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Friday, 15 June 2012

भाग न बाँचे कोय !


 कई बरस पहले शहर में एक बड़े नामी बाबा पधारे. बिहार के रहने वाले थे. भाग्य बाँचने और भविष्य सुधारने में महारथी माने जाते थे. कुंडली देखना, बनाना, और तदनुसार यज्ञ-हवन-जाप-रत्नादि का विधान करवाते थे. लोगों की शक्ल देख कर मुस्कुराते हुए झट से भाई-बहनों की संख्या, पेशा, माता-पिता से संबन्धित जानकारी बता देते थे. इस कौतुक के लिए न तो उन्हें कुंडली देखनी पड़ती थी न हाथ.

बाबा आये तो रेडियो कॉलोनी मे अपने एक चेले के यहाँ डेरा जमाया. जैसे-जैसे लोगों को खबर होती गई, तो भूत-भविष्य को लेकर परेशान रहने वाले लोगों का तांता लगने लगा. किसी का गुरु वक्री था, किसी को राहु की महादशा चल निकली. किसी को शनि की साढ़े साती चल रही थी तो किसी का मंगल नीच का था. कोई ऐसा नहीं जिसको कोई न कोई बाधा न हो, और ऐसी कोई बाधा नहीं थी जिसका उपाय बाबा के पास न हो. बाबा तरह-तरह के यज्ञ-जाप-हवन आदि के उपाय बताते. अब साधारण नौकरीपेशा, दुकान-धंधा करने वाले संसारी मनुष्य से यज्ञ-जाप-हवन कहाँसधता है ! ज़रा सी भी चूक हो गई तो लेने के देने पड़ जायें......तो बाबा ही ठेका ले लेते थे यथाविधि यज्ञादि करने का. इसका सबसे बड़ा लाभ यह था कि पीड़ित का काम-धंधा भी प्रभावित नहीं होता था. बाबा उसके नाम से सारे कृत्य सम्पन्न करा देंगे. बस उसे सारे बिधान का एक मुश्त खर्च बाबा के पास जमा करा के निश्चिन्त होना होता था. लोगों के लिए बड़ा सुविधाजनक रास्ता खोल दिया था बाबा ने.

मेरा एक मित्र था.  उसके पिता PWD में इंजीनियर थे. बेहिसाब रुपया घर में आ रहा था. फिर भी न जाने कौन सी बाधाएँ थीं घर में कि अक्सर कोई न कोई पूजा-पाठ, महाम़त्युंजय जाप आदि घर में चलता ही रहता. मेरा मित्र खुद जिस कक्षा में था उसमें दो बार फेल हो चुका था. जबकि इसके पहले वाली कक्षा भी तीसरे प्रयास में उत्तीर्ण करने के बाद मेरा क्लासफेलो बना था. इस लिहाज से उम्र और अनुभव में वो मुझसे बड़ा था. बड़ा नेकदिल था. आधी रात को भी किसी की मदद करने को हाजिर रहता. मेरे लिए उसका स्कूटर सबसे बड़ा आकर्षण था, जिसमें मैं दिन भर घूमा करता. हमारी मित्र मंडली में अक्सर लोगों को उसी के मार्गदर्शन में चलना पड़ता था.

बाबा आये तो मेरा मित्र भी उनके पास गया. और बाबा ने उसकी बाधा के मुताबिक कोई जाप भी शुरू कर दिया था. वह लगभग दिन भर बाबा के ही पास  रहता और शहर भर से अपने परिचितों को भी उनके पास ले जाता. हालाँकि मेरा इन सब बातों पर विश्वास नहीं था, पर एक दिन वह मुझे भी पकड़ ले गया....यूँ ही घुमाने के बहाने.

