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Tuesday, 11 September 2012

अनुनाद

एक तितली गूँजती है
फूल की पंखुड़ियों पर
तो रंग खिलखिलाते हैं ।

चन्द्रमा गूँजता है
पृथ्वी की कक्षा में 
तो रोशनी मुस्कुराती है
गहरी रात में भी ।

धरती के भार में गूँजता है बीज
तो साँसें लय मे होकर
आ जाती हैं सम पर ।

समुद्र के भीतर गूँजता है अतल
तो पानी का संगीत बजता है ।

भोर की पत्ती पर
गूँजती है ओस की बूँद
तो सूरज जागता है ।

देह के भीतर
गूँजती है देह
तो जनमता है
जीवन का अनुनाद ।
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