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Thursday, 28 June 2012

मंज़िल न दे चिराग न दे, रास्ता तो दे...! : शिक्षा (2)


अनिर्णय और अंधकार के जिस मुकाम तक हमारी शिक्षा-प्रणाली आज पहुँच गई है, वो किन रास्तों से होकर यहाँ तक आयी है, इसका भी एक संक्षिप्त जायज़ा लेना इसलिए ठीक रहेगा कि ऐसा न लगे कि हमारे नीति-नियंता एकदम ही नाकारा थे. आप सब जानते ही हैं कि संविधान के चौथे भाग में उल्लिखित नीति निदेशक तत्वों में कहा गया है कि प्राथमिक स्तर तक के सभी बच्चों को अनिवार्य एवं निःशुल्क शिक्षा की व्यवस्था की जाय. इसी को थोड़ा और आगे बढ़ाते हुए हमारी मौजूदा सरकार ने अनिवार्य शिक्षा अधिनियम-2009 (RTE) पारित किया, जिसमें 14 वर्ष तक के बच्चों को निःशुल्क शिक्षा देने का संकल्प व्यक्त किया गया है. 1948 में डॉ.राधाकृष्णन की अध्यक्षता में विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग के गठन के साथ ही भारत में शिक्षा-प्रणाली को व्यवस्थित करने का काम शुरू हो गया था. 1952 में लक्ष्मीस्वामी मुदालियर की अध्यक्षता में गठित माध्यमिक शिक्षा आयोग, तथा 1964 में दौलत सिंह कोठारी की सदारत में गठित शिक्षा आयोग की शिफारिशों के आधार पर 1968 में शिक्षा नीति पर एक प्रस्ताव प्रकाशित किया गया जिसमें राष्ट्रीय विकास के प्रति वचनबद्ध, चरित्रवान तथा कार्यकुशलयुवक-युवतियों को तैयार करने का लक्ष्य रखा गया. मई 1986 में नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति लागू की गई, जो अब तक चल रही है. इस बीच राष्ट्रीय शिक्षा नीति की समीक्षा के लिए 1990 में आचार्य राममूर्ति की अध्यक्षता में एक समीक्षा समिति, तथा 1993 में प्रो. यशपाल की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया गया. राष्ट्रीय शिक्षा नीति की धज्जियाँ किस तरह से उड़ाई गई हैं इसका पता तो हमे अपने आस-पास की स्कूलों और उच्चशिक्षा केन्द्रों को देख कर  ही चल जाता है.

एक अनुमान के मुताबिक भारत की पचास प्रतिशत स्कूलें बिना शाला-भवनों के अथवा अनुपयुक्त भवनों में चल रही हैं. बच्चे ज़मीन पर बैठते हैं, पेयजल की व्यवस्था भी नहीं है और बिजली-पंखे तो बहुत दूर की बात हैं. अतः इन विद्यालयों में शिक्षा के उच्च लक्ष्यों के प्राप्ति की बातें करना बेमानी है. शेष पचास प्रतिशत में अधिकांश निजी स्कूल हैं, जिनमें फीस अधिक होने और कठिन प्रवेश परीक्षा के कारण केवल उच्च वर्गीय बच्चे पहुँचते हैं. जबकि संविधान प्राथमिक शिक्षा मुफ्त उपलब्ध कराने को कहता है और यशपाल समिति नर्सरी कक्षाओं में प्रवेश-परीक्षा की परंपरा को बंद कराने की शिफारिश करती है. आलम यह है कि स्कूलों में प्रवेश के लिए बच्चों के साथ-साथ अभिभावकों का भी टेस्ट लिया जा रहा है. उधर यशपाल समिति बस्ते का बोझ कम करने और होमवर्क बंद करने को कहती है, और इधर बच्चे धोबी के गधे बनाये जा रहे हैं तथा माता-पिता बच्चे के होमवर्क के साथ जूझते दिखते हैं. नीति कहती है कि स्कूलों में खेल का मैदान अवश्य हो, तो असलियत ये है कि आधी स्कूलों के पास मैदान नहीं हैं तो आधी स्कूलें मैदानों में ही लगती हैं. एक और विडम्बना है कि छोटे बच्चों को ज्यादा योग्य शिक्षकों की जरूरत होती है लेकिन उन्हें सबसे कम योग्यता वाले शिक्षक मिलते हैं. स्कूली शिक्षा उद्देश्यहीन है, यह हमारी व्यावहारिक जरूरतों को पूरा  नहीं करती. कई लोगों की राय है कि प्राथमिक स्तर के शिक्षकों के लिए मनोविज्ञान का अध्ययन अनिवार्य होना चाहिए और प्राथमिक स्तर पर सिर्फ प्रायोगिक शिक्षा दी जानी चाहिए.