बाबा अन्दर के कमरे में विराजते थे. दरवाज़ा बंद रहता था. धूप और अगरबत्ती की खुशबू बाहर के कमरे और उसके बाहर बरामदे, और उसके बाहर लॉन और पेड़ों तक बिखरती रहती थी. जिनका नम्बर कुछ ही देर बाद लगना होता वो दूसरे नम्बर के कमरे में बुला लिए जाते थे. जिन्हें नम्बर लगाना होता था वो बरामदे में होते. और  जो कौतूहलवश पहुँचते वे पेड़ों के इर्द-गिर्द बैठे या खड़े होते. मुझे अंदाज़ा नहीं था कि मेरे मित्र की धाक इतनी जमी हुई है कि मुझे सीधे दूसरे नम्बर के कमरे में पहुँचा देगा. मैं बैठ गया. कुछ और लोग भी बैठे थे. बाबा के दो-तीन चेले भी साधुवेश में वहीं बैठे लोगों से हँसी ठिठोली करते. किसी का हाथ देखते, किसी की पेशानी....या किसी की गुप्त परेशानी पूछकर मुस्काते.....कुछ देर में एक चेले ने मेरे दाहिने हाथ को नरमी से पकड़ा और हथेली की रेखाएँ देखने लगा..... 
कुछ देख कर बोला—“ क्यों महराज, दो-भाई, एक-बहन है तुम्हारे ?”
मैने कहा—नहीं तीन-भाई, एक-बहन.....वो मुस्कुराया.
“ पापा बैंक में हैं ?” उसने फिर कहा.
“ नहीं टीचर हैं.”…मैने कहा......वो फिर मुस्कुराया.
“ और माता ?”_____
वो भी टीचर है-----मैने कहा....वो मुस्कुराता रहा.
“ प्यार करते हो किसी को ?”------ मैने कहा—हाँ...
“ दूसरी जाति की होगी ?”
“ मेरी ही जाति की है “---मैने बताया.
इस बार वो हँसा---“ चिन्ता न करो, बाबा सब ठीक कर देंगे..”----कहता हुआ वो वहाँ से उठ गया.
मैं सोचने लगा कि मेरा तो कुछ गड़बड़ ही नहीं है, बाबा क्या ठीक कर देंगें !!

इतने में एक दूसरा चेला एक कागज और पेन लेकर आया और उसमें मेरा नाम, जन्मतिथि, जन्म का स्थान और समय लिख कर ले गया.

लगभग दो घंटे बाद बाबा ने मुझे भीतर बुलवाया, तो मुझे डर लगा. मैने अपने मित्र की तरफ देखा तो उसने पीठ पर धौल जमाते हुए कहा कि चल,मैं भी चलता हूँ. मैं अन्दर चला गया. बाबा ज़मीन पर ही आसन जमाये बैठे थे. बगल में एक चौकी पर तरह-तरह के देवता विराजे थे. बाबा के पास कुछ पोथियाँ और पत्रे पड़े हुए थे. मुझे सामने बैठने का इशारा किया. मेरे बैठते ही सीधे मेरी आँखों में अपनी नज़रें उतार दीं......मुस्कुराते हुए कहने लगे-----“ ब्राह्मन हो...बहुत बर्हिया.....माँ-बाप मास्टर हैं ?.....पर तुम बड़े भाग्यशाली हो.....कितने, तीन-भाई, एक-बहन हैं ?..... ‘ हाँ.’…..एक भाई से बड़ा सुख मिलेगा......और परेम भी करते हो..?..... ‘ हाँ.’……लड़की ब्राह्मन ही है, पर तब भी कुछ बाधा है.......”--------------  
मैं भौंचक ! इन्हें सब कैसे पता !?-------लोग ठीक ही कहते थे.
बाबा आगे बोले---“ ये तुम्हारा कुंडली बना दिया है. बाकी सब ठीक है पर कुछ बाधाएँ हैं. ठीक हो जायेंगी, एक जाप करा लो. कोई पंडित हो तो घर में करा लो. लेकिन कोई कुधरम नहीं होना चाहिए ! नहीं तो हम खुद करवा देंगे जाप तुम्हारे नाम से....51,00 रुपये का जाप है....बोलो तो शुरू करवा दें !!”-----------मेरी हलक से कुछ निकल नहीं रहा था. मैने धीरे से कहा—“ पापा से पूछ लें !”
वो कागज़ जिस पर उन्होने कुंडली बनाई थी, मुझे पकड़ाते हुए बाबा बोले—“जैसी मर्ज़ी..”
मैं बाहर निकल आया. उनके चेले मुस्कुरा रहे थे. मैं रुका नहीं, सीधे घर आ गया. पापा से भी कुछ बताया नहीं. जल्दी ही मन संयत हो गया.

एक  दिन कइयों के हवन-जाप, रुपया-पैसा, श्रद्धा-विश्वास  समेटकर बाबा अन्तर्ध्यान हो गये......चमत्कारी तो वो थे ही इस लिए लोगों को अचंभा नहीं हुआ.....लोग  निराश तो तब हुए जब पता चला कि बाबा के स्थानीय चेले भी भूमिगत हो गये हैं.


