धर्म के प्रवर्तकों गौतम बुद्ध और महावीर को भी ईश्वर का अवतार मान लिया...और अँग्रेजों ने अगर हिन्दू-मुसलमानों के बीच इतनी खाई न पैदा की होती, और विभाजन न हुआ होता तो शायद पैगम्बर हज़रत मोहम्मद साहब भी अवतारों में शामिल कर लिए गए होते...निजता को सम्मान देने वाला इतना उदार धर्म दुनिया में और कौन है ? हिन्दू धर्म ने हमारे सोचने, बोलने, आजीविका के साधन जुटाने पर कभी कोई पाबन्दी नहीं लगाई.

दरअसल गौर से देखने पर पता चलता है कि हिन्दू धर्म की प्रवृत्ति मुक्त करने की रही है. बांधना, संकुचित करना और शासन करना इस धर्म का ध्येय कभी नहीं रहा. हमारे यहाँ चार वेद, एक सौ आठ उपनिषद, अठारह महापुराण,गीता,महाभारत,मानस आदि ग्रंथ, हमारे प्रेरणास्रोत और मार्गदर्शक बने रहे. हिन्दू धर्म ने कभी यह दावा नहीं किया कि इनमें से कोई भी ग्रंथ पहला और अंतिम सत्य है, जैसा कि कुरान और बाइबिल के बारे में कहा जाता है. हिन्दू धर्म ने कभी भी किसी व्यक्ति को धर्म से बाहर नहीं निकाला, चाहे उसने कितना भी गैर-धार्मिक आचरण किया हो. हिन्दू धर्म के पुनर्संस्थापक आदि शंकराचार्य ने देश में घूमकर चार पीठों की स्थापना की. चारों पीठों पर चार शंकराचार्यों को बैठाया, लेकिन उनमे से किसी को भी अधिकार नहीं दिया कि वो कोई फतवा जारी करें...न तो आदि शंकराचार्य ने कभी कोई फतवा जारी किया.

लोकतंत्र, हिन्दू-धर्म के स्वभाव में है. कर्मफल में अडिग आस्था रखने वाले इस धर्म में साधारण मनुष्य तो क्या, देवताओं तक को कोई छूट नहीं दी गयी. यह इसका आंतरिक संविधान है. राम ने सीता के साथ अन्याय किया तो उन्हें अपने ही पुत्रों से पराजित होना पड़ा. सीता धरती में समा गयीं और राम को जीवन भर का पत्नी-वियोग मिला. गांधारी ने कृष्ण को श्राप दिया तो उनकी एक हज़ार सोलह पटरानियों का भीलों ने अपहरण कर लिया और महाबली अर्जुन देखते ही रह गये. अंत में एक बहेलिए ने कृष्ण का वध कर दिया. ब्रह्मा अपनी ही बेटी पर आसक्त हो गये तो उनका हाल देखिए....पुष्कर के अलावा,देश में कहीं भी उनका न मंदिर बना और न ही उनकी पूजा होती. महादेव शंकर को अपने ससुर से ही अपमानित होना पड़ा....ये दृष्टान्त, हिन्दू धर्म की उस मूल-प्रतिज्ञा को पुष्ट करते हैं, जिसमें कर्म को ही सर्वोच्च प्रधानता दी जाती है. यहाँ कर्म ही सर्वश्रेष्ठ पूजा है. इस धर्म में ये संकेत स्पष्ट हैं कि आपका कर्म ही आपकी प्रतिष्ठा का आधार है,धर्म इसमें हस्तक्षेप नहीं करेगा.

हिन्दू धर्म में पैदा होना मुझे जितनी राहत और आश्वस्ति देता रहा है, हिन्दुत्व से मुझे उतनी ही अधिक असहमति और विरक्ति रही है. आप सब भली प्रकार समझते ही हैं कि हिन्दू और हिन्दुत्व में कितना अंतर है !  हिन्दुत्व एक झटके में ही हिन्दू होने के हमारे गर्व, हमारी आश्वस्ति और हमारे औदार्य पर पर प्रश्न-चिन्ह लगा देता है. हम जब अपने धर्म की श्रेष्ठता के  प्रति दुराग्रही हो जाते हैं, तो अपनी श्रेष्ठता को ही खोने लगते हैं. हिन्दुत्व एक वर्चस्ववादी मानसिकता है. आदिकाल से ही इस देश का चरित्र और स्वभाव समावेशी रहा है. बौद्ध,जैन और सिख धर्म यहाँ पैदा हो गये. इस्लाम बाहर से आया और .
यहीं का हो गया. क्या किसी भी दूसरे देश और समाज में आप इतनी उदारता की कल्पना कर सकते हैं !  

