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Thursday, 19 January 2012

अब बारी लेखक-कलाकारों की है !


  न्यूज़ पोर्टल मोहल्ला लाइव पर अरविन्द गौड़ के हवाले से एक खबर थी कि मुंबई पुलिस की क्राइम ब्रांच ने एक स्थानीय वकील की शिकायत पर कानपुर के युवा कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी की वेबसाइट ‘कार्टून अगेंस्ट करप्शन डॉट कॉम’ पर प्रतिबंध लगा दिया है। असीम पर आरोप है कि उन्होंने अपने कार्टूनों के जरिये देश की भावनाओं को ठेस पहुंचायी है। असीम एक कलाकार हैं. भ्रष्टाचार के खिलाफ़ लडने का अपना तरीका है.किसी भीड़ का हिस्सा बने विना वो एक रचनात्मक प्रतिरोध कर रहे है. वे भ्रष्टाचार पर तीखी और सीधी चोट करते हैं। जिन्होने असीम के कार्टून देखे हैं, वे जानते हैं कि इन चित्रों में किसी का मजाक नहीं बल्कि आम आदमी की भावनाओं की, गुस्से की वास्तविक अभिव्यक्ति है। अरविन्द लिखते हैं कि " यह सिर्फ कार्टूनिस्ट पर प्रतिबंध लगाना नहीं बल्कि मीडिया और सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर सुनियोजित तरीके से नियंत्रण की शुरुआत है।" हाल के समय में सरकार के कुछ ज़िम्मेदार मंत्री अपनी मंशा सार्वजनिक कर चुके हैं कि सोशल मीडिया पर लगाम की ज़रूरत है.
         दरअसल भ्रष्टाचार की अभी तक की मुहिम में देश का बुद्धिजीवी वर्ग खुलकर सामने नहीं आया था.बल्कि यह कहना ज़्यादा ठीक होगा कि बौद्धिक वर्ग का रवैया कुछ-कुछ नकारात्मक रहा है. इसकी वज़ह शायद अन्ना और उनकी टीम का बेतुकापन हो.अन्ना, रामदेव और उनके साथियों की हर हरकत और बयान को बौद्धिक समाज अपनी कसौटी पर कसता रहा. लेकिन यकीन मानिए कि बुद्धिजीवी यह कतई नहीं चाहते थे कि यह आन्दोलन अकाल मृत्यु को प्राप्त हो.इस बात की संभावना प्रबल है और अवसर भी है, कि आगे आन्दोलन की कमान देश के लेखक-कलाकार अपने हाथ में ले लें. राजनीतिक दल और सरकार सतर्क दिखती है.
         आप देख ही रहे होंगे कि पूरे देश में जितनी भी अकादमियां और कला-संस्थान हैं, उनमें सरकार ने अपने पक्षधर और बहुत औसत किस् के लोगों को बैठा रखा है. फिर ये संस्थाएँ चाहे केन्द्र सरकार की हों या राज्य सरकारों की.यह सब बहुत सुनियोजित तरीके से हुआ है. सरकार इन्हीं लोगों को पुरस्कृत भी करती रहती है. ये मठाधीश आपस में भी एक दूसरे को सम्मानित और उपकृत करते रहते हैं. इस रणनीति से सरकार ने बौद्धिक वर्ग के एक बहुत बड़े हिस्से की मेधा को पहले ही नियंत्रित कर रखा है. जो कुछ लोग सरकार की कृपा से महरूम हैं या कुछ जो अपनी क्षमताओं को सरकार का गुलाम नहीं बनाना चाहते, उन पर सरकार इस तरह के हमले करने लगी है.
         अपने देश के लिए यह अपेक्षाकृत नयी बात है. और ज़ाहिर है ख़तरनाक भी.मुस्लिम देशों और यूरोप-अमेरिका महाद्वीप के कुछ देशों में लेखक-कलाकारों पर प्रतिबन्ध के समाचार जब हम सुनते थे तो आश्चर्य तो होता था, पर इसकी गम्भीरता और छटपटाहट को महसूस नहीं कर पाते थे.लेकिन कुछ वर्षों में अपने देश में पनप रही इस प्रवृत्ति की चोट अब दर्द बन कर उभरने लगी है.
          एक वाकया मैं आपको म.प्र. का बताता हूं. म.प्र. की साहित्य अकादमी पिछले कई वर्षों से प्रदेश के लगभग सभी शहरों में पाठक मंच चलाती है. उस शहर के किसी उर्जावान साहित्यकर्मी को संयोजक बना दिया जाता है.अकादमी अपनी ओर से 10-12 किताबें चुनकर सभी केन्द्रों में भिजवाती है.शहर के साहित्य प्रेमियों को ये किताबें पढ़ने को दी जाती हैं. हर महीने एक किताब पर सब लोग चर्चा करते हैं. इस चर्चा की समेकित रपट अकादमी के पास भेजी जाती है. दिखने में यह योजना बहुत शानदार लगती है. पुस्तक-संस्कृति को बढ़ावा देने की ऐसी योजना शायद किसी और प्रदेश में नहीं है.
