Pages

Thursday, 19 September 2013

जिस आवाज़ को सुनने वाला कोई न हो

जिस आवाज़ को
सुनने वाला कोई न हो
उसे गुम हो जाना चाहिए
अपनी ही स्वरपेटी में ।

उसे नहीं देखना चाहिए
सात स्वरों का समन्दर
और हवा अगर कान में कुछ कहे
तो उसे अनसुना कर देना चाहिए ।

जिस आवाज़ को
सुनने वाला कोई न हो
उसे बन्द कर लेने चाहिए
सारे खिड़की दरवाज़े
और रौशनी के सारे सूराखों में
डाल देनी चाहिए
पिघली हुई मोम ।

उसे बैठना चाहिए कुछ देर
अपनी ही आवाज़ के अँधेरे में ।

इसी अँधेरे में मिलेंगे
कुछ ऐसे लोग
जिनकी ज़ुबानें
काट ली गई थीं
एक मौन जुलूस में
शामिल होने के अपराध में ।

जिस आवाज़ को
सुनने वाला कोई न हो
उसे शामिल हो जाना चाहिए
इन्हीं बेज़ुबान लोगों के मौन में,
नक्शे के मुताबिक
उसे चलते जाना चाहिए
अँधेरे की रौशनी में
जंगलों और पहाड़ों के बीच से ।


उसे तब तक
कोई सवाल नहीं करना चाहिए
जब तक उसके बेज़ुबान साथी
आवाज़ों के किले पर
उसे फहरा नहीं देते
विजय पताका की तरह ।
Post a Comment