उच्च शिक्षा की हालत भी कम बुरी नहीं है. देश के 80 प्रतिशित महाविद्यालय उच्चशिक्षा के न्यूनतम मानदण्ड भी पूरा नहीं करते. हमारे विश्वविद्यालय और महाविद्यालय बेरोजगार पैदा करने के सबसे बड़े कारखाने हैं.दरअसल भारत में रोजगारोन्मुखी शिक्षा की परम्परा अभी भी ठीक से नहीं बन पाई है. प्रबन्धन की शिक्षा की अपनी सीमाएँ हैं और वह ग्रामीण भारत और छोटे शहरों की आवश्यकता को पूरा नहीं कर पाती है. कुछ लोग तो बेरोज़गारी की समस्या के लिए सरकार की नीतियों से ज़्यादा मध्यवर्ग के प्रतिष्ठा-बोध को दोषी मानते हैं. मध्यमवर्गीय अभिभावक आज भी अपने बच्चों का एम.ए.,एम,एस.सी, पी.एच.डी. होने को अपनी प्रतिष्ठा मानते हैं. जबकि आज के भारत में ये डिग्रियाँ रोज़गार की दृष्टि से निरर्थक साबित हो रही हैं. उन समाजों में जहाँ समय की गति को समझ लिया गया है, वहाँ रोजगार की समस्या इतनी ज्यादा नहीं है. जिन लड़कों को आप टाई बाँधे, चम्मच-कटोरी-तेल-साबुन-वाशिंग पावडर लेकर घर-घर जाकर बेचते देखते हैं , जो लड़के अपने मोटर गैराज खोल रहे हैं, अथवा जो फाइनेंस और बैंकिंग कम्पनियों के एजेन्ट के बतौर आपके घर खाता खुलवाने दौड़े आ रहे हैं, वे सब भी प्रतिष्ठित लोगों के ही बच्चे हैं. इन्हें रोज़गार की कोई समस्या नहीं है. प्रतिष्ठावादी मध्यमवर्ग को तत्काल अपना नज़रिया बदलने की जरूरत है.

बात खत्म करने से पहले एक-दो बच रही बातों पर मुख़्तसर तौर पर पर विचार कर लेना चाहिए. इधर कई तबकों से माग उठती रही है और सरकारें भी इस पर गंभीरता से सोचती रही हैं कि शिक्षा का निजीकरण कर दिया जाये. एक समय यू.जी.सी. तो इस तरह की योजना भी बनाने लगा था कि व्यापारिक प्रतिष्ठान, शिक्षण संस्थाओं को गोद ले लें. इस तरह की माग करने वाले शायद यह सोच रहे होंगे कि ऐसा करने से संविधान की भावना, सबके लिए अनिवार्य शिक्षा, पूरी हो सकेगी और होनहार चरित्रवान युवक-युवतियाँ तैयार हो सकेंगे. लेकिन यह ख़ामख़याली है. औद्योगिक घरानों के हाथों में जाने से शिक्षण संस्थाएँ उनके लिए एक नये मासूम और विवश बाजार की तरह सुलभ हो जायेंगी. औद्योगिक घरानों को अपने उत्पादों के लिए विज्ञापन का विस्तृत एवं फायदेमंद क्षेत्र आसानी से मिल जायेगा. मुमकिन है कि आपको ऐसा दृश्य भी दिखे कि किसी शराब कम्पनी द्वारा गोद लिए गए स्कूल के बच्चों को उसका मोनो लगाना पड़े ! और विल्स वर्ल्ड कपया गोल्ड फ्लेक ओपन टेनिस की तर्ज़ पर विल्स छात्र और गोल्ड फ्लेक छात्रमिल जायें. अधिक फीस का रोना अभिभावक अभी रोते है, निजीकरण के बाद किस तर्क से वह कम हो जायेगी—मेरी समझ से तो बाहर है.