कई वर्षों बाद, कल, कुछ पुरानी फाइलें ढूढ़ते हुए मुझे वो कागज़ मिला जिस पर बाबा ने मेरी कुंडली बनाई थी और फलादेश लिखा था. मैने पढ़ा तो मज़ेदार लगा. आप भी पढ़िए इसे------------------


भइया दुबेदी की कुंडली
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....आप का कुंडली बृस्चीक लग्न में तैयार हुआ है....लग्नपती श्वामी मंगल है जो अष्टमघर मे (मृत) गर मे है.....जीससे आप का जो सरीर संबन्धी कमजोरी है । वह मंगल के प्रती है प्रन्तू उसका यहा तक सीमीत रहना ठीक है । कारण मंगल आप का घातक नही है, फीर भी आप मुगां धारण नहीं करना......आपका मागेंश चन्द्रमा स्वगृह है तथा अपने घर में है, इसलिए शिछा आप प्राप्त किये हैं तथा अपने से मेहन्त भी अच्छे करते हैं ।

......तथा आप अभी भी आप अपना पैरो पर खडा होने के प्रयास जारी रखे है, प्रन्तू अभी सफलता नहीं मील रहा है । आप का सरवीस अवश्य होगी तथा गौरमेन्ट सारीवस या उच्च स्थान का प्राइवेट सरवीस का भी योग्य है ।




........जो आप अपन पैर पर खडा होकर अपना नाम ऊचा करेगे प्रन्तू आपको दो तरह का कुंडली से प्रेशानी 31 वर्ष के उम्र तक आ सकता है  जो जहा भी अपना सरवीस या परिछा हेतू अभी गये होगे, कोई न कोई अड़चन अवश्य उतपन हुआ होगा ।

.......पहला ग्रह धन स्थान मे गुरु अपने घर मे बैठकर आप के जन्मकाल से बक्री है । जीसे नीर्वल कहते है तथा कुंडली में गुरु वक्र होना (रुष्ट) होना ठीक नही होता है। और धन स्थान मे गुरु है जहा से धन संग्रह कीया जाता है। तथा धन उपारजन का लक्ष्य बनाया जाता है।

......दुसरा आपके पूनवर्सू नक्षत्र मे चौथा वर्ण मे जन्म है जीससे आप गुरु के महादसा में जन्म है जीससे आप गुरु का महादसा मे जन्म लेकर आज वुद्ध के महादसा मे चल रहे है। वुद्ध आपका लामेस पती है, यह लाभ देगा प्रन्तू उसी तरह योगिनी का महादसा होता है जो अभी संकठा का महादसा चल रहा है जो 25 वर्ष के उम्र से सुरू होकर 33 वर्ष के उम्र तक चलेगा । और वुद्ध का महादसा 38 वर्ष तक चलेगा। यह दसा उतम फल देगा प्रन्तू इस वुद्ध के दसा से फल उतम उठाने के लीये आप संकठा को दमन करे तथा गुरु को बलीष्ट करे तो उतम रहेगा। पुत्रन जाप कराने मे खर्च तो पड़ेगा प्रन्तू लाभ तथा शान्ती बनेगी । आप मंगला भी है प्रन्तू हलका है।

.......फीर भी कुंडली मिलाकर सादी का योग्य बनेगा. उतम सादी 28 के उम्र से 30 के उम्र तक होगा. संतान 5 रहेगे. दोनो मीलकर पितामाता अभी जीवित होगे । पिता भी जीवन पहला सरवीस से लेकर चलेगे। भ्राता तीन रहेगे. 1 भाई से प्रबल सुख्य आनन्द रहेगा। आप दयालू है तथा उपकारी भी है ।

आगे के भभीष्य ठीक है। अगर आप अपना उथान मे प्रेशानी से बचना चाहते है। तो संकठा दसा को शान्ती तथा गुरु को प्रवल करने का उपचार करेगे, आप अपना नगर के पंडीत से भी सलाह अपना कंडली दीखाकर लेगे ।
उम्र—77 वर्ष से 82 वर्ष का है ।
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सालों बाद जब इस फलादेश को पढ़ा तो खूब हँसी आयी.
अब जबकि जीवन में अप्रत्याशित होने के लिए सिर्फ दुर्घटनाओं की ही संभावना बचती है......किसी अप्रत्याशित सुख की कल्पना करना अपना ही मज़ाक उड़ाने जैसा ही लगता है. बाबा की अधिकांश भभीष्यवाणियाँ घटित नहीं हुईं.....
जीवन में कई चीजें नहीं मिलीं तो इसलिए कि उन्हें पाना ही नहीं चाहा....कई चीज़ें इसलिए नहीं मिली कि मैं उनके योग्य नहीं था.....कई चीज़ें ऐसी मिल गईं जो किसी काम की नहीं हैं..... लेकिन कुछ छोटी-छोटी ऐसी चीज़ें नहीं मिलीं जिन्हें पाना चाहा और जिनके योग्य भी था......
फिलहाल इन्हीं का दुख भी होता है कभी-कभी.....अहोभाग्यम्.......।

हाँ.....मेरा वो मित्र उस कक्षा में तीसरी बार फेल हो गया था....और फिर आगे पढना ही छोड़ दिया. इस समय एक आयल एजेन्सी का मालिक  है.

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