इस देश के चरित्र और स्वभाव को बदलने की सुनियोजित और संगठित कोशिश की जा रही है. हिन्दुत्व इस कोशिश का वैचारिक आधार है...आडवानी, मोदी, तोगड़िया, कटियार आदि इसके चेहरे है. यह कोशिश कौन कर रहा है, सबको मालूम ही है. अयोध्या, गुजरात, मालेगांव आदि, हिन्दुत्व की मुखर अभिव्यक्तियां हैं. इन घटनाओं को हिन्दू धर्म से जोड़ना उतना ही ग़लत होगा, जितना मुसलमान आतंकियों की करतूतों को इस्लाम से जोड़ना...

अब कुछ बातें उन आपत्तियों पर जिनका ज़िक्र शुरू में किया था. मेरे मन में पहला सवाल यह था कि क्या वर्तमान की सफलता की चकाचौंध में अतीत में किये गये पापों को भुला देना ठीक है ? आज गुजरात की सफलता और विकास बेशक उल्लेखनीय है. इसका श्रेय मोदी और उनकी टीम के साथ-साथ गुजरात की जनता को दिया जाना चाहिए. दंगों और भूकम्प से हुए विनाश के बाद गुजरात की जनता ने पुनर्निर्माण की जैसी इच्छशक्ति दिखायी, उसने मोदी की राह आसान कर दी. लेकिन उन हज़ारों अल्पसंख्यकों की कीमत पर जो गुजरात से गायब हो गये. चुनाव आयोग ने भी इस बात की पुष्टि की थी कि दंगों के बाद गुजरात में हुए आम चुनाव में तैयार की गई मतदाता सूची से हज़ारों अल्पसंख्यकों के नाम गायब थे. ये कहाँ गये,आज तक किसी को पता नहीं ! दंगों के बाद प्रभावित लोगों को सरकार के राहत शिविरों में रखा गया था, वो सब लापता हैं. गुजरात दंगों के बाद जिन लोगों ने मीडिया के कवरेज़ को खुली आँखों से देखा होगा, वो जानते हैं कि यह दंगा सरकार की शह पर हुआ था. जिन लोगों पर सुरक्षा की ज़िम्मेदारी थी वो खुद लूट,हत्या और बलात्कार में शामिल हो गये थे. तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी ने कहा था कि गुजरात में जो कुछ हुआ वह हमारे लिए शर्म की बात है. हालांकि बाद में दबावों के चलते अटल जी ने अपना बयान बदल दिया था और मोदी की प्रशंसा की थी.

पिछले दिनों जब मोदी ने मीडिया के साथ मिलकर इस देश का प्रधानमंत्री बनने की अपनी महत्वाकांक्षा को ज़ाहिर किया और पूरे देश में जो अव्यक्त स्वीकृति दिखाई पड़ी-वह चिन्ता का सबब है. क्या इस देश के बहुसंख्यकों ने इस देश को एक हिन्दू राष्ट्र की मौन स्वीकृति दे दी है ?  जो लोग धर्मनिरपेक्षता के पक्षधर हैं , वो अल्पसंख्यक और निस्तेज क्यों होते जा रहे हैं ??  धर्मनिरपेक्षता मेरे लिए धर्म से च्युत होना नही है, बल्कि गहरे धार्मिक अवबोध से निकली हुई जीवन प्रणाली है. मेरी धर्मनिरपेक्षता किसी भी तरह की बर्बरता के खिलाफ है....मेरी धर्मनिरपेक्षता मुझे जितना इस्लामिक आतंकवाद के विरुद्ध करती है, उतना ही उग्र हिन्दुत्व से....मेरी धर्मनिरपेक्षता किसी भी साम्प्रदायिक सोच वाले व्यक्ति को अपना प्रधानमंत्री मानने से रोकती है....मेरी धर्मनिरपेक्षता इस महादेश की जनता की कमज़ोर होती स्मृति के आगे विवश दिखाई पडती है.
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