          लेकिन यहाँ भी सरकार के अपने छल-छद्म हैं. तीन साल पहले तक रीवा-पाठक मंच का संयोजक मैं था.तीन साल पहले अमरकंटक में पाठक मंच संयोजकों का वार्षिक सम्मेलन हुआ. वार्षिक सम्मेलन में प्रदेश-देश के ख्यात साहित्यकारों-विचारकों को बुलाकर विचार-विमर्श की परंपरा है. विडम्बना ये है कि सरकार बदलती है तो विचारक भी बदल जाते हैं और अकादमी का संचालक भी. म.प्र.में भाजपा की सरकार पिछले आठ वर्षों से है. अब आप अंदाजा लगा सकते हैं कि सम्मेलन में विशेषज्ञ के रूप में किन लोगों को बुलाया गया होगा. इस सम्मेलन के दौरान कुछ वरिष्ठ साहित्यकारों ने खुलेआम अकादमी संचालक को सलाह दी कि पाठक मंच के ऐसे संयोजकों को तत्काल हटाया जाय जो प्रगतिशील हैं. और नतीजा यह हुआ कि कुछ ही दिनों के अन्दर मेरे साथ ही कई संयोजक बदल दिए गये. कुछ पाला बदल कर बच गये. कहीं कोई शोर गुल नहीं हुआ.
            सरकारों का चरित्र अब कुछ ऐसा हो गया है कि किसी भी आवाज. का उन पर अब कोई असर भी नहीं होता. आपको याद ही होगा केन्द्रीय साहित्य अकादमी के उपाध्यक्ष पद पर अशोक चक्रधर की नियुक्ति का कितना विरोध किया था देश भर के साहित्यकारों ने. क्या फर्क पड़ा  ? लेखक-कलाकारों की आवाज़ सुनने की अब आदत ही नहीं रही सरकार को.
       अरविन्द के साथ ही हम सब रचनाकर्मियो का सवाल है कि आखिर कोई किस आधार पर किसी वेबसाइट, लेख, नाटक, पेंटिंग या किताब पर प्रतिबंध लगा सकता है? सच कहना क्या कोई अपराध है? हमारे नेता या सरकार इतने कमजोर या डरपोक क्‍यों है? वे असलियत से क्‍यों डरते है? हमारे बोलने की, लिखने की, कहने की आजादी पर रोक क्‍यों लगाना चाहते है? ये केवल अभिव्यक्ति की आजादी का सवाल नहीं है, ये केवल लोकतांत्रिक हकों का हनन भर भी नहीं है, बल्कि ये एक चुनोती है, असल में ये हमारे संवैधानिक अधिकारो पर सीधा हमला है।
       असीम का आरोप है कि वेबसाइट को बैन करने की भी मुंबई पुलिस ने कोई जानकारी उन्हे नहीं दी। वेबसाइट की प्रोवाइडर कंपनी बिगरॉक्स डॉट कॉम ने एक मेल द्वारा असीम को साइट बंद करने की सूचना दी। जब बिगरॉक्स कंपनी से बात हुई, तो उन्‍होंने असीम को मुंबई पुलिस की क्राइम ब्रांच से संपर्क करने को कहा। क्राइम ब्रांच में कोई बताने वाला नहीं कि वेबसाइट को बैन क्‍यों किया गया? या साइबर एक्ट की किन धाराओं में केस दर्ज किया गया है? अब पता चला है कि महाराष्ट्र के बीड़ जिला अदालत ने स्थानीय पुलिस को असीम पर राष्ट्रद्रोह का केस दर्ज करने का आदेश भी दे दिया है। ये और भी शर्मनाक हरकत है।
       आरोप है कि उनके कार्टूनो में संविधान और संसद का मजाक उड़ाया गया है। पर सवाल ये भी है कि जब सांसद संसद में हंगामा करते हैं, खुलेआम नोट लहराते हैं, लोकपाल बिल फाड़ते हैं, चुटकुलेबाजी करते हैं, तब क्या वे संसद का मजाक नहीं उड़ाते? देश की जनता का अपमान नहीं करते?
         दरअसल हमारे लेखक-कलाकार भी इतने   खेमों में बटे हैं कि हम असीम को बहुत भरोसे के साथ आश्वस्त भी नहीं कर सकते.हमने इस देश के बौद्धिकों को कोई बड़ी लड़ाई लड़ते कभी देखा ही नहीं है. पर इस बिनाह पर हम उम्मीद नहीं छोड़ सकते. यह सवाल हमारी पहचान और सुरक्षा का भी है.
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