बहुत समय से भारतीय शिक्षा में एक प्रयोग करने का विचार चल रहा है—यौन शिक्षा देने का. भारतीय मानस इस पर इतना सकुचाया हुआ है कि वह बात करने में बी लजाता है. अधिकांश लोग यौन-शिक्षा के पक्ष में नहीं हैं, और जो पक्ष में हैं, वे भी नाम गुप्त रखने की शर्त पर ही बातचीत के लिए तैयार होते हैं. यौन-शिक्षा को लेकर कुछ भ्रम लोगों के मन में हैं. खासे पढ़े-लिखे लोग भी यह सोचते हैं कि यौन-शिक्षा जब दी जायेगी तो उसमे अश्लील साहित्य के चक्रवर्ती लेखक मस्तराम जैसी भाषा का उपयोग किया जायेगा और उसके बाद बच्चों को अभ्यास के लिए खुला छोड़ दिया जायेगा. अथवा इन्हें डर है कि इनके जीवन के अत्यन्त अन्तरंग और गोपन रहस्य बच्चों के सामने खुल जायेंगे !!. शिक्षक भी दुविधा में हैं कि उस तरह की गन्दी बातेंवे कैसे पढ़ायेंगे. यही वज़ह है कि यौन-शिक्षा के पक्ष में जनमत नहीं बन पा रहा है. लोग यह नही समझ पा रहे हैं कि यौन शिक्षा, जीव-विज्ञान के विषय के रूप में होगी और मनुष्य की जनन क्रियाओं का विवेचन उसी तरह किया जायेगा जैसे नाक-कान अथवा हृदय के कार्यों का किया जाता है. और यह वैसा ही नीरस और अनुत्तेजक होगा जैसे शरीर के अन्य अंगों का होता है.

सरकारों की भी अपनी मज़बूरी है. कोई परीक्षा पास करके तो सरकार बनती नहीं है. सरकार बनती है राजनीतिक प्रक्रिया से. इसलिए सरकार के लिए अपने राजनीतिक हित ही सर्वोपरि होते हैं. शिक्षा का क्षेत्र भी अब राजनीतिक लाभ के क्षेत्र के रूप में पहचान लिया गया है. जो पैसा स्कूलों की दशा सुधारने और अच्छे शिक्षकों के लिए खर्च किया जाना चाहिए उसे सरकार बच्चों और उनके अभिभावकों में बाँट रही है. देखिए कैसी विडम्बना है कि जिस स्कूल में भवन नहीं है, पानी की सुविधा नहीं है, शिक्षक नहीं हैं, उसी स्कूल का हर छात्र पाँच से सात हजार रुपये छात्रवृत्ति-साइकिल-गणवेश-भोजन-किताबों के बहाने पा रहा है. हकीकत ये है कि ये पैसे छात्रों के अभिभावक अपने उपयोग में खर्च  करते हैं. सरकार यह समझती है कि विश्व बैंक और यूनिसेफ से मिले इन पैसों से उसने अपने वोट बैंक को और मजबूत कर लिया है. गांवों की हालत इतनी खराब है कि वहाँ लोग बच्चों को पढ़ाने की ज़गह मज़दूरी में लगाना ज़्यादा ठीक समझते हैं, कम से कम दो वक्त की रोटी तो जुट सकेगी. छात्रवृत्तियाँ लेने के लिए बच्चों का नाम स्कूल में लिखवा ज़रूर देते हैं, लेकिन ये बच्चे कभी-कभार ही स्कूल जाते हैं. कागज़ पर हिसाब-किताब दुरुस्त रखा जाता है और विश्व बैंक और यूनिसेफ तक बढ़िया चमचमाती रिपोर्ट पहुँचती है हमारे विकास की.




बहरहाल ! आजादी के बाद देश में शिक्षा के विकास को संतोषजनक भी मानना मुश्किल है. नीति-निर्धारकों को मैकाले के भूत से पीछा छुड़ाना होगा और भारतीय बच्चों के लिए ऐसी शिक्षा की व्यवस्था करनी होगी जो उन्हें आत्महत्या के मुकाम तक न पहुँचाए, उन्हें बेहतर और मजबूत इंसान बनाए. हमारे बच्चों को ऐसी शिक्षा की ज़रूरत है जो उन्हें रोजमर्रा की दिक्कतों का सामना करने लायक बना सके. हमारे बच्चों के भीतर नागरिक-बोध पैदा हो. समाज और समाज में हो रहे बदलावों से तालमेल बैठा सकें.ऐसी शिक्षा की ज़रूरत है जो बच्चों के भीतर के रस को सुखाए बिना उन्हें अपने पैरों पर खड़ा कर सके. और यह सब कम से कम खर्चे में उपलब्ध होना चाहिए. सरकार को भी यह समझना होगा कि अगर वो ऐसे शिक्षित और स्वस्थ नागरिक देश के लिए तैयार कर सकी तो फिर देश को आगे बढ़ने के लिए किसी की मदद की ज़रूरत नहीं होगी. मध्यमवर्गीय मानस को भी अपनी प्रतिष्ठा अपने बच्चों के भविष्य की कीमत पर नहीं प्राप्त करनी चाहिए. लेकिन सबसे पहले उस भेदभाव को खत्म करने की ज़रूरत है जो गुलामी के दिनों से ही उच्चवर्ग और सामान्य जनता के शिक्षण में किया जा रहा है.
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