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Thursday, 2 January 2014

मैं कुछ कम रह जाना चाहता हूँ !

काल के अनिश्चय से
कुछ निश्चित को पा लेने की 
हमारी आदिम ज़िद
अक्सर प्रार्थना की तरह फूटती है
हमारी समूची शौर्यगाथा के
नेपथ्य से ।

अभी अभी जो जन्मा है
एक नया साल
उसकी हँसी में झड़ते हैं
हमारी विजय के फूल
और उसके अयाचित रुदन में
मनुष्य की चूकों के गीत हैं ।

इन चूकों का
मैं एक आत्म-समर्पित मुजरिम
ढूढ़ना चाहता हूँ
उन गौरैय्यों को
जिनको आँगन से विदा लेते
देखा भी नहीं किसी ने ।

अंतरिक्ष के
किसी गोपन अवकाश में
मैं छुपा देना चाहता हूँ
अपने समय के विश्वसनीय शब्दों को ।

मुझे प्रेम करने वाली स्त्री को
मैं उस वक्त देना चाहता हूँ
एक चुम्बन
जब प्रेम-द्रोह की
सज़ा तामील करने से पहले
मेरी अंतिम इच्छा पूछी जायेगी ।

मैं कुछ झूठ सीखना चाहता हूँ
जिन्हें सच की तरह बोल सकूँ
उन लम्हों में
जब एक बच्चा
मुझे लाचार और निरुत्तर छोड़ देता है ।
उस नौजवान दोस्त से
जो तीन बार जान देने की
कोशिश कर चुका है ।
उस आग से
जो तब्दील होती जा रही है राख में ।

देखता हूँ
साल दर साल
समुद्र में बची रहती है थोड़ी प्यास
अनगिन नक्षत्र है
उसके बाद भी
सबके लिए थोड़ा खाली है आकाश 
जिस्म से निकलने के बाद
खून में बची रहती है थोड़ी हरारत
हवा कितना चलती है
फिर भी कम रह जाती है कुछ दूरी ।

नये साल में भी
मैं कुछ कम रह जाना चाहता हूँ ।।
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